Peepal leaves in Hindi Short Stories by Jeetendra books and stories PDF | पीपल के पत्ते

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पीपल के पत्ते

बारिश  की वह पहली बूँद जब पीपल के पत्ते पर गिरी तो वरुण मिश्रा ठीक उसी पल गाँव की सीमा पर खड़ा था। उसके कंधे पर एक भारी बैग था जिसमें तीन कैमरे पाँच लेंस और एक ज़िंदगी भर की थकान बंधी हुई थी। दिल्ली से निकलते समय उसने सोचा था कि यह सिर्फ़ एक और असाइनमेंट है। एक फोटो एसे जो किसी पत्रिका के लिए होगा और फिर अख़बारों में कहीं गुम हो जाएगा। लेकिन जब उसने वह हरा भरा गाँव देखा जहाँ पहाड़ी नदी की आवाज़ हवा में घुल रही थी तो उसे लगा जैसे वह किसी पुराने सपने में प्रवेश कर रहा है।

गाँव का नाम था तलाई। उत्तराखंड की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव जहाँ सड़कें संकरी थीं और दुकानें गिनी चुनी। वरुण ने एक छोटी सी कोठी किराए पर ली थी जो गाँव के बाहरी इलाके में एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बनी हुई थी। मकान का मालिक एक बूढ़ा था जिसकी आँखों में वह चमक थी जो सिर्फ़ पहाड़ों में रहने वालों की होती है। बूढ़े ने कहा कि साहब यह मकान सालों से खाली पड़ा है। पहले एक अंग्रेज़ रहता था फिर कोई नहीं आया। वरुण ने चाबी ली और जब दरवाज़ा खोला तो अंदर से लकड़ी की सोंधी गंध आई। वह गंध उसे कहीं दूर ले गई। शायद उसके बचपन के नाना के घर जहाँ वह गर्मियों की छुट्टियों में जाता था।

पहले दिन उसने कुछ नहीं किया। सिर्फ़ बरामदे में बैठकर पहाड़ों को देखा। शाम को धुंध छाने लगी और गाँव की मुर्गियाँ अपने अपने घरों की ओर लौट रही थीं। तभी उसने उसे देखा। वह एक लड़की थी लेकिन लड़की शब्द उसके लिए छोटा पड़ जाएगा। वह एक औरत थी लेकिन उसके चेहरे पर वह मासूमियत थी जो बच्चों और बूढ़ों में ही दिखती है। उसने सफ़ेद कुर्ता और नीली सलवार पहनी हुई थी और उसके बालों में एक साधारण सी चोटी थी। वह पीपल के पेड़ के नीचे रुकी। एक पत्ता उठाया और उसे अपनी हथेली में रखकर कुछ देर देखती रही। फिर उसने पत्ते को धीरे से एक पत्थर के नीचे दबा दिया। वरुण को यह दृश्य अजीब लगा। उसने सोचा शायद कोई स्थानीय रिवाज़ है।

अगले दिन सुबह जब वरुण गाँव की गली से गुज़र रहा था तो वही औरत उससे टकरा गई। उसके हाथ में कुछ किताबें थीं और एक कागज़ का गुच्छा गिर गया। वरुण झुका और कागज़ उठाने लगा। तभी उसने देखा कि वे सब पीपल के पत्ते थे जिन पर कुछ लिखा हुआ था। लेकिन वह लिखावट नहीं थी। वह तो कुछ और ही थी। जैसे किसी ने पत्ते पर सुई से खुदाई की हो।

माफ़ कीजिए। उस औरत ने कहा। उसकी आवाज़ में वह गंभीरता थी जो पहाड़ी औरतों में होती है। न तेज़ न धीमी बस स्पष्ट।

नहीं मेरी गलती है। मैं नया हूँ यहाँ। वरुण ने कहा।

मैं जानती हूँ। आप वही फोटो वाले हैं न। दिल्ली से आए हैं। उसने कागज़ और पत्ते अपनी झोली में इकट्ठे किए।

हाँ लेकिन आपको कैसे पता।

इस गाँव में हवा भी खबर लेकर आती है। वह मुस्कुराई और उसकी मुस्कुराहट में एक अजीब सी शर्म थी। मैं अनन्या हूँ। गाँव के स्कूल में पढ़ाती हूँ।

वरुण।

आप वहीं रह रहे हैं न। पुराने अंग्रेज़ की कोठी में।

हाँ।

अनन्या ने एक पल के लिए उस मकान की ओर देखा फिर कहा कि वहाँ एक पीपल का पेड़ है। रात को उसकी पत्तियों की सरसराहट सुनाई देती है।

