हवेली के उस विशाल दरबार में समय जैसे किसी पत्थर की तरह जम गया था। पेंटिंग से निकला वह मायावी दृश्य जैसे ही समाप्त हुआ, चारों ओर फिर से वही श्मशान जैसा सन्नाटा छा गया। अविन अब भी उस काले, नक्काशीदार सिंहासन पर बैठा था, लेकिन उसकी देह किसी ठंडे संगमरमर की तरह कांप रही थी।
उसके मस्तिष्क में यादों का एक भयानक ज्वार उमड़ रहा था। वह अनाथालय की वे सूनी रातें, हॉस्टल की वह चुभती हुई खामोशी, और बरसों तक टैक्सी चलाते हुए अपनी किस्मत को कोसना—सब कुछ उसे अब एक क्रूर झूठ जैसा लगने लगा। वह कोई मामूली लावारिस नहीं था; उसके पीछे एक साम्राज्य था, एक गौरवशाली रक्त-रेखा थी और एक भरा-पूरा परिवार था।
जैसे ही उसकी बंद आँखों के सामने 'त्रिषा' का वह मासूम चेहरा उभरा, अविन की पलकों के कोर भीग गए। आंसू की एक भारी बूंद उसकी आँख से टपक कर सिंहासन के ठंडे बाजू पर गिरी। उसके भीतर का वह कठोर अविन, जिसे उसने दुनिया के तानों से बचने के लिए एक ढाल की तरह बनाया था, आज ममता और जिम्मेदारी के बोझ से कांप उठा। एक ऐसी भावना, जिसे उसने बरसों पहले मिट्टी में दफन कर दिया था, आज फिर से उसके सीने को चीरकर जीवित हो रही थी।
उसका हृदय, जो अब तक केवल अपमान और बदले की ठंडी आग में धड़कता था, अब एक नई तड़प से व्याकुल था। उसकी बहन जीवित थी! वह एक्सीडेंट, जिसने उसके माता-पिता की साँसें छीन लीं, वह उसकी बहन को नहीं ले सका। वह अंधेरा उसे निगल नहीं पाया था।
"त्रिषा..." अविन ने बहुत ही धीमे स्वर में फुसफुसाया। उसका स्वर इतना कोमल था जैसे डर रहा हो कि कहीं ज़ोर से बोलने पर यह याद फिर से धुंधली न हो जाए। "तुम कहाँ हो? उस लहू से भरी रात में तुम कहाँ ओझल हो गई?"
अविन का मनोविज्ञान अब पूरी तरह रूपांतरित हो रहा था। अब तक वह केवल एक 'सर्वाइवर' था, जो किसी तरह अपनी ज़िंदगी काट रहा था। पर अब, वह एक शिकारी में बदल चुका था। उसकी आँखों की नमी अब एक बर्फीली चमक में बदल रही थी। वह जान चुका था कि जिसे वह बरसों से एक 'दुर्घटना' समझकर नियति को दोष दे रहा था, वह दरअसल एक सुनियोजित नरसंहार था। वह 'काला साया' कोई बुरा सपना नहीं था; वह एक जीवित शत्रु था जिसने उसके कुल को जड़ से मिटाने का कुचक्र रचा था।
अविन ने शून्य में ताकते हुए अपने खाली हाथों की ओर देखा। उसकी हथेली पर अब एक भी घोस्ट कॉइन शेष नहीं था। वह पूरी तरह निहत्था हो चुका था। न अब उसके पास वीरभद्र जैसा महाबली सेनापति था, और न ही रघुवन जैसा कूटनीतिज्ञ मंत्री।
वह उस विशाल, अभिशप्त हवेली में बिल्कुल अकेला था। एक ऐसा सम्राट जिसके पास न सेना थी, न शस्त्र, और न ही कोई सुरक्षा कवच। और हवेली के द्वारों के उस पार... सायों में छिपी 'मौत' उसकी गंध पहचान चुकी थी और बाहर निकलने का इंतज़ार कर रही थी।
अविन अभी निहत्था खड़ा अपनी बहन की यादों में खोया ही था कि तभी पूरी हवेली की नींव किसी प्रलय की तरह कांपने लगी। वह सिंहासन, जिस पर अविन बैठा था, पत्थर के किसी पुराने खिलौने की तरह चटकने लगा।
वे दो विशाल द्वार खजाने के कमरे के पास थे जो अब तक बंद थे, उनमें बिजली की तरह दरारें (Cracks) पड़ने लगीं। उन दरारों से कोई रोशनी नहीं, बल्कि काला धुआं और चीखें बाहर निकल रही थीं। वे 100 भूत तो चले गए थे, पर उनके जाते ही उन महा-शक्तियों के बंधन टूट गए थे जिन्हें सदियों से दबाकर रखा गया था।
तभी वह रहस्यमयी आवाज़ किसी सायरन की तरह गूँजी, पर इस बार उसमें खौफ था:
"चेतावनी! प्रकिया विफल रही! रक्षक भूतों के जाते ही प्राचीन परिरक्षण (Shield) नष्ट हो चुका है। महाराज राज राजेश चौहान की तीन रानियाँ और कुल का परम शत्रु अपने बंधनों से मुक्त हो रहे हैं! उत्तराधिकारी की जान खतरे में है! खतरा! खतरा!"
