एपिसोड – पहली बार स्कूटी
सुबह का समय था।
दिव्यम ने बाहर से आवाज़ लगाई,
"चित्रा... जल्दी तैयार हो जाओ।"
चित्रा बाहर आई तो देखा, दिव्यम स्कूटी के पास खड़ा मुस्कुरा रहा था।
"कहाँ जाना है?"
"चलो... रास्ते में बता दूँगा।"
चित्रा कुछ पल झिझकी, फिर चुपचाप पीछे बैठ गई
लेकिन बरामदे में खड़ी नीतू का चेहरा उतर गया।
वह मन ही मन बड़बड़ाई,
"अभी शादी को कितने दिन हुए हैं... और देखो कैसे दोनों साथ घूम रहे हैं। आज तो पूरे मोहल्ले में बात फैलाऊँगी।."
लेकिन उसके मन में जलन साफ दिखाई दे रही थी।
रास्ते भर चित्रा पूछती रही,
"आख़िर कहाँ ले जा रहे हैं?"
दिव्यम बस मुस्कुराता रहा।
"दो मिनट और... फिर खुद समझ जाओगी।"
कुछ देर बाद स्कूटी एक बड़े खाली मैदान में जाकर रुकी।
चित्रा हैरानी से बोली,
"यहाँ...? यहाँ तो कोई भी नहीं है।"
दिव्यम ने स्कूटी की चाबी उसकी ओर बढ़ा दी।
"आज तुम्हें स्कूटी चलानी सिखाऊँगा।"
चित्रा एकदम पीछे हट गई।
"नहीं... मुझसे नहीं होगा।"
"क्यों?"
"मैं कभी साइकिल तक नहीं चला पाई... स्कूटी कैसे चलाऊँगी?"
दिव्यम ने शांत स्वर में कहा,
"जब तक कोशिश नहीं करोगी, तब तक सीखोगी कैसे?"
चित्रा घबराते हुए स्कूटी पर बैठ गई।
उसके हाथ काँप रहे थे।
दिव्यम ने दूर खड़े होकर समझाया,
"डरना मत। धीरे से एक्सीलेटर घुमाना... और डर लगे तो ब्रेक दबा देना।"
चित्रा ने जैसे ही हल्का-सा एक्सीलेटर घुमाया...
स्कूटी अचानक आगे बढ़ गई।
"अरे... अरे... दिव्यम जी...!"
वह घबराकर चीखने लगी।
दिव्यम उसके पीछे दौड़ पड़ा।
"ब्रेक... चित्रा... ब्रेक!"
घबराहट में चित्रा को ब्रेक की जगह फिर एक्सीलेटर ही याद आया।
स्कूटी थोड़ा और आगे निकल गई।
"मुझे नहीं सीखनी... बचाइए...!"
आख़िरकार दिव्यम ने दौड़कर हैंडल पकड़ लिया और स्कूटी रोक दी।
चित्रा ने गहरी साँस ली।
उसका चेहरा डर से लाल हो चुका था।
दिव्यम हँसी रोकते हुए बोला,
"इतना डरोगी तो स्कूटी भी तुमसे डर जाएगी।"
चित्रा पहली बार मुस्कुरा दी।ओ
"आपको तो मज़ाक सूझ रहा है... मेरी तो जान निकल गई थी।"
दिव्यम ने गंभीर होकर कहा,
"ठीक है... आज नहीं तो कल सीख जाओगी। लेकिन एक बात याद रखना—जो लड़की इतना बड़ा दुख सह सकती है, उसके लिए स्कूटी चलाना कोई बड़ी बात नहीं है।"
दिव्यम की बात सुनकर चित्रा के चेहरे पर फिर से आत्मविश्वास लौट आया।
उसने दोबारा स्कूटी स्टार्ट की...
और इस बार स्कूटी बिना झटके के धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
दिव्यम दूर खड़ा ताली बजाकर बोला,
"शाबाश... यही है मेरी बहादुर चित्रा।"
चित्रा के चेहरे पर कई महीनों बाद जीत की मुस्कान थी...
लेकिन उसे नहीं पता था कि घर पर नीतू उनके लौटने का इंतज़ार कर रही थी, ताकि दोनों के खिलाफ एक नई कहानी गढ़ सके
चित्रा और दिव्यम के घर से निकलते ही नीतू के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई। वह धीरे-धीरे दादी माँ के पास जाकर बैठ गई।
दादी माँ ने आँगन की ओर देखते हुए कहा, "देखा न, नीतू... बच्चे को छोड़कर घूमने निकल गई। ज़रा भी शर्म नहीं है। अभी शादी को कितने दिन हुए हैं और रोज़ कहीं न कहीं निकल जाती है।"
नीतू ने तुरंत आग में घी डालते हुए कहा, "सही कह रही हैं दादी माँ। हमने तो अपनी शादी के बाद महीनों तक घर की चौखट भी नहीं लांघी थी। और एक ये हैं... मौका मिलते ही दिव्यम के साथ घूमने निकल जाती हैं।"
दादी माँ ने गहरी साँस ली।
"बहू को सबसे पहले घर और परिवार की ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए।"
नीतू ने बनावटी मासूमियत से कहा, "ऊपर से... दूसरी पत्नी भी हैं। थोड़ा तो सोच-समझकर रहना चाहिए। लोग क्या कहेंगे? मोहल्ले में बातें बनने में देर नहीं लगती।"
दादी माँ भी उसकी बातों में आ गईं।