हाँ सुनाई दी थी कल रात।

अच्छा है। वह कुछ और कहना चाहती थी लेकिन रुक गई। मुझे जाना होगा। बच्चे इंतज़ार कर रहे होंगे।

वरुण ने उसे जाते देखा। उसकी चाल में वह स्थिरता थी जो पहाड़ों की चट्टानों में होती है। न जल्दबाज़ी न ठहराव।

अगले कुछ हफ़्तों में वरुण ने गाँव को जानना शुरू किया। वह सुबह उठकर नदी के किनारे जाता। कैमरे में वह सब कैद करता जो शहरों में अब नहीं बचा। एक बूढ़ी औरत जो चूल्हे पर रोटी सेक रही थी। एक बच्चा जो अपने पिता के कंधे पर बैठकर हँस रहा था। एक बुज़ुर्ग जो अपनी भैंसों को नदी पार करा रहा था। उसकी तस्वीरें शांत थीं लेकिन उनमें एक गहराई थी जो उसे खुद हैरान कर रही थी।

अनन्या से उसकी मुलाकातें अब अक्सर होने लगी थीं। कभी स्कूल के रास्ते पर कभी नदी के घाट पर कभी उस पीपल के पेड़ के नीचे। एक दिन जब वरुण पेड़ के नीचे बैठकर अपनी तस्वीरें देख रहा था अनन्या वहाँ आई।

आप यहाँ बहुत समय बिताते हैं। उसने कहा।

यह पेड़ अच्छा है। छाया देता है और हवा भी आती है। वरुण ने कहा।

अनन्या ने पेड़ की ओर देखा। यह मेरे दादाजी ने लगाया था।

अच्छा।

हाँ। उन्होंने इस पूरे गाँव में पचास से ज़्यादा पीपल के पेड़ लगाए थे। कहते थे कि पीपल का पेड़ देवता है। यह हवा को साफ़ करता है और आत्मा को शांति।

वरुण ने उसे ध्यान से सुना। आपके दादाजी अब।

नहीं रहे। अनन्या की आवाज़ में एक हल्की सी झनक आई लेकिन वह तुरंत संभल गई। तीन साल हो गए। लेकिन ये पेड़ उनकी याद दिलाते हैं।

और ये पत्ते। वरुण ने पूछा। जिन पर आप कुछ लिखती हैं।

अनन्या ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा फिर अपनी झोली से एक पत्ता निकाला। वह एक सूखा लेकिन संभाला हुआ पीपल का पत्ता था। उस पर सुई से कुछ खुदा हुआ था। एक नाम एक तारीख़ और एक छोटी सी लाइन।

मेरे दादाजी यह करते थे। अनन्या ने समझाया। वे हर साल एक पत्ता चुनते और उस पर उस साल की सबसे ख़ूबसूरत याद खुदेते। फिर उसे एक लकड़ी के बक्से में रख देते। मैं बचपन से यह देखती आई हूँ। जब वे गए तो मैंने यह रिवाज़ जारी रखा।

वरुण ने वह पत्ता अपने हाथ में लिया। वह हल्का था लेकिन उसमें एक ज़िम्मेदारी का भार था। यह ख़ूबसूरत रिवाज़ है।

हाँ लेकिन अब पत्ते कम हो रहे हैं। अनन्या ने चिंता से कहा। कुछ लोग कह रहे हैं कि पीपल के पेड़ पुराने हो गए हैं। इनकी जगह चीड़ के पेड़ लगाए जाएँ। चीड़ तेज़ी से बढ़ते हैं। लकड़ी भी मिलती है।

और आप।

मैं। अनन्या ने पेड़ की ओर देखा। मैं जानती हूँ कि पीपल धीरे बढ़ता है लेकिन उसकी जड़ें गहरी होती हैं। चीड़ तेज़ी से ऊँचा होता है लेकिन एक तूफ़ान में गिर जाता है।

वरुण को अनन्या की बात में एक गहराई महसूस हुई। उसने सोचा यह औरत सिर्फ़ पेड़ों की नहीं ज़िंदगी की बात कर रही है।

धीरे धीरे दोनों के बीच एक दोस्ती बढ़ने लगी। वरुण अक्सर स्कूल में जाता। बच्चों को कैमरा दिखाता और अनन्या की क्लास के बाहर इंतज़ार करता। एक दिन अनन्या ने उसे अपने घर बुलाया। एक पुराना लकड़ी का घर जिसके सामने एक छोटा सा बगीचा था।

