Dialogue between Shri Ram and Hanuman after the Ramayana war in Hindi Short Stories by Prithvi Nokwal books and stories PDF | रामायण युद्ध के पश्चात श्री रामजी और हनुमानजी का संवाद

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रामायण युद्ध के पश्चात श्री रामजी और हनुमानजी का संवाद

यहाँ युद्ध के बाद भगवान श्रीराम और हनुमान जी के बीच संवाद प्रस्तुत है — भावपूर्ण, भक्तिरस से युक्त और लगभग 

लंका का युद्ध समाप्त हो चुका था।
रावण का अंत हो गया था, अधर्म पर धर्म की विजय हो चुकी थी। लंका की भूमि शांत थी, पर उस शांति में भी युद्ध की स्मृतियाँ गूँज रही थीं। समुद्र से आती शीतल वायु जैसे थके हुए योद्धाओं को विश्राम का संदेश दे रही थी।
भगवान श्रीराम एक शिला पर बैठे थे। उनके नेत्रों में करुणा थी, मुख पर शांति, किंतु हृदय में गहन विचार। तभी हनुमान जी हाथ जोड़कर उनके समीप आए।
हनुमान जी:
“प्रभु, आपकी कृपा से यह दास आज कृतार्थ हुआ। अधर्म का नाश हुआ, माता सीता मुक्त हुईं। यदि आज मेरे प्राण भी चले जाएँ, तो भी जीवन सफल है।”
श्रीराम (मुस्कराते हुए):
“हनुमान, तुम स्वयं को दास कहते हो, परंतु तुम मेरे लिए भाई भरत के समान हो। यदि तुम्हारा बल, बुद्धि और भक्ति न होती, तो यह कार्य इतना सरल न होता।”
हनुमान जी का मस्तक झुक गया, नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।
हनुमान जी:
“प्रभु, यह सब आपकी ही शक्ति है। मैं तो केवल माध्यम था। जैसे वायु बिना आपकी इच्छा के पत्ता भी नहीं हिला सकती, वैसे ही मैं बिना आपकी आज्ञा कुछ नहीं कर सकता।”
श्रीराम:
“नहीं हनुमान। ईश्वर भी कर्म के बिना फल नहीं देता। तुमने निस्वार्थ भाव से सेवा की। न कभी फल चाहा, न यश। यही सच्ची भक्ति है।”
कुछ क्षणों का मौन छा गया। फिर श्रीराम ने गंभीर स्वर में कहा—
श्रीराम:
“हनुमान, क्या तुम जानते हो कि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन सा है?”
हनुमान जी:
“प्रभु, शायद बाहरी शत्रुओं से लड़ा जाने वाला युद्ध?”
श्रीराम (धीरे से):
“नहीं। सबसे बड़ा युद्ध है—अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह से। रावण बाहरी शत्रु था, पर ऐसे रावण प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी निवास करते हैं।”
हनुमान जी ध्यानमग्न हो गए।
हनुमान जी:
“प्रभु, आपने सत्य कहा। जब तक मनुष्य अपने भीतर के रावण को नहीं मारता, तब तक कोई विजय पूर्ण नहीं होती।”
श्रीराम:
“इसीलिए हनुमान, तुम्हें आने वाले युगों में आदर्श बनाया जाएगा। तुम शक्ति के प्रतीक हो, पर उससे भी अधिक भक्ति और विनम्रता के।”
हनुमान जी ने विनयपूर्वक कहा—
हनुमान जी:
“यदि कोई मुझे स्मरण करे, तो वह आपको ही पाए। मेरी कोई पहचान नहीं, मेरी पहचान केवल आपकी सेवा है।”
श्रीराम उठे और हनुमान जी के कंधे पर हाथ रखा।
श्रीराम:
“हनुमान, वर मांगो। तुम्हारी सेवा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।”
हनुमान जी ने तुरंत उत्तर दिया—
हनुमान जी:
“प्रभु, मुझे न स्वर्ग चाहिए, न मोक्ष। बस इतना वर दीजिए कि जहाँ-जहाँ आपकी कथा हो, वहाँ-वहाँ यह दास उपस्थित रहे।”
श्रीराम की आँखें भर आईं।
श्रीराम:
“तथास्तु! जब तक रामकथा रहेगी, तब तक हनुमान अमर रहेंगे। संसार तुम्हें संकटमोचन के रूप में पूजेगा।”
हनुमान जी ने चरणों में शीश रख दिया।
हनुमान जी:
“प्रभु, जब-जब धर्म डगमगाए, मुझे अपनी सेवा में बुलाइएगा।”
श्रीराम:
“तुम सदा मेरे हृदय में वास करते हो, हनुमान। युग बदलेंगे, रूप बदलेंगे, पर राम और हनुमान का संबंध सदा अटूट रहेगा।”
सूर्य अस्त हो रहा था। आकाश के रंग बदल रहे थे। युद्ध की धूल अब शांति में परिवर्तित हो चुकी थी। श्रीराम और हनुमान जी साथ-साथ खड़े होकर उस नए प्रभात की प्रतीक्षा कर रहे थे—जहाँ धर्म, भक्ति और प्रेम का संदेश युगों तक गूँजने वाला था।