Bhoot Samrat - 8 in Hindi Mythological Stories by OLD KING books and stories PDF | भूत सम्राट - 8

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भूत सम्राट - 8

अध्याय 8: 

हवेली का वह भव्य दरबार, जहाँ कभी संगमरमर की दीवारों से टकराकर न्याय की गूँज निकलती थी, आज एक अजीब से सन्नाटे में डूबा था। ऊँचे चबूतरे पर स्थित उस विशाल नक्काशीदार सिंहासन पर अविन बैठा तो था, पर किसी सम्राट की तरह नहीं। वह उस बेबस जुआरी की तरह लग रहा था जो अपना आखिरी दाँव भी हार चुका हो।
अविन की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसका सिर सिंहासन के ठंडे पत्थर से टकरा रहा था।
"आउच! मेरी कमर... ये सिंहासन है या पत्थरों का ढेर? कम से कम कुशन तो लगवा लेते!"
अविन हड़बड़ाकर उठा। सामने वही 100 भूत और सात फीट ऊँचा वीरभद्र बुत बने खड़े थे। 
उसकी आँखें खुलीं, तो सबसे पहले उसने अपनी जेबें टटोलीं। खाली। उसने अपने हाथ देखे। खाली। उसने फर्श को देखा, जहाँ कुछ देर पहले सोने की ईंटों का ढेर लगा था। वहाँ अब सिर्फ धूल थी।अविन के माथे पर पसीने की बूंदें अभी भी ठंडी हवा में चमक रही थीं। सिंहासन के कठोर पत्थर से टिके होने के कारण उसकी गर्दन अकड़ गई थी। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसे सबसे पहले रघुवन और वीरभद्र के धुंधले चेहरे दिखाई दिए, जो उसके बिल्कुल करीब झुककर उसे ऐसे देख रहे थे जैसे अस्पताल के बाहर रिश्तेदार डॉक्टर का इंतज़ार करते हैं।
"खज़ाना... कहाँ है?" अविन ने हकलाते हुए पूछा, उसकी आँखों में अभी भी वह पाँच हजार करोड़ का लालच तैर रहा था। "वो सिक्के... वो नीलम... मैं अभी वहीं था ना? मैं यहाँ कैसे आ गया?"
उसने पागलों की तरह अपने हाथ पैर हिलाए, जैसे वह अभी भी उस खज़ाने को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।
रघुवन: (सहानुभूति के साथ) "महाराज, आप उस अदृश्य दीवार से इतनी जोर से टकराए कि आपका 'स्वैग' और आपकी चेतना, दोनों ने वहीं दम तोड़ दिया। आप वहीं फर्श पर ढेर हो गए थे।"
वीरभद्र: "जी महाराज। गजराज ने अपनी सूँड से उठाकर आपको पीठ पर लादा और हम सब आपको यहाँ दरबार में ले आए। हमें लगा शायद उस जादुई धक्के ने आपके प्राण ही हर लिए हों।"
अविन ने अपना सिर पकड़ लिया। "मतलब... तुम लोग मुझे वहाँ से उठा लाए? खाली हाथ? अरे, कम से कम मेरी मुट्ठी में एक-दो हीरा तो फंसा देते! बेहोश आदमी का फायदा उठाना भी नहीं आता तुम लोगों को? क्या खाक भूत बनोगे तुम लोग!"
रघुवन: (धीमी आवाज़ में) "महाराज, हम कोशिश तो बहुत की, पर जैसे ही हमने एक सिक्का उठाना चाहा, वह हाथ से फिसलकर वापस ढेर में जा गिरा। वह खज़ाना सिर्फ आपको नहीं, हमें भी रिजेक्ट कर रहा था।"
अविन का चेहरा लटक गया। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी चलती-फिरती लॉटरी के टिकट पर पानी फेर दिया हो। "रिजेक्ट? अरे भाई, 5000 करोड़ थे वो! उतने में तो मैं ,इस हवेली का रिनोवेशन करवा देता। और तुम लोग मुझे इस पत्थर के सिंहासन पर पटक कर आ गए? कुशन तक नहीं है यहाँ! मेरी कमर का बैंड बज गया है।"

उसने अपना माथा पत्थर से टिका दिया। "भगवान, अगर नहीं देना था तो दिखाया क्यों? ये तो वही बात हुई कि रेस्टोरेंट में मेन्यू कार्ड पढ़वाकर वेटर ने कह दिया कि 'किचन बंद है'। भाई, पाँच हजार करोड़ में तो मैं खुद का एक देश खरीद लेता, वहाँ अपना झंडा गाड़ता और उस पर अपनी फोटो लगवाता!"
उसके चेहरे पर वह 'प्योर डिप्रेशन' था जो मिडिल क्लास लड़कों को तब होता है जब उनकी सैलरी आने से पहले ही खर्चे लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं।

