[ 7. कुशासन ]
भूल-71
दुर्बल बाबूराज और दंडात्मक न्याय-प्रणाली
बाबूराज-आई.ए.एस.-आई.पी.एस.-आई.एफ.एस.-आई.आर.एस. को मिलाकर अपराधिक न्यायिक प्रणाली से जुड़े लोग और निचले स्तर की नौकरशाही समाजवाद, विकास की खराब दर, निरंतर गरीबी, अन्याय और दुःख से बेहद आत्मीयता से जुड़ी हुई है।
नेहरू ने बाबूराज को बदलने और उसे लोगों के प्रति उन्मुख, सेवोन्मुख और विकासोन्मुख बनाने के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने अपने तौर-तरीकों और अभिमानी तरीके से संचालित होना जारी रखा, जो सार्वजनिक सेवा के लिए बिल्लकु भी अनुकूल नहीं था। स्वतंत्रता के पर्वू की राजा की तरह जीने, सत्ता के दुरुपयोग, लोगों का शेाषण करने, उनकी कीमत पर खुद अमीर होने और ब्रिटिशों की नकल करके खुद को सुसंस्कृत दिखाने की बाबू संस्कृति जारी रही; बल्कि नेहरू और इंदिरा के लाइसेंस-परमिट-कोटा राज में तो और भी बदतर हो गई।
एम.ओ. मथाई ने लिखा—“भारतीय सिविल सेवा (आई.सी.एस.) के सदस्य अन्य सेवाओं, जिन्हें वे हीन मानते थे, के मुकाबले सबसे अधिक अभिमानी और शायद सबसे अधिक जाहिल थे।” (मैक2/एल-2927)
आजादी से पूर्व के दौर में आई.सी.एस. शोषण करनेवाले औपनिवशिे क स्वामी की सेवा में थे; स्वतंत्रता-पश्चात् के दौर में उन्होंने पाला बदलकर भ्रष्ट नेताओं की सेवा की और बदले में अपने हिस्से का मेवा खाया।
15 अक्तूबर, 2013 के ‘टाइम्स अॉफ इंडिया’ में प्रफुल्ल मार्पकवार के मुंबई के एक समाचार ‘राज्य में 2,600 पलुिसकर्मी आई.पी.एस. अधिकारियों के घरों में सेवा दे रहे हैं’ के अनुसार—
“ ...अब सवाल यह उठता है कि क्या (सरकार) पूरे राज्य (महाराष्ट्र) में 280 आई.पी.एस. अधिकारियों के निवासों पर तैनात 2,600 पलुिसकर्मियों को वापस बुलाएगी? एक वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी ने बताया कि एक भारतीय पलुिस सेवा अधिकारी के निवास पर 7 से 10 कॉन्स्टेबल तैनात किए गए हैं। अगर इस संख्या को कम किया जाता है तो राज्य को इतने पलुिसकर्मी मिल जाएँगे, जिनसे कम-से-कम 10 से 12 पलुिस थानों का काम चल सकता है। (एक ईमानदार) आई.पी.एस. अधिकारी बोले, ‘मैं यह देखकर आश्चर्यचकित हूँ कि इतने सारे कॉन्स्टेबलों को नियुक्त किया गया है! कई बार तो मुझे ऐसा लगता है कि हम अभी भी ब्रिटिशों के राज में जी रहे हैं।’ यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि एस.पी./आयुक्तों के निवासों पर 5 से 9 कॉन्स्टेबल, 3 अर्दली, 1 रसोइया, 2-3 टेलीफोन संचालक और 2 वाहन चालक तैनात हैं; जबकि अन्य आई.पी.एस. अधिकारियों के निवासों पर 2 से 5 कॉन्स्टेबल, 2-3 अर्दली, 2 टेलीफोन संचालक और 2 वाहन चालक तैनात हैं। रिपोर्ट में आगे कहा गया कि ‘एक शीर्ष आई.पी.एस. अधिकारी ने बताया’, कई अधिकारियों के पास तो और भी अधिक कर्मचारी हैं, जो उनके प्रभाव पर निर्भर करता है। पुणे में जेल विभाग के एक अति-वरिष्ठ अधिकारी के निवास पर 15 से 20 कॉन्स्टेबल तैनात हैं। उस अधिकारी के मुताबिक, इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह था कि अगर अमुक अधिकारी का तबादला भी हो जाता है और उस अधिकारी को दूसरे शहर में जाना पड़ता है तो भी वही कर्मचारी उसके साथ बने रहते हैं। यहाँ तक कि एक अधिकारी के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भी वे पलुिसकर्मी तीन महीने से लेकर एक साल तक उस अधिकारी की सेवा में तैनात रहते हैं।” (यू.आर.एल.46)
