Girl's limit. in Hindi Women Focused by Jeetendra books and stories PDF | लड़की की लिमिट।

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लड़की की लिमिट।

हमारे मोहल्ले में हर घर के दरवाजे पर एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा खिंची होती है। इसे सिर्फ लड़कियां ही देख पाती हैं। दयाशंकर जी इस रेखा के सबसे बड़े और निष्ठावान चौकीदार हैं। उनकी बेटी गुंजन इसी रेखा के घेरे में बड़ी हुई है। दयाशंकर जी को लगता है कि संस्कार सिर्फ लड़कियों की चप्पल की आवाज में कैद होते हैं।

दयाशंकर जी की नाक बहुत संवेदनशील है। उन्हें दूर से ही उड़ती हुई मर्यादा की गंध आ जाती है। वह अक्सर कहते हैं कि मर्यादा का पालन करना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस अपनी इच्छाओं को एक संदूक में बंद करना होता है। फिर उस संदूक को किसी पुराने कुएं में फेंक देना चाहिए।

गुंजन ने बचपन से ही सुना है कि उसे अपनी सीमा में रहना है। यह सीमा कभी पिता की मर्जी से तय होती थी। कभी भाई की चिड़चिड़ाहट से इसे नापा जाता था। मोहल्ले की बूढ़ी चाची भी इस सीमा की माप लिया करती थीं। गुंजन को लगता था कि वह कोई जमीन का टुकड़ा है। जिसकी मेड़ हर कोई बांध रहा है।

संसार में जितने भी नियम बने हैं वे सब गुंजन जैसी लड़कियों के लिए हैं। लड़कों के लिए तो आसमान भी छोटा पड़ता है। पर गुंजन के लिए घर का आंगन भी बहुत बड़ा माना गया। दयाशंकर जी का तर्क था कि बिजली और लड़की को हमेशा कंट्रोल में रखना चाहिए। वरना दोनों ही घर जला सकती हैं।

एक दिन गुंजन ने दफ्तर जाने की इच्छा जताई। दयाशंकर जी को लगा कि उनके पुरखों की आत्माएं कांपने लगी हैं। उन्होंने पान चबाते हुए अपनी चिंता जाहिर की। बोले कि बाहर की हवा बहुत जहरीली हो गई है। लड़कियों की फेफड़े इतने मजबूत नहीं होते कि वह आजादी की हवा झेल सकें।

मोहल्ले के लोग भी कम नहीं थे। निंदा रस का आनंद लेने के लिए वे हमेशा तैयार रहते थे। शर्मा जी बोले कि आज कल की लड़कियां बहुत उड़ रही हैं। उन्हें नहीं पता कि पंख कटने में देर नहीं लगती। दयाशंकर जी ने सिर हिलाकर उनकी बात का समर्थन किया। मर्यादा की रक्षा का भार उन पर जो था।

गुंजन ने हिम्मत जुटाकर दफ्तर जाना शुरू किया। पहले दिन जब वह घर से निकली तो पूरा मोहल्ला उसे ऐसे देख रहा था जैसे वह मंगल ग्रह जा रही हो। दयाशंकर जी घर की दहलीज पर ऐसे बैठे थे जैसे किसी किले की सुरक्षा कर रहे हों। उनकी आंखों में खानदान की इज्जत का भारी बोझ साफ दिखता था।

दफ्तर की दुनिया गुंजन के लिए नई और चकित करने वाली थी। वहां लोग काम की बातें करते थे। वहां कोई उसे यह नहीं बता रहा था कि उसे कितना हंसना चाहिए। वहां कोई उसकी हंसी की तीव्रता को मर्यादा के पैमाने पर नहीं नाप रहा था। गुंजन को लगा कि वह पहली बार सांस ले रही है।

इधर घर में दयाशंकर जी की बेचैनी बढ़ रही थी। वह घड़ी की सुइयों को अपनी धड़कन से मिला रहे थे। शाम के छह बजते ही उनकी नाक फिर से फड़कने लगी। उन्हें लगा कि सीमा की दीवार में दरारें आने लगी हैं। वह बार बार दरवाजे की तरफ देखते थे। जैसे वहां से कोई अपराधी आने वाला हो।

गुंजन को उस दिन काम की वजह से थोड़ी देर हो गई। वह जब घर पहुंची तो अंधेरा घिर आया था। दयाशंकर जी का चेहरा गुस्से से लाल था। उन्होंने गुंजन से एक भी सवाल नहीं किया। पर उनकी खामोशी में हजार गालियां छिपी थीं। मोहल्ले की बत्तियां बुझ चुकी थीं पर सबकी नजरें गुंजन के घर पर थीं।

