Bhoot Samrat - 9 in Hindi Horror Stories by OLD KING books and stories PDF | भूत सम्राट - 9

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भूत सम्राट - 9

अध्याय 9 आखरी आदेश 


हवेली का वह भव्य दरबार अब किसी श्मशान की शांति ओढ़े हुए था। सन्नाटा इतना गहरा था कि अविन को अपनी ही धड़कनें किसी नगाड़े की तरह सुनाई दे रही थीं। उसकी उंगलियाँ उस जादुई पेंटिंग पर थमी हुई थीं, जिसे चित्रसेन ने अपनी यादों की राख से बनाया था।

अविन के सामने उसके पिता, प्रताप सिंह चौहान खड़े थे।

बचपन के उस एक्सीडेंट ने अविन से न केवल उसके माता-पिता छीने थे, बल्कि उसकी यादों का एक बड़ा हिस्सा भी मिटा दिया था। उसे बस इतना याद था कि वह उस रात कार में था, चीखें थीं, कांच के टूटने का शोर था और फिर... अंतहीन अंधेरा। उसे कभी याद नहीं आया कि उसके पिता मुस्कुराते कैसे थे, या उसकी माँ के हाथ की खुशबू कैसी थी। उसके लिए 'माता-पिता' शब्द बस दो धुंधली परछाइयाँ भर थे।

पर आज, इस पेंटिंग ने उन परछाइयों में रंग भर दिए थे। पिता के गले में वही पीतल का लॉकेट देख कर अविन के भीतर जैसे कुछ टूट गया। वह लॉकेट, जिसे वह अपनी टैक्सी में एक मामूली खिलौना समझकर लटकाए रखता था, आज उसके अस्तित्व का इकलौता गवाह बनकर खड़ा था।

"तो... आप ऐसे दिखते थे पापा," अविन बुदबुदाया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट और बेइंतहा दर्द का मिश्रण था। "मैं पूरी जिंदगी खुद को कोसता रहा कि मैं अनाथ हूँ, कि आपने मुझे इस बेरहम दुनिया में अकेले छोड़ दिया। और आप... आप यहाँ इस धूल और सन्नाटे के बीच मेरा इंतज़ार कर रहे थे?"

अविन की आँखों में नमी थी, पर वह रो नहीं रहा था। उसका मनोविज्ञान एक ऐसे 'विलेन' का था जिसने दर्द को पीना सीख लिया था। उसके मन में हजारों सवाल उठ रहे थे—उस रात क्या हुआ था? हम कहाँ जा रहे थे? क्या आपने मुझे बचाने की कोशिश की थी?

तभी, रघुवन ने धीरे से कदम आगे बढ़ाया। "महाराज... आपके पिता ने अपनी खुशियों की बलि दी थी ताकि आप बाहर की दुनिया में 'अविन' बनकर जी सकें, न कि 'चौहान' खानदान के श्राप के साथ। पर ये खून... ये अपनी जड़ें ढूँढ ही लेता है।"

वीरभद्र ने अपनी भारी तलवार को जमीन पर टिकाया, उसकी आँखों में भी अपने पुराने स्वामी के लिए सम्मान था।

अविन का हाथ अभी भी पेंटिंग पर था। उसे वह बचपन की यादें याद करने की कोशिश में सिर में तेज दर्द महसूस हुआ। वह जानना चाहता था कि उस एक्सीडेंट के असली गुनहगार कौन थे। क्या वह वाकई एक हादसा था, या कोई सोची-समझी साजिश?

तभी, हवेली की छतों, ठंडी दीवारों और सदियों पुराने पत्थरों से एक 'रहस्यमयी आवाज़' गूँजी। यह आवाज़ पहले की तरह केवल अविन के दिमाग में नहीं थी; इस बार यह दरबार के कोने-कोने में बिजली की तरह कड़की। रघुवन और वीरभद्र के चेहरे खौफ और हैरानी से सफेद पड़ गए।

आवाज़: "देख लो अविन अविनाशी सिंह चौहान... अपनी अधूरी विरासत को देख लो। यह खंडहर, ये रूहें और ये धूल भरी तस्वीरें ही तुम्हारा सच हैं। पर क्या तुम इस सच की पूरी कीमत चुकाने का दम रखते हो? क्या तुम उस शख्स का चेहरा पहचानने की हिम्मत रखते हो जिसे दुनिया ने भुला दिया और तुमने अपनी यादों से मिटा दिया?"