अविन का पेट इस वक्त ऐसे गुड़गुड़ा रहा था जैसे उसके अंदर कोई दूसरा 'गजराज' दौड़ रहा हो। खज़ाना खोने का गम एक तरफ, लेकिन पेट की भूख ने इस वक्त सारे 'रॉयल स्वैग' की ऐसी-तैसी कर रखी थी।
उसने अपने पेट पर हाथ रखा और दरबारी भूतों की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखा।
"ओए रघुवन! वीरभद्र! सुनो यार... ये खज़ाना-वज़ाना और रहस्य तो सुलझते रहेंगे, पहले ये बताओ यहाँ किचन कहाँ है? बहुत ज़ोर की भूख लगी है भाई। कुछ मटन-कबाब, शाही टुकड़ा या कम से कम दाल-रोटी ही मिल जाए तो जान में जान आए।"
रघुवन और वीरभद्र ने एक-दूसरे की तरफ ऐसे देखा जैसे अविन ने उनसे उनकी ज़मीन जायदाद मांग ली हो।
रघुवन: (बड़ी मासूमियत से) "क्षमा करें महाराज, पर इस हवेली में पिछले 300 साल से चूल्हा नहीं जला है। हम आत्माओं को भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती। हम तो बस इस बर्फीली हवा और यादों के सहारे जीवित... मेरा मतलब है, अस्तित्व में हैं।"
वीरभद्र: "जी महाराज, हमें तो ये भी याद नहीं कि स्वाद होता क्या है। हमारे लिए 'खाना' केवल एक शब्द है जो पुरानी पोथियों में लिखा मिलता है।"
अविन का मुँह खुला का खुला रह गया। "क्या? मतलब तुम 100 के 100 लोग यहाँ सिर्फ हवा खाकर गुज़ारा कर रहे हो? धिक्कार है ऐसी भूतिया लाइफ पर! अबे, कम से कम एक जोमैटो वाला भूत ही भर्ती कर लेते!"
भूख के मारे अविन की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

तभी अचानक उसे याद आया—उसका पुराना नीला बैग! वह बैग जिसे वह अपने साथ लाया था, लेकिन जब वह उन भूतों से डरकर गलियारों में भाग रहा था, तब वह बैग कहीं गिर गया था। उसमें उसके 'सर्वाइवल' का आखिरी सामान था।
अविन झटके से सिंहासन पर सीधा हुआ और एक सम्राट की तरह चिल्लाया, "सैनिकों! मेरा नीला बैग ढूंढ कर लाओ! जब मैं तुम्हारी गलियों में जान बचाकर भाग रहा था, तब वो कहीं गिर गया था। जाओ! मुझे वो बैग हर हाल में चाहिए, वरना तुम सबको दोबारा मार दूँगा!"
अविन का आदेश सुनते ही चार-पांच दरबारी भूत हवा में गायब हुए और कुछ ही मिनटों में वह धूल से सना नीला पिट् बैग लेकर हाजिर हो गए। उन्होंने बैग को ऐसे पेश किया जैसे वह कोई प्राचीन स्वर्ण-कलश हो।
"मिल गया! मेरी ज़िंदगी की असली जमापूँजी!" अविन ने झपटकर बैग छीना और उसकी चेन खोली। अंदर एक आधा कुचला हुआ नीले लेज (Lays) का पैकेट और आधे लीटर की पेप्सी की बोतल थी।
अविन ने पैकेट को ऐसे सीने से लगाया जैसे वह कोई 5000 करोड़ का हीरा हो। 'चरर्रर्र...' पैकेट खुलने की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी संगीत जैसी गूँजी। अविन ने झट से एक चिप्स मुँह में डाला— 'कड़क!'

"मिल गया! मेरी ज़िंदगी की असली जमापूँजी!" अविन ने झपटकर बैग छीना और उसकी चेन खोली। अंदर एक आधा कुचला हुआ नीले लेज (Lays) का पैकेट और पेप्सी की एक बोतल थी। अविन ने पैकेट को ऐसे सीने से लगाया जैसे वह कोई 5000 करोड़ का हीरा हो। 'चरर्रर्र...' पैकेट खुलने की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी संगीत जैसी गूँजी। अविन ने झट से एक चिप्स मुँह में डाला— 'कड़क!'
पूरे दरबार में सन्नाटा इतना गहरा था कि उस चिप्स के टूटने की आवाज़ किसी धमाके जैसी लगी। 100 भूतों की फौज अपनी फटी-फटी आँखों से अविन के मुँह की हरकतों को देख रही थी।
अविन: (चिप्स चबाते हुए) "क्या देख रहे हो? तुम्हारे पास 5,000 करोड़ का खज़ाना है पर एक आलू का चिप्स नसीब नहीं... सच तो ये है कि मेरा ये 'लेस' का पैकेट तुम्हारे उस पूरे खज़ाने से कीमती है।"
उसने रघुवन की आँखों में झाँकते हुए एक और चिप्स हवा में लहराया और गर्व से बोला:
"सुन लो रघुवन चाचा! ये सोना, चाँदी, हीरे और मोती दुनिया की नज़रों में कीमती हो सकते हैं, पर जब पेट की भूख अपनी औकात पर आती है ना... तो ये मिट्टी के बराबर भी नहीं होते। इंसान हीरा पहन कर ज़िंदा नहीं रह सकता, उसे रोटी ही चाहिए होती है।"
उसने पेप्सी का ढक्कन खोला—'फिसस्स...'—भले ही वह चाय जैसी गरम थी, पर अविन के लिए वह इस वक्त अमृत थी। "आह! कलेजे को ठंडक पहुँची।"

