जानवी को जब ये सब पता लगा तो जानवी कार को किनारे पर रोककर रोने लगती है और कहती है ---
जानवी :- मैने ये सब क्या कर दिया , जिसके सामने मेरी कोई हैसियत नही , कोई औकात नही मैने उसे ही लालची समझा , जिसने मेरी कंपनी को हर बार बचाया , मैने उसे ही कंपनी का लुटेरा समझा । आज मुझे एहसास हो रहा है के मैं कितनी बदनसीब हूँ , जिसने एक हिरा को खो दिया । आदित्य आज तक मेरे प्यार के लिए कितना कुछ सकता रहा , पर अब मैं उसे जरा सा भी दुख नही होने दुगीं ।
अशोक :- शांत हो जाओ बेटी , आदित्य तुमसे अब भी उतना ही प्यार तरता है । मुझे भरोसा है के वो तुम्हें जरुर समझेगा ।
जानवी :- पापा ... आपने मुझे ये सब पहसे क्यों नही बताया ?
अशोक :- बेटा ... कोशिश तो बहुत किया था बताने का पर तुमने कभी सुना ही नही ।
जानवी को अपने किए पर बहुत पछतावा होने लगा था । जानवी कार पर बैठती है और वहां से निकल जाती है ।
कुछ दैर बाद… जानवी बेचैन होकर पहले आदित्य के घर पर जाती है और जब वहां पर आदित्य नही मिलता तो जानवी वहां से आदित्य के ऑफिस पहुँचती है , जानवी बहुत बैचेन थी और उसका दिल तेज़ धड़क रहा है। जानवी ऑफिस के अंदर पहूँच जाती है तो रिसेप्शनिस्ट उसे रोकती है और कहती है --
रिसेप्शनिस्ट: - मेम ... आपको किनसे मिलना है ?
जानवी :- मुझे आदित्य से मिलना है , कहां है वो ?
वो लड़की जानवी को दैखकर पहचान जाती है के वो आदित्य की पत्नी है , पर अब डिवोर्स होने वाला है , इसिलिए वो लड़की जानवी से कहती है ---
रिसेप्शनिस्ट :- मैम, सर अभी किसी से नहीं मिल रहे… ।
जानवी (टूटती आवाज़ में) :- उन्हें बोलिए… जानवी आई है…अगर आज वो मुझसे नहीं मिले… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी… तुम जाओ उनसे कहो के मैं आई हूँ ।
रिसेप्शनिस्ट एक कॉल करती है तो पता चलता है के आदित्य नही है ।
रिसेप्शनिस्ट कहती है --
रिसेप्शनिस्ट: - सॉरी मेम , पर आदित्य सर से आप अभी नही मिल सकती क्योंकि वो अभी ऑफिस मे नही है ।
जानवी रिसेप्शनिस्ट से रिक्वेस्ट करके कहती है --
जानवी: - मुझे आदित्य से मिलना है… अभी। बहुत ज़रूरी है।
रिसेप्शनिस्ट ने सिस्टम चेक किया… फिर थोड़ा झिझकते हुए बोली —
रिसेप्शनिस्ट: - "मैम… सर अभी कुछ देर पहले ही निकल गए।"
जानवी जैसे वहीं जम गई ।
जानवी: - निकल… गए? कहाँ गए? अभी तो… अभी तो मैं आई हूँ…"
रिसेप्शनिस्ट: - उन्हें एक जरूरी मीटिंग के लिए जाना पड़ा। उन्होंने किसी से मिलने का शेड्यूल भी कैंसल कर दिया था।"
जानवी की आँखों में जो उम्मीद थी… वो धीरे-धीरे बुझने लगी।
वो कुर्सी पर बैठ गई। उसे ये नहीं पता था —आदित्य को तो ये खबर ही नहीं दी गई थी कि जानवी आई है।
उधर…आदित्य अपनी कार में बैठ चुका था। ड्राइवर गाड़ी चला रहा था, लेकिन आदित्य की नज़र खिड़की से बाहर कहीं खोई हुई थी।
उसके मन में अजीब बेचैनी थी।
आदित्य (मन ही मन): - पता नहीं क्यों… आज सब कुछ अधूरा लग रहा है…
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह क्यों बार-बार पीछे मुड़कर देखने का मन कर रहा है।
