Bhoot Samrat - 6 in Hindi Horror Stories by OLD KING books and stories PDF | भूत सम्राट - 6

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भूत सम्राट - 6

अध्याय 6:  कंकाल-गज

समय: रात्रि 08:15 PM

अविन की आँखों के सामने अभी भी धुंधली सी रोशनी थी। जैसे ही उसने पलकें झपकाईं, उसे लगा उसकी खोपड़ी के अंदर कोई छोटा हथौड़ा मार रहा है।
अविन की आँखों के सामने धुंधलापन था, तभी सदियों पुरानी शुद्ध और देहाती हिंदी का मेल उसके कानों में पड़ा:
दासी 1 (चमेली): "अरी ओ ओछी बुद्धि वाली! देख तो ज़रा, ये कलयुगी राजा सो रहा है कि दोबारा परलोक सिधार गया? वर्षों बाद कोई इस चौखट पर आया था, ये तो आते ही भूमि पर लोट गया!"
दासी 2 (जूही): "अरी चुप कर बावरी! मर्यादा भूल गई क्या? शाही मृत्यु और आम बेहोशी में बड़ा अंतर होता है! ये 'राजसी मूर्छा' है, हमारे महाराज बड़े ठाट से अचेत हुए हैं।"
दासी 3 (कंचन): "ठाट की ऐसी-तैसी! आधे घंटे से इस हवेली की ओस बटोरकर इसके मुँह पर छिड़क रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे किसी पत्थर की मूरत का श्रृंगार कर रही हूँ। अगर महाराज न जागे, तो सेनापति वीरभद्र हम सब की चटनी बना देंगे!"

अविन ने पूरी आँखें खोलीं। नज़ारा किसी हॉरर-कॉमेडी फिल्म जैसा था। उसे लगा जैसे वह किसी पुरानी ऐतिहासिक फिल्म के सेट पर जाग रहा है। वह एक साधारण पलंग पर नहीं, बल्कि ठोस सफ़ेद संगमरमर से तराशे गए एक विशाल शाही आधार पर लेटा था। उस ठंडे पत्थर के ऊपर मखमल और जरी के इतने मुलायम गद्दे बिछे थे कि अविन को अपनी पुरानी जींस और गंदी जैकेट पर शर्म आने लगी।
शयनकक्ष की भव्यता देख उसकी आँखें फटी रह गईं। फर्श से लेकर दीवारों तक कीमती संगमरमर की पच्चीकारी की गई थी, जिसमें नीलम और मूंगे जैसे रत्नों से फूल-पत्तियाँ उकेरी गई थीं। छत पर लटका विशाल झाड़ू जैसा झूमर अब भी चाँदनी को सोखकर कमरे में एक रहस्यमयी दुधिया रोशनी फैला रहा था। सालों बीत जाने के बाद भी यहाँ की हवा में चमेली और कपूर की वह शाही गंध बसी हुई थी, जो सीधे किसी रईस राजा के वजूद का एहसास कराती थी।
पर माहौल जितना आलीशान था, उतना ही डरावना भी। कमरे के चारों कोनों में चार साये उसे बिलकुल पत्थर की मूर्तियों की तरह एकटक निहार रहे थे:
बिस्तर के सिरहाने जूही और चम्पा खड़ी थीं। उनके पारदर्शी हाथों में मोतियों से जड़े पंखे थे, जो बिना किसी आहट के हवा कर रहे थे। और उसके बिस्तर के पास  एक दासी कंचन अपने हाथों में एक सोने का लौटा पकड़े खड़ी थी । दाईं ओर, एक विशाल संगमरमर के खंभे का सहारा लिए सेनापति वीरभद्र खड़ा था। वहीं पास की एक नक्काशीदार मेज पर मंत्री रघुवन अपनी पुरानी पोथियाँ खोले बैठा था, मानो अविन के उठते ही कोई टैक्स वसूलने वाला हो।
अविन हड़बड़ाकर उठा और बिस्तर के रेशमी सिरहाने से टिक गया।
तुम चारों ऐसे क्यों घूर रहे हो जैसे मुझे कच्चा चबा जाओगे? ये... ये कौन सा म्यूजियम है? और तुम लोगों ने मेरे साथ कुछ 'इल्लीगल' तो नहीं किया न? मैं यहाँ कैसे आया? भाई, देखो मैं बहुत शरीफ आदमी हूँ, मोहल्ले के कुत्ते भी मुझे नहीं काटते, मुझे जाने दो!"

