Munjya in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Munjya

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Munjya

अमावस की काली रात थी और दूर पीपल के पेड़ की शाखाएं बिना हवा के ही धीरे धीरे हिल रही थीं। लोग जल्दी अपने दरवाजे बंद कर चुके थे, क्योंकि गांव में एक पुरानी बात फैली हुई थी कि इस पेड़ के नीचे रात में जाना मौत को बुलाने जैसा है।

मैं तब छोटा था और अपने दादा के साथ उस पुराने घर में रहता था। दादा अक्सर कहते थे कि रात में अगर पीपल के पास से हंसी की आवाज आए तो कभी जवाब मत देना। उस समय मुझे ये सब कहानियां लगती थीं, लेकिन उस रात सब कुछ बदल गया।

रात करीब आधी हो चुकी थी जब मेरी नींद अचानक एक हल्की सी हंसी से टूटी। वो हंसी किसी बच्चे की थी, लेकिन उसमें कुछ अजीब सा था, जैसे कोई खुशी नहीं बल्कि कोई छुपा हुआ दर्द हो। मैं चुपचाप उठा और खिड़की से बाहर झांका। पीपल के पेड़ के नीचे एक पतला सा काला साया खड़ा था। उसकी आंखें अंधेरे में भी चमक रही थीं।

मैं डर गया, लेकिन जिज्ञासा मुझे बाहर खींच लाई। धीरे धीरे मैं दरवाजा खोलकर आंगन में गया। जैसे ही मैं पेड़ के करीब पहुंचा, वो साया थोड़ा झुका और फिर वही हंसी गूंजने लगी। अब वो साफ सुनाई दे रही थी। एक बच्चे की खिलखिलाहट, लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो दिल को चीर दे।

मैंने हिम्मत करके पूछा, कौन है वहां?

कुछ पल के लिए सब शांत हो गया। फिर एक पतली आवाज आई, खेलोगे मेरे साथ?

मेरे पैर जैसे जमीन में धंस गए। मैं पीछे हटना चाहता था, लेकिन मेरा शरीर जैसे मेरा साथ नहीं दे रहा था। वो साया धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ा। अब मैं उसे साफ देख पा रहा था। उसका शरीर बहुत दुबला था, जैसे हड्डियों पर सिर्फ काली छाया चिपकी हो। बाल बिखरे हुए थे और उसकी आंखें पीली रोशनी में चमक रही थीं।

वो मेरे बिल्कुल सामने आकर रुक गया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, तुमने मेरी हंसी का जवाब दिया है, अब तुम मेरे दोस्त हो।

अचानक मुझे दादा की बात याद आई और मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैं भागने के लिए मुड़ा, लेकिन तभी उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बर्फ से भी ठंडा था।

उसने धीरे से मेरे कान के पास कहा, मैं मुंज्या हूं। मेरी शादी अधूरी रह गई थी। मैं हर उस बच्चे को अपने साथ ले जाता हूं जो मेरी हंसी का जवाब देता है।

मैं पूरी ताकत से खुद को छुड़ाकर भागा और घर के अंदर आकर दरवाजा बंद कर लिया। बाहर से फिर वही हंसी गूंजने लगी, लेकिन इस बार वो और तेज थी, जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो।

सुबह होने तक मैं कांपता रहा। जब दादा को सब बताया तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने कहा कि गांव में कई साल पहले एक लड़का था जिसकी शादी से पहले ही मौत हो गई थी। तब से वो पीपल के नीचे भटकता है।

उस दिन के बाद मैंने कभी रात में बाहर कदम नहीं रखा। लेकिन असली डर कुछ दिनों बाद शुरू हुआ।

एक रात मैं अपने कमरे में लेटा था जब वही हंसी फिर से सुनाई दी। इस बार वो बाहर से नहीं, मेरे कमरे के अंदर से आ रही थी।

मैंने धीरे से आंखें खोलीं और देखा कि वही काला साया मेरे बिस्तर के पास खड़ा है। उसकी आंखें पहले से ज्यादा चमक रही थीं।

उसने मुस्कुराते हुए कहा, तुम बच नहीं पाए। अब मैं तुम्हारे साथ रहता हूं।

मैं चीखना चाहता था, लेकिन आवाज नहीं निकली। उसने धीरे से मेरे सिर पर हाथ रखा और उसी पल सब कुछ अंधेरा हो गया।

सुबह जब मेरी आंख खुली तो सब सामान्य लग रहा था। लेकिन जब मैं उठकर आईने के सामने गया, तो मेरे पीछे कोई खड़ा था।

मैंने पलटकर देखा तो वहां कोई नहीं था।

फिर आईने में देखा तो वही मुंज्या मुस्कुरा रहा था।

और उस दिन के बाद से, जब भी रात होती है, मुझे अपनी ही हंसी सुनाई देती है, लेकिन वो मेरी नहीं होती।

कभी कभी मुझे लगता है कि अब मैं अकेला नहीं हूं, और शायद अब मैं ही वो हंसी हूं जो किसी और को अपने पास बुलाने का इंतजार कर रही है।