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PRASANG

PRASANG

@advpranayrajranveer8815


यादों की कैद।

ना हमें नींद आती है, ना यादें हमें सोने देती हैं,
रात-दिन ये बेचैनियाँ चैन से रोने कहां देती हैं।

सूनी राहों में गूंजे तेरी आहट का कोई धोखा,
धुंधली सी परछाइयाँ सच को खोने कहां देती हैं।

हमने चाहा था भुला दें तेरे हर लम्हे की खुशबू,
ये महकती सी यादें खुद को होने कहां देती हैं।

वो जो वादे थे तेरे, उम्र भर साथ निभाने के,
अब वही टूटी सदा दिल को संजोने कहां देती हैं।

हम भी हँस लेते कभी इस बनावटी से जग में,
तेरी सच्चाई मगर झूठ को बोने कहां देती हैं।

अब तो आदत सी बनी इन तन्हा लम्हों के साथ,
“प्रसंग” ए खामोशियाँ तसल्ली होने कहां देती हैं।

प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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એવું તો કોણ માનશે?

હું માણસ મજાનો એવું તો કોણ માનશે?
શબ્દોનો છું ખજાનો એવું તો કોણ માનશે?

હાસ્ય હોય ચહેરે ને ભીતર ભર્યા છે દર્દ,
પીડાથી છું ભરપૂર એવું તો કોણ માનશે?

ઘણી યાદોના ઉજાગરા સપનાની રાહમાં,
આંસુ વહ્યાં ઘોડાપૂર એવું તો કોણ માનશે?

શાંત હૃદયે દોટ મૂકી શમણાંના શહેરમાં,
ખ્વાબો ચકનાચૂર, એવું તો કોણ માનશે?

એકલ રસ્તે ચાલતો નવી ના કોઈ મંજિલ,
છું અહીં હું મુસાફિર એવું તો કોણ માનશે?

નીત નવા ઉજવ્યા બધા અવસર હેતના,
પ્રસંગ મૌત છે કાફિર એવું તો કોણ માનશે?

- પ્રસંગ
પ્રણયરાજ રણવીર

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ખુદમાં..!!!!

ખુદ ને ક્યાં શોધું, ખોવાયો છું ખુદમાં,
જ્યાં જ્યાં હું મળ્યો, જડ્યો છું ખુદમાં.

આંખોના આંસુ કહે, નિઃશબ્દ વાતો,
દરેક પળમાં હું વિખરાયો છું ખુદમાં.

સપનાઓ તૂટ્યાં, થંભી ગયા શ્વાસ,
જીવતો હોવા છતાં મરાયો છું ખુદમાં.

રસ્તાઓ બધા જ ખોવાઈ ગયા અંતે,
એકલો બનીને અટવાયો છું ખુદમાં.

'પ્રસંગ' કહે છે, ઊંડે ઉતર જો હવે તું,
સાચો હું ક્યાંક તો સમાયો છું ખુદમાં.

- "પ્રસંગ"
પ્રણયરાજ રણવીર

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हौसले की सुबह।

हौसला रख, ये अँधेरा भी गुजर जाएगा,
तेरा हर ज़ख्म ही इक दिन तो भर जाएगा।

रात कितनी भी हो गहरी, नहीं रहती सदा,
सुबह का नूर भी हर हाल उतर जाएगा।

दर्द को थाम के मत बैठ यूँ हार मान,
चल पड़ेगा तो ही रास्ता निखर जाएगा।

साँस चलती है तो उम्मीद भी बाकी है अभी,
ये बदन फिर से नई ताक़त से भर जाएगा।

आँधियों से जो लड़ा है वही जीता है सदा,
तू अगर डट के खड़ा हो तो संवर जाएगा।

मुस्कुरा दे ज़रा, हालात बदलते हैं यहाँ,
तेरा ये वक्त भी इक दिन तो गुजर जाएगा।

नाम अपना न गिरा, हिम्मत बनाए रख तू,
देखना, फिर से तू पहले सा उभर जाएगा।

- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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तन्हाई का सच।

दिल ना लगाना कभी दिलदार  सारे झूठे हैं,
कसमें वादे किया था मुझे वो सारे  झूठे हैं।

चेहरों की सादगी में छुपे वो इरादों का ज़हर,
मुस्कान ओढ़े हुए सबके सब  नज़ारे झूठे हैं।

जो हमारे अपने ही थे साँसों के करीब कभी,
मुश्किल वक़्त में वो नदी के किनारे झूठे हैं।

रिश्तों के नाम पर जो मिले थे  हमको कभी,
वक़्त ने दिखा ही  दिया सारे  सहारे झूठे हैं।

इश्क़ की राह में जितने  भी  मिले हमसफ़र,
जो साथ चलने के सब के सब इशारे झूठे हैं।

अब तो “प्रसंग” समझा  तन्हाई के शहर  में,
रूह से जो भी करीब  आए वो सारे झूठे हैं।


- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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"खामोश लहरों की दास्तां"

