रामपुर गाँव की गलियों में शाम का वक़्त था। सूरज पहाड़ों के पीछे छिप रहा था और आसमान में नारंगी और लाल रंग की लकीरें बन रही थीं। गाँव के बीचोंबीच एक पुरानी पीपल की छाँव में दो दोस्त बैठे थे। एक का नाम था मोहन और दूसरे का नाम था सोहन।
मोहन गाँव का सबसे ईमानदार लड़का माना जाता था। उसके बापू जी की छोटी सी दुकान थी जहाँ गाँव वाले रोज़मर्रा की चीज़ें खरीदते थे। मोहन रोज़ सुबह उठकर दुकान साफ़ करता, सामान व्यवस्थित रखता और ग्राहकों से इतनी मुस्कुराहट से बात करता कि लोग खाली हाथ भी उसकी दुकान से मुस्कुराते हुए निकल जाते। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे कोई बच्चा हो जिसे दुनिया की हर चीज़ में ख़ुशी मिलती हो।
सोहन उसका बचपन का दोस्त था। दोनों एक साथ खेले, एक साथ स्कूल गए, एक साथ नदी में नहाए। लेकिन सोहन की आँखों में वो चमक नहीं थी जो मोहन की आँखों में थी। सोहन के घर की हालत ठीक नहीं थी। उसके बापू जी शराब पीते थे और माँ बीमार रहती थीं। शायद इसीलिए सोहन के चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी उदासी लगी रहती थी, जैसे कोई बोझ उठाए हुए हो।
उस शाम पीपल की छाँव में मोहन ने सोहन से कहा, "अरे भाई, तू इतना उदास क्यों रहता है हमेशा? कुछ तो ख़ुश रह।"
सोहन ने अपने हाथों को जोड़ते हुए कहा, "मोहन भाई, तुझे क्या बताऊँ। घर की हालत तू जानता ही है। माँ की दवाईयों के पैसे नहीं हैं। कल डॉक्टर साहब ने कहा है कि अगर दो हफ़्ते में पैसे नहीं दिए तो इलाज बंद कर देंगे।"
मोहन ने सोहन का कंधा थपथपाया। उसकी आँखों में असली चिंता थी। "अरे पागल, तू चिंता मत कर। मैं हूँ ना। कल से मेरी दुकान पर आ जा। मैं तुझे काम पर रख लूँगा। तू रोज़ आकर दुकान संभाल ले, मैं और बापू जी बाहर का काम देख लेंगे।"
सोहन ने मोहन की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक कौंधी। लेकिन वो चमक ख़ुशी की नहीं थी, वो कुछ और ही थी। लेकिन मोहन तो इतना सीधा था कि उसने वो चमक नोटिस ही नहीं की।
"सच में मोहन? तू मुझे काम देगा?" सोहन ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्सुकता थी।
"हाँ भाई, क्यों नहीं? तू मेरा बचपन का दोस्त है।" मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा।
अगले दिन से सोहन मोहन की दुकान पर आने लगा। वो सुबह सात बजे आता और रात आठ बजे तक दुकान पर रहता। मोहन और उसके बापू जी उस पर पूरा भरोसा करने लगे। कभी कभार मोहन को बाहर जाना पड़ता तो सोहन पूरी दुकान संभाल लेता। ग्राहकों से बात करता, हिसाब किताब रखता, सब कुछ।
मोहन के बापू जी एक दिन मोहन से कहने लगे, "बेटा, सोहन बहुत ईमानदार लड़का है। इसे अपना भाई मान।"
मोहन ने ख़ुशी से सिर हिलाया। उसे लगा कि उसने अपने दोस्त की मदद की है। लेकिन वो नहीं जानता था कि सोहन की आँखों में वो चमक क्या थी।
महीनों बीत गए। सोहन की माँ की तबीयत ठीक हो गई। लेकिन सोहन दुकान पर आना बंद नहीं किया। मोहन ने उसकी तनख़्वाह भी बढ़ा दी। सोहन अब दुकान का पूरा हिसाब रखता था। मोहन और उसके बापू जी को लगता था कि सोहन पर इतना भरोसा कर सकते हैं कि वो अपनी जेब की चाबी भी उसे सौंप सकते हैं।
एक दिन मोहन के बापू जी बीमार पड़ गए। उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मोहन अपने बापू जी के साथ शहर चला गया। दुकान पूरी तरह सोहन के हवाले कर दी। मोहन ने सोहन से कहा, "भाई, तू दुकान संभाल ले। मैं बापू जी को लेकर आऊँगा। तू चिंता मत कर।"
