इधर जैसे ही चित्र अपने ससुराल लौट गई,
उधर उसकी भाभी रुचि के चेहरे पर अजीब-सी राहत उतर आई।
वह मन ही मन खुश थी।
“चलो अच्छा हुआ…
छुटकारा मिला।
रोज़-रोज़ इसके लिए खाना बनाना,
बच्चे को संभालना,
सेवा करना — अब नहीं करना पड़ेगा।”
उस रात रुचि ने सुकून की साँस ली।
मोबाइल उठाया और अपनी सहेली को फोन मिला दिया।
“अरे सुन… मेरी ननंद गई अपने ससुराल।
सच बताऊँ, एक नंबर की कैरक्टरलेस लगती है मुझे।”
उधर से सहेली चौंकी —
“अरे! ऐसा क्यों?”
रुचि ने ज़हर घोलते हुए कहा —
“जब देखो कभी मंदिर, कभी कहीं।
असल में मंदिर के बहाने अपने प्रेमी से मिलने जाती है।
उसके पहले पति ने ऐसे ही थोड़ी छोड़ा होगा।
कुछ तो गड़बड़ रही होगी ना!”
रुचि की बातें झूठ थीं,
लेकिन झूठ को फैलने में देर नहीं लगती।
धीरे-धीरे ये अफवाहें
पड़ोसियों तक पहुँचीं,
रिश्तेदारों तक पहुँचीं,
और हर कान में बैठती चली गईं।
और उधर…
चित्र।
जब-जब उसे ऐसी बातें सुनने को मिलतीं,
उसका दिल अंदर से टूट जाता।
“मैंने क्या किया है भगवान…
सिर्फ शांति से जीना ही तो चाहा है।”
वह चुप रहती,
क्योंकि जानती थी —
सच बोलने वाली औरत से ज्यादा
समाज को चुप रहने वाली औरत पसंद आती है।
इधर दिव्यम बिल्कुल अलग इंसान था।
सीधा, समझदार, और दिल से साफ।
वह चित्र के लिए एक सुंदर साड़ी लाया,
दादी के लिए भी,
और दिव्यांश के लिए छोटे-छोटे कपड़े।
जैसे ही सामान रखा,
भाभी नीतू की आँखों में जलन चमक उठी।
वह ताना मारते हुए बोली —
“वाह देवर जी…
लगता है चित्रा पर कुछ ज़्यादा ही प्यार लुटा रहे हो।
हमारे लिए भी कभी इतना सोच लिया करो।”
दिव्यम ने शांति से कहा —
“भाभी, सबके लिए ही लाया हूँ।
आप चाहें तो ये साड़ी आप ले लीजिए।”
वह जानता था कि नीतू की नीयत ठीक नहीं,
फिर भी बराबरी रखना चाहता था।
दादी साड़ी देखकर खुश हो गईं।
“बहुत सुंदर साड़ी है,”
उन्होंने कहा।
फिर उनकी नज़र चित्र पर गई।
और वही ज़हर फिर बाहर आया।
धीरे से, पर चुभता हुआ —
“लेकिन इस चित्र के लिए इतनी जरूरत क्या थी?”
चित्र का सिर झुक गया।
दादी बोलीं —
“इतना मत सर पर चढ़ा।
आजकल की लड़कियों का कोई भरोसा नहीं।
पहले पति को छोड़ दिया…
अब तुझे भी छोड़ देगी।”
चित्र का दिल काँप उठा।
दिव्यम पहली बार थोड़ा सख्त हुआ —
“दादी, वो ऐसी नहीं है।
वो बहुत अच्छी लड़की है।”
दादी ने ठंडे स्वर में कहा —
“अच्छी?
सर पर चढ़ाओगे तो आँख दिखाएगी।
आजकल की लड़कियाँ सब जानती हैं —
प्रॉपर्टी पर कैसे हक जमाया जाता है।”
चित्र चुपचाप अंदर चली गई।
दिव्यांश को सीने से लगा लिया।
आँसू गिरे,
लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
“मैं बोलूँ तो बदतमीज़,
चुप रहूँ तो चरित्रहीन।”
दिव्यम बाहर खड़ा था।
उसे पहली बार महसूस हुआ —
यह घर सिर्फ रिश्तों का नहीं,
सोचों की जेल है।
इधर चित्र की जेठानी नीतू हर दिन नई-नई चालें रच रही थी।
उसका मन अब सिर्फ एक ही बात पर टिक गया था —
किस तरह चित्रा को इस घर से निकाल दिया जाए।
उस दिन दिव्यांश पालने में झूला झूलते-झूलते सो गया था।
चित्र किचन में काम कर रही थी।
नीतू ने मौका देखा।
धीरे से वह पालने के पास गई।
दिव्यांश की बोतल उठाई…
और दूध में पानी मिला दिया।
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
जैसे कोई जीत हासिल कर ली हो।
कुछ ही देर में दिव्यांश बेचैन होने लगा।
रोना…
फिर अचानक तेज़ दस्त।
चित्रा घबरा गई।
उसे गोद में उठाया, संभालने लगी।
लेकिन तब तक दादी माँ की नज़र पड़ चुकी थी।
“ये क्या हाल कर दिया है मेरे पोते का!”
दादी माँ गुस्से से चिल्लाईं।
“ज़रा भी अक़्ल नहीं है तुझे?
पहले अपने पति को नहीं संभाल पाई,
अब मेरे पोते को भी नहीं संभाल पा रही!”
चित्रा कांप गई।
आँखें भर आईं, पर आवाज़ नहीं निकली।
“दादी माँ…
मैंने तो सब ठीक से किया था,
पता नहीं अचानक—”
“चुप!”
दादी माँ ने उसे डाँट दिया।
“तुझे शर्म नहीं आती?
मेरा एक ही तो पोता है!”
नीतू दूर खड़ी यह सब देख रही थी।
उसके चेहरे पर संतोष था।
“अच्छा हुआ…
आज फिर इसकी बेज़्ज़ती हुई।”
नीतू जानती थी,
दादी माँ को कैसे खुश रखा जाता है।
कभी लड्डू,
कभी रसमलाई,
कभी गरम-गरम पकवान।
दादी माँ खुश होकर कहतीं —
“कम से कम बड़ी बहू समझदार है।
कितना ख्याल रखती है मेरा।”
नीतू मीठी-मीठी बातों में
दादी माँ को अपने जाल में फँसाती जा रही थी।