मंत्री रघुवन ने अपनी पोथी समेटी और थोड़ा झुककर बोला, "धैर्य रखिये महाराज! आप अपने ही शाही कमरे में हैं। आप बाहर गलियारे में बेहोश होकर गिर पड़े थे, तो सेनापति आपको यहाँ उठा लाए।"
तभी कंचन दासी चहकते हुए बोली, "ओह! महाराज जाग गए! दरबार की रौनक वापस आ गई!"
अविन ने अपना माथा सहलाया, "ओह... तो मैं फिर गिर गया था? बेइज्जती का रिकॉर्ड तोड़ दूँगा मैं।" फिर उसे अचानक कुछ याद आया और उसकी आँखों में चमक आ गई। "अबे वो खज़ाना कहाँ है? और वो जो रहस्यमई आवाज़ थी, वो कहाँ गई?"
जैसे ही उसने 'आवाज़' का नाम लिया, उसके कान के पास एक ठंडी हवा गुज़री, जैसे किसी ने उसके कान में फूँक मारी हो। अविन अभी इस बात से उबर ही रहा था कि उसके दिमाग में वही जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी:
> "लॉगिन 60% पूरा हुआ। इनाम: 100 घोस्ट कॉइन्स और एक प्राचीन चाबी मिली।"
अविन अभी बिस्तर पर लेटा ही था कि तभी हवा में एक अजीब सी हलचल हुई। अचानक, शून्य में से एक काली चीज़ प्रकट हुई और सीधे अविन की गोद में आ गिरी। अविन उछल पड़ा, "अबे! ये ऊपर से क्या टपका?"
उसने हाथ बढ़ाकर उसे उठाया। वह लोहे की एक पुरानी, जंग लगी हुई काली चाबी थी। दिखने में तो वह साधारण थी, लेकिन उसका आकार बड़ा अजीब था—दो सांप आपस में लिपटे हुए थे, जैसे अंग्रेजी का '8' अंक बना रहे हों।
अविन ने चाबी को घुमाकर देखा और बिस्तर पर लेटे-लेटे ही वीरभद्र और रघुवन की ओर देखा, "ओ सुनो मेरे 300 साल पुराने सरकारी कर्मचारियों! ये सांपों वाली चाबी किस खजाने की है? असली धन कहाँ छुपा रखा है?"
मंत्री रघुवन ने अपनी पुरानी पांडुलिपि खोली और गंभीर होकर बोला, "महाराज, इस हवेली के तहखाने में एक गुप्त मार्ग है। वहाँ तीन द्वार हैं। पहले दो द्वारों के पीछे 'मृत्यु' का पहरा है, और तीसरे के अंत में वह खज़ाना है जिसकी चमक से सूरज भी लजा जाए। लेकिन..."
"लेकिन क्या?" अविन ने उबासी लेते हुए पूछा।
सेनापति वीरभद्र की नीली आँखें अंगारे की तरह जल उठीं, "लेकिन उन द्वारों तक पहुँचने के लिए आपको 'कंकाल-गज' की अनुमति चाहिए। वह हमारा रक्षक है, और 300 साल से उसने किसी को भीतर जाने नहीं दिया।"
अविन ने राहत की साँस ली और चादर गले तक खींच ली। "अच्छा... तो ठीक है। फिर कल सुबह फुर्सत में बात करते हैं। मैं अभी बहुत थक गया हूँ, शुभ रात्रि (Good Night)!"
उसने आँखें मूँद लीं और चादर ओढ़कर सोचने लगा— 'भाई, मैं कोई पागल थोड़ी हूँ? मैंने भी डरावनी फ़िल्में देखी हैं। जो लालच करता है, वही सबसे पहले मरता है। मुझे खज़ाना चाहिए, पर इतनी भी क्या जल्दी है? सोजा बेटा अविन, वरना ये भूत तुझे अभी ले जाकर किसी हड्डी वाले हाथी से लड़वा देंगे। जान बची तो कल देखेंगे।'
लेकिन अविन की इस 'चतुराई' पर वीरभद्र और रघुवन ने एक-दूसरे को देखा और एक ऐसी मुस्कान दी, जिसे देखकर किसी का भी कलेजा काँप जाए।
"क्षमा करें महाराज," वीरभद्र ने अपनी विशाल भुजाएँ बढ़ाईं और अविन को बिस्तर से ऐसे उठाया जैसे वह कोई रूई का गट्ठर हो, "राजगद्दी का अर्थ विश्राम नहीं, युद्ध होता है। चलिए!"
"अबे! छोड़ो मुझे! ओए! ये अपहरण है! मैं पुलिस को बुला लूँगा... नेटवर्क नहीं है तो क्या हुआ, मैं जोर-जोर से चिल्लाऊँगा!" अविन हवा में पैर मारता रहा, लेकिन 7 फुट का वीरभद्र उसे उठाकर दरबार के पिछले हिस्से की ओर ले गया। वहाँ ज़मीन में एक गुप्त पत्थर का द्वार अपने आप भारी आवाज़ के साथ खुल गया।
वीरभद्र ने बिना किसी दया के अविन को उस अंधेरी सुरंग के मुहाने पर ले जाकर पटक दिया। नीचे एक विशाल मैदान जैसा हिस्सा था।

