Zyvan 3 के बारे में हमारे पास अब तक कोई ठोस डेटा नहीं है... यह सुंदर है, लेकिन खतरे भी हो सकते हैं।"
निशांत मॉरिश की ओर देखता है जो यान को लैंडिंग मोड में डाल चुका था।
निशांत ने कहा "मॉरिश, तैयार हो जाओ... हमें लैंड करना है। और इस बार... सही कदम रखना है।"
स्पेसक्राफ्ट एक विशाल झील की सतह पर उतरा। पानी की चमक यान को जैसे आलोकित कर रही हो। लहरों की छुअन से यान हौले से झूलने लगा।
मॉरिशः "Touchdown complete. Surface stable."
सभी ने अपनी सीट बेल्ट खोल दी ।
आद्विका ने सबसे पहले दरवाज़ा खोला।
वह जोर से बोली: "हम आ गए... Zyvan 3!!!"
उसकी आवाज़ वायुमंडल में गूंज उठी। तभी निशांत ने कहा - निशांत धीरे और गंभीरता से: "शश्श... आद्विका... शांत रहो।
ये जगह नई है, हमें संभलकर चलना होगा।, हम यहां के बारे में कुछ नहीं जानते।
फिर वे सब एक एक कर यान से बाहर आये- ज़मीन पर पहली बार इंसानी कदम।
आद्विका ने झुक कर मिट्टी उठाई। वह नम और जीवित थी ।
उधर निशांत ने सबको बताया "यहां गुरुत्वाकर्षण भी लगभग धरती जैसा ही है... शायद ये ग्रह धरती से जुड़ा हुआ कोई प्राचीन रहस्य हो?"
वहां की अदभुत चीजें देखते हुए आगे बढ़ रहे थे कि
थोड़ी ही दूरी पर चलने के बाद - मॉरिश ने कहा पीछे "देखो... वो पहाड़!
और वो तो... एक नदी है शायद?"
सामने फैली थी - एक हरी घाटी, जहां हवा में ताजगी थी, पानी बह रहा था, और दूर-दूर तक पहाड़ों के पीछे बादलों की हलचल थी।
आद्विका धीरे से खुद से: "मैं जानती थी... यहां जीवन जरूर होगा..."
Zyvan 3 पर लैंडिंग के बाद, सैम स्पेस सूट में खड़ा स्कैनर की स्क्रीन देख रहा था।
उसने पता लगाया..."ऑक्सीजन स्तर सामान्य है... गुरुत्वाकर्षण भी स्थिर।
ये ग्रह धरती जैसा ही महसूस हो रहा है।"
आद्विका उत्साहित होकर बोली... अगर सब कुछ सामान्य है तो हमें उस यान को ढूंढना चाहिए, जिससे सिग्नल आया था।"
शायद वो हमारे आस पास ही कहीं है।
फिर क्या था
चारों - आद्विका, निशांत, सैम और मॉरिश - हरियाली से भरे मैदान की ओर बढ़ रहे थे।
चलते-चलते उन्हें एक जगह अनाज की पकी हुई फसल दिखाई दी।
वे सब हैरान थे "ये... ये तो गेहूं जैसा लग रहा है। मगर यहां किसने उगाया?" क्योंकि दूर दूर तक कोई नहीं था।
निशांत थोड़ा घबराया हुआ था बोला… सावधानी से: "कोई तो है यहां... इसीलिए सब लोग सतर्क रहो।"
थोड़ी दूरी ओर तय करने पर उन्हें एक पुरानी सी झोपड़ी नज़र आई।
अरे "वो देखो... एक झोपड़ी... चलो देखते हैं।"
हिम्मत कर वे चारों झोपड़ी के पास पहुंचे। झोपड़ी के दरवाज़े को हल्के से धक्का दिया ।
भीतर एक बूढ़ा आदमी आग के पास बैठा था , शांत, जैसे उनका इंतज़ार कर रहा हो।
सैम सख़्त लहजे में: "तुम कौन हो? इस ग्रह पर क्या कर रहे हो?"