घर के अंदर वरुण ने देखा कि दीवारों पर पुराने फ्रेम लगे हुए थे। एक फ्रेम में एक बुज़ुर्ग आदमी था जिसकी मूँछें सफ़ेद थीं और हाथ में एक कुदाल थी। मेरे दादाजी। अनन्या ने कहा।

और फिर एक कोने में वरुण ने एक लकड़ी का बक्सा देखा। वह वही बक्सा था जिसके बारे में अनन्या ने बताया था। उसमें सैकड़ों पत्ते थे। हर एक पर कुछ न कुछ लिखा हुआ।

क्या मैं देख सकता हूँ। वरुण ने पूछा।

अनन्या ने हाँ में सिर हिलाया। वरुण ने एक पत्ता उठाया। उस पर लिखा था। उन्नीस सौ पैंसठ। आज पहला पीपल का पेड़ लगाया। मिट्टी गीली थी और मैंने अनन्या की दादी का हाथ पकड़ा था। उसके हाथ में वही मिट्टी लगी थी।

अगला पत्ता। उन्नीस सौ बयासी। अनन्या पैदा हुई। रात को पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर मैंने उसे देखा। वह सो रही थी और पत्ते सरसरा रहे थे। मुझे लगा यह पेड़ उसकी रक्षा करेगा।

वरुण ने और पत्ते देखे। हर एक में एक कहानी थी। एक ज़िंदगी का सारांश। उसे समझ आया कि यह बक्सा सिर्फ़ पत्तों का नहीं एक पूरे परिवार की यादों का संग्रह है।

आपके दादाजी बहुत ख़ास थे। वरुण ने कहा।

हाँ। अनन्या की आँखें नम हो गईं। और मैं नहीं चाहती कि यह परंपरा खत्म हो जाए। लेकिन। वह रुकी।

क्या।

कुछ नहीं। वह मुस्कुराने की कोशिश की।

लेकिन वरुण जान गया था। उसने अनन्या की आँखों में वह डर देखा था। वह डर जो उसे खुद अपनी आँखों में अक्सर दिखता था। डर इस बात का कि जो कुछ भी ख़ूबसूरत है वह एक दिन चला जाएगा।

उस रात वरुण अपनी कोठी में बैठा था। बारिश फिर से शुरू हो गई थी। उसने अपने कैमरे की फोटो देखीं। अनन्या की तस्वीरें। वह स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हुई। नदी के किनारे पानी भरती हुई। पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी हुई। हर तस्वीर में वह एक अलग रूप में थी। कभी गंभीर कभी हँसती हुई कभी सोच में डूबी हुई।

वरुण ने सोचा कब आखिरी बार किसी ने उसे इतना शांत महसूस कराया था। शायद कभी नहीं। उसकी ज़िंदगी तस्वीरों में बीत गई थी। युद्ध की तस्वीरें दंगों की तस्वीरें राजनीति की तस्वीरें। वह हमेशा दूसरों की कहानियाँ बताता रहा लेकिन खुद की कहानी में वह खो गया था।

उसकी शादी हुई थी दस साल पहले। रिया से। लेकिन रिया को वह समय नहीं दे पाया जो वह डिज़र्व करती थीं। हमेशा असाइनमेंट हमेशा यात्रा हमेशा एक और तस्वीर। फिर एक दिन रिया ने कहा कि तुम्हारे कैमरे में मेरी जगह नहीं है वरुण। और वह चली गई। तीन साल बाद उसने सुना कि रिया की शादी हो गई है और वह लंदन में है।

वरुण ने उस दर्द को दबा लिया था। लेकिन अब इस गाँव में इस पीपल के पेड़ के नीचे वह दर्द फिर से जाग रहा था। लेकिन इस बार दर्द के साथ एक आशा भी थी। आशा इसलिए कि शायद ज़िंदगी में कुछ ऐसा भी हो सकता है जो स्थायी हो।

एक महीने बाद गाँव में एक मेला लगा। स्थानीय त्योहार था हरेला। अनन्या ने वरुण को बुलाया। आओ तुम्हें गाँव की असली ज़िंदगी दिखाऊँ।

मेले में अनन्या ने वरुण को पारंपरिक नृत्य दिखाया। स्थानीय व्यंजन खिलाए और एक बूढ़ी दादी से मिलवाया जो अनन्या की दादी की सहेली थीं। वह बूढ़ी दादी ने वरुण को देखा फिर अनन्या को और मुस्कुराई। अच्छा लड़का है। आँखों में सच्चाई है।

अनन्या शरमा गई। दादी यह मेरा दोस्त है। दिल्ली से आया है।

दोस्त। दादी ने आँखें सिकोड़ीं। हम भी कभी दोस्त थे तुम्हारे दादाजी और मैं। फिर देखो क्या हुआ।