आवाज़ का मुख्य प्रहार अविन के पिता की छवि पर था। पेंटिंग में प्रताप सिंह चौहान के चेहरे पर मौजूद वह हल्की सी मुस्कान अब अविन को एक गहरी साज़िश या एक महान बलिदान जैसी लग रही थी।

रघुवन और वीरभद्र चौंक गए। वीरभद्र ने पलक झपकते ही अपनी विशाल तलवार म्यान से निकाली और हवा में एक घातक चाप बनाई। धातु के टकराने जैसी तीखी आवाज़ गूँजी।

"कौन है? कायर की तरह सायों में मत छिप! सामने आ!" वीरभद्र की दहाड़ दरबार के ऊँचे गुंबद से टकराकर बार-बार गूँजी, पर वहाँ कोई नहीं था। केवल सन्नाटा था, जो वीरभद्र की चुनौती का मज़ाक उड़ा रहा था।

अविन ने अपनी नज़रें पेंटिंग से नहीं हटाईं। उसका चेहरा अब किसी पत्थर की तरह सख्त हो गया था। उसकी रूह उस पेंटिंग के भीतर छिपे अपने पिता के अस्तित्व को कुरेद रही थी।

"कीमत?" अविन ने धीरे से पूछा। उसका स्वर अब पहले जैसा साधारण नहीं था। यह गहरा, भारी और खतरनाक हो चुका था। "तुम सच बताने के लिए मुझसे कीमत माँग रहे हो? जो पहले से ही सब कुछ खो चुका हो, उससे तुम और क्या छीनोगे?"

अविन का हाथ कांपते हुए उस पेंटिंग पर पिता के सीने के पास पहुँचा। उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ रंग और कपड़ा नहीं है; इसके पीछे एक पूरी दास्तान दफन है।

आवाज़: "कीमत सोने की नहीं होती, उत्तराधिकारी। कीमत जज्बातों की होती है। तुम्हारे पिता ने भी एक कीमत चुकाई थी, तभी तुम आज यहाँ खड़े होने के काबिल बने हो। पर क्या तुम उस दर्द को दोबारा जीने के लिए तैयार हो जिसे तुमने बचपन के उस मलबे में दबा दिया था?"

अविन की आँखों में उस काली रात के धुंधले मंजर तैरने लगे। उसे याद आया कि उसके पिता की मौत ने उसे केवल अनाथ नहीं बनाया था, बल्कि उसके नाम से उसकी पहचान भी छीन ली थी। 'अविनाशी'—यह नाम उसने बरसों बाद सुना था।

"कीमत?" अविन ने धीरे से पूछा। उसका स्वर अब पहले जैसा साधारण नहीं था। यह गहरा, भारी और खतरनाक हो चुका था। "तुम सच बताने के लिए मुझसे और क्या छीनोगे? जो अपनी यादें तक खो चुका हो, उसके पास देने के लिए बचा ही क्या है?"

अविन के बोलते ही, उसके ठीक सामने हवा में एक नीली बिजली सी कड़की और एक चमड़े की पुरानी पोटली प्रकट हुई। अविन ने उसे थाम लिया। उस पोटली के भीतर 1,699 घोस्ट कॉइन्स थे—ताकत, ऊर्जा और अनगिनत रहस्यों से भरे हुए। पोटली से निकलने वाली ठंडी सिहरन अविन की नसों में उतर रही थी।

इन सिक्कों को देखकर अविन के मस्तिष्क में उन काली रातों की यादें ताज़ा हो गईं। हर एक सिक्के के पीछे एक खौफनाक सफर था, एक डरावनी रूह थी और मौत से आमना-सामना था।

रहस्यमयी आवाज़ फिर गूँजी, और इस बार उसकी गूँज में एक चेतावनी थी:

"ये घोस्ट कॉइन्स (Ghost Coins) कोई साधारण मुद्रा नहीं हैं, अविन। ये मृत्यु लोक की ऊर्जा हैं। 1,699 सिक्कों का अर्थ है—1,699 आत्माओं के एहसान। इन सिक्कों से तुम अपनी टैक्सी को एक ऐसे अभेद्य किले में बदल सकते हो जिसे यमराज भी न भेद पाए। तुम इनसे वे अलौकिक अस्त्र खरीद सकते हो जो देवताओं को भी विचलित कर दें। ये सिक्के ही तुम्हारी सुरक्षा का एकमात्र कवच हैं।"

आवाज़ ने एक क्रूर हँसी के साथ जारी रखा: "तुम्हारे पास ये 1,699 सिक्के हैं, अविन। ये तुम्हारी ताकत हैं। पर आज, मैं तुम्हें 'अविनाशी' बनने का एक मौका देता हूँ। तुम्हारे पास दो मार्ग हैं!"

अचानक, दरबार के बीचों-बीच दो विशाल मायावी द्वार उभरे। एक स्वर्ण की आभा से चमक रहा था, और दूसरा गहरे रक्त की तरह लाल और धुंधला था।

आवाज़: "प्रथम मार्ग—इन सिक्कों को अपनी मुट्ठी में भींच लो। इस हवेली के स्वामी बनो और यहाँ दबे पुरखों के असीमित स्वर्ण भंडार पर राज करो। तुम दुनिया के सबसे धनी पुरुष बन जाओगे, पर अपने माता-पिता के रहस्यों को नहीं जान पाओगे । तुम एक ऐसे राजा बनोगे जिसके पास संपत्ति तो होगी, पर अपनी जड़ों का पता नहीं होगा।"

अविन की नज़रें उन चमकते हुए सिक्कों पर टिकी थीं। फिर आवाज़ और भी गंभीर हो गई।

आवाज़: "द्वितीय मार्ग—बलिदान! अपने इन सभी 1,699 घोस्ट कॉइन्स को अभी इसी क्षण दान कर दो। इन सिक्कों की ऊर्जा से इस हवेली में कैद इन 100 भूतों को इस 300 साल के नर्क से मुक्ति मिल जाएगी। पर याद रखना... जैसे ही तुम ये सिक्के त्यागोगे, तुम निहत्थे हो जाओगे। न कोई कवच बचेगा, न कोई जादू। तुम एक ऐसे राजा बनोगे जिसके पास न राज्य होगा, न रक्षक, और न ही तुम्हें 'महाराज' कहने वाली कोई जनता। बदले में... यह हवेली तुम्हें वह दृश्य दिखाएगी जो तुम्हारी यादों में दफन है—वह एक्सीडेंट... वह आखिरी रात का पूरा सच!"

दरबार में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि अविन को अपनी ही रूह की पुकार सुनाई देने लगी। रघुवन और वीरभद्र पत्थर की मूरत बने अविन को देख रहे थे।

तभी, कोनों में खड़े उन सौ भूतों के बीच एक हलचल हुई। वे अब तक केवल साये थे, पर अब उनकी पारदर्शी आँखों में एक तड़प उभरी।

एक वृद्ध भूत: (कांपती आवाज़ में) "क्या वाकई... क्या हमें फिर से रोशनी नसीब होगी? क्या 300 साल का यह अंधेरा खत्म होगा?"

एक सैनिक भूत: "महाराज! हमें ताकत नहीं, शांति चाहिए। हमें इस पत्थर की कैद से बचा लीजिए!"