इधर ऑफिस में…जानवी उठती है। धीरे-धीरे आदित्य के केबिन की ओर जाती है। दरवाज़ा आधा खुला था तो जानवी अंदर चली जाती है कोई डर से जानवी को रोकता नही है क्योंकी जानवी आदित्य की वाईफ थी । वो अंदर जाती है। कमरा बिल्कुल वैसा ही था… साफ-सुथरा… सख्त… लेकिन कहीं न कहीं उसकी मौजूदगी महसूस हो रही थी , टेबल पर रखी फाइलें… कॉफी का आधा खाली कप…
और कुर्सी… जिस पर वो बैठता था। जानवी उस कुर्सी को देखती रह जाती है।
जानवी (टूटती आवाज़ में): - तुम हमेशा ऐसे ही चले जाते हो आदित्य…जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है…।
वह टेबल को हल्के से छूती है…जैसे उस स्पर्श में आदित्य को महसूस करना चाहती हो उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं।
जानवी: - मैं तुम्हें गलत समझती रही…और तुम… हर बार चुपचाप दूर चले गए…।
उसी समय उसकी नज़र टेबल पर रखी एक डायरी पर पड़ती है।
डायरी खुली हुई थी उसमें लिखा था —
“कभी-कभी सच बताने का हक भी इंसान खो देता है…
जब सामने वाला विश्वास करना छोड़ दे।”
ये पढ़ते ही जानवी का दिल जैसे कस कर किसी ने पकड़ लिया हो ।
उधर…मोनिका किसी वकील के ऑफिस में बैठी है।
मोनिका :- मुझे ऐसा केस बनाना है…कि आदित्य चाहे कितना भी साफ क्यों न हो…उसे कोर्ट आना पड़े…और समाज उसके नाम को मेरे नाम से जोड़े बिना ना रहे।
वकील चौंक जाता है और कहता है --
वकील :- आप सच में केस लड़ना चाहती हैं… या किसी को मजबूर करना चाहती हैं?
मोनिका (ठंडी मुस्कान के साथ) :- मजबूर…प्यार से नहीं माना… तो अब हालात से मानेगा। आप कुछ ऐसा किजिए के वो डि एन ए रिपोर्ट बदल जाए और आदित्य के पास मुझसे शादी करने के अलावा और कोई रास्ता ही ना बचे ।
वकील :- तो क्या आपके पेट मे जो बच्चा है वो आदित्य का नही है ?
वकील के सवाल से परेशान होकर मोनिका गुस्से से कहती है --
मोनिका :- ये आपका काम नही है , आपको बस इतना साबित करना होगा के मेरे पेट मे जो बच्चा है वो आदित्य का है , और जो रिपोर्ट आएगी उसे कैसे बदलना है ये आप दैख लो ।
वकील समझ जाता है के मोनिका ते पेट मे आदित्य का बच्चा नही है । वकील मोनिका से कहता है --
वकिल :- दैखो मेडम , अगर मुझे सब खुलकर नही बताओगे , तो मैं आपकी कोई मदद नही कर पाउगां ।
वकिल की बात पर मोनिका उसे सब बोलतर सुनाती है । तब वकिल कहता है ---
वकिल :- इसमे पैसा बहुत लगेगा ।
मोनिका :- जितना लगेगा मैं दूगी ।
वकिल :- ठिक है फिर । आप जाओ मैं तैयारी करता हूँ ।
मोनिका वकिलके वहां से चली जाती है । उधर जानवी आदित्य के लिए बहुत परेशान थी । जानवी अपने घर पर थी उसके सामने अशोक था । जानवी बार - बार पहसे की बात याद करने की कोशिश करती है , पर उसे सिर्फ कुछ धुधंला सा ही याद आता है , जैसे एक्सीडेंट के समय जानवी आदित्य के गौद मे थी आदित्य परेशान था और आदित्य जानवी से I love you कहने वाला था तो जानवी आदित्य के होंट पर उगंली रखकर उससे कहती है --
" अभी नही "
बस जानवी को इतनी ही याद आ रहा था । जानवी गुस्से से कहती है --
जानवी :- ओह .... मुझे कुछ याद क्यों नही आ रहा है ?
जानवी दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर बैठ गई। उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं… जैसे यादें उसके अंदर कहीं कैद हों और बाहर आने के लिए छटपटा रही हों।
जानवी (झुँझलाकर): - "ओह…! मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा है?
