The famous dice game episode from the Mahabharata: Duryodhana and Yudhishthira in Hindi Short Stories by Prithvi Nokwal books and stories PDF | महाभारत का प्रसिद्ध पासा क्रीड़ा प्रसंग: दुर्योधन और युधिष्ठिर

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महाभारत का प्रसिद्ध पासा क्रीड़ा प्रसंग: दुर्योधन और युधिष्ठिर

महाभारत का प्रसिद्ध पासा क्रीड़ा प्रसंग: दुर्योधन और युधिष्ठिर
महाभारत: जब धर्म पासों की चाल में उलझ गया
हस्तिनापुर का राजमहल उस दिन असामान्य रूप से शांत था। आकाश में बादल घिरे थे, मानो प्रकृति भी आने वाले अनर्थ की आहट सुन रही हो। राजसभा को विशेष रूप से सजाया गया था। स्वर्ण जटित स्तंभ, रेशमी परदे और दीपकों की मद्धिम रोशनी—सब कुछ वैभवपूर्ण था, पर उस वैभव के पीछे एक गहरी साजिश छिपी हुई थी।
दुर्योधन अपने कक्ष में अधीरता से टहल रहा था। उसके मन में वर्षों से पांडवों के प्रति ईर्ष्या की ज्वाला धधक रही थी। इंद्रप्रस्थ की समृद्धि, युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ और जनता का प्रेम—ये सब दुर्योधन को भीतर ही भीतर जला रहे थे। तभी शकुनि प्रवेश करता है।
“भांजे,” शकुनि ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, “शस्त्रों से नहीं, बुद्धि से युद्ध जीता जाता है। और बुद्धि का सबसे बड़ा अस्त्र है—पासा।”
दुर्योधन की आँखों में चमक आ गई।
“मामा, क्या युधिष्ठिर इस खेल के लिए तैयार होंगे?”
शकुनि हँसा।
“धर्मराज पासे खेलने से मना नहीं कर सकते। क्षत्रिय के लिए निमंत्रण ठुकराना अपमान होता है।”
निमंत्रण
कुछ ही दिनों में युधिष्ठिर को हस्तिनापुर से आमंत्रण प्राप्त हुआ। पत्र पढ़ते ही उनके हृदय में आशंका जाग उठी। वे पासों के खेल से परिचित थे और जानते थे कि यह उनके लिए दुर्बलता का कारण बन सकता है।
भीम ने तुरंत विरोध किया।
“भैया! यह छल है। दुर्योधन कभी सीधे मार्ग से नहीं चलता।”
अर्जुन ने भी कहा,
“यदि जाना ही है, तो सतर्क रहिए।”
द्रौपदी की आँखों में चिंता थी।
“स्वामी, मुझे यह खेल अशुभ प्रतीत होता है।”
युधिष्ठिर ने गहरी साँस ली।
“मैं क्षत्रिय हूँ। आमंत्रण अस्वीकार नहीं कर सकता। जो होगा, धर्म की इच्छा से होगा।”
राजसभा का दृश्य
राजसभा में दोनों पक्ष आमने-सामने बैठे थे। धृतराष्ट्र सिंहासन पर विराजमान थे, पर उनकी आँखों पर पुत्रमोह का अंधकार छाया हुआ था। भीष्म, द्रोण, विदुर—सब वहाँ थे, पर कोई भी आने वाले संकट को रोक न सका।
शकुनि पासों को हाथ में लेकर बोला,
“आइए धर्मराज, खेल प्रारंभ करें।”
युधिष्ठिर ने शांत भाव से सिर हिलाया।
खेल की शुरुआत
प्रारंभिक दाँव छोटे थे—स्वर्ण मुद्राएँ, रत्न, वस्त्र। हर बार शकुनि जीतता गया। युधिष्ठिर का मन विचलित होने लगा, पर वे खेल से पीछे नहीं हटे।
“राजन्,” विदुर ने सावधानी से कहा,
“अब भी समय है, खेल रोक दीजिए।”
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया,
“जो प्रारंभ किया है, उसे अधूरा छोड़ना धर्म नहीं।”
राज्य का दाँव
धीरे-धीरे खेल भयानक रूप लेने लगा। युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ को दाँव पर लगा दिया—और हार गए। सभा में सन्नाटा छा गया।
दुर्योधन की हँसी गूंज उठी।
“अब आप हमारे अधीन हैं, धर्मराज।”
भीम के हाथ गदा पर कस गए, पर युधिष्ठिर ने उन्हें रोक दिया।
भाइयों की हार
अगले दाँव में युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को दाँव पर लगा दिया—एक-एक करके। नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम—सभी हार गए।
अर्जुन की आँखों में पीड़ा थी, पर उन्होंने भाई की आज्ञा स्वीकार की।
भीम दहाड़ उठा,
“यह अन्याय है!”
पर सभा मौन रही।
स्वयं की हार
अंततः युधिष्ठिर ने स्वयं को दाँव पर लगाया—और हार गए। धर्मराज अब स्वयं दास बन चुके थे।
विदुर का हृदय फटने लगा।
“यह खेल नहीं, अधर्म है!”
पर धृतराष्ट्र चुप रहे।
द्रौपदी का दाँव
अब वह क्षण आया जिसने इतिहास को कलंकित कर दिया।
शकुनि बोला,
“अब क्या बचा है, धर्मराज?”
युधिष्ठिर की दृष्टि भूमि पर थी। क्षण भर के मौन के बाद उन्होंने कहा—
“मेरी पत्नी… द्रौपदी।”
सभा में भूचाल आ गया।
भीष्म स्तब्ध रह गए।
“यह कैसा धर्म है?”
द्रोण ने मुख फेर लिया।
द्रौपदी का प्रश्न
द्रौपदी को सभा में बुलाया गया। वे सरल वस्त्रों में, पर आत्मसम्मान से पूर्ण खड़ी थीं।
उन्होंने गूंजती हुई वाणी में पूछा,
“मैं एक प्रश्न पूछती हूँ—
क्या युधिष्ठिर ने पहले स्वयं को हारा था या मुझे?”
सभा मौन थी। किसी के पास उत्तर नहीं था।
भीष्म ने भारी स्वर में कहा,
“धर्म अत्यंत सूक्ष्म है।”
अपमान और क्रोध
दुर्योधन ने द्रौपदी का अपमान किया। दुःशासन ने उन्हें खींचने का प्रयास किया। द्रौपदी ने आँखें मूँदकर श्रीकृष्ण का स्मरण किया।
चमत्कार हुआ—उनका चीर अनंत हो गया।
भीम ने प्रतिज्ञा की—
“मैं दुःशासन का रक्त पीऊँगा।”
अर्जुन ने कहा—
“मैं कर्ण का अंत करूँगा।”
खेल का अंत, युद्ध की शुरुआत
अंततः धृतराष्ट्र को भय हुआ और उन्होंने पांडवों को वरदान देकर मुक्त किया, पर दुर्योधन ने फिर पासा खेलने की माँग की।
परिणाम वही रहा—
पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला।
समापन
जब पांडव राजसभा से निकले, उनके पास न राज्य था, न वैभव—
पर उनके पास धर्म था।
युधिष्ठिर ने पीछे मुड़कर हस्तिनापुर को देखा और कहा,
“यह हार नहीं, परीक्षा है।
धर्म का सूर्य अस्त नहीं होता।”
और यही पासों की वह क्रीड़ा थी,
जिसने महाभारत के युद्ध का बीज बो दिया—
जहाँ अंततः
अधर्म हारा और धर्म विजयी हुआ।