वे सौ भूत एक साथ धीरे-धीरे अविन के सामने झुकने लगीं। उनके चेहरों पर लालच नहीं, बल्कि एक थकी हुई उम्मीद थी। वे उस इंसान की ओर देख रहे थे जिसके हाथ में उनकी आज़ादी की चाबी थी।

अविन ने अपनी नज़रें उठाईं। एक तरफ वह ताकत थी जिससे वह दुनिया पर राज कर सकता था, और दूसरी तरफ वह बचपन की अधूरी चीखें, जिनके बिना उसका अस्तित्व एक झूठ था।


अविन धीरे-धीरे उस ऊँचे, नक्काशीदार काले सिंहासन की ओर बढ़ा। उसके फटे हुए जूते उस कीमती फर्श पर एक अलग ही धमक पैदा कर रहे थे। वह उस सिंहासन पर जाकर बैठ गया। उसका बैठना किसी मसीहा जैसा नहीं, बल्कि एक ऐसे जुआरी जैसा था जिसने अपनी आखिरी बाजी लगा दी हो। उसने सिंहासन के बाजुओं को दृढ़ता से पकड़ा।

"तुम चाहते हो कि मैं वो राजा बनूँ जिसका कोई साम्राज्य न हो?" अविन ने अपनी आँखों में ठंडी आग लिए उस अदृश्य आवाज़ की ओर देखा। "मुझे मंजूर है। मुझे वो दौलत नहीं चाहिए जो मेरे अपनों के सच को छुपा दे। अगर इन भूतों की मुक्ति ही मेरे सच का रास्ता है, तो यही सही।"

उसने वह चमड़े की पोटली हवा में उछाली। पोटली जैसे ही हवा में पहुंची, उसमें से 1,699 सिक्के नीली ज्वालाओं में बदलकर पूरे दरबार में बिखरने लगे।


वे सौ रूहें, जो अब तक केवल डरावने साये थे, अचानक दिव्य रोशनी से भर गए। उनके धुंधले चेहरे अब साफ़ दिखने लगे थे। उन्होंने अपने नए राजा, अपने उद्धारक को सिंहासन पर बैठे देखा, जिसने उनके लिए अपनी सर्वस्व शक्ति का त्याग कर दिया था।

अचानक, वीरवीरभद्र ने अपनी तलवार को ज़मीन पर पटका और एक गूँजती हुई आवाज़ में चिल्लाया— "अविन अविनाशी सिंह चौहान की... जय!"

उसकी आवाज़ के साथ ही, दरबार में खड़े वे सौ भूत, वे सैनिक, वे दासियाँ और यहाँ तक कि कोनों में खड़े विशाल गजराज की रूहें भी एक स्वर में दहाड़ उठीं— "महाराज अविन अविनाशी की जय हो, चौहान वंश अमर रहे, 


दरबार की दीवारें उनके जयकारों से कांप रही थीं। अविन ने अपना हाथ उठाया और हवा में एक मौन सन्नाटा छा गया। उसने अपनी गंभीर नज़रें उन सब पर घुमाईं और अपना आखिरी शाही आदेश दिया।

अविन: (भारी और स्थिर स्वर में) "हम सबका साथ बस इसी रात तक था। मुझे नहीं पता कि आप सबके साथ क्या बीता, या आप किन मजबूरियों के कारण इन दीवारों में भटकती आत्माएं बनकर रह गए। पर मैं यहाँ आया हूँ, तो यही मेरा अंतिम कार्य होगा—आप सभी को इस अनंत तड़प से मुक्त करना।"

अविन एक पल के लिए रुका, उसकी आँखों में एक अजीब सी ममता और विदाई का दर्द था।

"मेरे दोस्तों... मेरे साथियों... मैं प्रार्थना करता हूँ कि अब हमारी मुलाकात कभी दोबारा न हो। न इस भूतिया रूप में, और न ही इस नरक जैसी हवेली में। जाओ, अपनी मुक्ति की ओर बढ़ो!"

अविन के आदेश पर, उन सभी भूतों का कारवां मुक्ति के द्वार की ओर बढ़ने लगा। यह उस हवेली के इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान था।

सबसे पहले सैनिकों की टुकड़ी आगे बढ़ी। उन्होंने अपने घुटने टिकाए और अविन को वह अंतिम सलामी दी, जो केवल एक सम्राट को दी जाती है। जैसे ही वे उस दिव्य प्रकाश के द्वार में समाए, वे हवा में ओझल हो गए। उनके पीछे महल के सेवक और तीन मुख्य सेविकाएँ आईं। उनकी आँखों में कृतज्ञता के आंसू थे। उन्होंने झुककर अविन के चरणों की धूल को छुआ—उस व्यक्ति की धूल, जिसने अपनी शक्ति की परवाह न करते हुए उन्हें इस 300 साल के नर्क से बाहर निकाला था। यहाँ तक कि वह विशाल हाथी भी अपनी सूंड उठाकर अविन को नमन करते हुए उस प्रकाश के भंवर में विलीन हो गया।