अगले दिन सुबह दयाशंकर जी ने पंचायत बिठाई। घर के बड़े बुजुर्ग इकट्ठा हुए। सबने एक स्वर में कहा कि लड़की की लिमिट पार हो रही है। भाई बोला कि अगर समाज में सिर उठाकर चलना है तो बहन को घर में रखना होगा। गुंजन चुपचाप एक कोने में खड़ी सब सुन रही थी।

दयाशंकर जी ने फरमान सुनाया कि अब दफ्तर जाना बंद होगा। उन्होंने कहा कि इज्जत कमाने में सदियां लगती हैं और गंवाने में एक पल। गुंजन ने पूछा कि क्या उसकी मेहनत और पढ़ाई की कोई कीमत नहीं है। दयाशंकर जी ने जवाब दिया कि लड़की की पढ़ाई सिर्फ शादी के विज्ञापन में काम आती है।

गुंजन को लगा कि वह किसी पुराने महल में कैद हो गई है। वहां की दीवारें बहुत मोटी थीं। उन दीवारों पर मर्यादा के पोस्टर लगे थे। वह सोचने लगी कि समाज लड़कियों को इंसान क्यों नहीं समझता। वह उन्हें सिर्फ खानदान की साख का एक प्यादा क्यों मानता है।

परसाई जी की आत्मा शायद कहीं हंस रही होगी। वह देख रहे होंगे कि कैसे एक लड़की की आजादी को धर्म और संस्कृति का नाम देकर कुचला जा रहा है। दयाशंकर जी जैसे लोग अपनी कमजोरी को संस्कार का नाम देते हैं। उन्हें डर लगता है कि अगर लड़की बाहर निकल गई तो उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा।

गुंजन ने अगले दिन दफ्तर जाने के लिए अपना बैग उठाया। दयाशंकर जी ने उसका रास्ता रोका। बोले कि अगर आज तुम इस दहलीज से बाहर गई तो मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी। यह वह अचूक हथियार था जो हर भारतीय पिता अपनी संतान पर चलाता है। गुंजन के कदम वहीं रुक गए।

पर क्या सच में कदम रुक गए थे। गुंजन की सोच अब उस सीमा से बाहर निकल चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि यह सीमा सिर्फ उसके शरीर के लिए है। उसकी आत्मा तो पहले ही दफ्तर के काम और आजादी के स्वाद को चख चुकी थी। दयाशंकर जी को लग रहा था कि वे जीत गए हैं।

समाज की नजर में गुंजन एक अच्छी लड़की बन गई। वह घर में रहती और सबका कहना मानती थी। पर उसके अंदर की गुंजन मर चुकी थी। दयाशंकर जी को एक जीती जागती लाश चाहिए थी जो उनकी इज्जत की रक्षा कर सके। उन्हें वह मिल गई थी और वे बहुत खुश थे।

मोहल्ले वाले अब दयाशंकर जी की मिसाल देते थे। कहते थे कि देखो इसे कहते हैं अनुशासन। लड़की को एकदम काबू में रखा है। पर किसी ने यह नहीं देखा कि उस काबू के नीचे एक सपना दम तोड़ चुका है। किसी ने नहीं देखा कि एक इंसान को पत्थर की मूर्ति बना दिया गया है।

यह कहानी हर उस घर की है जहां लड़की की लिमिट तय होती है। जहां उसकी हंसी को गुनाह समझा जाता है। जहां उसके पंखों को बचपन में ही कुतर दिया जाता है। ताकि वह अपनी उड़ान से किसी के अहंकार को चोट न पहुंचा सके। दयाशंकर जी आज भी दरवाजे पर बैठे पहरा दे रहे हैं।

दयाशंकर जी जैसे लोग भूल जाते हैं कि समाज को इज्जत की नहीं बल्कि बराबरी की जरूरत है। वे अपनी ही बेटियों को दुश्मन की तरह देखते हैं। उन्हें लगता है कि वे रक्षा कर रहे हैं पर असल में वे हत्या कर रहे होते हैं। एक व्यक्तित्व की हत्या और एक भविष्य की हत्या।

गुंजन की चुप्पी अब शोर मचा रही थी। पर दयाशंकर जी को वह शोर सुनाई नहीं देता था। उन्हें तो बस समाज की वाहवाही सुनाई देती थी। उन्हें लगता था कि उन्होंने अपनी बेटी को बचा लिया है। पर असल में उन्होंने अपनी बेटी को खो दिया था। वह गुंजन अब कभी वापस नहीं आएगी।