अनन्या ने वरुण की ओर देखा और दोनों की नज़रें मिलीं। उस पल वरुण ने महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। वह डर भी रहा था और उत्सुक भी।

मेले के बाद दोनों नदी के किनारे बैठे। चाँद निकल आया था और पानी में उसकी चाँदनी टिमटिमा रही थी।

वरुण। अनन्या ने धीरे से कहा। तुम कब तक रहोगे यहाँ।

वरुण ने एक पल के लिए सोचा। मुझे नहीं पता। मेरा असाइनमेंट अगले महीने खत्म हो जाएगा।

और फिर।

फिर शायद दिल्ली लौट जाऊँ। या शायद कहीं और।

अनन्या ने चुपचाप नदी की ओर देखा। मैंने सोचा था। नहीं कुछ नहीं।

क्या सोचा था।

कुछ नहीं। उसकी आवाज़ में वह खोखलापन था जो वरुण पहचान गया।

वरुण मैं ज़िंदगी भर भागता रहा हूँ। एक शहर से दूसरे एक देश से दूसरे। मैं कभी कहीं ठहरा नहीं। और अब जब मैं यहाँ हूँ तो मुझे लगता है कि शायद। वह रुका।

क्या।

शायद मैं ठहरना चाहता हूँ। लेकिन मुझे डर लगता है।

किस बात का डर।

इस बात का कि अगर मैं ठहर गया और फिर कुछ बदल गया तो।

अनन्या ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। उसका हाथ गर्म था और हल्का सा काँप रहा था। वरुण पीपल का पेड़ धीरे बढ़ता है लेकिन उसकी जड़ें गहरी होती हैं। अगर तुम एक बार जड़ें जमा लो तो कोई तूफ़ान नहीं गिरा सकता।

वरुण ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। उसे लगा जैसे वह किसी सुरक्षित बंदरगाह में पहुँच गया हो।

लेकिन ज़िंदगी कभी इतनी आसान नहीं होती। अगले ही हफ़्ते गाँव में एक बड़ी कंपनी के लोग आए। वे एक रिज़ॉर्ट बनाना चाहते थे इको टूरिज़्म के नाम पर। उनकी योजना थी कि नदी के किनारे और पीपल के पेड़ों वाले इलाके में एक बड़ा होटल बनाया जाए। उन्होंने गाँव वालों को पैसे का लालच दिया। नौकरी विकास तरक्की।

कुछ लोग मान गए। जवान लड़के जो शहरों में जाकर कमाना चाहते थे उन्होंने सोचा कि यह मौका है। लेकिन बुज़ुर्गों ने विरोध किया। ये पेड़ हमारे पूर्वज हैं। एक बूढ़े ने कहा। इन्हें कैसे काट सकते हो।

कंपनी के मैनेजर ने समझाया। बुज़ुर्ग जी विकास के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। हम नए पेड़ लगा देंगे और गाँव को सड़क बिजली पानी सब कुछ मिलेगा।

अनन्या ने यह सब सुना और उसका चेहरा पीला पड़ गया। वरुण के साथ वह पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी थी।

यह नहीं हो सकता। अनन्या ने कहा। अगर ये पेड़ गए तो गाँव की आत्मा चली जाएगी।

तो क्या करें। वरुण ने पूछा।

लड़ना होगा। अनन्या की आँखों में एक चमक थी जो वरुण ने पहले कभी नहीं देखी थी। मैं अपने दादाजी के पेड़ों को नहीं जाने दूँगी।

उस रात अनन्या और वरुण ने गाँव के बुज़ुर्गों से बात की। वरुण ने अपने कैमरे से उन पेड़ों की तस्वीरें खींचीं। हर पेड़ की एक कहानी। एक पेड़ के नीचे किसी की शादी हुई थी। दूसरे के नीचे किसी का अंतिम संस्कार। तीसरे के नीचे एक मंदिर बना हुआ था। वरुण ने ये तस्वीरें और कहानियाँ एक प्रस्तुति में जोड़ीं।

अगले दिन गाँव की पंचायत बुलाई गई। कंपनी के मैनेजर ने अपनी योजना समझाई। लोग उलझन में थे। पैसा चाहिए था लेकिन पेड़ भी नहीं जाने चाहिए थे।