सेनापति वीरभद्र अपनी विशाल तलवार को टेक लगाकर अविन को ऐसे देख रहा था जैसे वह आलू का चिप्स कोई प्राचीन दिव्य अस्त्र हो।
वीरभद्र: (हैरानी और श्रद्धा से) "महाराज... यह पीली वस्तु क्या है? क्या यह किसी शत्रु की हड्डी है जिसे आपने सुखाकर चबा डाला? इसकी ध्वनि तो मेरी ढाल टूटने से भी प्रचंड है!"
अविन: (चिप्स चबाते हुए) "हड्डी नहीं है वीरभद्र भाई, ये 'लेस' है। दुनिया में इसे 'टाइमपास' कहते हैं और यहाँ ये मेरा 'सर्वाइवल किट' है। तुम क्या जानो? तुम्हारे ज़माने में तो लोग हारने पर ज़हर पी लेते थे, हम चिप्स खाकर अपनी किस्मत को गालियाँ देते हैं।"
मंत्री रघुवन अपनी प्राचीन पोथियाँ खोलना भूल गए थे। उनकी फटी आँखों में 300 साल की भूख साफ़ झलक रही थी।
रघुवन: "क्षमा करें महाराज, पर इसकी सुगंध... यह किसी अज्ञात औषधि जैसी है। क्या इसे चखने से आत्मा को शांति मिलती है?"
अविन: "शांति का तो पता नहीं रघुवन चाचा, पर ये याद दिलाता है कि मैं अभी ज़िंदा हूँ। क्या है? ऐसे क्या घूर रहे हो जैसे मैं नेशनल ज्योग्राफिक का कोई दुर्लभ प्राणी हूँ? वैसे भी सुबह होते ही मैं यहाँ से पतली गली से निकल लूँगा। यहाँ न कोई खज़ाना मिला, न माँ-बाप का अता-पता।"
उसने रघुवन की ओर देखते हुए चिढ़कर पूछा, "ए मंत्री! कुछ पता चला मेरे खानदान के बारे में? या तुम लोग बस यहाँ खड़े होकर मेरा नाश्ता ही गिनोगे? मेरा बाप भी क्या मेरी तरह यहाँ खज़ाना लूटने आया था और नाक तुड़वाकर भागा था?"
रघुवन: "महाराज... अभिलेखों में दर्ज है कि 15 वर्ष पूर्व एक पुरुष इस हवेली की चौखट तक आया था। पर वह दहलीज लांघने का साहस न कर सका। वह केवल अँधेरे के डर से वहीं से वापस लौट गया।"   तभी, खंभों के पीछे से एक दुबला-पतला सा साया उभरकर सामने आया। उसकी उंगलियाँ लंबी थीं और हवा में ऐसे चल रही थीं जैसे अदृश्य रंगों से खेल रही हों।
रघुवन ने सिर झुकाकर परिचय दिया, "महाराज, यह 'चित्रसेन' है। इस हवेली का शाही चित्रकार। इसकी कूची (brush) केवल रंग नहीं, स्मृतियाँ उकेरती है।"
चित्रसेन ने अविन की ओर देखा भी नहीं। उसने बस हवा में अपनी उंगलियाँ घुमाईं और दरबार की एक खाली दीवार पर नीली धुआँधार रोशनी फूट पड़ी। धीरे-धीरे उस धुएँ ने एक ठोस पेंटिंग का रूप लेना शुरू किया।
अविन ने तिरछी नज़रों से देखा, "क्या है ये? अब तुम लोग मेरी भी 'वांटेड' वाली फोटो बनाओगे क्या?"
लेकिन जैसे-जैसे चित्र उभरकर सामने आया, अविन के हाथ से पेप्सी की बोतल छूटते-छूटते बची। पेंटिंग में एक पुरुष खड़ा था, जिसकी शक्ल अविन से तोड़ी मिलती थी—वही तीखी नाक, वही आँखें, बस चेहरे पर उम्र का थोड़ा सा तजुर्बा और आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी। वह हवेली की चौखट पर खड़ा था, उसका एक हाथ दरवाजे की ओर बढ़ा हुआ था और दूसरा हाथ उसके गले में लटके एक पुराने लॉकेट पर था।
उसे वो चेहरा तोड़े याद था पर वो लॉकेट उसके जैसा ही एक उसके टैक्सी में सामने में लटका हुआ था ।
पेंटिंग वाले आदमी के गले में भी बिल्कुल वही लॉकेट था।
"ये... ये तो वही है," अविन बुदबुदाया। उसकी आवाज़ का स्वैग अब पूरी तरह खत्म हो चुका था। "ये मेरा बाप है? मतलब... वो वाकई यहाँ तक आया था?"

तभी वो रहस्यमई आवाज सुनाई देती है....