अविन हक्का-बक्का रह गया। "क्या? यह क्या हो रहा है? ये दीवारें कैसे हिल रही हैं?"
अभी उसने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि हवेली की निर्जीव वस्तुएं किसी अदृश्य शक्ति के वश में होकर हवा में तैरने लगीं। भारी झूमर, लोहे की मशालें और पुराने भारी सोफे हवा में उठकर अविन की ओर किसी मिसाइल की तरह बढ़ने लगे।
हवेली के कोनों से तीन अलग-अलग स्त्री स्वर में ऐसी हँसी गूँजी जो कानों के पर्दों को फाड़ दे। उनका कोई भौतिक रूप नहीं था, वे केवल काले सायों और बर्फीली हवा के रूप में पूरे दरबार को अपनी गिरफ्त में ले रही थीं। यह उन तीन रानियों का प्रकोप था, जिन्होंने 300 साल की कैद का गुस्सा अब अविन पर निकालना शुरू कर दिया था।
"घुसपैठिया!" एक चीख गूँजी और साथ ही लकड़ी का एक भारी मेज़ अविन की ओर तेज़ी से उछला।
अविन ने फुर्ती से खुद को नीचे झुकाया, मेज़ उसके सिर के ठीक ऊपर से गुज़रते हुए दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गई। वह अब एक सम्राट नहीं, बल्कि एक शिकार था। हवेली अब एक जीवित मौत का जाल बन चुकी थी। फर्श से पत्थर उखड़कर उसके पैरों की ओर बढ़ रहे थे और छत से भारी कड़ियाँ गिर रही थीं।
रहस्यमयी आवाज़: "भागो अविन! अभी तुम इनसे नहीं लड़ सकते! ये बिना शरीर के साये हैं, तुम इन्हें छू भी नहीं पाओगे!"
पहली रानी की आवाज़: (किसी हिंसक आंधी की तरह गूँजती हुई) "राज राजेश चौहान! तू फिर लौट आया? तूने हमें इन दीवारों में सड़ने के लिए छोड़ा था, आज तेरी रूह के टुकड़े मैं अपनी उंगलियों से करूँगी!"
दूसरी रानी की आवाज़: (तीखी और चुभती हुई हँसी के साथ) "नहीं! इसे मैं मारूँगी! इसके खून की गर्मी से मैं अपनी सदियों की ठंड मिटाऊँगी। तू नहीं बचेगा राज राजेश!"
अविन चिल्लाया, "मैं राज राजेश नहीं हूँ! होश में आओ!" पर उसकी आवाज़ उन शक्तिशाली चीखों के सामने किसी तिनके की तरह दब गई। उन रानियों के लिए वह केवल एक शिकार था, अपने उस पति का अक्स जिससे वे घृणा करती थीं।
हवेली के भीतर का दृश्य अब किसी भयानक प्रलय जैसा था। भारी पत्थर के खंभे हवा में ऐसे घूम रहे थे मानो कागज के टुकड़े हों। तभी, फर्श के संगमरमर के टुकड़े उखड़े और किसी जीवित साँप की तरह रेंगते हुए अविन की ओर बढ़े। इससे पहले कि अविन कुछ समझ पाता, वे पत्थर के टुकड़े उसकी टांगों और जांघों से पूरी ताकत के साथ लिपट गए।
अविन संतुलन खोकर ज़मीन पर गिरा। वह जितना छटपटाता, वे पत्थर उसकी हड्डियों को उतना ही ज़ोर से भींचने लगते। वह पूरी तरह फंस चुका था।
तभी, वह रहस्यमयी आवाज़ अब किसी मशीन के बिगड़ने जैसे शोर के साथ कड़की:
"खतरा! खतरा! लॉगिन प्रक्रिया असफल होने के कगार पर है! उत्तराधिकारी के प्राण संकट में हैं! वंशज की जीवन-रेखा समाप्त हो रही है!"