सीमाएं हमेशा दूसरों के लिए बनाई जाती हैं। खुद के लिए तो सिर्फ सुख और सुविधाएं होती हैं। दयाशंकर जी खुद रात भर बाहर रह सकते थे। उनका बेटा कहीं भी जा सकता था। पर गुंजन के लिए सूरज ढलते ही दुनिया खत्म हो जाती थी। यह कैसा न्याय है और कैसी व्यवस्था है।

एक दिन गुंजन ने अपना सामान समेटा। उसने कोई शोर नहीं किया और न ही कोई बहस की। उसने सिर्फ एक पत्र छोड़ा और घर से निकल गई। पत्र में लिखा था कि अब मैं अपनी लिमिट खुद तय करूंगी। आपकी बनाई सीमाएं मेरे लिए बहुत छोटी पड़ रही हैं।

दयाशंकर जी जब सोकर उठे तो उन्हें वह पत्र मिला। उनकी दुनिया उजड़ चुकी थी। मोहल्ले वालों के लिए अब वे मजाक का पात्र बन गए थे। वे लोग जो कल तक उनकी तारीफ करते थे आज उन पर हंस रहे थे। दयाशंकर जी की नाक अब मर्यादा की गंध नहीं पहचान पा रही थी।

सच्चाई तो यह है कि लड़कियां कोई सीमा नहीं तोड़तीं। वे तो बस उस कैद को तोड़ती हैं जिसे सीमा कहा जाता है। वे आसमान में उड़ने के लिए बनी हैं न कि पिंजरे में सजने के लिए। दयाशंकर जी का अहंकार अब धूल में मिल चुका था। पर गुंजन अब बहुत दूर जा चुकी थी।

कहानी का अंत दुखद नहीं है। यह तो एक नई शुरुआत है। उन तमाम गुंजन के लिए जो अपनी लिमिट खुद तय करना चाहती हैं। जो समाज के डर से अपनी पहचान नहीं खोना चाहतीं। हरिशंकर परसाई की शैली में कहें तो पाखंड की दीवार एक न एक दिन गिरती ही है।

अब दयाशंकर जी घर में अकेले बैठते हैं। उन्हें अब किसी की चप्पल की आवाज सुनाई नहीं देती। मर्यादा का वह संदूक अब खाली पड़ा है। उन्हें समझ आ गया है कि इज्जत घर में बैठने से नहीं बल्कि सम्मान देने से आती है। पर यह समझ बहुत देर से आई है।

गुंजन अब एक दूसरे शहर में है। वह वहां काम करती है और अपनी शर्तों पर जीती है। वहां कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है। वहां सिर्फ मेहनत और ईमानदारी की रेखा है। वह अब किसी की साख का बोझ नहीं ढोती। वह अब सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों को समझती है।

समाज आज भी वही है और लोग भी वही हैं। पर गुंजन बदल गई है। उसने अपनी ताकत को पहचान लिया है। उसने यह साबित कर दिया है कि लड़की की कोई लिमिट नहीं होती। उसकी लिमिट तो पूरा ब्रह्मांड है। दयाशंकर जी का पहरा अब बेमानी हो गया है।

इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि इंसान को इंसान रहने देना चाहिए। उसे अपनी सनकों का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। लड़कियां भी इसी समाज का हिस्सा हैं। उन्हें भी उतना ही हक है जितना किसी और को। सीमाएं सिर्फ दिमाग की उपज होती हैं।

दयाशंकर जी जैसे पात्र हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं। वे रोज किसी न किसी गुंजन का गला घोंटते हैं। वे संस्कारों की आड़ में नफरत फैलाते हैं। पर वक्त बदल रहा है। अब कोई सीमा किसी को रोक नहीं पाएगी। अब हर लड़की अपनी मंजिल खुद तलाश करेगी।

रावत जी कहते है कि व्यंग्य समाज की गंदगी को साफ करता है। यह कहानी भी उसी गंदगी पर एक चोट है। जो लड़कियों को बांधकर रखना चाहती है। जो उन्हें आगे बढ़ने से रोकती है। अब समय आ गया है कि हम इन सीमाओं को जड़ से मिटा दें।

गुंजन अब खुश है और आजाद है। उसने दिखा दिया कि डर के आगे ही जीत है। दयाशंकर जी की कहानी अब खत्म हो चुकी है। पर गुंजन की कहानी अभी शुरू हुई है। वह हर उस लड़की की आवाज है जो अपनी सीमाएं लांघकर आगे बढ़ गई है।

                       
                          💥समाप्त💥