राधा का संगम - प्रकरण 2
राधा के सपने आसमान की बुलंदी को छूते थे.. अपनी अलग पहचान बनाने के लिये ग्रेजुएशन के साथ पार्ट टाइम जोब शुरू किया था और उसी पैसे से सेक्रेटरी का कोर्स संपन्न किया था.
उसी महेनत ने उसे सेक्रेटरी बनने का मौका दिया था. ऊस के लिये राधा ने मेरा तहेदिल से शुक्रिया अदा किया था.
वह पहले ही दिन बहुत नर्वस थी. पर मुझे देखकर अपने आप को संभाल लिया था. ऊस में मुझे अपनापन की झलक दिखाई दी थी.
मेरी बेबाकी देखकर राधा ने एक ही नजर में अपना बना लिया था.
सेक्रेटरियल कोर्स कितने समय का था. रोजाना कितना समय देना पड़ता था. यह जानने के लिये मैंने उसे पूछा था. और ऊस ने मुझे बताया था.
" श्याम! यह एक डिप्लोमा कोर्स था. उसे खत्म करने के लिये छह महिने लगे थे. रोज़ मुझे 3-4 घंटे देने पड़ते थे. "
राधा तब भी बडी महेनती थी जिस ने उसे सभी काम समय पर निपटाने की क्षमता प्रदान की थी. वह अपने सारे काम वक़्त के पहले पूरा कर लेती थी.
ऊस की यह बेबाकी ने मेरा दिल जीत लिया था.
सेक्रेटरियल कोर्स का संस्थान काफ़ी दूर था, ऊस तक पहुंचने में 45 मिनिट जैसा समय लगता था.
बस में जाते समय वह अक्सर खिड़की से बाहर देखती थी और हसीन यादों में खो जाने की बातें करती थी.
बस के सफर में कई लड़के ऊस का दयान अपने प्रति खिंचने का प्रयास करते थे.. राधा पूरी नखरे बाज थी.
वह बस खिड़की के बाहर देखती थी और सोचती थी की उसे अपने सपने का सौदागर मिलेगा जो उसे बिना शर्त प्यार करें.
कोर्स पूरा होते ही उसे बडी कंपनी से इंटरव्यू कोल आया था. वहाँ का बोस काफ़ी कड़क था. जिस से उसे जोब मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दी थी.. फिर भी राधा का हाजिर जवाबी पन ऊस के काम आ गया था.
उसे फ़ौरन कंपनी ने नियुक्त कर लिया था. राधा ने अपनी इस उपलब्धि के बारे में मुझे बताया था. जिसे सुनकर मैं बहुत खुश हो गया था. लेकिन मैं उसे अपने साथ ही रखना चाहता था. ऊस समय एक इत्तेफ़ाक़ ने मेरी सहायता की थी. ऊस वक़्त कंपनी की सेक्रेटरी जोब छोड़कर अमरीका चली गई थी. और राधा के लिये रास्ता खुल गया था. उसे बढ़िया पगार में मेंरे साथ जोब मिल गया था.
राधा को ऊस वक़्त दोहरी खुशी प्राप्त हुई थी. उसे मेंरे साथ काम करने का मौका मिला था, और सैलरी भी ज्यादा मिलने वाली थी.
ऊस की मेहनत देखकर बोस ने उसे सेक्रेटरी के साथ अपनी पर्सनल असिस्टेंट भी बना दी थी.. सैलरी भी बढी थी. लेकिन राधा को पलभर भी आराम नहीं मिलता था.
वह बोस के हर राज़ और मीटिंग्स का हिस्सा बन गई थी.
ऊस का काम बढ़ गया था. वह थोड़ी आजादी चाहती थी.
एक दिन गलती से ऊस के हाथो से बोस की किंमती फ़ाइल पर कोफी गिर गई थी.
ऊस पर बोस गुस्से से लाल हो गये थे.. ऊस पर राधा की आँखों में सावन भादो बह निकले थे.. जिसे देखकर उन का सारा गुस्सा पिघल गया था.
बोस ने ऊस का हाथ पकडकर कहां था: "फ़ाइल तो दोबारा बन जायेंगी, पर मैं तुम्हारी आँखों में आंसू नहीं देख सकता. "
और उन्होंने पियून को बुलाकर राधा के लिये कोफो मंगवाई थी.
ऊस पल राधा को अपनी खूबसूरती पर बड़ा नाज हुआ था.. यह बहुत बडी ट्विस्ट थी. बोस भी युवान था, 25-27 की उम्र थी. ऊस की शादी नहीं हुई थी.. राधा की खूबसूरती ने उसे शादी के लिये ललचाया था. ऊस ने शादी का प्रस्ताव भी रखा था. लेकिन वह तो श्याम की कब से हो चुकी थी. दोनों शादी भी करने वाले थे. इस लिये राधा ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था.
श्याम बड़ा पारखी था. वह बोस की रग रग को जानता था.
हकीकत जानकर भी ऊस की सोच में कोई बदलाव नहीं आया था.
वह बार बार किसी ना किसी बहाने राधा को अपनी केबिन में बुलाता था. ऊस की बढ़ती हुई उम्र ने उसे शादी के लिये उकसाता था. लेकिन भरी युवानी में उस के सारे बाल झर गये थे. ऊस का माथा चांद की तरह चमकता था. वह फ़िल्मी अभिनेता राकेश रोशन और अनुपम खेर की तरह बिल्कुल टकला हो गया था.
लेकिन उन का दिल साफ था, वह नेकदिल था. किसी का बुरा भी नहीं सोचता था. इस लिये श्याम और राधा ऊस की इज्जत करते थे, ऊस का ख्याल रखते थे.
ऊस के बाद बॉस को भी फ़िल्म ' डर ' की तरह राधा का ओबसेशन हो गया था. वह उसे महेंगी भेट देते थे. ऊस की तारीफ करते थे और सामने से राधा की केबिन में जाकर उसे मदद करने का दिखावा करते थे, और ऊस के सौंदर्य को अपनी आँखों से पीते रहते थे.
यह देखकर किसी भी प्रेमी और पति को जलन हो सकती थी.
मेरा भी यही हाल था. मैं राधा के लिये बहुत पझेसिव हो गया था. कोई ऊस के साथ बात करे, यह बात मैं बर्दास्त कर नहीं पाया था.
इस स्थिति में हमने फटाफट कोर्ट में जाकर विधिवत शादी कर ली थी.
हमारी शादी में ऊस ने बहुत बड़ा तोहफा दिया था. हमने ऊस के लिये मना किया था. फिर भी ऊस में जबरन यह तोहफा हमें दिया था.
लेकिन ऊस के बाद बॉस की नियत में बदलाव आया था. हर हप्ते तीन दिन कुछ ना कुछ बहाने डेरे तक ऑफिस में रोक रहा था. मैं अपने काम के आलावा और काम करता था, इस लिये साथ नहीं रह पाता था, वैसे रहना भी गलत था. ऊस पर संदेह की वजह से मैं यह करता हूं ऎसा सोचकर मैंने राधा पर विश्वास कर के ज्यादा दयान नहीं दिया था.. एक दिन वह राधा के नजदीक सरके थे. इस के कंधो पर हाथ रखकर कहां था.
" मेंरे साथ डिनर के लिये होटल चलोगी?
0000000000 ( क्रमशः)