भूल-18
नेहरू ने पेशकश किए जाने पर जम्मू व कश्मीर के विलय को ठुकरा दिया था
जून-जुलाई 1947 तक जम्मूव कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ अंतिम विलय की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए थे, जिसमें उनके पाक-समर्थक पी.एम. रामचंद्र काक को हटाकर मेहर चंद्र काक को पद सौंपना था, जो एक अधिवक्ता होने के साथ-साथ सीमा आयोग में कांग्रेस द्वारा मनोनीत किए गए थे और जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। इस सबके मद्देनजर नेहरू को एक अनुकूल माहौल तैयार करना चाहिए था और हरि सिंह को भरोसे में लेना चाहिए था, ताकि महाराजा के भारत के साथ विलय करने के फैसले को तेजी से अमली जामा पहनाया जा सके। इसके परिणामस्वरूप, इस देरी से हुए विलय के चलते सामने आनेवाली तमाम मुसीबतों से बचा जा सकता था। पर नेहरू ने ऐसा करने के बजाय महाराजा के साथ विरोधी जैसा व्यवहार किया।
एंड्रयू व्हाइटहेड ने ‘ए मिशन इन कश्मीर’ में लिखा—“इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि महाराजा ने अगस्त 1947 में या फिर निश्चित रूप से सितंबर के मध्य तक फैसला कर लिया था कि उनके पास भारत में शामिल होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है और यह भी कि वे सिर्फ सबसे माकूल माहौल तथा सबसे फायदेमंद शर्तों का इंतजार कर रहे थे।” (ए.डब्ल्यू./101)
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महाराजा हरि सिंह ने जब अगस्त-सितंबर 1947 में वास्तव में कश्मीर के भारत में विलय की पेशकश की तो बिल्कुल आश्चर्यजनक तरीके से नेहरू ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जो यह चाहते थे कि पहले शेख अब्दुल्ला को रिहा किया जाए और राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाए—एक ऐसी शर्त, जो महाराजा को बिल्कुल भी मंजूर नहीं थी। क्या यह अजीब नहीं था? एक देश, जिसे विलय की पेशकश की जा रही है, वह शर्तें थोप रहा है, जबकि ऐसा विलय के लिए राजी होनेवाले राज्य को करना चाहिए था! घमंड से भरे नेहरू के तरीके वास्तव में विचित्र और खतरनाक थे! (इसके बिल्कुल उलट, दूसरी तरफ जिन्ना थे, जिन्होंने जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर के महाराजाओं के सामने अपने खुद के फाउंटेन पेन के साथ एक कोरा कागज रखकर उनसे विलय के लिए पाकिस्तान में विलय की अपनी शर्तें लिखने का प्रस्ताव देते हुए कहा, “आप अपनी खुद की शर्तें लिख सकते हैं।” (बी.के./337)) अगर उस विलय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया होता तो भारतीय सेनाएँ पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा अक्तूबर 1947 में किए गए हमले से काफी पहले ही कश्मीर में तैनात हो गई होतीं, जिसके चलते पी.ओ.के. के निर्माण के साथ-साथ लूट, हत्याओं और बलात्कारों की त्रासदी से भी बचा जा सकता था।
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‘द शैडो अॉफ द ग्रेट गेम’ में सरीला लिखते हैं—
“माउंटबेटन ने आगे कहा, ‘उन्होंने (सरदार ने) भी यह कहते हुए पहली बार नेहरू पर हमला बोला, ‘मुझे इस बात का अफसोस है कि हमारे नेता ने बुलंद विचारों को हवा में उड़ा देने का फैसला किया है और उनका जमीन या फिर वास्तविकता से कोई संपर्क ही नहीं है।” हो सकता है कि उस समय पटेल की नेहरू से नाराजगी की प्रमुख वजह उनका महाराजा के कश्मीर के भारत में विलय के प्रस्ताव को तब तक के लिए ठुकराना रहा हो, जब तक कि राज्य में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार का गठन नहीं हो जाता।” (सार/370)
जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को स्वीकार न करने का नेहरू का इतना बड़ा फैसला, वह भी मंत्रिमंडल की सहमति लिये बिना, वास्तव में अलोकतांत्रिक और गैर-जिम्मेदाराना होने के साथ-साथ गैर-कानूनी भी था। इस बात की भी पूरी संभावना है कि माउंटबेटन ने उन्हें विलय को स्वीकार करने से रोक दिया हो।