सोहन ने सिर हिलाया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। "तू जा मोहन, मैं सब संभाल लूँगा।"
मोहन शहर चला गया। बापू जी का इलाज चल रहा था। मोहन रोज़ सोहन से फ़ोन पर बात करता। सोहन हमेशा कहता, "सब ठीक है भाई, तू चिंता मत कर।"
लेकिन एक हफ़्ते बाद जब मोहन वापस आया तो उसने दुकान का दरवाज़ा बंद पाया। पास के दुकानदार रामू काका ने मोहन को बुलाया।
"मोहन बेटा, तू कहाँ था इतने दिन?" रामू काका की आवाज़ में चिंता थी।
"काका, बापू जी बीमार थे। क्या हुआ?" मोहन ने पूछा।
"बेटा, सोहन ने तेरी दुकान बंद कर दी। कह रहा था कि तूने उसे दुकान बेच दी है।" रामू काका ने कहा।
मोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। "क्या? ये क्या बकवास है काका? मैंने तो उसे सिर्फ़ दुकान संभालने को कहा था।"
"बेटा, सोहन ने गाँव वालों को दिखाया कि तूने उसे दुकान बेच दी है। कागज़ात भी दिखाए। गाँव वालों ने उस पर भरोसा कर लिया।" रामू काका ने कहा, उनकी आँखों में दुख था।
मोहन दौड़कर सोहन के घर गया। सोहन का घर अब एक नया घर था, पक्की दीवारें, टिन की छत। सोहन की माँ बरामदे में बैठी चाय पी रही थीं। उनकी तबीयत तो ठीक हो गई थी, लेकिन उनके चेहरे पर अब एक अलग ही घमंड था।
"सोहन! सोहन बाहर आ!" मोहन चिल्लाया।
सोहन बाहर आया। उसने नए कपड़े पहने थे। उसके हाथ में सोने की घड़ी थी। उसने मोहन को देखा और हँसने लगा। वो हँसी मोहन ने कभी नहीं सुनी थी। वो हँसी किसी शैतान की थी, किसी दुश्मन की थी।
"अरे मोहन भाई, आ गए? कैसे हो?" सोहन ने कहा, उसकी आवाज़ में कोई शर्मिंदगी नहीं थी।
"सोहन, तूने मेरी दुकान पर कब्ज़ा किया? तूने गाँव वालों को झूठ बोला?" मोहन की आवाज़ काँप रही थी, उसकी आँखों में आँसू थे।
"अरे भाई, दुकान तो तूने मुझे बेची थी ना? कागज़ात हैं मेरे पास।" सोहन ने कंधे उचकाए।
"झूठ! मैंने तुझे कभी दुकान नहीं बेची। तूने कागज़ात जाली बनाए हैं।" मोहन चिल्लाया।
सोहन का चेहरा बदल गया। वो गुस्से में आ गया। "देख मोहन, तू मुझे कुछ मत सिखा। मैंने तेरी दुकान पर महीनों मेहनत की है। तू तो शहर में अपने बापू जी के साथ घूम रहा था। मैंने दुकान संभाली। मेरी मेहनत है इसमें।"
"मेहनत? मैंने तुझे काम दिया, तेरी माँ की दवाईयों के पैसे दिए, तुझे अपना भाई माना। और तूने मुझसे धोखा किया?" मोहन की आवाज़ टूट रही थी। उसके आँसू गालों पर बह रहे थे।
"भाई? हाँ हाँ, तू मेरा भाई था। लेकिन भाई कोई ग़रीब को भाई नहीं बनाता। तू मुझ पर एहसान कर रहा था। हर रोज़ मुझे अपनी दया दिखाता था। मुझे तेरी दया नहीं चाहिए थी।" सोहन गुस्से में बोला।
मोहन ने सोहन की तरफ़ देखा। उसे लगा कि वो किसी अजनबी को देख रहा है। ये वो सोहन नहीं था जिसके साथ उसने बचपन बिताया था। ये कोई और था, कोई दुश्मन था।
"तूने मुझसे धोखा किया सोहन। तूने हमारी दोस्ती को धोखा दिया।" मोहन ने धीमी आवाज़ में कहा।
"दोस्ती? दोस्ती तो तब होती है जब दोनों बराबर हों। तू अमीर था, मैं ग़रीब। ये दोस्ती नहीं थी, ये एहसान था। और मैं एहसान नहीं उठाता।" सोहन ने कहा और अंदर चला गया।
मोहन वहीं खड़ा रहा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसने क्या ग़लत किया था। क्या दोस्त की मदद करना ग़लत था? क्या किसी ग़रीब को काम देना एहसान था?
