नचे श्रीकृष्ण–अर्जुन–दुर्योधन संवाद पर आधारित नारायणी सेना माँगने का प्रसंग
**श्रीकृष्ण, अर्जुन और दुर्योधन का संवाद
(नारायणी सेना का प्रसंग)**
द्वारका की प्रातःकालीन वेला थी। समुद्र की लहरें जैसे किसी अनहोनी की सूचना दे रही थीं। कुरुक्षेत्र के युद्ध का समय निकट आ चुका था। पांडव और कौरव—दोनों ही अपने-अपने पक्ष को सुदृढ़ करने में लगे थे। इसी उद्देश्य से अर्जुन और दुर्योधन, दोनों ही श्रीकृष्ण से सहायता माँगने द्वारका पहुँचे।
द्वारका में प्रवेश करते ही दोनों के मन में अलग-अलग भावनाएँ थीं।
अर्जुन के हृदय में विश्वास था—“कृष्ण जहाँ हैं, वहाँ विजय निश्चित है।”
दुर्योधन के मन में लोभ था—“कृष्ण की नारायणी सेना यदि मुझे मिल जाए, तो पांडवों का अंत निश्चित है।”
दोनों एक साथ श्रीकृष्ण के महल पहुँचे। उस समय श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे। द्वारपाल ने बताया कि वे शयनावस्था में हैं।
अर्जुन ने विनम्रता से कहा,
“जब तक माधव जागें, मैं यहीं चरणों में बैठकर प्रतीक्षा करूँगा।”
वह श्रीकृष्ण के चरणों की ओर बैठ गया।
दुर्योधन ने सोचा—
“यदि मैं उनके सिरहाने बैठूँ, तो जागते ही पहले मुझे देखेंगे।”
वह श्रीकृष्ण के सिर की ओर आसन जमाकर बैठ गया।
कुछ समय पश्चात श्रीकृष्ण की आँखें खुलीं। उनकी दृष्टि पहले चरणों की ओर गई और उन्होंने अर्जुन को देखा।
श्रीकृष्ण (मुस्कुराते हुए):
“आओ पार्थ! कब आए? और इस समय द्वारका आने का कारण?”
अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा,
“माधव! धर्म की रक्षा के लिए आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।”
तभी दुर्योधन ने शीघ्रता से कहा,
“कृष्ण! मैं भी यहाँ आपसे सहायता माँगने आया हूँ।”
श्रीकृष्ण ने तब दुर्योधन की ओर देखा और मंद मुस्कान के साथ बोले,
“अरे दुर्योधन! तुम भी आए हो? बैठो, दोनों की इच्छा एक ही जान पड़ती है।”
कुछ क्षण का मौन छा गया। फिर श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा—
“मुझे ज्ञात है कि तुम दोनों कुरुक्षेत्र युद्ध की तैयारी में हो। अतः मैं स्वयं तुम्हें प्रस्ताव देता हूँ। मेरे पास दो वस्तुएँ हैं—
एक, मेरी विशाल नारायणी सेना।
दूसरा, मैं स्वयं—निहत्था, शस्त्र न उठाने का व्रत लेकर।
अब तुम दोनों में से जो चाहे, पहले अपनी पसंद बताए।”
दुर्योधन मन ही मन प्रसन्न हुआ। उसने सोचा—
“अर्जुन मूर्ख है, वह कृष्ण को चुनेगा। सेना तो मुझे ही मिलेगी।”
अर्जुन ने कुछ कहने से पहले श्रीकृष्ण की ओर देखा। वह उनके नेत्रों में झाँकने लगा—वहाँ न सेना थी, न शस्त्र—वहाँ केवल धर्म था।
अर्जुन (नम्र स्वर में):
“माधव! यदि अनुमति हो, तो पहले दुर्योधन अपनी बात रखें।”
दुर्योधन तुरंत बोला—
“कृष्ण! मुझे आपकी नारायणी सेना चाहिए। ग्यारह अक्षौहिणी सेना, शस्त्रों से सुसज्जित, अपराजेय!”
यह कहते समय दुर्योधन का मुख गर्व से चमक रहा था।
श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में कहा,
“ठीक है दुर्योधन, नारायणी सेना तुम्हारी।”
अब श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा।
“पार्थ! अब तुम्हारी बारी है।”
अर्जुन ने बिना किसी क्षण की देरी के कहा—
“माधव! मुझे न सेना चाहिए, न शस्त्र। यदि आप मेरे सारथी बन जाएँ, तो वही मेरे लिए पर्याप्त है।”
यह सुनते ही सभा में एक विचित्र सन्नाटा छा गया।
दुर्योधन हँस पड़ा—
“अर्जुन! तुम कितने मूर्ख हो! बिना हथियार के कृष्ण तुम्हारे क्या काम आएँगे? युद्ध में उपदेश नहीं, सेना काम आती है।”
अर्जुन ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“दुर्योधन, जिसे धर्म का रथ चलाने वाला मिल जाए, उसे सेना की क्या आवश्यकता?”
श्रीकृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले—
“पार्थ, तुमने सही चयन किया है। और दुर्योधन, तुमने भी वही चुना, जिसकी तुम्हें आकांक्षा थी।”
दुर्योधन ने गर्व से कहा—
“कृष्ण! देखना, मेरी सेना पांडवों को मिटा देगी। तब धर्म, नीति, सब व्यर्थ सिद्ध होंगे।”
श्रीकृष्ण का स्वर अब गंभीर हो गया—
“दुर्योधन! सेना बल देती है, पर विवेक नहीं। जहाँ विवेक नहीं, वहाँ विनाश निश्चित है।”
दुर्योधन ने उपहास किया—
“विनाश पांडवों का होगा, माधव!”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा और बोले—
“पार्थ! स्मरण रखना—
युद्ध केवल शस्त्रों से नहीं जीते जाते।
धर्म, धैर्य और नीति—इनसे विजय प्राप्त होती है।”
अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा—
“आप ही मेरा शस्त्र हैं, केशव।”
दुर्योधन उठ खड़ा हुआ। जाते-जाते बोला—
“कृष्ण! जब मेरी सेना गदा और बाणों से रणभूमि भर देगी, तब तुम्हारी नीति कहाँ होगी?”
श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“जहाँ अधर्म होगा, वहाँ मेरी नीति स्वयं प्रकट होगी।”
दुर्योधन द्वारका से प्रसन्न होकर लौटा। उसे लगा—वह युद्ध पहले ही जीत चुका है।
अर्जुन कुछ क्षण रुका। फिर बोला—
“माधव, क्या मैं सच में सही हूँ? बिना सेना के युद्ध…”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा—
“पार्थ! जब सारथी स्वयं धर्म हो,
तो रथ कभी हारता नहीं।”
अर्जुन के नेत्रों में आँसू थे—विश्वास के, समर्पण के।
यहीं से कुरुक्षेत्र की वह कथा आरंभ हुई, जहाँ नारायणी सेना होते हुए भी दुर्योधन हार गया,
और निहत्थे श्रीकृष्ण के होते हुए पांडव विजयी हुए।
क्योंकि अंततः
सेना नहीं, धर्म जीतता है।