वंशिका को गुप्त सूत्रों से यह पुख्ता जानकारी मिल चुकी थी कि भूपेंद्र अब बेरोज़गार हो चुका है। जब उसने यह बात शबनम और महिमा को बताई, तो महिमा के चेहरे पर एक कुटिल संतोष भरी मुस्कान छा गई।
महिमा ने अपनी मेज़ पर रखे पेपरवेट को घुमाते हुए कहा, "वंशिका, यह तुम्हारी पहली जीत है। जब आर्थिक नींव हिलती है, तो हवस का महल सबसे पहले गिरता है। लेकिन याद रखना, अब जो समय आएगा, वह तुम्हारे लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा। अब तक तुम घर के भीतर लड़ रही थी, अब तुम्हें समाज से लड़ना होगा।"
महिमा ने वंशिका की आँखों में देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, "समाज एक अजीब आइना है, वंशिका। यहाँ व्यक्ति चाहे कितना भी पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, वह हमेशा उंगली चरित्रवान पर ही उठाता है, निर्लज्ज पर नहीं। लोग भूपेंद्र की अय्याशी पर पर्दा डाल देंगे, लेकिन तुम्हारी आज़ादी पर कीचड़ उछालेंगे। वे कहेंगे कि तुम्हारी नौकरी और तुम्हारे जिम ने तुम्हारा घर उजाड़ दिया। वे तुम्हारे चरित्र पर लांछन लगाएंगे क्योंकि निर्लज्ज को तो शर्म आती नहीं, और मर्यादा में रहने वाले को ही लोग सुनाते हैं। तुम सुनना, लेकिन एक हद तक। जिस दिन पानी सिर से ऊपर जाए, उस दिन जवाब कड़ा देना। लोगों की कमजोरी पकड़ना सीखो। अगर कोई तुम पर लांछन लगाए, तो उसकी खुद की गलतियों को ढाल बनाकर उसे ऐसा जवाब दो कि उसकी बोलती बंद हो जाए।"
शबनम ने वंशिका का हाथ थामते हुए बड़े प्यार से समझाया, "बहन, महिमा सही कह रही है। आने वाला समय मुश्किल होगा। तुझे अकेली औरत देखकर लोग तुझे शिकार समझेंगे। कोई सहानुभूति दिखाएगा तो उसके पीछे भी उसकी गंदी नीयत होगी। तुझे अपनी ही सहेलियों और रिश्तेदारों की महफिलों में कड़वी बातें सुननी पड़ेंगी। लेकिन याद रखना, अपनी कमाई को अपनी ताकत बनाना। जब तेरे पास पैसा होगा और तू अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देगी, तो यही लोग कल तेरे सामने हाथ जोड़कर खड़े होंगे। परिस्थितियों से भागना मत, उन्हें अपनी तरक्की से कुचल देना।"
उधर, भूपेंद्र के लिए हकीकत का सामना करना अब नामुमकिन होता जा रहा था। बैंक बैलेंस तेज़ी से घट रहा था और काया की फरमाइशें बढ़ती जा रही थीं। वह एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंटरव्यू देने पहुँचा। उसे पूरा भरोसा था कि उसका अनुभव उसे नौकरी दिला देगा।
इंटरव्यू पैनल में बैठे वरिष्ठ अधिकारी ने उसकी फाइल बंद करते हुए बड़े ठंडे स्वर में पूछा, "मिस्टर भूपेंद्र, आपकी पिछली नौकरी का रिकॉर्ड कहता है कि आपकी लापरवाही की वजह से उन्हें एक बड़ा प्रोजेक्ट खोना पड़ा और लाखों का नुकसान हुआ। साथ ही, हमारे पास जानकारी है कि आपके खिलाफ आपकी पत्नी ने घरेलू हिंसा और अनैतिक संबंधों का कानूनी नोटिस भेजा है।"
भूपेंद्र के गले में थूक सूख गया। "सर... वह सब पारिवारिक मामला है और..."