गाँव वाले मोहन को देख रहे थे। कुछ लोगों को सच्चाई का पता चल गया था। लेकिन कागज़ात सोहन के पास थे। मोहन कुछ नहीं कर सकता था। उसके पास पैसे नहीं थे कि वकील करे। उसके बापू जी अभी भी बीमार थे। अस्पताल का बिल चुकाना था।
मोहन अपने घर लौटा। उसका घर अब एक खाली घर लग रहा था। माँ रोते हुए बैठी थीं। बापू जी बिस्तर पर लेटे थे, उनकी साँसें भारी थीं।
"बेटा, क्या हुआ?" माँ ने पूछा।
मोहन कुछ नहीं बोल सका। वो माँ के पास बैठ गया और रोने लगा। माँ ने उसे गोद में लिया। मोहन बचपन की तरह रो रहा था, जैसे कोई बच्चा हो जिसका खिलौना कोई छीन ले गया हो।
रात हो गई। मोहन छत पर बैठा था। तारे चमक रहे थे। पहले वो सोहन के साथ यहीं बैठकर तारे गिनते थे। सोहन कहता था, "मोहन, एक दिन मैं भी इतना अमीर बनूँगा कि तारों को छू लूँगा।"
मोहन ने कहा था, "अरे पागल, तारे तो बहुत दूर हैं। लेकिन मैं तुझे इतना अमीर बनाऊँगा कि तू सब कुछ खरीद सके।"
यादें आँखों के सामने घूम रही थीं। मोहन ने अपने आँसू पोंछे। उसने फैसला किया कि वो हार नहीं मानेगा। वो अपनी दुकान वापस लेकर रहेगा।
अगले दिन मोहन शहर गया। उसने एक वकील से मिला। वकील ने कागज़ात देखे और कहा, "बेटा, ये कागज़ात जाली हैं। लेकिन केस लड़ने में समय और पैसे दोनों लगेंगे।"
मोहन ने कहा, "मैं कुछ भी करूँगा साहब। बस मुझे न्याय चाहिए।"
वकील ने केस लिया। महीनों केस चला। मोहन रोज़ शहर गाँव का चक्कर लगाता। बापू जी की तबीयत धीरे धीरे ठीक हो रही थी। लेकिन घर की हालत खराब हो गई थी। माँ ने अपने गहने बेच दिए। मोहन ने कुछ दिनों के लिए मज़दूरी भी की।
गाँव में लोगों की राय बदलने लगी। सोहन की असलियत सबके सामने आने लगी। उसने जो कागज़ात दिखाए थे, वो जाली थे। उसने जो दस्तख़त दिखाए थे, वो मोहन के नक़ली थे। लोगों को समझ आया कि सोहन ने धोखा दिया है।
एक दिन सोहन की माँ मोहन के घर आईं। उनकी आँखें लाल थीं। उन्होंने मोहन के पैर पकड़ लिए।
"मोहन बेटा, मुझे माफ़ कर दे। मैंने नहीं जानती थी कि मेरा बेटा इतना गिर जाएगा।" वो रो रही थीं।
मोहन ने उन्हें उठाया। "काकी, तुम क्यों रो रही हो? तुम्हारा इसमें क्या क़सूर है?"