अविन जब ज़मीन पर गिरा, तो उसका पिछवाड़ा बुरी तरह झनझना उठा। उसने ऊपर खड़े वीरभद्र को मुक्का दिखाया, "अबे ओ 300 साल पुराने अंगरक्षक! कमर तोड़ दी मेरी! ये कौन सा तरीका है राजा के साथ व्यवहार करने का? मैं तुम लोगों को सजा दूँगा!" 
सालों भूतों एक दिन मेरा टाइम आएगा तब मैं तुम भूतों को बताऊंगा, ये सब जो तुम मेरे साथ कर रहे होना ये कितन गलत हैं ।

अचानक, अंधेरे को चीरती हुई एक ऐसी चिंघाड़ गूँजी कि अविन की आवाज़ उसके गले में ही फँस गई। यह आवाज़ किसी हाथी की थी, लेकिन इसमें मांस और रक्त की गूँज नहीं, बल्कि हड्डियों के आपस में टकराने की खौफनाक खड़खड़ाहट थी। धूल का एक गुबार उड़ा और सामने प्रकट हुआ— 'गजराज' का भूत।
वह 15 फीट ऊँचा हड्डियों का एक ढांचा था। उसकी पसलियाँ साफ दिख रही थीं, उसकी आँखों के गड्ढों में पीली आग जल रही थी, और उसकी सूँड से ठंडी भाप निकल रही थी। उसने अपना भारी पैर पटका तो पत्थर की धरती के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
अविन की नज़र उस विशालकाय कंकाल-हाथी पर पड़ी। अविन की आँखें फटी की फटी रह गईं।

'भैंस की आँख! ये क्या बला है? ये तो किसी डरावनी कहानी और अजायबघर का मेल लग रहा है! वो रहस्यमई आवाज वाली देवी, ये 'रक्षक' है या यमराज की सवारी? मैंने तो सोचा था कोई मोटा सा हाथी होगा जिसे केला खिलाकर पटा लूँगा, पर इसे क्या खिलाऊँ? कैल्शियम की गोलियां? अगर इसने एक पैर भी मुझ पर रख दिया, तो मेरा खज़ाना तो क्या, मेरा पहचान-पत्र भी नहीं मिलेगा! ओए वीरभद्र! वापस ऊपर खींच मुझे, मुझे खज़ाना नहीं चाहिए, मुझे घर जाना है!'
अविन का पूरा शरीर कांपने लगा, लेकिन वह कंकाल-गज उसकी तरफ अपनी जलती हुई आँखें घुमा चुका था। अब पीछे हटने का कोई मार्ग नहीं था।

अविन ने घबराकर पीछे की ओर कदम बढ़ाए, लेकिन उसकी पीठ ठंडी, खुरदुरी पत्थर की दीवार से जा लगी। एक पल के लिए उसे लगा जैसे वीरभद्र की हथेलियाँ उसे फिर से सहारा दे रही हों, लेकिन यह भ्रम कंकाल-गज के अगले कदम से टूट गया। हाथी अब महज़ दस कदम दूर था, उसकी पीली आँखों की आग अविन की रूह तक को झुलसा रही थी।

चारों ओर का माहौल इतना भारी था कि अविन को अपनी ही धड़कनों की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे रही थी। वह एक विशाल भूमिगत कक्ष में था, जिसकी छत इतनी ऊँची थी कि अँधेरे में खो जाती थी। दीवारों पर प्राचीन लिपियाँ और डरावनी आकृतियाँ उकेरी हुई थीं, जो सदियों पुरानी किसी भयानक कहानी को बयां कर रही थीं। ज़मीन पर बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़े बिखरे थे, जो शायद गजराज के क्रोध से ही टूटे होंगे। हवा में एक अजीब सी ठंडी, सूखी गंध फैली थी, जैसे कोई प्राचीन कब्रिस्तान साँस ले रहा हो। ऊपर से वीरभद्र और रघुवन के साये, पत्थर की मूर्तियों से भी ज़्यादा खामोश, इस तमाशे को देख रहे थे।

अविन का दिमाग बिजली की रफ्तार से दौड़ा: उस रहस्यमई आवाज ने कहा था—राजा की तरह व्यवहार करो। राजा की तरह सोचो। ये हाथी राजा का पालतू था। अगर मैं डरा, तो ये मुझे चटनी बना देगा। लेकिन अगर मैं इसे अपना कुत्ता... मेरा मतलब, अपना हाथी समझूँ? हाँ! राजा तो पालतू जानवरों को आदेश देते हैं! उसे भी तो 300 साल से कोई आदेश नहीं मिला होगा!'