ऐसे में, एक तरफ जहाँ आम आदमी अभी भी असुरक्षित बना हुआ है और महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अपराध एक बढ़ती हुई चिंता होते जा रहे हैं तो आई.पी.एस. बाबुओं को भी अपने आई.ए.एस. साथियों की तरह इसे छोड़ देना चाहिए। दुनिया में और कोई ऐसा लोकतांत्रिक देश है क्या, जो इस प्रकार की बेशर्मी, पागलपन, औपनिवशिे क विलासिता, सामंती प्रभुत्व, लोगों को सेवाएँ प्रदान करने के मुकाबले खुद को प्राथमिकता देने और आम जनता के घोर तिरस्कार की अनुमति प्रदान करे? क्या भारत जैसा एक गरीब देश, जहाँ करोड़ाें लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, इसे वहन कर सकता है? सिर्फ भारत जैसा एक सामंती, वंशवादी लोकतंत्र, जहाँ सत्ता में बैठे लोग पूरी तरह से जनता का अपमान और तिरस्कार करते हैं, जनता के ऐसे घोर अपमान और उपेक्षा की अनुमति दे सकते हैं।
बाबूवाद (विशेषकर शीर्ष पर बैठे आई.ए.एस. ने, जिन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए)ने राज को एक कठोर शोषक से नागरिकों की सेवा करनेवाले में बदलने के लिए किया ही क्या है? कोई यह सोच सकता है कि आखिर आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.एफ.एस. और आई.आर.एस. के साथ शब्द ‘सेवा’ जोड़ा ही क्यों गया है, या फिर इसका मतलब सिर्फ अपने आप की सेवा करना या फिर अपने मालिकों की सेवा करना है, तो वे क्या यह जनता की सेवा करते हैं? या वे अपनी सेवा करवाते हैं? बाबुओं की आई.क्यू. वास्तव में बेहद कम है—लो इंटिग्रिटी कोशेंट। राजनेताओं की तुलना में शायद बाबू अधिक बड़े अपराधी हैं। भारत के कुशासन के लिए काफी हद तक आई.ए.एस.-आई.पी.एस.-आई.एफ.एस.-आई.आर.एस. के गठबंधन को जिम्मेदार माना जा सकता है। वे गोबर के ढेर के शीर्षपर बैठते हैं और कई मायनों में हर पाँच साल में आते-जाते रहनेवाले राजनेताओं से अधिक शक्तिशाली होते हैं; जबकि वे अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के चलते अपने अक्षम कार्य-निष्पादन के बावजूद पद पर बने रहते हैं। आई.सी.एस. ब्रिटिशों के राज में समृद्ध हुआ, जबकि राष्ट्रवादी जेलों में सड़ते रहे। आजादी के बाद शीर्ष स्तर के बाबू (सभी तो नहीं, लकिन एक भारी बहुमत) बहुत अच्छा समय गुजारते आ रहे हैं—पैसा कमाना, शक्ति का दुरुपयोग करना, बहुत कम योगदान देना, देश को गर्त में ले जाना, फिर राजनेताओं को तमाम बुराइयों का दोष देना और बताना कि कैसे उन्हें काम करने की आजादी नहीं दी गई।
दुर्गा दास ने भारत में ब्रिटिश नौकरशाही के बारे में लिखा—“आर्थिक रूप से सुरक्षित और सामाजिक रूप से विशिष्ट सिविल सेवक और उनकी पत्नियाँ ऐसे व्यवहार करते थे, जैसे सामंत और जमींदार अपने घर पर करते थे। उनके छोटे-से-छोटे काम को करने के लिए नौकरों की फौज, उनके सामाजिक विशेषाधिकार को संरक्षित करने के लिए एक क्लब और उनकी श्ष्ठता को मकखन लगाने के लिए कार्यकारी अधिकारी।” (डी.डी./51)
भूरे साहब, जिन्होंने आजादी के बाद सत्ता सँभाली, उनके ही नक्शे-कदम पर चले। नेहरू ने 1930 के दशक में आई.सी.एस. (भारतीय सिविल सेवा) की यह कहते हुए निंदा की, “न तो भारतीय, न ही सिविल और न ही सेवा।” उन्होंने आगे कहा, “यह आवश्यक है कि आई.सी.एस. और ऐसी तमाम सेवाएँ पूरी तरह से खत्म हो जाएँ।” दुर्भाग्य से, आजादी के बाद, जब वे खुद सत्ता में थे तो ऐसी प्रतिज्ञाएँ और बाकी के वादे सब हवा हो गए।