"हमारी कंपनी के लिए एथिक्स और क्रेडिबिलिटी सबसे ऊपर है," अधिकारी ने बीच में ही टोक दिया। "जिस व्यक्ति की छवि इतनी धूमिल हो और जिसके पीछे कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगे हों, हम उसे अपनी कंपनी की जिम्मेदारी नहीं सौंप सकते। आई एम सॉरी।"
भूपेंद्र बाहर निकला, तो उसका सिर चकरा रहा था। उसके कार्यालय के लोगों ने गुपचुप तरीके से मार्केट में उसकी साख मिट्टी में मिला दी थी। वह अब सिर्फ एक बेरोज़गार पति नहीं था, बल्कि कॉर्पोरेट जगत के लिए एक ब्लैकलिस्टेड नाम बन चुका था।
ठीक उसी समय, शहर के दूसरे हिस्से में मंज़र बिल्कुल अलग था। वंशिका ने अपने जिम के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगवाया था—"वंशिका'स फिटनेस हब: रीबर्थ"।
उस शाम उसने शबनम, महिमा और अपनी कुछ करीबी सहेलियों के साथ अपनी नई आज़ादी का एक छोटा सा जश्न मनाया। यह जश्न किसी की हार का नहीं, बल्कि खुद की जीत का था। वह अब उस घुटन भरे रिश्ते की बेड़ियों से आज़ाद थी।
जिम में महिलाओं की भीड़ अब दुगनी हो गई थी। वंशिका के संघर्ष की कहानी दबी ज़ुबान में ही सही, पर सबके पास पहुँच चुकी थी। महिलाएं उसे एक मिसाल के तौर पर देखने लगी थीं। उसने खुद को अपने काम में इतना झोंक दिया कि जिम की आमदनी बढ़ने लगी। उसकी त्वचा पर अब तनाव की जगह मेहनत की चमक थी।
वंशिका अब उन तानों की परवाह नहीं करती थी जो उसे सुबह-शाम पड़ोसियों से मिलते थे। उसने तय कर लिया था कि वह अपनी सफलता से उन सबका मुँह बंद करेगी। वह अब एक ऐसी औरत थी जिसे अपनी कीमत पता चल चुकी थी।
रात को जब वह घर लौटती (अपने नए किराए के अपार्टमेंट में), तो उसे बच्चों की याद तो आती, पर उसे संतोष था कि वे उस ज़हरीले माहौल से दूर सुरक्षित हैं। उसने अपनी डायरी में लिखा—"तबाही ज़रूरी थी, ताकि निर्माण नया हो सके।"
वंशिका अपने नए अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी शहर की रोशनी को देख रही थी। उसके मन में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति काँच की तरह नाजुक भी थी। उसके मायके वालों को जब तलाक की खबर मिली, तो वे पूरी तरह समर्थन में नहीं थे। वे अक्सर फोन पर उसे सुना देते थे कि "भरी-पूरी गृहस्थी बर्बाद करने में पहला हाथ तुम्हारा ही है।"
पहले ऐसी बातें सुनकर वंशिका घंटों रोती थी, अपनों से माफी माँगती थी। पर अब वह ऐसा नहीं करती थी। उसने सच को स्वीकार करना सीख लिया था। वह मन ही मन सोचती, "हाँ, गलती मैंने की। उस घर की सुख-शांति की पहली ईंट शायद मैंने ही तोड़ी थी जब मैंने खुद के वजूद को पहचानना शुरू किया। लेकिन उस घर की नींव को तो भूपेंद्र ने खोखला किया। मेरी छत को भूपेंद्र ने ढहाया, दीवारों को सासू माँ मनोरमा ने गिराया और उस घर को पूरी तरह खंडहर काया ने बनाया। तो फिर सारा दोष सिर्फ मेरा कैसे?"
