शहर की चकाचौंध से दूर एक मध्यमवर्गीय अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी अदिति अपनी कॉफी के कप से उठती भाप को देख रही थी। सुबह के सात बज रहे थे। घर में शांति थी, लेकिन उसके भीतर एक शोर मचा हुआ था। यह शोर उन अनकहे शब्दों का था जो पिछले दस सालों से उसके गले में अटके हुए थे। अदिति एक सफल आर्किटेक्ट थी, या कम से कम शादी से पहले तो थी ही। अब वह एक 'कुशल गृहिणी' थी, जो इस बात पर गर्व महसूस करने के लिए मजबूर की जाती थी कि उसने अपने करियर का 'त्याग' अपने परिवार के लिए किया है।
उसके पति, आलोक, एक बड़ी कंपनी में सीनियर मैनेजर थे। उनके लिए अदिति की भूमिका केवल घर को सुचारू रूप से चलाने और उनके माता-पिता का ध्यान रखने तक सीमित थी। आलोक अक्सर कहते, अदिति, तुम्हें काम करने की क्या जरूरत है? मैं इतना कमा तो रहा हूं। तुम बस घर संभालो और खुश रहो। लेकिन आलोक यह कभी नहीं समझ पाए कि खुशी केवल बैंक बैलेंस या सुविधाओं में नहीं, बल्कि अपनी पहचान में होती है।
आज अदिति का मन भारी था। कल रात एक पार्टी में किसी ने उससे पूछा था, और अदिति जी, आप आजकल क्या कर रही हैं? इससे पहले कि वह कुछ बोल पाती, आलोक हंसते हुए बोले, यह तो हमारे घर की होम मिनिस्टर हैं, पूरा साम्राज्य यही संभालती हैं। सब हंसे, लेकिन अदिति को लगा जैसे किसी ने उसकी आत्मा पर एक खरोंच मार दी हो।
वह रसोई में गई और नाश्ता बनाने लगी। तभी आलोक वहां आए और बोले, अदिति, आज शाम को मेरे बॉस और उनकी पत्नी डिनर पर आ रहे हैं। कुछ खास बनाना। और हां, वो नीली वाली साड़ी पहनना, तुम उसमें बहुत सोफिस्टिकेटेड लगती हो।
अदिति ने बिना सिर उठाए कहा, आलोक, आज मुझे एक पुराने दोस्त से मिलने जाना है। शायद मैं शाम को जल्दी न आ पाऊं।
आलोक का हाथ चाय के कप पर रुक गया। उन्होंने हैरानी से उसे देखा, दोस्त? कौन दोस्त? और बॉस आ रहे हैं, यह तुम्हें पता है न? तुम जा नहीं सकतीं।
अदिति ने धीरे से चाय का कप मेज पर रखा और उनकी आंखों में देखते हुए कहा, आलोक, मैंने पूछा नहीं था, बस बताया था। वह मेरा कॉलेज का दोस्त है और वह मुझे एक फ्रीलांस प्रोजेक्ट के सिलसिले में बुला रहा है।
आलोक को गुस्सा आ गया। प्रोजेक्ट? अदिति, क्या पागलपन है? तुम्हें पैसों की कमी है क्या? या मैं तुम्हारी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा? ये फालतू के शौक अब शोभा नहीं देते। घर पर ध्यान दो।
अदिति के भीतर की तड़प अब गुस्से में बदल रही थी। उसने संयम बनाए रखा और कहा, यह पैसों की बात नहीं है आलोक। यह मेरे वजूद की बात है। पिछले दस सालों से मैं सिर्फ तुम्हारी पत्नी, राहुल की मां और मां जी की बहू बनकर रह गई हूं। 'अदिति' कहां है? क्या तुमने कभी सोचा कि मेरी अपनी भी कोई इच्छाएं हो सकती हैं?