तब अनन्या खड़ी हुई। उसने अपने दादाजी का बक्सा सामने रखा और एक एक करके पत्ते दिखाए। यह उन्नीस सौ पैंसठ का पत्ता है जब मेरे दादाजी ने पहला पेड़ लगाया था। यह उन्नीस सौ इकत्तर का पत्ता है जब बाढ़ आई थी और यह पेड़ हमें बचाने के लिए मिट्टी को पकड़े रहा। यह उन्नीस सौ निन्यानवे का पत्ता है जब मेरी दादी का अंतिम संस्कार इसी पेड़ के नीचे हुआ था।

गाँव वाले चुपचाप सुन रहे थे।

अनन्या ने कहा कि ये पेड़ सिर्फ़ लकड़ी नहीं हैं। ये हमारी यादें हैं हमारी पहचान। अगर ये गए तो हम अपनी जड़ों से कट जाएँगे। हम शहरों में रहने वालों की तरह हो जाएँगे। ऊँची इमारतों में लेकिन खोखले अंदर से।

एक बूढ़ी औरत रोने लगी। मेरे पति का अंतिम संस्कार भी उसी पेड़ के नीचे हुआ था।

एक और आदमी खड़ा हुआ। मेरी बेटी की शादी उसी छाँव में हुई थी।

धीरे धीरे गाँव वालों में एक जागरूकता आई। वरुण ने अपनी तस्वीरें दिखाईं। पेड़ों की वह सुंदरता जो किसी रिज़ॉर्ट से कहीं ज़्यादा कीमती थी।

अंत में गाँव के मुखिया ने फैसला सुनाया कि हम पेड़ नहीं काटने देंगे। कंपनी वाले जाएँ। हमें उनकी नौकरी नहीं चाहिए।

कंपनी के मैनेजर ने गुस्से में कहा कि तुम लोग पछताओगे। यह विकास का मौका था।

लेकिन गाँव वाले अड़े रहे। और अनन्या वरुण के साथ उन सबकी अगुआई कर रही थी।

उस रात गाँव में एक छोटी सी जश्न की रस्म हुई। लोगों ने पीपल के पेड़ों के नीचे दीए जलाए और प्रसाद बाँटा। वरुण और अनन्या एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

तुमने आज कमाल कर दिखाया। वरुण ने कहा।

नहीं। अनन्या ने कहा। यह मेरे दादाजी की जीत थी। मैं तो बस उनकी आवाज़ बनी।

वरुण ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। अनन्या मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा है। युद्ध दंगे राजनीति। लेकिन आज पहली बार मैंने कुछ असली देखा। कुछ ऐसा जो कैमरे में कैद नहीं हो सकता लेकिन दिल में उतर जाता है।

क्या।

तुम्हारी आँखों में वह चमक। जब तुम उन पत्तों को दिखा रही थीं तो मुझे लगा कि मैं किसी अनोखी चीज़ को देख रहा हूँ।

अनन्या ने उसकी आँखों में देखा। वरुण मैंने भी कभी सोचा नहीं था कि कोई शहर से आया इंसान हमारी इस ज़िंदगी को समझ सकेगा।

मैं अब वही शहरी नहीं रहा। वरुण ने कहा। यह गाँव ये पेड़ ये लोग और तुम। तुम सबने मुझे बदल दिया है।

अनन्या ने उसका हाथ पकड़ा। तो अब क्या।

वरुण ने गहरी साँस ली। मैंने अपने एडिटर को ईमेल किया है। मैंने कहा है कि मैं वह असाइनमेंट पूरा नहीं कर सकता जो उन्होंने सोचा था। मैं एक अलग कहानी लिखना चाहता हूँ। इस गाँव की इन पेड़ों की और तुम्हारी।

और फिर।

और फिर मैं यहीं रहना चाहता हूँ। अगर तुम मुझे अपनाओ तो।

अनन्या की आँखों में आँसू आ गए। लेकिन यह ख़ुशी के आँसू थे। मुझे किसी के अपनाने की ज़रूरत नहीं वरुण। तुम पहले से ही इस गाँव के हो। बस तुम्हें यह एहसास करना था।

वरुण ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे और बारिश की हल्की बूँदें गिरने लगी थीं। लेकिन इस बार वह बारिश शुद्ध थी। बिना किसी डर के बिना किसी अलविदा के।

छह महीने बाद वरुण ने गाँव में एक छोटा सा फोटोग्राफी स्टूडियो खोला। लेकिन यह कोई साधारण स्टूडियो नहीं था। यहाँ वह गाँव वालों की मुफ़्त तस्वीरें खींचता था। बच्चों की बूढ़ों की औरतों की पेड़ों की। हर तस्वीर में एक कहानी होती थी।