दरबार के बीचों-बीच एक विशाल काला भंवर उठने लगा। वह चौहान वंश का सबसे बड़ा शत्रु था, जिसका अभी कोई आकार नहीं था, पर उसकी मौजूदगी से हवेली की हवा जहरीली हो गई थी। हवा में तैरती हुई मशालें और तलवारें अब एक दिशा में मुड़ गईं—सबका लक्ष्य केवल एक था, सिंहासन के पास बेबस पड़ा अविन।
"नहीं! मैं यहाँ ऐसे नहीं मर सकता!" अविन ने दांत पीसते हुए कहा, उसकी आँखों में वही 'सम्राट' वाली चमक फिर से उभरी। भले ही वह निहत्था था, पर उसकी इच्छाशक्ति अब भी सम्राट जैसी थी।
वह काला साया शत्रु अविन की गर्दन की ओर एक काले हाथ की तरह बढ़ा, जबकि हवा में तैरती सैकड़ों चीजें उस पर गिरने के लिए तैयार थीं।
तभी, जब मौत अविन की गर्दन को छूने ही वाली थी, वह रहस्यमयी आवाज़ एक प्रचंड गर्जना में बदल गई। वह यांत्रिक शोर अब किसी प्राचीन मंत्र की तरह गूँज उठा:
"पर्याप्त हुआ! निःस्वार्थ त्याग का उच्चतम मूल्य स्वीकार किया जाता है! सम्राट का रक्त व्यर्थ नहीं जाएगा!"
अचानक, अविन के सीने से एक सुनहरी और नीली मिश्रित ज्वाला फूट पड़ी। यह उन 100 आत्माओं का आशीर्वाद था जिन्हें उसने आज़ाद किया था। उस रोशनी के संपर्क में आते ही, अविन के पैरों में लिपटे पत्थर के सांप जलकर राख हो गए। हवा में तैरते हुए भारी झूमर और मेज़ें किसी अदृश्य दीवार से टकराकर दूर जा गिरीं।
उन रानियों की चीखें अब दर्द में बदल गईं। वे साये उस रोशनी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे।
रहस्यमयी आवाज़:
"लॉगिन सफल! ट्यूटोरियल पूर्ण! पुरस्कार अनलॉक किए जा रहे हैं!"
उपाधि प्राप्त: "सम्राट बिना साम्राज्य के" (इस उपाधि के सक्रिय होते ही अविन के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बन गया)।
शक्ति का पुर्नजन्म: 2,000 घोस्ट कॉइन्स अविन की आत्मा में समा गए, जिससे उसे खोई हुई ऊर्जा वापस मिल गई।
"अब और नहीं!" अविन ने दहाड़ लगाई। भले ही वह अभी उन रानियों को नष्ट नहीं कर सकता था, पर इस नई शक्ति ने उसे उस गतिरोध से बाहर निकाल दिया।
आवाज़ ने अंतिम निर्देश दिया: "भागो अविन! मुख्य द्वार खुला है! यह सुरक्षा घेरा केवल कुछ क्षणों का है!"