जैसेकि उनकी सामान्य सेवा-अवधि देश को बरबाद करने के लिए काफी नहीं है, बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त बाबू किसी-न-किसी प्रतिष्ठान में सरकारी पद की व्यवस्था कर लेते हैं; वास्तव में कभी सेवानिवृत्त नहीं होते हैं। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने जुलाई 2012 में अपने लेखों की एक शखृं ला में (आई.ई.2, आई.ई.3, आई.ई.4) आई.ए.एस. का वर्णन ‘इंडियन अॉलवेज इन सर्विस’ (हमेशा सेवारत भारतीय) के रूप में किया। एक ‘पुष्ट सुलभ पैसे की टिकट’ को पाने की संभावना, जैसाकि आई.ई. ने कहा, प्रमुखतः इस बात पर निर्भर करता है कि वह उस समय की सत्ता के कितना नजदीक है! वास्तव में, राजनीतिक वर्ग और बाबूवाद, प्रमुखतः आई.ए.एस., एक-दूसरे के पूरक हैं। राजनेता बिना बाबुओं की मदद के अथाह संपदा अर्जित नहीं कर सकते, दूसरों को लाभ नहीं पहुँचा सकते और अपने तथा अपने राजवंश के शासन को आगे नहीं बढ़ा सकते और बदले में शीर्ष बाबू राजनेताओं के हस्तक्षेप के बिना मलाईदार पदों और काली कमाई में अपने हिस्से तथा अपने काले कारनामों से बचाव का रास्ता नहीं पा सकते। एक परस्पर लाभदायी संयोजन होने के नाते शीर्ष बाबुओं की चाहत होती है और राजनेता सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी निरंतर कमाईवाली सेवाओं को बनाए रखें।
राजनीतिक संरक्षण की मौजूदा प्रचलित प्रणाली की बदौलत शक्तिशाली, लचीले, सामान्यज्ञ बाबुओं ने काफी लंबे समय से अपने शिकंजों को फैलाकर न सिर्फ राज्यपालों के पदों को हासिल किया है, बल्कि ऐसे तमाम महत्त्वपूर्ण पदों पर कब्जा किया है, जिनके लिए जरूरी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है; जैसे—आर.बी.आई. गवर्नर, सी.ए.जी., ट्राई (TRAI) सी.सी.आई., एन.डी.एम.ए., सी.ई.आर.सी. इत्यादि के अध्यक्ष का पद। हालाँकि, ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि लगभग सभी शीर्ष पदों के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है और सामान्यतः आई.ए.एस. (यहाँ तक कि उन्होंने कोई कोर्स कर लिया हो या फिर उप-पदों के पाने के लिए थोड़ा अनुभव पा लिया हो) इन पदों के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त होते हैं, क्योंकि शीर्ष स्तर की विशेषज्ञता के लिए उस विशेष क्षेत्र में कई वर्षों के केंद्रित कार्यों की आवश्यकता होती है, जो आई.ए.एस. कभी नहीं पा सकते। इसी वजह से आई.ए.एस. के पास उन क्षेत्रों में योगदान करने के लिए कुछ भी सार्थक नहीं होता है और वे सिर्फ समय बिताते हुए फाइलों को आगे बढ़ानेवाले बनकर रह जाते हैं। क्यों नहीं ट्राई (TRAI) की कमान एक आई.ए.एस. बाबू के स्थान पर दूरसंचार विशेषज्ञ के हाथ में होनी चाहिए? आखिर क्यों सी.ए.जी. भारतीय अॉडिट और लेखा सेवा के बजाय एक आई.ए.एस. होना चाहिए? आर.बी.आई. का गवर्नर एक कुशल और अनुभवी अर्थशास्त्री होना चाहिए, या फिर एक आई.ए.एस. बाबू के हाथों में आर.बी.आई. की कमान होनी चाहिए? आखिर अमेरिका कैसे प्रासंगिक पदों का नेतृत्व करने के लिए संबंधित क्षेत्रों के उच्च प्रशिक्षित विशेषज्ञों का प्रबंधन करता है; जबकि इसके बिल्कुल उलट, हम सभी शीर्ष पदों पर बिल्कुल बेमेल आई.ए.एस. बाबुओं को बैठा देते हैं।
