कोहरे की चादर ने पूरी घाटी को ढका हुआ था। दूर कहीं से आती हुई झरनों की आवाज सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। एक पुरानी लकड़ी की चौकी, जिसकी दीवारें समय की मार से काली पड़ चुकी थीं, वहां दो साये आमने-सामने बैठे थे। मेज पर एक पुराना लालटेन जल रहा था, जिसकी कम रोशनी में केवल चेहरे के हाव-भाव ही नजर आ रहे थे।
मेजर विक्रम ने अपनी चाय का मग टेबल पर रखा और सामने बैठे नौजवान आर्यन की तरफ देखा।
"तो, तुम तैयार हो आर्यन?" विक्रम की आवाज में एक भारीपन था।
आर्यन ने अपनी बंदूक के बोल्ट को चेक किया और सिर उठाकर देखा। "तैयार तो मैं उसी दिन हो गया था सर, जिस दिन मैंने इस वर्दी को पहली बार छुआ था।"
विक्रम मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में दर्द था। "वर्दी पहनना आसान है, इसे उतारना सबसे मुश्किल। खासकर तब, जब तुम्हें पता हो कि शायद कल का सूरज तुम न देख पाओ।"
"सर, क्या सूरज देखना जरूरी है? क्या ये काफी नहीं कि हमारे बाद जो लोग जागेंगे, वो एक आजाद सवेरा देखेंगे?" आर्यन की आंखों में एक अजीब सी चमक थी।
"बातें बड़ी करने लगे हो।" विक्रम ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।
"सीखा भी तो आपसे ही है सर।" आर्यन ने हल्की हंसी के साथ कहा। "वैसे, घर पर क्या बताया है? इस बार छुट्टी कब जा रहे हैं?"
विक्रम ने धुंआ छोड़ते हुए खिड़की के बाहर देखा, जहां अंधेरा और गहरा हो गया था। "घर? घर पर कह दिया है कि इस बार काम थोड़ा ज्यादा है। वैसे भी, सीमा (पत्नी) को अब आदत हो गई है झूठ सुनने की।"
"झूठ? आप इसे झूठ कहते हैं?" आर्यन ने टोका।
"और क्या है आर्यन? हम हर बार कहते हैं कि लौट आएंगे, लेकिन क्या हम वाकई लौटते हैं? जो लौटता है, वो तो बस एक शरीर होता है। हमारी रूह तो इन्हीं पहाड़ों में, इन्हीं पत्थरों के बीच कहीं दफन हो जाती है।" विक्रम की बातें गहरी थीं।
आर्यन कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "लेकिन सर, वो रूह ही तो है जो इस मिट्टी को महकाती है। अगर हम जैसे लोग यहां अपनी रूह न छोड़ें, तो नीचे शहरों में लोग चैन की नींद कैसे सो पाएंगे?"
तभी वॉकी-टॉकी पर खड़खड़ाहट हुई।
"टाइगर फॉर ईगल... ओवर।"
विक्रम ने तुरंत वॉकी-टॉकी उठाया। "ईगल स्पीकिंग, गो अहेड।"
"सर, मूवमेंट कन्फर्म है। पोस्ट नंबर 4 के उत्तर में करीब 200 मीटर की दूरी पर हलचल देखी गई है। संख्या 10 से 12 हो सकती है। ओवर।"
विक्रम की आंखें अचानक ठंडी और स्थिर हो गईं। उसने आर्यन की तरफ देखा। "खेल शुरू हो गया है।"
आर्यन ने अपनी जैकेट की चेन ऊपर तक खींची। "यही तो वो मोड़ है सर, जिसका मैंने इंतजार किया था।"
दोनों चौकी से बाहर निकले। ठंडी हवा के झोंकों ने उनके चेहरों को सहलाया, जैसे विदा कह रहे हों। वे रेंगते हुए उस चट्टान की ओर बढ़े जहां से दुश्मन की हलचल साफ देखी जा सकती थी।
"आर्यन, लेफ्ट फ्लैंक तुम संभालोगे। जब तक मैं पहली गोली न चलाऊं, तुम ट्रिगर नहीं दबाओगे। समझ गए?" विक्रम ने धीमी आवाज में निर्देश दिया।
"कॉपी दैट, सर। लेकिन एक बात पूछूं?"