अविन ने अपनी जैकेट की धूल झाड़ी और पूरी ताकत से उस विशाल द्वार की ओर दौड़ लगा दी। पीछे से वह काला साया और रानियों की सिसकियाँ उसका पीछा कर रही थीं, पर जैसे ही वह द्वार की दहलीज के पार पहुँचा, पीछे एक ज़ोरदार धमाका हुआ। द्वार ऐसे बंद हुआ जैसे किसी ने पहाड़ पटक दिया हो।
अविन सीधे हवेली के बाहर कच्ची ज़मीन पर जाकर गिरा। उसका शरीर पसीने से तरबतर था और साँसें उखड़ रही थीं। उसने मुड़कर देखा, वह काली हवेली अब एक शांत कब्र की तरह खड़ी थी, पर उसके भीतर कैद वह 'शत्रु' और 'रानियाँ' अब भी दीवारों पर अपने हाथ पटक रहे थे।
अविन ने आसमान की ओर देखा। उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने अपना मोबाइल निकाला सुबह के 10:17 बज रहे थे। चमकदार धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह ज़िंदा बाहर आ गया है।
अविन तपती हुई ज़मीन पर लेटा हुआ था। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी और शरीर से पसीना ऐसे बह रहा था मानो वह अभी किसी बर्फीले पानी से निकल कर आया हो। उसने मुड़कर उस विशाल, काली हवेली की ओर देखा जो धूप में भी किसी डरावने साये की तरह खड़ी थी।
अविन के दिमाग में इस वक्त विचारों का बवंडर चल रहा था। उसका तर्क (Logic) और उसका अनुभव आपस में लड़ रहे थे।
"यह... यह क्या पागलपन है?" अविन ने हाँफते हुए खुद से कहा। उसकी आवाज़ में खौफ और हैरानी का मिश्रण था। "अभी कुछ समय पहले तक सब ठीक लग रहा था। वे 100 भूत... वे तो कितने सभ्य थे। वीरभद्र, रघुवन... वे सब तो सम्मान देना जानते थे। मुझे लगा था कि भूत बस वैसे ही होते हैं—दुखी और थोड़े डरावने। पर वे तीन रानियाँ और वह काला साया?"
अविन के हाथ कांप रहे थे। "वे तो मुझे राज राजेश समझकर कच्चा चबा जाना चाहते थे। अगर वह रोशनी नहीं फूटती, तो आज मेरी हड्डियाँ उसी हवेली का हिस्सा बन जातीं। साला, इस दुनिया में जितना गहरा जाओ, उतना ही अंधेरा बढ़ता जा रहा है।"
उसे समझ आ गया था कि 'घोस्ट वर्ल्ड' में कोई भी दोस्त या दुश्मन पक्का नहीं होता। वहाँ केवल शक्ति और रक्त का मोल है। उसका वह मासूम सा टैक्सी ड्राइवर वाला हिस्सा अब धीरे-धीरे मर रहा था और उसकी जगह एक सतर्क, चालाक और कठोर 'सम्राट' ले रहा था।
तभी, वह रहस्यमयी आवाज़ फिर से अविन के मस्तिष्क में गूँजी, पर इस बार वह थोड़ी थकी हुई और गंभीर थी।
आवाज़: "सावधान उत्तराधिकारी! वे रानियाँ और शत्रु अभी शांत नहीं हुए हैं। वे केवल पीछे हटे हैं। जैसे ही वह सुरक्षा घेरा पूरी तरह समाप्त होगा, वे फिर से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। इस हवेली को फिर से सील (Seal) करने और उन महा-शक्तियों को कालकोठरी में कैद रखने के लिए एक प्रचंड ऊर्जा की आवश्यकता है।"
अविन उठकर खड़ा हुआ और अपनी जैकेट झाड़ते हुए बोला, "तो मैं क्या करूँ? मेरे पास तो अब कोई शक्ति नहीं बची।"
आवाज़: "शक्ति तुम्हारे पास ही है। उन 100 भूतों की वे आखिरी निशानियाँ—वे 100 वस्तुएं जिनमें उनकी आत्मा का अंश था—वे अब तुम्हारे अधिकार में हैं। यदि तुम वे वस्तुएं इस हवेली को वापस कर दो या मुझे सौंप दो, तो मैं उनकी ऊर्जा का उपयोग कर इस हवेली के बंधनों को पहले से भी ज्यादा मज़बूत कर दूँगी।"
अविन ने अपनी पोटली की ओर देखा, जहाँ वे 100 कीमती वस्तुएं रखी थीं।
आवाज़: "किंतु, न्याय का सिद्धांत कहता है कि सम्राट को उसके त्याग का फल मिलना चाहिए। ये 100 वस्तुएं इस दुनिया के लिए 'करप्टेड' (Corrupted) हैं, पर इनकी रूहानी कीमत अपार है। यदि तुम मुझे ये 95 वस्तुएं (उन 5 को छोड़कर जिन्हें तुमने सुरक्षित रखा है) सौंपते हो, तो मैं उन्हें ऊर्जा में बदलकर इस हवेली को सील कर दूँगी और बदले में तुम्हें 100 करोड़ रुपये (Real Money) तुम्हारे सांसारिक बैंक खाते में प्रदान करूँगी। क्या तुम्हें यह सौदा स्वीकार है?"