आखिर ऐसा क्यों है? असल में, राजनेताओं को ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है, जो उनके काम कर सकें और आई.ए.एस. बाबू उनकी इस आवश्यकता पर पूरी तरह से खरे उतरते हैं। क्यों उन पदों को भरने के लिए अकादमिक, न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक, राजस्व, सुरक्षा, आपदा-प्रबंधन, कानून लागू करने, उद्यम, व्यापार, प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार या अन्य तकनीकी विशेषज्ञों को बाहर से बुलाया जाए तथा ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और खरे व्यक्ति रखने का अनावश्यक जोखिम उठाया जाए? आई.ए.एस. बाबू सबसे सुरक्षित दाँव है, इसलिए सेवानिवृत्त बाबुओं को कामों की भीख माँगते देखा जा सकता है।
वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद इस बात की उम्मीद जताई जा रही थी कि नौकरशाही के शिकंजे में कुछ ढील आएगी। लकिे न अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ पैसा कमाने के मौकों में भी हुए असीमित विस्तार को देखते हुए राजनेता-नौकरशाही के गठबंधन ने यह सुनिश्चित किया कि सामने आ रहे नए निकायों के आधिक्य, विशेषकर नियामकों, में से अधिकांश इन बाबुओं के कब्जे में ही रहे। राजनेताओं की सहमति के साथ सेवारत और सेवानिवृत्त बाबुओं ने वास्तविक रूप से महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने वाले तमाम निकायों को अपने कब्जे में ले रखा है। आई.ए.एस. बाबुओं के नियामक निकायों के प्रमुखों के पद पर काबिज होने के चलते स्वायत्त, स्वतंत्र, ईमानदार, सक्षम और संतुलित नियमन एक कल्पना है। बाबूवाद जिस प्रकार से मौजूद है, नतीजे देने में यह पूरी तरह से अक्षम है; क्योंकि आजादी के बाद के छह दशकों का अनुभव सामने है। हालाँकि, इस बीच कुछ बाबू ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने अच्छा करने का प्रयास किया है; लेकिन उनका बहुत मामूली प्रतिशत और अपवाद ही रहा है और यहाँ तक कि वे लंबी दूरी तय करने में शामिल रहे, क्योंकि प्रतिष्ठान ने ही उन्हें शिकस्त दे दी, जिनमें उनके अपने सहकर्मी भी शामिल थे।
क्या यह वास्तव में अजीब नहीं है कि एक तरफ जहाँ राजनीतिक दल एक-दूसरे को उधेड़ रहे हैं, टी.वी. और प्रिंट मीडिया राजनीतिक वर्ग की कटु आलोचना कर रहा है तथा एन.जी.ओ. और नागरिक समाज के समूह उनके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में शायद ही कोई ऐसा है, जो इन बाबुओं की शिथिलता, सत्यनिष्ठा की कमी, अक्षमता और भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा हो, जिनकी मिलीभगत या लापरवाही के बिना कोई घपला-घोटाला होना संभव नहीं है। एक सक्षम और ईमानदार आई.ए.एस. अधिकारी खेमका, जो भुक्तभोगी ही हैं, का कहना है, “अगर नौकरशाह अपना कर्तव्य ठीक से निभाएँ तो देश में कोई घोटाला नहीं हो सकता।”
असलियत यह है कि बाबूवाद भारत की दुर्दशा की नींव का एक बेहद मजबूत स्तंभ रहा है। भारतीय बाबूवाद निश्चित ही निरंकुश, अभिमानी, कठोर, अन्यायी, हृदयहीन, बदतमीज, असावधान, अक्षम, अयोग्य, बेअसर, भाई-भतीजावाद से ग्रस्त, ढीला, सुस्त, मतलबी और बेशर्मी भरा तथा भ्रष्ट रहा है। नौकरशाही अब चोरतंत्र है। सिर्फ एक चीज है, जो हमें नौकरशाही से आंशिक रूप से बचाए हुए है और वह है उनकी अक्षमता।
