Aashiqui - 8 in Hindi Drama by vaishnavi Shukla books and stories PDF | आशिकी.....अब तुम ही हो। - 8

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आशिकी.....अब तुम ही हो। - 8

अध्याय: 8

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दृश्य: अगला दिन , सुबह , श्रद्धा का घर , लिविंग एरिया।

श्रद्धा,सोफे के पास खड़ी अपने बैग में कुछ सामान रख रही है और एक हाथ में पराठे को रोल करके खा भी रही है ।

श्रद्धा:(पराठे की एक बाइट लेते हुए ) ये पार्थ का बच्चा अभी तक तैयार नही हुआ। (वंदना से) मां, इस शैतान को जल्दी तैयार कीजिए, मुझे देर हो रही है ।

(वंदना किचन से दो टिफिन बॉक्स लाती है।)

वंदना:(पार्थ के बैग में टिफिन बॉक्स रखते हुए) हो गया है तैयार !, तू आराम से बैठ कर नाश्ता कर न... , क्यों हड़बड़ा रही है?

श्रद्धा: मां , प्रीति पहुंच भी चुकी होगी , और मैं यहां घर से भी नही निकली ।

(पार्थ वही स्कूल यूनिफॉर्म में छोटी डाइनिंग टेबल के पास कुर्सी पर बैठा जानबूझ कर धीरे धीरे दूध खत्म कर रहा है।)

श्रद्धा:(पार्थ को देखकर , वंदना से) देखिए न मां , ये जानबूझ कर धीरे धीरे दूध पी रहा है ताकि मैं लेट हो जाऊं।

पार्थ:(भोलेपन के साथ , वंदना से)नही, मम्मी मैं तो नॉर्मली पी रहा हूं।

श्रद्धा: देखो तो , कितना भोला बन रहा है। (पार्थ से) देख ,शैतान के बच्चे ! जल्दी कर वरना तुझे यही छोड़ कर चली जाऊंगी।

पार्थ:(मुंह पर हाथ रख कर) हो दीदू ! आपने पापा को शैतान कहा। पापा को बताऊंगा।

श्रद्धा: रुक ......तुझे तो मैं बताती हूं।

(यह के कर श्रद्धा पार्थ की और बढ़ती है....पार्थ .... मम्मी चिल्लाते हुए वंदना के पीछे छुप जाता है ।)

वंदना: (श्रद्धा को रोकते हुए..!) क्या कर रही है श्रद्धा...बच्चा है।

श्रद्धा:(वंदना से) आप ही देखिए न....परेशान कर रहा है  मुझे।

वंदना: छोटा भाई है तेरा ...जाने दे...!

(श्रद्धा एक नजर पार्थ को देखती है जो वंदना के पीछे छुपकर हंस हंस कर श्रद्धा को चिड़ा रहा था!)

(श्रद्धा फिर सोफे के पास आ जाती है।)

वंदना:(श्रद्धा से) ये सब छोड़ ....(टिफिन बॉक्स पकड़ाते हुए) ये भी रख ले ....तूने ठीक से नाश्ता नही किया है ....खा लेना.!

श्रद्धा: ठीक है मां.!

(और टिफिन बॉक्स बैग में रख लेती है ।)

(तभी उसका फोन रिंग करता है।)

श्रद्धा: (फोन को देखते हुए) लो प्रीति की कॉल भी आ गई। (फोन उठाती है) हेलो...!

प्रीति: निकली।

श्रद्धा: बस निकल  ही रही हु। तूने सारा सामान मंगा लिया न!

प्रीति: वही बताने के लिए फोन किया था...!!कुछ चीजे रह गई है ..तू आते वक्त लेते आना।

श्रद्धा: ठीक है,अब वही आकर मिलती हूं। सामान की लिस्ट सेंड कर देना ।

प्रीति: हम्म.... ठीक है! और सुन ... वंदना चाची ने जरूर टिफिन दिया होगा । यहां आते आते खत्म मत कर देना ।

श्रद्धा:(झुंझलाकर) प्रीति।

(प्रीति हंस कर झट से फोन काट देती है।)

श्रद्धा:(खुद से) इसे क्या  मैं इतनी बड़ी भूक्खड़ लगती हूं की रास्ते में खाना शुरू कर दूंगी।