चारों उसे चारों तरफ से घेर लेते हैं। बुजुर्ग धीरे से उठता है, उसके चेहरे पर झुर्रियाँ और आँखों में शांति।
बुजुर्ग व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला: "मेरा नाम जॉर्ज है... और मैं पृथ्वी से हूँ।"
सब उसे देख कर हैरान थे।
निशांत हैरानी से बोला: "पृथ्वी से? लेकिन कैसे ? कब?"
सवाल तो बहुत सारे थे पर जवाब उलझे हुए।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद। फिर सैम ने गहरी सांस लेते हुए पूछा... "क्या आपने ही हमें सिग्नल भेजा था?"
जॉर्ज धीरे से : "हाँ... वो सिग्नल मैंने ही भेजा था।"
आद्विका के भीतर भी बहुत सवाल थे... "लेकिन आप यहां कैसे बचे... इतने सालों से अकेले ?
क्या आप उस मिशन का हिस्सा थे जो सालों पहले भेजा गया था?"
जॉर्ज थोड़ा उदास था ।
उसने झोपड़ी की एक पुरानी लकड़ी की संदूक से एक मोटी डायरी निकाली।
उसकी उंगलियाँ कांप रही थी, लेकिन आँखें स्थिर थी ।
चारों उसे एकटक देख रहे थे।
जॉर्ज धीरे से बोलना - जॉर्ज:
"सालों पहले... मैं भी एक मिशन पर भेजा गया था।
हम 5 लोग थे... 'Mission Echo One'।
हमारा उद्देश्य था शनि के उपग्रहों पर जीवन की खोज।"
वो डायरी का पहला पन्ना खोलते हैं, जहाँ एक फटी तस्वीर लगी थी - पाँच वैज्ञानिकों की टीम की।
जॉर्ज धीरे से: "पर हम शनि के पास पहुँच भी नहीं पाए थे... कि हमारा यान किसी अनजानी ग्रेविटेशनल लहर की चपेट में आ गया।
सब कुछ धुंधला था... मुझे होश आया तो मैं यहाँ था Zyvan 3 पर... अकेला था।"
मेरे साथी मुझे नहीं पता उनके साथ क्या हुआ??
सैम ने आश्चर्य से पूछा... "यान बचा कैसे?"
जॉर्ज गंभीर स्वर में बोला: "मुझे लगता है... इस ग्रह की गुरुत्वीय शक्ति ने यान की दिशा मोड़ दी थी।
वो फट चुका था... मेरे साथी... वो सब..."
एक क्षण के लिए उसकी आवाज़ भरी जाती है।
आद्विका : "और फिर आप यहां... अकेले..." जॉर्ज मुस्कुराते हुए: "हां।
शुरुआत में तो मैं पागल होने के कगार पर था।
लेकिन फिर... इस ग्रह ने मुझे ज़िंदा रखा। यहाँ की मिट्टी, हवा... सबकुछ जीवंत है।
मैंने खेती शुरू की... झोपड़ी बनाई... और फिर धीरे-धीरे, ज़िंदगी को यहां महसूस करना सीख लिया।"
उन्हों ने डायरी का एक पन्ना दिखाया जहाँ लिखा था "Day 1867: आज मैंने पहली बार खुद को ज़िंदा महसूस किया..."