भारत की तमाम परेशानियों के सबसे बड़े कारण हैं भ्रष्टाचार एवं खराब प्रशासन और इन दोनों के लिए ही बाबूवाद पूरी तरह से जिम्मेदार है। राजनीतिक वर्ग तो निश्चित रूप से जिम्मेदार है ही, साथ ही बाबूवाद भी बराबर का जिम्मेदार है, जो इनके साथ पूरी तरह से मिला हुआ है। इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं कि पी.ई.आर.सी. (राजनीतिक और आर्थिक जोखिम परामर्श : www.asiarisk. com) इसे एशिया की सबसे खराब नौकरशाहियों में से एक के रूप में दर्जा देता है। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’, मुंबई में 16 अक्तूबर, 2013 के एक लेख के मुताबिक—“प्रमुख नीतियों में अड़चन डालना, दैनिक मामलों में फैली व्यापक लालफीताशाही, बड़े पैमाने पर फैला भ्रष्टाचार, कुछ नया करने में अक्षम और असंवेदनशील होनेवाले तथा ऐसे सामान्यज्ञ व्यक्ति, जिनके पास विशेषज्ञता की कमी है।” पी.ई.आर.सी. ने वर्ष 2013 में एशिया-प्रशांत के लिए ‘व्यावसायिक पर्यावरण पर भ्रष्टाचार का प्रभाव’ नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। यह 10 के पैमाने पर देशों को ग्रेड देती है, जिसमें 0 सबसे अच्छा और 10 सबसे खराब तथा सबसे भ्रष्ट है। 0.74 के स्कोर के साथ सिंगापुर शीर्षपर रहा, जबकि जापान एवं अॉस्ट्रेलिया 2.35 के स्कोर के साथ दूसरे स्थान पर सहबद्ध हुए और 8.95 के स्कोर के साथ भारत सबसे नीचे के पायदान पर था।
असल में, भारतीय नौकरशाही प्रणाली सुधारों से परे है। इसका एकमात्र इलाज यह है कि इसे जड़ से खत्म किया जाए और पूरी तरह से दोबारा तैयार किया जाए। जब कोई निजी कंपनी असफल हो जाती है या खराब नतीजे देती है तो आप उस शीर्ष नेतृत्व को दोष देते हैं, जिसे अकसर इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। आई.ए.एस.-आई.पी.एस.-आई.एफ.एस.-आई.आर.एस. मिलकर सरकार के शीर्ष अधिकारी होते हैं। आपको उन्हें भारत की असफलता का दोषी ठहराना ही होगा, केंद्र व राज्यों दोनों में ही। अधिकांश बाबू या तो समाजवाद या फिर राज्य के किसी नियंत्रण या नियमों के समर्थक रहे हैं—इसलिए नहीं कि उन्हें लगता है कि वे भारत का कुछ भला करने में सक्षम रहेंगे, बल्कि इसलिए, क्योंकि ऐसा करना उनकी शक्तियों और महत्त्व को बढ़ाने में मददगार होता है और पैसा बनाने के नए रास्तों को खोलता है। यह बात भी सच है कि सभी बाबू बुरे नहीं हैं। जैसाकि किसी ने कहा है, सिर्फ 99 प्रतिशत बाबू ऐसे हैं, जो बाकियों का नाम खराब कर रहे हैं! इस संबंध में पूर्व कैबिनेट सचिव टी.आर. सुब्रमण्यम की पस्तु क ‘जर्नीज थ् बाबूडम ऐंड नेता रू लैंड’ (टी.आर.एस.) पढ़ने लायक है।
****************
बाबूवाद को देखते हुए फ्रांज काफ्का के मेटामोर्फोसिस पर एक पैरोडी आपके दिमाग में आकार लेती है। कैसा रहता, अगर काफ्का का जन्म भारत में हुआ होता और उन्होंने स्वतंत्रता-पश्चात् भारत को देखा होता और अगर उन्होंने मौजूदा भारत के संदर्भ में मेटामोर्फोसिस को लिखा होता? क्या यह अभी भी बिना किसी सुव्यवस्था एवं न्याय वाली शासन प्रणाली के साथ गैर-बराबरी और अलगाव तथा एक बेतरतीब व अराजक सृष्टि के आंतरिक गुणवाला होगा? क्या यह अभी भी ग्रेगर, एक यात्रा सेल्समैन, एक विशाल कीट में कायापलट होगा? या फिर, इसके बजाय यह एक मूढ़, कठोर, भ्रष्ट, जंग लगी हुई अन्यायपूर्ण प्रणाली का हिस्सा होगा—वह भी मानव-निर्मित, जिसमें ग्रेगर एक घूमनेवाले सेल्समैन के बजाय एक बाबू होगा और वह एक विशालकाय तिलचट्टे में बदल जाएगा?
****************