वंशिका के माता-पिता को उसकी सुरक्षा और चरित्र की चिंता सता रही थी। उन्हें डर था कि अकेले रहकर कहीं वह गलत रास्ते पर न चल दे। उन्होंने उसे वापस घर आने का दबाव बनाया, पर वंशिका ने दो टूक मना कर दिया। उसने स्वाभिमान से कहा, "पापा, मैं इतनी चरित्रहीन नहीं हूँ कि राह भटक जाऊँ। अगर मेरे बच्चे न होते, तो शायद मैं फिर से घर बसाने का सोचती, पर अब मेरी दुनिया मेरे बच्चे हैं। उनके सहारे मैं पूरी जिंदगी सम्मान से बिता सकती हूँ। मुझे अब किसी बैसाखी की जरूरत नहीं।"
अगली शाम, जब वंशिका ने शबनम और महिमा से अपने दिल की ये बातें साझा कीं, तो शबनम की आँखों में नमी उतर आई। उसने वंशिका का हाथ थामकर कहा, "बहन, ये सिर्फ तेरी कहानी नहीं है। मेरे अम्मी-अब्बू ने मुश्किल वक्त में मेरा साथ दिया, लेकिन आज भी वे बात-बात पर जताते हैं कि मुझ पर उनका कितना बड़ा एहसान है। वे भूल जाते हैं कि मैं अपनी मेहनत से कमा रही हूँ और बच्चों को पाल रही हूँ। उनका वह बार-बार एहसान याद दिलाना कलेजे में सुई की तरह चुभता है।"
महिमा ने अपनी डायरी बंद करते हुए एक ठंडी आह भरी। "यही तो विडंबना है," उसने कहा। "बाहर वाला कहे तो इंसान सह ले, पर जन्म देने वाले जब घाव दें तो वह बहुत अखरता है। माता-पिता चाहे समानता के कितने ही गीत गा लें, पर बेटे और बेटी में भेदभाव उनके भीतर गहरे तक धँसा होता है। तुम खुद देख लो वंशिका, जमाई की करतूतें जगजाहिर हैं, फिर भी वे भूपेंद्र को गलत कहने के बजाय तुम्हारी गलतियाँ गिना रहे हैं।"
महिमा ने फिर जोश के साथ कहा, "खैर, ये सब छोड़ो। तुम्हारे लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट क्या है पता है? तुम सेल्फ डिपेंड हो। तुम्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। हर लड़की का आत्मनिर्भर होना आज के दौर में सबसे बड़ी सुरक्षा है।"
शबनम ने बीच में टोकते हुए कहा, "सिर्फ आत्मनिर्भर होना ही काफी नहीं है बहन महिमा।" महिमा ने हैरानी से उसे देखा।
शबनम ने अपनी भाभी का उदाहरण देते हुए आगे कहा, "मेरी भाभी को देख लो। पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन कमाती नहीं हैं, सेल्फ डिपेंड नहीं हैं। फिर भी पूरे घर को अपने इशारों पर नचाती हैं। हर लड़की को शायद बाहर जाकर कमाने की जरूरत नहीं है, लेकिन हाँ... हर लड़की को इतना पढ़ा-लिखा और अंदर से इतना मजबूत जरूर होना चाहिए कि अगर भविष्य में कभी बुरा वक्त आए, तो वह बेझिझक अपने पैरों पर खड़ी हो सके। उसे किसी के सहारे या रहम की जरूरत न पड़े। मजबूती बैंक बैलेंस से ज़्यादा दिमाग और हौसले में होनी चाहिए।"
महिमा ने मुस्कुराकर शबनम की बात का समर्थन किया। "बिल्कुल सही कहा तुमने। शिक्षा और साहस ही असली हथियार हैं।"
वंशिका ने उन दोनों की बातें सुनीं और उसे अहसास हुआ कि वह जिस रास्ते पर चल पड़ी है, वह कठिन जरूर है, लेकिन यही रास्ता उसे उस खंडहर से दूर एक नई और गौरवमयी दुनिया में ले जाएगा। उसे अब किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं थी—न समाज के, न माता-पिता के।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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