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“સાહેબ” એક શબ્દ નહોતો, મારી ઓળખ હતો, હવે એ જ શબ્દ બોલું છું, અને હું જ અજાણી બની જાઉં છું. તમે ગયા. હું પડી નથી, ઊભી છું હજી, પણ અંદર કંઈક સદાકાળ માટે સૂનું પડી ગયું છે. બે દીકરીઓની આંખોમાં પ્રશ્ન છે, હું આંસુ નહીં, હિંમત પહેરું છું, મા છું. એટલે સત્ય ગળી જાઉં છું. તમે હતા ત્યારે બળ હતું, હવે હું જ બળ બનવાની ફરજ છે, દુઃખને છાતીમાં દાટી, હાસ્યને હોઠે બાંધી રાખું છું. દરેક ખૂણો આજે પણ તમારી યાદથી ધબકે છે, પણ હું મૌનને જ ઉત્તર બનાવું છું. “સાહેબ” હવે અવાજમાં વિનંતી નથી, એક નિશ્ચય છે. તમે નહીં આવો, એ કડવો સ્વીકાર છે. હું તૂટી નથી હવે, હું કઠોર બની ગઈ છું. દર્દને હૃદયમાં રાખી, જીવવાનું યુદ્ધ લડી રહી છું.
ભાઈ તું કેમ ગયો… હૈયું તૂટ્યું, શ્વાસ અટક્યા, વિખૂટી ગયો ભાઈ, જીવનનો આધાર મારો લૂંટાઈ ગયો ભાઈ. રાખડીના પવિત્ર ધાગા કંપી ઉઠ્યા હાથમાં, સ્નેહનો એ અતૂટ બંધ વિખેરાઈ ગયો ભાઈ. નોધારી મૂકી દુનિયામાં, એકલી પડી ગઈ હું, આંસુઓનો દરિયો આંખોમાં વહી ગયો ભાઈ. છાંયો બનીને સાથ આપતો દરેક પળે તું, એ સાથ મારો વચ્ચે જ સરકાઈ ગયો ભાઈ. મારા દુઃખે તું પહેલાં જ રડી પડતો હસતાં, આજે હાસ્ય મારું અંદર જ દબાઈ ગયો ભાઈ. “બહેન” કહીને એક વખત બોલાવી લે મને, મારો આ રડકાર અંદર જ રહી ગયો ભાઈ. શબ્દો સૂના થઈ ગયા છે તારી વિના હવે, હૈયાનો દરેક સ્વર પણ સુકાઈ ગયો ભાઈ. પ્રસંગ પ્રણયરાજ રણવીર
હસતો માણસ.!!!! હું પથ્થરોથી ખડકાયેલ પહાડ જેવો, જલાવો મને તો પીગળતા મીણ જેવો. હું કઠોર બહારથી, અંદરથી નરમ દિલનો, પ્રેમથી સ્પર્શો તો બની જાઉં ફૂલ જેવો. ઘણા ઘા સહન કર્યા સમયના હાથેથી મેં, છતાં ઊભો રહ્યો છું અડગ યકીન જેવો. આંખોમાં વાદળ છે, હોઠ પર હાસ્ય રાખું, દર્દ છુપાવું અંતરમાં, દેખાઉં દર્પણ જેવો. ‘પ્રસંગ’ કહે છે દિલની વાત એવી સાચી, દુખમાં પણ જીવું છું હસતો માણસ જેવો. - પ્રસંગ પ્રણયરાજ રણવીર ૩૦/૦૪/૨૦૨૬
दर्द देना नहीं हैं लेना होता है, यकीन लेना नहीं देना होता हैं। "प्रસંग"
यही हाल है। महंगाई की मार में जीना कठिन यही हाल है, कमाई से बड़ा अब हर एक सवाल यही हाल है। वादों के मेले में सच की दुकानें बंद पड़ीं, झूठों के चेहरे पर बस इक कमाल यही हाल है। आँकड़ों की चादर से भूख को ढकने की कोशिश, हकीकत के शहर में हर दिन बवाल यही हाल है। जो ताली बजाते हैं सत्ता की हर बात पर, उनकी आँखों में बसा हुआ जंजाल यही हाल है। जनता की जेबों में बस कर्ज़ का बोझ बढ़ा है, उम्मीदों के घर का टूटा सा हाल यही हाल है। भाषणों की रोशनी में अंधेरा बढ़ता ही गया, सच की हर आवाज़ का होता दर्द यही हाल है। जो कहते हैं “सब ठीक है”, वो ही सबसे दूर खड़े, प्रसंग कहे, जन-जीवन बेहाल यही हाल है। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