"पूछो।"
"अगर... अगर मैं वापस न जा पाया, तो मेरी मां से कहिएगा कि उसका बेटा भागा नहीं था।" आर्यन की आवाज में डर नहीं, एक जिम्मेदारी थी।
विक्रम ने उसका कंधा थपथपाया। "तुम खुद जाकर कहोगे। और सुनो, भावुक मत होना। जंग जज्बातों से नहीं, दिमाग से जीती जाती है।"
अचानक सन्नाटा चीरती हुई एक गोली चली। पत्थर से टकराकर चिंगारी निकली।
"पोजीशन लो!" विक्रम चिल्लाया।
अगले ही पल गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरी घाटी गूंज उठी। अंधेरे में सिर्फ गोलियों की रोशनी नजर आ रही थी। दुश्मन काफी करीब आ चुके थे।
"सर! वो दाहिनी तरफ से घेर रहे हैं!" आर्यन ने चिल्लाते हुए तीन फायर किए।
"मैं देख रहा हूं! आर्यन, कवर दो मुझे!" विक्रम एक पत्थर से दूसरे पत्थर की ओर लपका।
गोलीबारी के बीच संवाद मुश्किल था, लेकिन उनकी आंखें एक-दूसरे की भाषा समझ रही थीं। आर्यन लगातार फायर कर रहा था ताकि विक्रम दुश्मन के ग्रेनेड लॉन्चर तक पहुंच सके।
"आर्यन! ध्यान हटने मत देना!" विक्रम ने एक ग्रेनेड फेंका।
एक जोरदार धमाका हुआ और चीखें सुनाई दीं। लेकिन तभी एक गोली आर्यन के कंधे को चीरती हुई निकल गई।
"आह!" आर्यन जमीन पर गिरा।
"आर्यन!" विक्रम उसकी तरफ भागना चाहा, पर गोलियों की बौछार ने उसे वहीं रोक दिया।
"मैं ठीक हूं सर! बस थोड़ा सा खरोंच है!" आर्यन ने दांत पीसते हुए कहा और फिर से अपनी बंदूक थाम ली। उसका खून बर्फ पर गिर रहा था, जो सफेद से सुर्ख लाल होती जा रही थी।
"पीछे हटो आर्यन! ये ऑर्डर है!" विक्रम दहाड़ा।
"सॉरी सर, आज मैं आपका ये ऑर्डर नहीं मान सकता। देश प्रेम का कोई रिट्रीट बटन नहीं होता।" आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा, हालांकि उसके चेहरे पर दर्द साफ दिख रहा था।
दुश्मन की संख्या ज्यादा थी। वे धीरे-धीरे घेरा छोटा कर रहे थे।
"सर, इनके पास भारी हथियार हैं। अगर ये इस पहाड़ी को पार कर गए, तो नीचे गांव तक पहुंच जाएंगे।" आर्यन ने हांफते हुए कहा।
विक्रम ने अपनी मैगजीन चेक की। "सिर्फ दस गोलियां बची हैं।"
"मेरे पास पंद्रह हैं सर। काफी हैं न?" आर्यन ने पूछा।
"एक आजाद सवेरे के लिए? बहुत हैं।" विक्रम ने अपनी बंदूक तानी।
दोनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। एक-एक गोली का हिसाब रखा जा रहा था। दुश्मन एक-एक करके गिर रहे थे, लेकिन उनकी तादाद कम नहीं हो रही थी।
तभी एक बड़ा धमाका हुआ। विक्रम को लगा जैसे उसके कान सुन्न हो गए हों। धूल और धुएं के बीच उसने आर्यन को देखा। आर्यन जमीन पर पड़ा था, उसका पूरा सीना खून से लथपथ था।
"आर्यन!" विक्रम पागलों की तरह उसकी तरफ रेंगा।
उसने आर्यन का सिर अपनी गोद में लिया। "आर्यन, आंखें खोलो! तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
आर्यन ने धीरे से अपनी आंखें खोलीं। उसके होंठों पर एक फीकी मुस्कान थी। "सर... देखिए... आसमान का रंग बदल रहा है।"
विक्रम ने ऊपर देखा। दूर क्षितिज पर अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था। एक नीली और नारंगी रोशनी फैलने लगी थी।
"हां आर्यन, सुबह हो रही है। हम जीत गए।" विक्रम की आंखों से आंसू गिरकर आर्यन के चेहरे पर पड़े।
"सर... रोइए मत। आपने ही तो कहा था... जंग जज्बातों से नहीं... दिमाग से... पर ये दिल... ये तो देश के लिए ही धड़कता है न?" आर्यन की आवाज बहुत धीमी हो गई थी।
"तुम बहुत बहादुर हो आर्यन। तुम्हारे जैसा बेटा पाकर ये मिट्टी धन्य है।"
"सर... मां से... मां से बस इतना कहिएगा... कि उसका आजाद... अब हमेशा के लिए सो गया है... ताकि बाकी सब... जाग सकें।"
आर्यन के हाथ से बंदूक छूट गई। उसकी सांसें रुक गईं, लेकिन उसकी आंखों में वही चमक थी जो रात को लालटेन की रोशनी में थी। एक ऐसी चमक, जो कभी नहीं बुझती।
विक्रम वहां अकेला बैठा था, गोद में अपने छोटे भाई समान सैनिक का शव लिए। उसने अपनी बंदूक उठाई और बची हुई आखिरी गोलियों को हवा में दाग दिया—उन वीरों को सलामी देने के लिए जो लौटकर कभी घर नहीं जाते।
सूरज की पहली किरण पहाड़ी की चोटी पर पड़ी। बर्फ सोने की तरह चमक उठी।
विक्रम ने धीरे से आर्यन की आंखें मूंद दीं और खुद से कहा, "देखो आर्यन, आजाद सवेरा हो गया।"
घाटी में अब सन्नाटा था, लेकिन ये सन्नाटा खौफ का नहीं, सम्मान का था। हवाओं में एक गीत था—उन लोगों का जिन्होंने कल की खातिर अपना आज दे दिया था।
विक्रम ने आर्यन के शरीर को तिरंगे में लपेटने की तैयारी शुरू की। उसे पता था कि अब उसे नीचे जाकर बहुत से लोगों को ये बताना है कि इस सवेरे की कीमत क्या थी।
"जय हिंद, मेजर।" जैसे हवा में आर्यन की आवाज गूंजी।
विक्रम ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा और सैल्यूट किया। "जय हिंद, मेरे शेर।"
सवेरा हो चुका था, पूरी तरह आजाद, पूरी तरह पावन।