अब टूटे दिलों को मरम्मत नया नहीं चाहिए,
इस बहती नदी को कोई किनारा नहीं चाहिए।

खामोशियों में दबी हर एक धड़कन कहती हैं,
अब किसी के सहारे की परछाई नहीं चाहिए।

राहें बदल गईं, अब तो मौसम भी बदल गए,
फिर भी ठहराव हैं, किसी नज़ारा नहीं चाहिए।

दर्द भी अब साथी है, खुशी भी अब साथी है,
तन्हा सफ़र हैं, दूजा कोई सहारा नहीं चाहिए।

जख्मों की परतें खोलती रहीं हैं वो हर यादें,
इस वीराने में अब कोई हमारा नहीं चाहिए।

अब इन लहरों के संग बहता ए दर्दे दास्तां,
'सोनी' दिल हैं मेरा, कोई पराया नहीं चाहिए।

- सोनी शाक्य

मेरे दोस्त भीड़ू ने लिखा पसंद आया तो मैंने भी अपने page पर रखने से रोक नहीं पाया।

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अनकही पीड़ा।

तुम न समझ सके कभी मेरी बेचैन निगाह,
मेरी तन्हाई की गहराई, ना जाने कोई नज़र।

मैं देखूँ तुम्हारी आँखों में मुस्कान की रौनक,
पर समझ न सके मेरे उदास मन की नज़र।

मेरी खामोशी पर तुम मुस्कुराती हो सदा,
पर न समझ न सके मेरे टूटे मन की नज़र।

मैंने जताई कितनी बातें तुमसे चुपके से,
फिर रह गईं अनसुनी मेरी आहों की नज़र।

तुम चाहो कि मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँ,
पर न समझ न सके मेरे जज़्बातों की नज़र।

मैंने सहा हर दर्द, हर तन्हाई अपनी,
‘प्रसंग’ न देख सके कोई गहराई की नज़र।

- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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મૌનનાં સવાલાત.!!!!

નથી ફીકર હવે મને મારા મોતના સવાલાતની,
કોઈ કસર ના રહે બાકી હવે એ સવાલાતની.

શ્વાસોના દરેક પળે ઊઠ્યા છે મૌન અંદરથી,
દિલને ક્યાં મળે હવે રાહત આ સવાલાતની.

રાતોના દરેક ખૂણે ગુંજે છે વિચારના પડઘા,
મનને ક્યાં મળે કોઈ અંત આ સવાલાતની.

સાચા ખોટાના રસ્તા ધૂંધળા થઈ ગયા છે,
આંખોમાં રહી માત્ર છાયા આ સવાલાતની.

સપનાઓ ઉડી ગયા છે રાખ બની સમય સાથે,
હાથોમાં રહી ગઈ ખાલી રેખા આ સવાલાતની.

ખુદને જ પૂછે અંતર સત્ય શું અહીં 'પ્રસંગ',
જવાબો ખોવાયા ભીતર જ આ સવાલાતની.

- પ્રસંગ
પ્રણયરાજ રણવીર

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सदाबहार यादें।

तेरी ख़ामोशियों का असर कुछ यूँ था,
खुद से ही बेवजह बातें करते रहे हम।

नींद आँखों से रूठी रही सारी रात,
ख़्वाब तेरे ही हर पल सजाते रहे हम।

दिल की वीरानियों में धड़कनें तेरी,
जैसे कोई इबादत निभाते रहे हम।

तुम नहीं थे मगर हर तरफ़ थे तुम ही,
खुद को तेरी ही सौगात देते रहे हम।

वक्त ने हमको पत्थर बना तो दिया,
फिर भी आँसू बरसात सहते रहे हम।

तेरी यादों का मौसम न बदला कभी,
सर्द रातों में भी तड़पते रहे हम।

‘प्रसंग’ नाम लेकर तुझे पुकारा बार-बार,
ख़ुद को ही तेरी तन्हाई में सँवारते रहे हम।

- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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यादों के बाद।

हमें नींद आएगी तो इस तरह सो जाएंगे,
कि लोग हमें जगाने को सब रो जाएंगे।

चेहरे पे सुकूँन रख के सारे दर्द छुपाएंगे,
भीतर के सभी आँसू चुपचाप खो जाएंगे।

हँसी की ओट में रखे हैं जो ज़ख़्म गहरे,
तन्हाई के लम्हों में फिर वो खुल जाएंगे।

यादों की हवा जब भी छू लेगी दिल को,
भूले हुए हर किस्से फिर से लौट आएंगे।

वक़्त की रवानी में सब कुछ बह जाएगा,
अहंकार, शिकवे मिट्टी में ही ढल जाएंगे।

थककर ये सारी साँसें जब ठहरने लगेंगी,
रूह के सभी क़दम सुकून में थम जाएंगे।

"प्रसंग" ख़ामोशी में एक दिन रुख़्सत होगा,
लोग उसे याद करके बार-बार रो जाएंगे।

- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर

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