अंत में, रघुवन और वीरभद्र अविन के सामने आए। उनकी आँखों में एक अनूठा गर्व था।

"महाराज..." रघुवन का स्वर किसी शांत नदी जैसा था, "हमने इतिहास में कई राजा देखे, पर आप जैसा त्यागी सम्राट पहले कभी नहीं हुआ। आपने अपनी शक्ति देकर हमें हमारा अस्तित्व वापस लौटा दिया।" इतना कहकर, वे दोनों भी उसी प्रकाश का हिस्सा बन गए।

दरबार अब पूरी तरह खाली था। वह भव्यता अब एक सन्नाटे में बदल चुकी थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि अविन को अपनी रुकी हुई सांसें किसी पत्थर के गिरने जैसी सुनाई दे रही थीं। जैसे ही आखिरी आत्मा गायब हुई, उस जादुई पेंटिंग से एक प्रचंड ऊर्जा निकली और वह दीवार पर फैलकर एक जीवित दृश्य में बदल गई।

दृश्य: वह काली रात का भयावह सत्य

अविन की साँसें थम गईं। उस चित्रकारी के भीतर किसी जीवंत स्मृतियों की तरह एक दृश्य चलने लगा—एक तूफानी, काली रात, जहाँ बिजली आसमान का सीना चीर रही थी।

एक महंगी, काली चमचमाती कार सुनसान मार्ग पर बिजली की रफ़्तार से दौड़ रही थी। अविन ने जैसे ही उस कार के नंबर प्लेट और उसके बनावट को देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

"यह... यह तो वही कार है जिसे आज मैं टैक्सी बनाकर चला रहा हूँ!" अविन के मस्तिष्क में एक विस्फोट हुआ।

दृश्य अब कार के भीतर पहुँचा। अविन के पिता, प्रताप सिंह चौहान, दृढ़ता से पहिया (Steering) थामे हुए थे। उनकी बगल वाली सीट पर उनकी छोटी बहन, 'त्रिषा' बैठी थी, जो अपनी मासूमियत में चहक रही थी। अविन खुद अपनी माँ के साथ पीछे की सीट पर बैठा था।

पिता: "सुमात्रा, मैंने बच्चों के भविष्य के लिए बैंक खातों और लॉकर का सारा प्रबंध कर दिया है। ये चाबियाँ ही उनकी ढाल बनेंगी। दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, मेरे बच्चों को कभी कोई कमी नहीं होगी।"

माँ: (पिता के कंधे पर हाथ रखते हुए मुस्कुराई) "आप व्यर्थ ही चिंता करते हैं। हम साथ हैं, हमारे बच्चे हमेशा सुरक्षित रहेंगे।"

तभी छोटी त्रिषा पीछे मुड़ी। उसने अविन का हाथ पकड़कर हिलाया और अपना हाथ हवा में लहराते हुए बोली— "भाई! देखो पिता जी ने मेरे लिए नया चाबी वाला लॉकेट लिया है! आप भी लोगे क्या? देखो, यह कितना चमक रहा है!"

अविन का गला रुँध गया। वह लॉकेट... वह चेहरा... उसे सब याद आने लगा था। वह अनाथ नहीं था, वह एक भरे-पूरे परिवार का हिस्सा था। वह 'अविनाशी' था।

पर तभी... कार की मुख्य लाइटों की रोशनी में एक भयावह काला साया उभरा। वह न तो इंसान था, न कोई ज्ञात जीव। पिता ने घबराकर पहिया घुमाया। टायरों के घिसने की तीखी आवाज़ आई, शीशे चकनाचूर हुए और कार कई बार हवा में कलाबाजियां खाते हुए गहरी खाई की ओर बढ़ गई।


अविन की चीख पूरे दरबार में गूँज उठी— "नहीं!"