दिसंबर की वह सुबह कड़ाके की ठंड लेकर आई थी। शिमला की पहाड़ियों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी और पेड़ों की टहनियों से ओस की बूंदें मोती की तरह टपक रही थीं। विक्रम अपने पुराने लकड़ी के कॉटेज के बरामदे में बैठा था। उसने एक मोटा ऊनी स्वेटर और मफलर लपेट रखा था। उसके सामने मेज पर रखी चाय से भाप निकल रही थी, जो ठंडी हवा में विलीन हो रही थी।
विक्रम की नजरें सामने की पहाड़ी पर टिकी थीं, लेकिन उसका मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। तभी अंदर से अंजलि की आवाज आई, जो घर की सफाई में व्यस्त थी।
अंजलि: "विक्रम, फिर से उन यादों में खो गए? चाय ठंडी हो गई है, कम से कम उसे तो पी लीजिए।"
विक्रम ने पीछे मुड़कर देखा और मुस्कुरा दिया। अंजलि के चेहरे पर उम्र की लकीरें आ गई थीं, लेकिन उसकी आँखों की चमक आज भी वैसी ही थी जैसी तीस साल पहले थी।
विक्रम: "अंजलि, तुम्हें याद है? हमारी पहली मुलाकात भी ऐसी ही एक सर्द सुबह हुई थी। तुम माल रोड पर अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थीं और लाल रंग का कोट पहना था।"
अंजलि हाथ में झाड़न लिए बाहर आई और कुर्सी खींचकर बैठ गई। उसके चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान तैर गई।
अंजलि: "कैसे भूल सकती हूँ? आप अपने दोस्तों के साथ जोर-जोर से हंस रहे थे और मुझे लगा था कि कितना लापरवाह लड़का है यह। पर जब मेरी सैंडल टूटी और आपने बिना कुछ सोचे अपनी चप्पल मुझे दे दी थी, तब लगा कि दिल के बहुत नेक हो।"
विक्रम हंसने लगा, "उस दिन मैं नंगे पैर बस स्टैंड तक गया था। बर्फ पैर को काट रही थी, पर दिल में एक अजीब सी गर्माहट थी। वही तो प्यार की पहली धूप थी।"
उसी समय नील कमरे से बाहर निकला। वह शहर से कुछ दिनों की छुट्टियों पर आया था। उसने अपने माता-पिता को पुरानी यादों में डूबे देखा तो उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई।
नील: "अरे वाह! सुबह-सुबह रोमांस का दौर चल रहा है? पापा, आप तो आज भी मम्मी के प्यार में वैसे ही गिरफ्तार हैं जैसे कॉलेज के दिनों में थे।"
अंजलि थोड़ा झेंप गई और उठकर अंदर जाने लगी, "चलो-चलो, बहुत बातें हो गईं। नील, नाश्ता तैयार है, आ जाओ।"
नील ने विक्रम के पास बैठकर कहा, "पापा, सच कहूँ तो आप दोनों को देखकर मुझे प्यार पर भरोसा होता है। आज के दौर में जहाँ रिश्ते कांच की तरह टूट जाते हैं, आप लोगों ने इस एहसास को कैसे बचाए रखा?"
विक्रम ने नील के कंधे पर हाथ रखा और गहरी सांस ली। उसकी आँखों में एक गंभीरता आ गई।
विक्रम: "बेटा, प्यार सिर्फ साथ घूमना या तोहफे देना नहीं है। प्यार तो वह है जो सर्दियों की इस गुनगुनी धूप की तरह होता है—जो खामोशी में भी सुकून दे। हमने एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार किया। जब अंजलि बीमार होती थी, तो मैं उसकी ढाल बनता था, और जब मैं हारता था, तो वह मेरी ताकत बनती थी।"
नील चुपचाप सुन रहा था। उसे महसूस हुआ कि उसके माता-पिता का रिश्ता केवल शब्दों का नहीं, बल्कि समर्पण की एक लंबी दास्तान है।
विक्रम: "तुझे याद है नील, एक बार जब मैं शहर में नौकरी के सिलसिले में गया था और भारी बर्फबारी की वजह से रास्ता बंद हो गया था? मैं तीन दिन तक घर नहीं आ पाया था। अंजलि ने बिना किसी डर के अकेले घर संभाला और हर रात बरामदे में लालटेन जलाकर बैठती थी ताकि अगर मैं आऊं तो मुझे रास्ता दिख सके।"
अंजलि अंदर से नाश्ते की प्लेटें लाते हुए बोली, "डर तो बहुत लगा था, पर भरोसा उससे भी बड़ा था। मुझे पता था कि तुम आओगे जरूर।"
नील ने महसूस किया कि उन दोनों के बीच एक ऐसा तार जुड़ा है जो मीलों दूर रहकर भी धड़कता है। शाम ढलने लगी थी और सूरज की आखिरी किरणें पहाड़ों के पीछे छिप रही थीं। ठंड और बढ़ गई थी, लेकिन उस छोटे से कॉटेज के अंदर प्यार और यादों की एक ऐसी आग जल रही थी जो किसी भी सर्दी को मात दे सकती थी।
विक्रम ने अंजलि का हाथ थाम लिया। अंजलि ने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। नील ने खिड़की से उन्हें देखा और अपने मोबाइल में उनकी एक फोटो खींच ली।
नील ने मन ही मन सोचा, "सच्चा प्यार समय के साथ बूढ़ा नहीं होता, वह तो सर्दियों की धूप की तरह और भी कीमती हो जाता है।"
पहाड़ों पर रात का सन्नाटा छा गया था, लेकिन विक्रम और अंजलि की खामोश गुफ्तगू जारी थी। उनकी यादों की किताब का हर पन्ना आज फिर से ताजा हो गया था।
समाप्त