(पार्थ से)...अब हो गया न तेरा।

पार्थ : (कुछ सोचता है, फिर अचानक से) नही , दीदू  कमरे में एक बुक रह गई ....अभी आया ।

(कह कर हंसते हुए कमरे की ओर बढ जाता है।)

श्रद्धा: देखा ना मां......!!!कितना बदमाश हो गया है....एक मौका नही छोड़ता . मुझे परेशान करने का।

(वंदना उन दोनो को देखकर मुस्कुरा देती है।)

(कुछ देर बाद ... श्रद्धा और पार्थ....निकल जाते है।)

वहीं दूसरी तरफ...ASM कंपनी । 

अनिरुद्ध कम्पनी से बाहर निकल रहा है और फोन पर बात कर रहा है।

(फोन में दूसरी तरफ से) आनंद: कहा रह गया तू....तेरा चॉपर रेडी है  भाई।

अनिरुद्ध: JUST COMING...! ऑफिस का एक इंपोर्टेंट काम था वही देखने आया था। 

आनंद:(हंसते हुए) लगता है ...! आज अनिरुद्ध महेश्वरी जी लेट होने वाले है।

अनिरुद्ध:(शार्प टोन में) Aniruddha Maheshwari is never late...! I am coming....!!

(और फोन कट कर देता है)

आनंद: अरे भाई सुन तो...!!जल्दी के चक्कर में किसी को ठोक मत देना..!!

(इधर अनिरुद्ध कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ ...सीट बेल्ट लगाता है और कार ड्राइव करते हुए आगे बढ़  जाता है।)

कुछ देर बाद.....!!

(ऑटो एक सड़क पार आकर रुकती है जहां से थोड़ी दूर पर सड़क के दूसरी साइड मार्केट थी।)

श्रद्धा;(ऑटो वाले को पैसे देते हुए ) ये लीजिए ...आपके पैसे।

(पैसे लेकर ऑटो वाला आगे बढ़ जाता है।)

श्रद्धा:(खुद से) पार्थ को स्कूल तो छोड़ दिया ...अब मार्केट से सामान ले लेती हूं।

(वह गाड़ियों को ध्यान में रखते हुए सड़क पार करने लगती है।)

(तभी उसकी नजर अचानक से सड़क के बीच पड़ती है।......एक छोटा सा कुत्ते का बच्चा घबराया हुआ खड़ा था ....ना आगे बढ़ पा रहा था और न पीछे जा पा रहा था।... सामने दूर से एक तेज रफ्तार कार उसी की तरफ बढ़ रही थी।)

श्रद्धा:(डरते हुए) हे कान्हा जी....!!(उसके मुंह से हल्की से आवाज निकली ।)

(श्रद्धा बिना सोचे समझे उसकी तरफ दौड़ लगाती है....कुछ ही पलों में)

( उसने उसके पास पहुंचकर उसने झुककर कुत्ते के बच्चे को अपने बाहों में उठा लिया पर खुद वहा से नही हट पाई...!)

(कार ड्राइवर ने अचानक से ब्रेक लगाई.... टायर्स सड़क पर घिसते हुए चीख उठे।)

(..... कार रुक चुकी थी  पर फिर उसके झटके से श्रद्धा का बैलेंस बिगड़ता है और वह सड़क पर गिर जाती है...अपनी बाहों में उस छोटे  से कुत्ते के बच्चे को जोर से लिपटाए हुए।)

श्रद्धा:aah...!!

(सड़क के छोटे कंकड़ उसके हाथों में चुभ जाते है...और उसे चोट लग जाती है...जहां से हल्का हल्का खून भी निकल रहा था।)

(पर श्रद्धा का ध्यान उस चोट पर न होकर कुत्ते के बच्चे पर था....)

यह सोचकर की उसने कुत्ते के बच्चे को बचा लिया है.... श्रद्धा के होठों पर एक छोटी सी मुस्कान आ जाती है।

ड्राइवर साइड का दरवाजा जोर से खुलता है...एक लड़का बाहर आता है...तेजी से, ऑलमोस्ट गुस्से में..!!