"बेटा, सोहन ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। वो शराब पीने लगा है। जुआ खेलने लगा है। तेरी दुकान का पैसा सब उड़ा दिया।" काकी रोते हुए बोलीं।
मोहन को कुछ समझ नहीं आया। उसने सोचा था कि सोहन अमीर बनना चाहता था। लेकिन सोहन ने पैसे को बर्बाद कर दिया। शायद सोहन को पैसे से ज़्यादा कुछ और चाहिए था। शायद वो मोहन से जलता था। शायद वो चाहता था कि मोहन भी ग़रीब हो जाए, जैसे वो था।
मोहन ने काकी को समझाया और उन्हें घर भेज दिया। उस रात मोहन बहुत देर तक सोचता रहा। उसे समझ आया कि कुछ लोग धोखा इसलिए देते हैं क्योंकि वो ख़ुद को कमज़ोर महसूस करते हैं। सोहन मोहन की दोस्ती से जलता था, मोहन की ख़ुशी से जलता था। वो चाहता था कि मोहन भी दुखी हो, जैसे वो था।
महीनों बाद अदालत का फ़ैसला आया। मोहन की दुकान उसे वापस मिल गई। सोहन को जेल की सज़ा हुई। लेकिन मोहन ने कोई शिकायत नहीं की। उसने वकील से कहा, "साहब, दुकान मुझे वापस दिला दो, बस।"
सोहन जेल गया। उसकी माँ रोज़ मोहन के घर आतीं। मोहन उन्हें खाना देता, उनका खयाल रखता। गाँव वाले कहते, "मोहन तो सच्चा भगवान का बन्दा है। जिसने उससे धोखा किया, उसकी माँ का भी खयाल रख रहा है।"
एक दिन मोहन जेल गया। सोहन से मिलने। सोहन अब बदल गया था। उसकी आँखों में वो घमंड नहीं था। उसकी आँखों में शर्मिंदगी थी। वो मोहन को देखकर रोने लगा।
"मोहन, मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुझसे बहुत बड़ा धोखा किया।" सोहन रो रहा था, उसकी आवाज़ टूट रही थी।
मोहन ने उसे देखा। उसके मन में कोई गुस्सा नहीं था। बस एक अजीब सी शांति थी। "सोहन, तू मुझसे धोखा कर सकता था, लेकिन अपने आप से नहीं। तूने अपनी आत्मा बेच दी पैसों के लिए। वो आत्मा वापस नहीं आएगी।"
सोहन ने अपने हाथों से आँसू पोंछे। "मोहन, मैं जलता था तुझसे। तू हमेशा ख़ुश रहता था। तेरे पास सब कुछ था। मेरे पास कुछ नहीं था। मैं चाहता था कि तू भी ग़रीब हो जाए, तुझे भी दुख मिले।"
"सोहन, ग़रीबी पैसों की नहीं होती। ग़रीबी दिल की होती है। तेरे पास पैसे नहीं थे, लेकिन तेरे पास मेरी दोस्ती थी। वो दोस्ती तूने गँवा दी। अब तू सच में ग़रीब हो गया है।" मोहन ने कहा।
सोहन की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसे समझ आया कि उसने क्या खोया है। उसने पैसे के लिए अपनी दोस्ती, अपनी इज़्ज़त, अपनी माँ का प्यार, सब कुछ खो दिया था।
मोहन ने सोहन का हाथ पकड़ा। "सोहन, जब तू बाहर आएगा, तू मेरे पास आना। मैं तुझे फिर से काम दूँगा। लेकिन इस बार ईमानदारी से काम करना।"
सोहन ने मोहन की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आश्चर्य था। "तू मुझे माफ़ कर रहा है? मैंने तेरी दुकान छीनी, तुझे धोखा दिया, तेरा घर बर्बाद किया। और तू मुझे माफ़ कर रहा है?"
"सोहन, मैं तुझे माफ़ नहीं कर रहा। मैं तो ख़ुद को माफ़ कर रहा हूँ। अगर मैं तुझे नफ़रत करूँगा तो मेरा दिल भी काला हो जाएगा। मैं वैसा नहीं बनना चाहता।" मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा।
सोहन रोते रोते फर्श पर बैठ गया। उसे समझ आया कि असली अमीरी क्या होती है। असली अमीरी दिल की होती है, पैसों की नहीं। मोहन ग़रीब हो सकता था, लेकिन उसका दिल अमीर था। सोहन के पास पैसे थे, लेकिन उसका दिल ग़रीब था।
मोहन जेल से बाहर निकला। सूरज चमक रहा था। उसने आसमान की तरफ़ देखा और मुस्कुराया। उसे लगा कि उसने कुछ बड़ा सीखा है। उसने सीखा कि दोस्ती सबसे बड़ी दौलत है। और जो इस दौलत को समझ नहीं पाता, वो सच में ग़रीब होता है।