अनन्या उसके साथ स्कूल के बाद स्टूडियो में आती। वे मिलकर नए पीपल के पेड़ लगाते। गाँव के बच्चे भी उनके साथ होते। वरुण ने बच्चों को फोटोग्राफी सिखानी शुरू की और अनन्या ने उन्हें पत्तों पर खुदाई करना सिखाया। अपनी यादें संजोना।

एक दिन अनन्या ने वरुण को एक पत्ता दिखाया। वह एक ताज़ा पीपल का पत्ता था जिस पर खुदा हुआ था। दो हज़ार छब्बीस। आज मैंने वरुण से कहा कि मैं उससे प्यार करती हूँ। और उसने कहा कि वह यह जानता था क्योंकि पीपल के पत्ते सब कुछ जानते हैं।

वरुण ने मुस्कुराते हुए अपनी झेब से एक पत्ता निकाला। उस पर लिखा था। दो हज़ार छब्बीस। आज मैंने अनन्या से कहा कि मैं उससे शादी करना चाहता हूँ। और उसने हाँ कह दी क्योंकि पीपल के पेड़ ने हमारी जड़ें एक साथ बाँध दी हैं।

दोनों ने हँसते हुए पत्ते एक दूसरे को दिए और फिर उन्हें दादाजी के बक्से में रख दिया। वह बक्सा अब और भी भारी हो गया था। एक नई पीढ़ी की यादों के साथ।

शादी हुई पीपल के सबसे पुराने पेड़ के नीचे। गाँव वालों ने खुद तैयारियाँ कीं। कोई बाहर का कैटरर नहीं कोई डीजे नहीं कोई शोर नहीं। सिर्फ़ पारंपरिक गीत स्थानीय व्यंजन और पेड़ों की सरसराहट।

वरुण ने अनन्या को देखा। लाल साड़ी में माथे पर एक छोटी सी बिंदी और हाथों में मेहंदी। वह इतनी सुंदर लग रही थी कि वरुण ने सोचा काश मेरे पास कैमरा न होता क्योंकि यह दृश्य सिर्फ़ मेरे दिल के लिए है।

शादी के बाद दोनों दादाजी के पुराने घर में रहने लगे। वरुण ने उस घर को एक स्टडी में बदल दिया जहाँ वह अपनी किताब लिखता। पीपल के पत्ते एक गाँव की आवाज़। यह किताब न सिर्फ़ तस्वीरों की थी बल्कि हर उस इंसान की कहानी थी जिसने इस गाँव को अपना घर बनाया।

अनन्या ने स्कूल में एक नया विषय शुरू किया। पर्यावरण और परंपरा। वह बच्चों को सिखाती कि विकास का मतलब पेड़ों को काटना नहीं बल्कि उनके साथ आगे बढ़ना है।

साल बीतते गए। उनके दो बच्चे हुए। एक लड़का और एक लड़की। वरुण ने उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे खेलते देखा जैसे अनन्या के दादाजी ने उसे देखा होगा। और अनन्या हर साल एक नया पत्ता चुनती और उस पर उस साल की सबसे ख़ूबसूरत याद खुदेती।

एक दिन जब बच्चे बड़े हो गए और वरुण के बाल सफ़ेद होने लगे उसने अनन्या से पूछा कि क्या तुम्हें कभी पछतावा नहीं हुआ। मैं एक फोटोग्राफर था दुनिया घूमता था। और अब मैं यहीं हूँ इस एक गाँव में।

अनन्या ने उसका हाथ पकड़ा। उसके हाथ में भी अब उम्र की झुर्रियाँ थीं लेकिन वही गर्माहट थी। वरुण तुमने दुनिया घूमकर जो तस्वीरें खींचीं वे लोगों की आँखों में कुछ देर रहती थीं। लेकिन यहाँ तुमने जो ज़िंदगी बिताई है वह लोगों के दिलों में हमेशा रहेगी। और मेरे लिए तुम मेरी दुनिया हो।

वरुण ने मुस्कुराते हुए कहा कि और तुम मेरा पीपल का पेड़ हो। जिसकी जड़ें मुझे पकड़े हुए हैं।

उस शाम जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिप रहा था वरुण और अनन्या उसी पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठे थे। हवा में पत्ते सरसरा रहे थे और कहीं दूर नदी की आवाज़ आ रही थी।

वरुण ने सोचा यही तो है वह शांति जो उसने हमेशा ढूँढी थी। यह शहरों में नहीं थी न ही किसी विदेश में। यह यहीं थी। इस गाँव में इस पेड़ के नीचे इस औरत के साथ।

अनन्या ने एक नया पत्ता उठाया और उस पर खुदना शुरू किया। वरुण ने पूछा कि इस बार क्या लिख रही हो।

अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह लिख रही हूँ कि दो हज़ार छब्बीस से अब तक हर साल एक ही याद सबसे ख़ूबसूरत रही कि तुम मेरे साथ हो।

वरुण ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और दोनों ने उस सूरज को डूबते देखा जो अगले दिन फिर से उगना था। उनकी जड़ों के साथ उनके पेड़ के साथ और उनके प्यार के साथ।

पीपल के पत्ते सरसराते रहे जैसे कह रहे हों कि यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह तो बस शुरुआत थी। एक लंबी गहरी और हरी भरी ज़िंदगी की जो पीपल के पेड़ की तरह धीरे धीरे लेकिन मज़बूती से आसमान की ओर बढ़ रही थी। उनकी संतानें बड़ी होकर अपने बच्चों को यही कहानी सुनातीं। कि एक समय था जब एक शहरी फोटोग्राफर आया था जो खोया हुआ था। और एक गाँव की औरत ने उसे पीपल के पत्तों की भाषा सिखाई। वह भाषा जो शब्दों में नहीं दिल की धड़कन में लिखी होती है।

वरुण की किताब प्रकाशित हुई और पूरे देश में मशहूर हुई। लेकिन वह कभी शहर नहीं लौटा। कभी नहीं। उसने एक बार एक पत्रकार से कहा कि मैंने पूरी दुनिया में तस्वीरें खींचीं लेकिन सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर वही है जो मैंने अपनी आँखों से देखी है। अनन्या की मुस्कुराहट। पीपल की छाया। और उस बच्चे की आँखें जो पहली बार अपने पत्ते पर खुदाई करता है।

अनन्या बूढ़ी हो गई लेकिन उसकी चोटी अब भी वैसी ही थी। हर सुबह वह पीपल के पेड़ के नीचे जाती। एक पत्ता चुनती। उसे अपनी हथेली में रखती। और फिर खुदेती। उसकी आँखें अब कमज़ोर हो गई थीं लेकिन हाथ अब भी स्थिर थे। वरुण उसके बगल में बैठता। कभी कैमरा उठाता नहीं। बस देखता। क्योंकि अब वह जान गया था कि कुछ पल सिर्फ़ दिल में संजोए जाते हैं। कैमरे में नहीं।

उनकी पोती एक दिन पूछती है। दादी आप हर रोज़ एक पत्ते पर क्यों लिखती हो।

अनन्या मुस्कुराती है और कहती है कि बेटा जब हम अपनी यादों को पत्तों में बंद कर देते हैं तो वे हमारे पेड़ का हिस्सा बन जाती हैं। और जब हम चले जाते हैं तो भी ये पत्ते हमारी कहानी कहते रहते हैं। हवा में सरसराते रहते हैं। बारिश में नहाते रहते हैं। और हर उस शख़्स को छूते रहते हैं जो इस पेड़ के नीचे बैठता है।

पोती समझती नहीं लेकिन महसूस करती है। वह भी एक दिन पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर अपनी यादें खुदेगी। यह परंपरा चलती रहेगी। जड़ें गहरी होती चली जाएँगी। और प्यार। प्यार तो वहीं रहेगा जहाँ हमेशा रहा है। पीपल के पत्तों में। नदी की आवाज़ में। और उस छाँव में जो कभी खत्म नहीं होती।

वरुण और अनन्या ने एक लंबी उम्र साथ बिताई। जब वरुण की साँसें धीमी पड़ने लगीं तो उसने अनन्या से कहा कि मुझे उस पीपल के पेड़ के नीचे ले चलो। जहाँ हम पहली बार मिले थे।

अनन्या ने उसे वहाँ लिटाया। पत्ते सरसरा रहे थे। वरुण ने कहा कि मुझे लग रहा है जैसे मैं उसी पहली बारिश में खड़ा हूँ। और तुम मुझसे टकराई हो।

अनन्या ने उसका हाथ पकड़ा। आँसू बह रहे थे लेकिन मुस्कुराहट भी थी। तुम खो गए थे वरुण। और मैंने तुम्हें पीपल के पत्ते से ढूँढ निकाला।

वरुण ने आँखें बंद कीं। उसकी साँसें थम गईं लेकिन उसके चेहरे पर वही शांति थी जो पहली बार इस गाँव में आने पर थी। अनन्या ने एक नया पत्ता उठाया। उस पर खुदा। आज वरुण चला गया। लेकिन वह यहीं है। इस पीपल के पेड़ में। इस हवा में। और मेरी हर साँस में।