आलोक ने व्यंग्य से कहा, स्त्री विमर्श की बातें रहने दो अदिति। ये सब किताबों में अच्छा लगता है। असल जिंदगी में परिवार पहले आता है। अगर तुम आज बाहर गईं, तो समझ लेना कि तुम्हें इस घर की गरिमा की कोई परवाह नहीं है।
अदिति कुछ नहीं बोली। उसने अपना काम जारी रखा, लेकिन उसका दिमाग बिजली की गति से दौड़ रहा था। दोपहर में जब आलोक ऑफिस चले गए और राहुल स्कूल में था, अदिति ने अपनी अलमारी खोली। वहां उसकी पुरानी डिग्री, कुछ मेडल और उसके बनाए हुए नक्शे एक कोने में धूल खा रहे थे। उसने उन्हें निकाला और साफ किया। उसे अपनी प्रोफेसर की बातें याद आईं, अदिति, तुम इस पीढ़ी की सबसे प्रतिभाशाली आर्किटेक्ट हो सकती हो, बस अपनी उड़ान मत रोकना।
उसने खुद को आईने में देखा। उसकी आंखों में लाचारी नहीं, बल्कि एक चमक थी। उसने फोन उठाया और अपने दोस्त समीर को कॉल किया।
समीर, मैं आ रही हूं। मुझे उस प्रोजेक्ट की डिटेल्स देखनी हैं।
शाम के छह बज चुके थे। आलोक घर लौटे तो देखा कि घर अंधेरे में डूबा था। रसोई खाली थी और डाइनिंग टेबल पर कोई तैयारी नहीं थी। उन्हें लगा अदिति कहीं पास की मार्केट गई होगी। लेकिन जब सात बज गए और बॉस के आने का समय हो गया, तो उनका पारा चढ़ गया। उन्होंने अदिति को फोन लगाया, लेकिन उसका फोन बंद था।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। आलोक ने सोचा बॉस आ गए। उन्होंने हड़बड़ाहट में दरवाजा खोला, लेकिन सामने अदिति खड़ी थी। उसके हाथ में एक फाइल थी और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो आलोक ने वर्षों से नहीं देखी थी।
तुम कहां थी? आलोक चिल्लाए। बॉस आने वाले हैं और तुमने कुछ भी तैयार नहीं किया है! तुम्हें अंदाजा भी है कि मेरी कितनी बेइज्जती होगी?
अदिति शांति से अंदर आई और फाइल मेज पर रख दी। उसने आलोक की तरफ देखा और कहा, आलोक, तुम्हारी बेइज्जती का डर तुम्हें इतना डरा रहा है, लेकिन मेरी गुम होती पहचान का तुम्हें कोई गम नहीं? मैंने डिनर के लिए बाहर से ऑर्डर दे दिया है, आधे घंटे में आ जाएगा। और जहां तक बॉस की बात है, मैं उनसे मिल लूंगी।
आलोक हैरान रह गए। तुम... तुम इस हाल में उनके सामने जाओगी? जींस और कुर्ते में?
अदिति हंसी। हां आलोक। क्योंकि मैं उनकी कर्मचारी की पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रोफेशनल के रूप में उनसे मिलूंगी। तुम्हें पता है तुम्हारे बॉस की जो नई टाउनशिप बन रही है, उसका डिजाइन रिजेक्ट हो गया है? समीर उसी कंपनी में चीफ कंसल्टेंट है। उसने मेरा काम उन्हें दिखाया और उन्हें मेरा विजन पसंद आया है। आज रात वे यहां सिर्फ डिनर के लिए नहीं, बल्कि मुझसे कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाने आ रहे हैं।
आलोक के पैरों तले जमीन खिसक गई। क्या? तुम मजाक कर रही हो?