उसकी आंखों में इरिटेशन साफ दिखाई दे रही थी ...ये लड़का कोई और नहीं हमारे हीरो अनिरुद्ध महेश्वरी हैं।

अनिरुद्ध:(तेज आवाज में) तुम्हे दिखाई नही देता क्या..??(श्रद्धा की तरफ बढ़ते हुए) मरने का इतना ही शौक़ है तो.....

कहते कहते वो रुक जाता है।

(श्रद्धा जमीन पर बैठी थी अपनी बाहों में एक छोटा सा कुत्ते का बच्चा संभाले...उसके हाथ से हल्का सा खून निकल रहा था , पर उसकी चेहरे पर छोटी सी मुस्कान थी और संतुष्टि भी की एक जन उसने बचा ली थी।)

अनिरुद्ध की बात अधूरी रह जाती है वह एकटक श्रद्धा को देखता रहता है ....कुछ देर के लिए वह श्रद्धा की मुस्कान में खो सा जाता है। ....एक पल को उसका गुस्सा हिल सा गया था।

फिर अपने ख्याल झटकते हुए...!!

अनिरुद्ध:(थोड़ा धीरे ) तुम ...सिरियसली??(फिर हल्का रफ टोन में) एक कुत्ते के लिए तुमने अपनी जान खतरे में डाल दी.. स्टूपिड गर्ल!!

(श्रद्धा अपने लिए स्टूपिड गर्ल सुनकर अनिरुद्ध को अपनी बड़ी बड़ी आंखों से घूरती है।)

अनिरुद्ध:(ठंडे लहजे में) खड़ी हो सकती हो??

(श्रद्धा उसे हैरानी से देखती हैं की ...ये कैसा इंसान है.!)

श्रद्धा:(जमीन पर बैठे बैठे ही..!) आपको दिख नही रहा....

अनिरुद्ध:(बीच में ही टोकते हुए) दिख रहा है इसीलिए कह रहा हूं।

(श्रद्धा ने गुस्से में उसकी तरफ देखा)

श्रद्धा:(अनिरुद्ध से) मैं ठीक  हुं।

अनिरुद्ध:(बिना एक्सप्रेशन चेंज किए) तुम ठीक नही हो...और अगर हो भी तो तुम्हारी जजमेंट बिल्कुल भी ठीक नही है।

श्रद्धा:(भौंहे सिकोड़ते हुए) excuse me??

अनिरुद्ध:(हल्का सा झुककर) बीच रोड पर दौड़ना , स्मार्ट डिजिशन नही होता ...स्टूपिड गर्ल..!

श्रद्धा:(तुरंत जवाब देते हुए) यहां एक जान जा सकती थी।

अनिरुद्ध:(ठंडे टोन में)अब दो जा सकती थी।

थोड़ी देर साइलेंस...!

(श्रद्धा अनिरुद्ध को अपनी बड़ी बड़ी आंखों से बस घूरे जा रही थी।)

अनिरुद्ध:(ऑर्डर्निंग टोन में) उठो...! मेरे पास तुम जैसी स्टूपिड गर्ल के साथ आर्गुमेंट करने का टाइम नही है।

(श्रद्धा गुस्से में उठने की कोशिश करती है पर उसके पैर उसका साथ नही देते और वो लड़खड़ा  जाती  है..!)

(इससे पहले वो गिरती .... अनिरुद्ध उसे पकड़ लेता है...!!)

(एक सेकंड को उन दोनो की नजरे मिलती है।.....)

अनिरुद्ध फिर अपने ख्याल झटकता है ... श्रद्धा को तुरंत छोड़ देता..!!! (इस समय उसके एक्सप्रेशन ऐसे थे जैसे वो खुद से ही इरिटेट हो रहा..हो.!)

श्रद्धा: आप मुझे स्टूपिड कैसे बोल सकते है.....!!!मैने जो किया वो इंसानियत के नाते किया.....

यह सुनकर अनिरुद्ध श्रद्धा की तरफ देखता है...फिर हल्की हसीं हस्ते हुए.....

अनिरुद्ध: इंसानियत और स्टूपिडिटी में एक thin line होती है....!!

....उसकी बात सुनकर श्रद्धा की आंखे बड़ी हो जाती है......

आज बस इतना ही ....आगे  जानने के लिए पढ़ते रहे।

[आशिकी..... अब तुम ही हो।]

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 Ager meri story pasand aaye to Please...!! Meri story ko rating and review den....!!!😊🙏