एक गहरी साँस भरकर, अविन ने अपने काँपते पैरों को ज़मीन पर जमाया। उसने अपनी पुरानी जैकेट ठीक की, और खुद को जितनी हो सके उतनी शाही भंगिमा में खड़ा करने की कोशिश की। उसकी आँखों में एक नकली आत्मविश्वास उभर आया, जैसे कोई बच्चा शेर का नाटक कर रहा हो।

"ओए, ओए, गजराज!" अविन ने अपनी कांपती आवाज़ को बल देने की कोशिश की, लेकिन वह थोड़ी पतली निकल गई। 'कोई नहीं, कोई नहीं, पहली बार में ऐसा होता है,' उसने खुद को समझाया। "हाँ... ए गजराज! रुक जा जहाँ है! अभी के अभी रुक जा! ये क्या तमाशा लगा रखा है? अपने महाराज के सामने ऐसे कौन आता है? अनुशासन कहाँ चला गया तेरा?"

कंकाल-गज ने अपनी सूँड थोड़ी ऊपर उठाई, जैसे वह अविन की बातों को समझ रहा हो, लेकिन उसकी आँखों की पीली लपटें और भी तेज़ हो गईं। उसका अगला कदम और भी भारी था, ज़मीन थर्रा उठी। वह अविन की ओर बढ़ता रहा, रुकने का कोई नाम नहीं।

अविन की आँखों में हल्का सा डर वापस आया। 'अबे, ये तो रुक ही नहीं रहा! लगता है 300 साल से इसने कोई रॉयल कमांड सुनी ही नहीं!'

"ए... ए... गजराज! मैंने कहा रुक जा!" अविन ने इस बार अपनी आवाज़ थोड़ी और ऊँची की, जैसे कोई शरारती बच्चे को डाँट रहा हो। "बदतमीज़! तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसे आने की? अभी मैं तुझे घास-फूस का चार्जशीट पकड़ा दूँगा! चल, पहले मेरी तरफ देख और 'जय महाराज' बोल!"

गजराज ने एक भयानक चिंघाड़ मारी, जो सीधे अविन की छाती से टकराई। उसकी सूँड अब अविन के बेहद करीब थी, ठंडी भाप अविन के चेहरे से छूकर गुज़र रही थी। उसकी हड्डियों का ढाँचा और भी भयावह लग रहा था। अविन का प्लान पूरी तरह से बिखर गया।

'अरे यार! ये तो 'महाराज' की बात सुनता ही नहीं! या तो 300 साल में कान खराब हो गए हैं, या फिर ये कोई और ही टाइप का राजा है! ! ये अब अटैक करने वाला है!'