निशांत ने बताया: "आपका भेजा सिग्नल ही था जिसने हमें यहाँ तक पहुँचाया।"
जॉर्ज आँखें झुकाये बैठा था: "मुझे नहीं लगा था कोई कभी आएगा... पर मैंने फिर भी भेजा। शायद कोई सुने। शायद... कोई जवाब दे।"
आद्विका भावुक होकर बोली... "अब आप अकेले नहीं हैं।"
सब चुपचाप मायूस बैठे थे।
बस झोपड़ी के बाहर हल्की सी हवा चल रही थी, जैसे कि zyvan 3 भी सुन रहा हो।
मुझे कभी उम्मीद नहीं थी कि मैं दोबारा धरती पर लौट पाऊंगा।
लेकिन Zyvan 3 पर जीवन के सभी आवश्यक तत्व मौजूद है।
मैंने यहां खेती की, नई चीजों की खोज की-बस खुद को ज़िंदा रखने की कोशिश करता रहा।
मन के किसी कोने में एक भरोसा था कि एक दिन कोई न कोई ज़रूर यहां तक पहुंचेगा... और आज तुम लोग आ गए।
सबने उन्हें हिम्मत देते हुए कहा... "हम आपको अपने साथ ले जाएंगे।"
अब हम साथ हैं।
निशांत ने जॉर्ज से Zyvan 3 ग्रह के बारे में हर जरूरी जानकारी ले ली थी।
यह ग्रह धरती जैसे जीवन के लिए उपयुक्त है।
उन्होंने देर न करते हुए वापस धरती लौटने की तैयारी शुरू कर दी।
उस ग्रह की सभी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने के बाद सब यान की ओर लौट आए क्योंकि अब समय था वापस घर लौटने का।
निशांत ने मिशन लॉग में दर्ज किया- "मिशन एक और जीवनः सफल। गंतव्य-Zyvan 31"
.....
एक लंबे अरसे के बाद...
जब उनका यान धरती की सतह पर सुरक्षित उतरा,
तो प्रोफेसर विलियम और वैज्ञानिकों की टीम उनके स्वागत में पहले से ही खड़ी थी।
विलियम अब थोड़ा वृद्ध हो चुके थे, पर आँखों में वही चमक थी।
उन्होंने आद्विका से पूछा- "तो कैसा रहा तुम्हारा पहला मिशन?"
वह मुस्कराकर बोली- "अद्भुत... लेकिन डर से भरा।"
प्रोफेसर हम आपके लिए कुछ लाएं हैं सबने एक स्वर में कहा! हम किसको अपने साथ लाए हैं।
जब उन्होंने प्रोफेसर जॉर्ज को देखा तो उन सब की आँखें नम हो गई।
फ़िर उन सबने मिशन की सफलता का जश्न मनाया ।आद्विका थोड़ी गंभीर होकर पूछती है- "सर, हम इतनी बड़ी आबादी को Zyvan 3 पर कैसे ले जाएंगे?"
प्रोफेसर ने मुस्कुराकर कहा - "जिस विशेष स्थान से तुमने उड़ान भरी थी, वही हमारा अंतरिक्ष यान है। हमने वर्षों पहले ये योजना तैयार कर ली थी... बस इंतज़ार था एक सही ग्रह का।
अब Zyvan 3 ही हमारी नई उम्मीद है। जल्द ही हम अंतरिक्ष में जगह-जगह स्पेस स्टेशन बनाएंगे।"
अब आद्विका सब समझ चुकी थी।
इसके बाद सब अपने-अपने घर लौटने लगे।
जब आद्विका अपने घर पहुंची, उसकी मां चुपचाप एक कोने में बैठी थी, और जॉन खेतों से लौट रहे थे।
अब वे बहुत बूढ़े हो चुके थे।
दोनों ने जैसे ही आद्विका को देखा, बिना कुछ कहे उसे गले से लगा लिया।
उनकी आंखें भर आई।
आद्विका ने धीमे से कहा- "अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी..." वे तीनों घर के अंदर चले गए।
कैसे कुछ लोगों ने अपने जीवन की परवाह किए बिना मानव सभ्यता को बचाया।
मीरा अपनी किताब 'एक और जीवन' को यहीं समाप्त कर देती है।
अंत में मीरा एक आखिरी पंक्ति लिखती है:
"अगर हम यूं ही प्रकृति का दोहन करते रहे, तो वो दिन दूर नहीं जब धरती की यही कहानी होगी... बस फर्क इतना होगा कि तब कोई मीरा नहीं होगी, लिखने के लिए।"
कुछ समय बाद, मीरा की ये किताब बेहद चर्चित हुई, और उसे एक प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा जाता है।
धन्यवाद 🙏
Neha kariyaal ✍️