उसने पत्ते को बक्से में रखा। बक्सा अब हज़ारों पत्तों से भरा था। हर एक में एक ज़िंदगी। हर एक में एक प्यार। और जब हवा चलती थी तो सैकड़ों पत्ते सरसराते थे। जैसे एक साथ गा रहे हों। एक गाना जो कोई शब्द नहीं जानता। सिर्फ़ दिल जानते हैं।

अनन्या अब भी हर सुबह उस पेड़ के नीचे बैठती है। बच्चे उसके चारों ओर खेलते हैं। कभी कोई पूछता है कि दादी आप किसका इंतज़ार कर रही हो। वह मुस्कुराती है और कहती है कि किसी का नहीं। मैं तो बस पत्तों की सरसराहट सुन रही हूँ। वे कहानी सुना रहे हैं। एक फोटोग्राफर की और एक स्कूल टीचर की। जो मिले एक पीपल के पेड़ के नीचे और फिर कभी अलग नहीं हुए।

और वाकई। अगर तुम कभी उत्तराखंड के उस छोटे से गाँव तलाई में जाओगे और पीपल के पुराने पेड़ के नीचे खड़े होकर कान लगाओगे तो तुम्हें सुनाई देगी। एक आवाज़। धीमी लेकिन स्पष्ट। जो कहती है कि प्यार वहीं मिलता है जहाँ तुम ठहरने का साहस रखते हो। जड़ें वहीं जमती हैं जहाँ तुम गिरने से नहीं डरते। और यादें वहीं जीवित रहती हैं जहाँ दिल की धड़कन शामिल हो।

पीपल के पत्ते गिरते हैं। नए आते हैं। साल बीतते हैं। लेकिन कुछ बातें नहीं बदलतीं। एक पेड़ की छाया। एक नदी की आवाज़। और एक प्यार जो पत्तों में लिखा हो। हवा में बंधा हो। और समय से परे हो।

अनन्या की आँखें अब बंद हो चुकी हैं। लेकिन उसकी कहानी नहीं। वरुण की तस्वीरें अब पुरानी हो चुकी हैं। लेकिन उनकी यादें नहीं। वे इस गाँव की मिट्टी में मिल चुके हैं। इस पीपल के पेड़ की जड़ों में बह रहे हैं। और जब भी कोई नया पत्ता उगता है तो उसमें एक नई कहानी होती है। एक नया प्यार। एक नई शुरुआत।

क्योंकि पीपल का पेड़ कभी मरता नहीं। वह सिर्फ़ नए रूप में जी उठता है। जैसे प्यार। जैसे यादें। जैसे वह अनोखा एहसास जो दो दिलों को एक साथ बाँध देता है। और फिर कभी अलग नहीं होने देता।

तलाई गाँव अब भी वैसा ही है। संकरी सड़कें गिनी चुनी दुकानें और वह पुराना पीपल का पेड़। जिसके नीचे एक कोठी है जहाँ एक अंग्रेज़ रहता था। फिर एक फोटोग्राफर आया। फिर एक औरत। फिर एक परिवार। और अब। अब वहाँ बच्चे खेलते हैं। पत्ते उठाते हैं। और कहानियाँ सुनाते हैं।

कहानी उन दादा दादी की जिन्होंने सिखाया कि ज़िंदगी भागने की नहीं ठहरने की है। जड़ें जमाने की है। और प्यार। प्यार तो पत्तों की तरह है। हल्का लेकिन गहरा। नाज़ुक लेकिन अमर।

और इसीलिए जब तुम उस गाँव में जाओगे तो तुम्हें एक बूढ़ी औरत नहीं मिलेगी। लेकिन तुम्हें एक पेड़ मिलेगा। जिसकी छाया में दो लोग बैठे हैं। एक कैमरा पकड़े हुए। दूसरा एक पत्ता। और दोनों मुस्कुरा रहे हैं। जैसे समय थमा हो। जैसे दुनिया बदल गई हो। लेकिन प्यार वहीं हो। जहाँ हमेशा था। पीपल के पत्तों के बीच। नदी की आवाज़ में। और एक गाँव की धड़कन में जो कभी रुकती नहीं।

यह कहानी खत्म नहीं होती। यह तो बस एक पत्ता है। एक बड़े पेड़ का। जिसकी जड़ें गहरी हैं। छाया विशाल है। और कहानियाँ। कहानियाँ तो अनगिनत हैं। हर पत्ते में एक। हर साँस में एक। और हर प्यार में एक। जो कभी खत्म नहीं होता। बस पत्तों की तरह बदलता रहता है। हरा रहता है। जीवित रहता है। और हमेशा रहता है।

समाप्त