“अधूरे हिसाबों में हूं” ए सच कहूं कि आजकल मैं मुश्किलों में हूं, बस खाली ये वक़्त गुज़रने के प्रयासों में हूं। कभी हौसला था जो आसमां को छू लेने का, वो बिखरे हुए एहसासों की टूटी किताबों में हूं। न रास्ता कोई साफ़ है, न ही मंज़िल का पता, मैं धुंधले से सफ़र और अधूरे हिसाबों में हूं। कभी जो अपने थे, वही अब अजनबी से हुए, मैं रिश्तों की भीड़ में सबसे तन्हा नक़ाबों में हूं। न अब शिकवा, न शिकायत किसी मोड़ पर, बस अपने सवालों के अनसुने जवाबों में हूं। कभी रोशनी थी, वो भी अब सिमट सी गई, मैं अंधेरों के शहर और खामोश सराबों में हूं। मैं अपनी ही कहानी का टूटा हुआ हूं, “प्रसंग”, हर मोड़ पर बिखरा मगर फिर भी यादों में हूं। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
“वक़्त और हम" जिसे समझना था उसे कभी हम समझ न पाए, साँसे तो चलती रही पर एक पल हम जी न पाए। वक़्त के धागों में उलझ कर रह गई हर बात यहाँ, दिल तक पहुँचा सच मगर होंठ उसे कह न पाए। दौर था समझदारी का फिर भी फ़ासले बढ़ते रहे, हम क़रीब होकर भी रिश्तों से रिश्ते जोड़ न पाए। हर तरफ़ शब्दों का शोर था मगर यहाँ सन्नाटा रहा, हमें जो महसूस हुआ वो भी किसी से बता न पाए। ख़ामोशियों ने भी कई राज़ सीने में दफ़न किए, हम जो थे अंदर से वह चेहरा कोई देख न पाए। जिसको समझा था अपना वो भी अपना न हुआ, हम ही “प्रसंग” थे जो खुद को भी समझ न पाए। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
इकरार की सज़ा। हम भूलकर भी कहाँ कैसे कोई भूल करें, आपने जो कह दिया है वही इकरार करें। हर ज़ख़्म को ख़ामोशी से ही मंज़ूर करें, मन पर जो गुज़र गया उससे पार करें। तन्हा सफ़र में धूप ही क़िस्मत का हिस्सा, छाँव की चाह में क्यों ख़ुद को बेकरार करें। सच की चुभन को हँसते हुए सह जाएँ, झूठी ख़ुशियों से क्यों मन बीमार करें। वक़्त के फ़ैसले पर कोई शिकवा न रखें, जो भी मिला है उसी पर विश्वास करें। ‘प्रसंग’ हर हाल में खामोशी से सहते रहें, लोग जो भी कहें, उसे बस स्वीकार करें। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
पहचान। तुम इतने गिरो कि उठाने वाला मिल जाए, टूटे हालात हो! अपना पराया सब खुल जाए। मुश्किल राहों में जब अँधेरा बहुत घना हो, कौन साथ है, ये हक़ीक़त उजागर हो जाए। अपनेपन के दावों में अक्सर फ़रेब छुपा रहता, सच की आँच में हर रिश्ता साफ़ नज़र आए। जिसे अपना समझा, उसी ने दगा कर दिया, दिल ही नहीं, जीने का सहारा भी टूट जाए। रातों की वो तन्हाई में जब सन्नाटा गहरा हो, आवाज़ों के बीच में सच्चा चेहरा उभर आए। अब न शिकायत, न कोई उम्मीद दिल में रहे, तजुर्बों का हर ज़ख्म सबक बनकर रह जाए। 'प्रसंग' सफ़र-ए-ज़िंदगी इतना समझ आया, गिरने पर ही इंसान की पहचान निखर जाए। - प्रसंग प्रणयराज रणवीर
वक्त के ज़ख्म। बदलते वक्त ने मुझे नया मुकाम दे दिया, मैंने जो चाहा नहीं था वही ज़ख्म दे दिया। सुकून की ख़ातिर बस दिल ठहर गया कहीं, किस्मत ने हर अरमान को धुआँ दे दिया। रिश्तों की भीड़ में अजनबी सा खड़ा रहा, चेहरों के बदलते रंगों ने इम्तिहां दे दिया। जिसको अपना समझा, वो बेवफ़ा निकला, उसने ही दिल की बात को सरेआम दे दिया। वफ़ा की राह पर चला तो ठोकरें मिलीं, दौर-ए-जहाँ ने हर कदम पे फ़साना दे दिया। अब न शिकायत रही, न कोई गिला बचा, तजुर्बों ने हर दर्द को सलीक़ा दे दिया। 'प्रसंग' तन्हाइयों में अपनी सदा सुनता रहा, ख़ामोशी ने हर लफ़्ज़ को बयाँ दे दिया। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
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