अविन के चेहरे पर छाई वो नकली शाही शान अब पूरी तरह से गायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक मासूम, निरीह प्राणी का डर था जो मौत को अपने सामने खड़ा देख रहा था। उसके दिमाग में एक ही विचार गूँज रहा था—'मेरा प्लान फ्लॉप! मैं गया! मम्मे!!'
मौत जब 15 फीट ऊँची हड्डियों के ढांचे के रूप में आपकी ओर दौड़ रही हो, तो समय जैसे थम जाता है। अविन का 'रॉयल कमांड' वाला पैंतरा बुरी तरह फेल हो चुका था। वह विशालकाय कंकाल-गज अब रुकने वाला नहीं था। वह पूरे वेग से अविन की ओर झपटा। अविन ने भागने की कोशिश की, लेकिन उस विशाल मैदान में उस दैत्य से तेज़ भागना नामुमकिन था। थक-हारकर और डर के मारे अविन फिर से दीवार से सट गया और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
'बस अविन बेटा... खेल खत्म। न खज़ाना मिला, न घर वापस जा पाया। कम से कम ये हाथी पैर धीरे से रखना!' उसने मन ही मन आखिरी प्रार्थना की।
अचानक, एक ज़ोरदार धमाका हुआ। हाथी अविन से मात्र कुछ इंच की दूरी पर रुका। उसके रुकने का झटका इतना जबरदस्त था कि फर्श की धूल का गुबार अविन के चेहरे पर छा गया। हवा में हड्डियों के टकराने की 'खड़-खड़' आवाज़ गूँजी। अविन ने काँपते हुए अपनी एक आँख खोली। सामने साक्षात् यमराज का वाहन खड़ा था। गजराज अपनी हड्डियों वाली लंबी सूँड से अविन को सूँघने लगा। उसकी सूँड से निकलने वाली वह बर्फीली ठंडी हवा अविन के चेहरे को सुन्न कर रही थी।
अविन को लगा कि शायद उसकी 'राजा' वाली बात काम कर गई है। उसने राहत की एक लंबी साँस ली और चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान लाने की कोशिश की। "देखा? मुझे पता था तू समझदार है। पुराना वफ़ादार है न? चल अब थोड़ा पीछे हट और..."
अभी अविन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक उस कंकाल ने अपनी सूँड तेज़ी से घुमाई और अविन की कमर में लपेट ली। इससे पहले कि अविन कुछ समझ पाता, गजराज ने उसे हवा में ऐसे उछाला जैसे कोई बच्चा फटे हुए फुटबॉल को फेंकता है।
"अबे ओए! ये चीटिंग है... बचाओओओ!" अविन चिल्लाता हुआ दूर जाकर गिरा। उसका शरीर पत्थरों पर रगड़ता हुआ रुका। दर्द के मारे उसकी चीख निकल गई। उसे लगा कि उसकी हड्डियाँ भी अब उस हाथी की तरह अलग-अलग हो जाएँगी।
वह लहूलुहान तो नहीं था—पर दर्द असली था। वह हिम्मत करके दोबारा खड़ा हुआ। ऊपर से वीरभद्र और रघुवन उसे ऐसे देख रहे थे जैसे किसी सर्कस का तमाशा चल रहा हो। अविन को गुस्सा आ गया। उसने धूल झाड़ी और लंगड़ाते हुए फिर से उस हाथी के सामने खड़ा हो गया।
"बस! बहुत हुआ!" अविन चिल्लाया। "तुम सबको क्या लगता है? मैं यहाँ मरने आया हूँ? ओए सूँड वाले! मेरी बात सुन! मुझे उन ऊपर खड़े दो बुढ्ढों ने जबरदस्ती यहाँ फेंका है। मैं अपनी मर्जी से तेरा शिकार बनने नहीं आया!"
हाथी ने दोबारा हमला करने के लिए अपने अगले पैर उठाए और एक भयानक चिंघाड़ मारी। वह अविन को कुचलने ही वाला था कि तभी अविन को अपनी जेब में उस 'सांपों वाली चाबी' का एहसास हुआ। उसने बिना सोचे-समझे जेब में हाथ डाला और वह काली, जंग लगी चाबी बाहर निकालकर हाथी की जलती हुई आँखों के सामने लहरा दी।
"ये देख! रुक जा! ये चाबी दी है मुझे उस रहस्यमयी आवाज़ ने! देख इसे!"
अविन की आवाज़ में इस बार डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा अधिकार था। जैसे ही गजराज की नज़र उस चाबी पर पड़ी—जिस पर दो सांप लिपटे हुए '8' बना रहे थे—पूरा माहौल बदल गया।
हाथी का उठा हुआ पैर हवा में ही जम गया। उसकी आँखों के गड्ढों में जल रही पीली आग अचानक शांत होकर नीली पड़ने लगी। वह विशालकाय कंकाल थरथराने लगा, लेकिन इस बार गुस्से से नहीं, बल्कि सम्मान या शायद पहचान से। उसने अपनी सूँड धीरे से नीचे झुका ली और उस चाबी को ऐसे गौर से देखने लगा जैसे उसे अपनी 300 साल पुरानी यादें वापस मिल गई हों।
अविन की साँसें अभी भी तेज़ थीं, लेकिन उसने देखा कि मौत का वह सौदागर अब एक पालतू जानवर की तरह शांत खड़ा था। चाबी से एक हल्की सी धुंधली रोशनी निकल रही थी जो सीधे हाथी के मस्तक पर बने एक छोटे से निशान से मेल खा रही थी।
अविन ने राहत की सांस ली और फुसफुसाया, "तो... सारा खेल इस छोटी सी चाबी का था? बेटा वीरभद्र, अब देख मैं ऊपर आकर तेरी चटनी कैसे बनाता हूँ!"