नहीं आलोक। अदिति ने गहरी सांस लेते हुए कहा। अब तक मैं तुम्हारी छाया में जी रही थी। अब मैं अपनी धूप खुद ढूंढूंगी। तुम्हें लगता था कि स्त्री का विमर्श सिर्फ भाषणों में होता है, लेकिन आज देख लो, यह हकीकत है। मैं इस घर को छोड़ नहीं रही हूं, लेकिन मैं इस पिंजरे को तोड़ रही हूं जिसे तुमने 'सुरक्षा' का नाम दिया था।
थोड़ी देर बाद बॉस और उनकी पत्नी आए। बातचीत के दौरान आलोक ने देखा कि उनके बॉस अदिति से कितनी इज्जत से बात कर रहे थे। वे उसके डिजाइन्स की बारीकियों पर चर्चा कर रहे थे। आलोक जो हमेशा अदिति को 'सिर्फ एक पत्नी' समझते थे, आज अपनी पत्नी के ज्ञान के सामने खुद को बौना महसूस कर रहे थे।
बॉस की पत्नी ने अदिति से कहा, अदिति, आप वाकई कमाल हैं। आलोक ने कभी बताया ही नहीं कि उनकी पत्नी इतनी टैलेंटेड हैं।
अदिति ने आलोक की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, शायद आलोक को भी आज ही इसका अहसास हुआ है।
रात को जब मेहमान चले गए, घर में फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन यह सन्नाटा पहले जैसा बोझिल नहीं था। आलोक बालकनी में अकेले खड़े थे। अदिति उनके पास आई।
आलोक ने बिना पीछे मुड़े कहा, मुझे माफ कर दो अदिति। मैंने कभी तुम्हारी जरूरतों को नहीं समझा। मुझे लगा कि तुम्हें खुश रखना ही काफी है, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि तुम्हारी अपनी भी एक पहचान है।
अदिति ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, आलोक, मैं सिर्फ तुम्हारा साथ चाहती थी, तुम्हारी अनुमति नहीं। एक स्त्री को विमर्श की जरूरत तब पड़ती है जब उसे इंसान से कम समझा जाता है। मैं बस यह चाहती हूं कि हम बराबरी के साथी बनकर जिएं।
उस रात अदिति चैन की नींद सोई। उसे पता था कि कल की सुबह अलग होगी। अब उसे किसी की अनुमति का इंतजार नहीं था। उसने अपने पंख फैला लिए थे और पूरा आकाश उसका था। उसने यह साबित कर दिया था कि एक स्त्री अगर ठान ले, तो वह घर की दीवारों के भीतर रहकर भी अपनी दुनिया बदल सकती है और जरूरत पड़े तो उन दीवारों के बाहर एक नया संसार भी रच सकती है।
यही तो स्त्री विमर्श है—अपनी पसंद का चुनाव करने की आजादी और उस चुनाव के साथ सम्मान से जीने का हक। अदिति ने उस रात न केवल अपना करियर वापस पाया था, बल्कि अपना खोया हुआ आत्म-सम्मान भी हासिल कर लिया था। अंधेरी रात बीत चुकी थी और एक नई सुबह की किरणें खिड़की से झांकने लगी थीं, जो एक नई अदिति का स्वागत करने के लिए बेताब थीं।
अगले दिन जब सूरज उगा, तो अदिति रसोई में चाय नहीं बना रही थी, बल्कि अपनी नई साइट का मैप देख रही थी। आलोक रसोई से दो कप चाय लेकर आए और बोले, आज की चाय मेरी तरफ से, मैडम आर्किटेक्ट।
अदिति मुस्कुरा दी। यह बदलाव छोटा था, लेकिन इसकी गूंज बहुत दूर तक जाने वाली थी। उसने समझ लिया था कि बदलाव की शुरुआत खुद से होती है। जब तक आप खुद को महत्व नहीं देंगे, दुनिया आपको महत्व नहीं देगी। आज वह स्वतंत्र थी, अपनी सोच में, अपने काम में और अपने वजूद में।
कहानी का अंत यहाँ होता है, लेकिन अदिति की नई जिंदगी की शुरुआत अभी हुई थी। उसने दिखा दिया था कि समझौता करना संस्कार हो सकता है, लेकिन खुद को मिटा देना बुद्धिमानी नहीं। वह एक मां थी, एक पत्नी थी, एक बहू थी, लेकिन सबसे बढ़कर, वह एक 'इंसान' थी।