गाँव वापस आकर मोहन ने अपनी दुकान फिर से खोली। लोगों का प्यार बढ़ गया था। सब कहते, "मोहन भगवान का बन्दा है।"
मोहन मुस्कुराता और कहता, "नहीं काका, मैं तो बस एक साधारण आदमी हूँ जो सीख रहा हूँ कि दुनिया में सबसे कीमती चीज़ क्या है।"
और वो कीमती चीज़ थी ईमानदारी, दोस्ती, और एक साफ़ दिल। मोहन के पास ये सब था। और सोहन ने ये सब खो दिया था।
कुछ महीनों बाद सोहन जेल से बाहर आया। वो सीधा मोहन के घर गया। उसने मोहन के पैर छुए। मोहन ने उसे उठाया और गले लगा लिया। दोनों दोस्त रो रहे थे। लेकिन इस बार वो आँसू शर्मिंदगी और माफ़ी के नहीं थे, वो आँसू एक नई शुरुआत के थे।
सोहन ने मोहन की दुकान में फिर से काम शुरू किया। इस बार वो ईमानदारी से काम करता। रात को जब दुकान बंद होती, तो दोनों दोस्त पीपल की छाँव में बैठते। सोहन कहता, "मोहन, तूने मुझे जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया।"
मोहन मुस्कुराता और कहता, "नहीं सोहन, तूने ख़ुद को सिखाया। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि दोस्ती में धोखा नहीं, भरोसा होता है। और जो भरोसा तोड़ता है, वो ख़ुद को तोड़ता है।"
सोहन ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में अब वो चमक नहीं थी जो पहले थी। अब उसकी आँखों में शांति थी, सुकून था। उसने समझ लिया था कि असली ख़ुशी किसी और को दुखा कर नहीं मिलती, असली ख़ुशी किसी और को ख़ुश करने में मिलती है।
गाँव में अब दोनों दोस्तों की मिसाल दी जाती है। लोग कहते हैं, "देखो मोहन और सोहन को। एक ने धोखा दिया, दूसरे ने माफ़ किया। और आज दोनों साथ हैं। यही असली दोस्ती है।"
मोहन की दुकान अब पहले से भी बड़ी हो गई थी। सोहन उसका साझीदार बन गया था। लेकिन इस बार सब कुछ कागज़ों पर, ईमानदारी से, और भरोसे से।
एक शाम फिर से दोनों पीपल की छाँव में बैठे थे। सूरज फिर से पहाड़ों के पीछे छिप रहा था। आसमान में फिर से नारंगी और लाल रंग की लकीरें बन रही थीं।
सोहन ने मोहन से कहा, "मोहन, क्या तू मुझे अब भी अपना दोस्त मानता है?"
मोहन ने सोहन की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी। "सोहन, तू मेरा दोस्त था, है, और रहेगा। धोखे ने हमारी दोस्ती नहीं तोड़ी, बल्कि और मज़बूत कर दी।"
सोहन ने मोहन का हाथ पकड़ा। दोनों दोस्त बैठे रहे। पीपल के पत्ते हवा में झूम रहे थे। जैसे वो भी इस दोस्ती को देखकर ख़ुश हो रहे हों।
और तब सोहन ने कहा, "मोहन, एक बात और।"
"क्या?" मोहन ने पूछा।
"मैंने जो तुझे धोखा दिया, उसके लिए मैं ज़िंदगी भर तुझे धन्यवाद दूँगा। क्योंकि उस धोखे ने मुझे सिखाया कि असली दोस्त कौन होता है।"
मोहन हँसने लगा। उसकी हँसी पूरे गाँव में गूँजी। और सोहन भी हँसने लगा। दोनों दोस्त हँस रहे थे, जैसे बचपन में हँसते थे। जैसे कोई बात नहीं हुई हो। जैसे सब कुछ पहले जैसा हो।
लेकिन सब कुछ पहले जैसा नहीं था। सब कुछ बदल गया था। सोहन बदल गया था। उसने समझ लिया था कि धोखा देने वाला कभी ख़ुश नहीं रह सकता। और मोहन ने समझ लिया था कि माफ़ कर देने वाला हमेशा ख़ुश रहता है।
गाँव की गलियों में रात हो गई। तारे चमक रहे थे। मोहन और सोहन अपने अपने घर लौटे। लेकिन दोनों के दिलों में एक ही बात थी।
दोस्ती में धोखा नहीं, भरोसा होता है। और जो भरोसा तोड़ता है, वो ख़ुद को तोड़ता है। लेकिन जो माफ़ कर देता है, वो ख़ुद को बचा लेता है।
यही थी उन दोनों दोस्तों की कहानी। एक धोखेबाज़ दोस्त की कहानी जो सुधर गया। और एक सच्चे दोस्त की कहानी जो माफ़ करने में बड़ा बन गया।
समाप्त