क्यों सब धुंधला है… क्यों?"
वह आँखें बंद करती है और फिर ज़ोर डालती है…लेकिन हर बार वही एक पल सामने आकर रुक जाता है —तेज़ बारिश…सड़क पर बिखरा काँच…उसका सिर आदित्य की गोद में…
और आदित्य की काँपती आवाज़…
" जानवी ... मैं तुमसे—"
और फिर…
उसने उसके होंठों पर उंगली रख दी थी —
जानवी :- "अभी नहीं…"
बसउसके बाद सब खाली। जानवी अचानक खड़ी हो जाती है।
जानवी: - "उसके बाद क्या हुआ था? उसने क्या कहना चाहा था?
मैंने उसे क्यों रोका था?"
उसकी आँखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। अशोक, जो अब तक चुपचाप उसे देख रहा था, धीरे से उसके पास आता है।
अशोक (नरम आवाज़ में): -"कुछ बातें याद करने से नहीं… महसूस करने से याद आती हैं बेटा। तुम जितना ज़ोर डालोगी… वो उतना ही दूर भागेंगी।"
जानवी थकी हुई आवाज़ में सोफे पर बैठ जाती है।
जानवी: - पापा… दिल बहुत घबरा रहा है।ऐसा लग रहा है जैसे मैंने… बहुत बड़ी गलती की है। जैसे कोई मुझे पुकार रहा है… और मैं सुन नहीं पा रही…"
अशोक की आँखें भी भर आती हैं। उसे पहली बार अपनी बेटी का टूटना दिख रहा था — ज़िद में नहीं, पछतावे में।
अशोक: - गलती का एहसास होना ही सबसे बड़ी शुरुआत होती है।
अब फैसला तुम्हें करना है — यादों का इंतज़ार करोगी… या सच का सामना करोगी।"
जानवी धीरे से उठती है। वह खिड़की के पास जाती है।
बाहर वही रास्ता दिख रहा था…जिस रास्ते पर कभी आदित्य उसे छोड़ने आया करता था।
उसकी आँखों से आँसू बह निकलते हैं।
जानवी (बहुत धीमे): - तुम कुछ कहना चाहते थे ना…
मैंने ही तुम्हें रोक दिया…क्या आज भी… तुम वहीं खड़े हो आदित्य?"
उसी पल… जानवी अपने पापा अशोक से कहती है --
जानवी :- पापा ... आदित्य को मैने बहुत दुख दिये है और इसिलिए वो मुझसे दुर चला गया , मैने उसे कोर्ट तक लेकर गया । उसने हर बार मेरी मदद की , मुझे उस विकास से बचाया पर खुद को बेइज्जत होने दिया , सिर्फ मेरे लिए। इतना प्यार करता है वो मुझसे , और मैने अपनी बेवकूफी के कारण अपने प्यार तो पहचान ही नही पाई ?
अशोक जानवी के पास आता है और कहता है --
अशोक :- बेटी अब भी दैर नही हूई है , तुम उससे बात आदित्य वो तुमसे अब भी प्यार करता है । मुझे भरोसा है के वो तुम्हें जरुर समझेगा ।
जानवी :- पापा ... वो मोनिका....आदित्य के बच्चे की मां बनने वाली है । और पापा ..मैंने आदित्य और मोनिका को एक साथ आदित्य के घर पर दैखा था । तो इसका मतलब ये है के उसने मुझे भुला दिया है ?
अशोक :- पहसे तो मुझे भी शक हूआ था पर जब आदित्य ने उस बच्चे को अपना मानने से इंकार कर दिया है तो इसका मतलब है के मोनिका झुठ बोल रही है । वो बच्चा आदित्य की नही किसी किसी और का होगा ।
जानवी :- पर पापा ... मोनिका किसी और के बच्चे को आदित्य का क्यों बताएगा ?
अशोक :- वही तो समझ मे नही आ रहा है बेटा ।
जानवी :- अगर आदित्य बेगुनाह है तो मैं उसे इस दलदल से बाहर निकाल कर रहूँगी । मैं सच का पता लगा कर रहूगीं ।
तभी वहां पर विकास आ जाता है और कहता है --
विकास :- मुझे पता है मोनिका के पेट मे किसका बच्चा है ।
To be continue....932