Holy Multi - 10 in Hindi Moral Stories by archana books and stories PDF | पवित्र बहु - 10

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पवित्र बहु - 10

उस दिन जब चित्र ने सबके सामने पहली बार आवाज़ उठाई थी…
घर कुछ पल के लिए शांत जरूर हुआ था…
लेकिन वो शांति…
तूफान से पहले की खामोशी थी।

🐍 नीतू की अगली चाल
रात का समय था।
सब अपने-अपने कमरों में थे।
नीतू धीरे से दादी माँ के कमरे में गई।
हाथ में गरम दूध और हल्दी वाला गिलास।
“दादी माँ… ये लीजिए, आपके लिए बनाया है।”
दादी का दिल तो वैसे ही उसके मीठेपन में फँसा हुआ था।
“अरे बहू, तू ही तो है जो मेरा ख्याल रखती है…”
नीतू ने मौका देखा…
और ज़हर घोलना शुरू किया।
धीरे से बोली—
“दादी माँ… आज जो चित्र ने बोला…
आपको सच में लगा वो सच था?”
दादी थोड़ी सोच में पड़ गईं—
“पता नहीं… लेकिन बात तो उसने बड़ी ठोक कर कही…”
नीतू हल्का सा हँसी—
“दादी माँ…
आजकल की लड़कियाँ बहुत चालाक होती हैं…”
⚡ दादी के मन में शक

“वो जानती है ना…
अगर घर में इज्जत बनानी है तो पहले
रोना, फिर सच का नाटक करना पड़ता है…”
दादी चुप हो गईं।
नीतू ने एक और वार किया—
“और आपने देखा नहीं?
कैसे सबके सामने मुझे ही गलत साबित कर दिया…”
“ऐसी औरतें पहले पति को भी ऐसे ही फँसाती हैं…
फिर छोड़ देती हैं…”
दादी के चेहरे पर फिर वही सख्ती लौट आई।
“हम्म… बात तो तेरी सही लग रही है…”
🔥 ज़हर गहराता है
नीतू अब पूरी तरह खेल में उतर चुकी थी।
“दादी माँ, मैं तो बस इतना चाहती हूँ…
घर सुरक्षित रहे…”
“कल को अगर ये प्रॉपर्टी पर हक जमाने लगी तो?”
बस… यही शब्द सुनना था दादी को।
उनका चेहरा बदल गया—
“नहीं!
ऐसा नहीं होने दूँगी मैं!”
नीतू ने सिर झुका लिया…
लेकिन अंदर से मुस्कुरा रही थी।
“फिर से जीत गई…”
💔 चित्र की चुप पीड़ा
उधर चित्र कमरे में बैठी थी।
दिव्यांश उसके सीने से लगा सो रहा था।
आज उसने पहली बार अपने लिए बोला था…
लेकिन दिल में अजीब सा डर था।
“क्या सच बोलना ही काफी होता है…?”
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह समझ चुकी थी—
यह लड़ाई आसान नहीं है।
⚖️ अगली सुबह का तूफान
सुबह होते ही दादी माँ का रवैया बदल चुका था।
“चित्र!”
उन्होंने जोर से आवाज़ लगाई।
चित्र दौड़ी आई—
“जी दादी माँ?”
“बहुत बोलने लगी है तू आजकल!”
चित्र चौंक गई।
“कल जो ड्रामा किया ना तूने…
मुझे सब समझ आ गया!”
चित्र की आँखें भर आईं—
“दादी माँ, मैंने सिर्फ सच—”
“चुप!”
दादी गरजीं—
“मेरी बड़ी बहू पर इल्जाम लगाती है?
शर्म नहीं आती?”
नीतू पीछे खड़ी थी…
चेहरे पर मासूमियत…
और आँखों में जीत।
😔 फिर वही हार… या शुरुआत?
चित्र ने सिर झुका लिया।
“सच भी हार सकता है…
अगर सामने वाला झूठ को हथियार बना ले…”
लेकिन इस बार…
कुछ अलग था।
चित्र टूटी जरूर थी…
पर अंदर कहीं
एक आग जल चुकी थी।


नीतू ने जाते-जाते धीमे से कहा—
“अभी तो शुरुआत है चित्र…
तुझे इस घर से निकालकर ही दम लूँगी।”
चित्र ने पहली बार
उसकी आँखों में आँख डालकर देखा…
और मन ही मन बोली—
“अब मैं चुप नहीं रहूँगी…
लेकिन सही वक्त का इंतज़ार करूँगी…”

रात गहरी थी…
लेकिन चित्र की आँखों में नींद नहीं थी।
दिव्यांश उसके सीने से लगा सो रहा था…
और चित्र छत को देख रही थी।
“सच बोलने से कुछ नहीं हुआ…
अब मुझे सच दिखाना होगा…”
उसकी आँखों में पहली बार आँसू नहीं…
इरादा था।
🧠 चित्र का पहला फैसला
अगली सुबह…
चित्र पहले जैसी चुप नहीं थी।
वह हर चीज़ को ध्यान से देखने लगी—
किचन, बोतल, दादी का कमरा,
और सबसे ज़्यादा… नीतू।
नीतू को लगा सब पहले जैसा है।
लेकिन उसे नहीं पता था—
अब चित्र देख भी रही है, समझ भी रही है।
🐍 नीतू की नई चाल
नीतू ने फिर मौका देखा।
किचन में आटा गूँथते हुए
उसने जानबूझकर नमक ज़्यादा डाल दिया।
और फिर चिल्लाई—
“अरे दादी माँ!
देखिए ज़रा आपकी लाडली बहू का काम!”
दादी आईं…
रोटी चखी…
और तुरंत गुस्सा—
“चित्र!
ये क्या बना दिया तूने?!”
चित्र चुप रही…
बस एक बार नीतू की तरफ देखा।
नीतू मुस्कुरा रही थी।