सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस जमी थी, लेकिन भीतर का माहौल गर्माहट और काम की हड़बड़ाहट से भरा था।
काया, जो इस घर की धड़कन थी, रसोई के स्लैब पर बिजली की तेजी से हाथ चला रही थी। वह पैंतीस वर्ष की थी, लेकिन उसकी फुर्ती किसी किशोर से कम नहीं थी। सांवला सलोना रंग, चेहरे पर एक स्थायी गंभीरता और आँखों में गजब की सतर्कता। उसने अपने घने बालों का एक जूड़ा बना रखा था ताकि काम में बाधा न आए। उसके हाथों की चूड़ियाँ आपस में टकराकर एक लयबद्ध संगीत पैदा कर रही थीं। कभी वह गोभी काटती, तो अगले ही पल परांठे बेलने लगती।
तभी बेडरूम से पहली आवाज़ गूँजी— "काया... काया... मेरा गर्म पानी!"
यह भूपेंद्र था। काया ने बिना उत्तर दिए, बगल में रखे थर्मल जग से पानी गिलास में उछाला और एक हाथ में तौलिया लिए बेडरूम की ओर लपकी। अभी वह पानी देकर मुड़ी ही थी कि दूसरी फरमाइश आई, "काया, कॉफी! आज ऑफिस में मीटिंग है, थोड़ी कड़क बनाना।"
काया ने मुस्कुराते हुए गर्दन हिला दी। उसे पता था कि भूपेंद्र के मीटिंग वाले दिन की शुरुआत बिना कड़क कॉफी के नहीं होती। वह वापस रसोई में आई ही थी कि बच्चों के कमरों से शोर सुनाई देने लगा।
" मेरा पीटी शूज कहाँ है?"
" टिफिन में क्या रखोगी? आज तो पास्ता प्रॉमिस किया था!"
काया ने वहीं से ऊँची आवाज़ में जवाब दिया, "जूते रैक के नीचे वाले दराज में हैं विहान! और अवनी, पास्ता बन चुका है, बस पैक करना बाकी है। तुम लोग जल्दी तैयार हो जाओ, वेन साढ़े सात बजे तक आ जाएगी।"
काया के हाथ एक मशीन की तरह चल रहे थे। वह एक तरफ बच्चों की डायरी चेक कर रही थी कि कहीं किसी होमवर्क पर साइन छूटा तो नहीं, और दूसरी तरफ भूपेंद्र की शर्ट पर आयरन कर रही थी। उसकी आँखें घड़ी की सुइयों और घर की ज़रूरतों के बीच तालमेल बिठाने में माहिर थीं।
साढ़े सात बजते ही बच्चों के स्कूल वेन का हॉर्न गूँजा। काया ने झटपट दोनों बच्चों के बैग टाँगे, उनकी पानी की बोतलें सेट कीं और उन्हें नीचे तक छोड़ने गई। वेन में उन्हें बैठाकर, हाथ हिलाते हुए उसने सुनिश्चित किया कि वे सुरक्षित चले गए हैं। वापस घर में घुसते ही उसका सामना भूपेंद्र से हुआ, जो अपनी घड़ी ढूँढ रहा था।
"काया, मेरी घड़ी नहीं मिल रही... और टिफिन?"
काया ने बिना बोले ड्रेसिंग टेबल के पीछे छिपी घड़ी निकाली और उसे भूपेंद्र के हाथ में थमाते हुए रसोई से टिफिन ले आई। "यह रहा आपका लंच बॉक्स। और सुनिए, पूरा फिनिश करके आना। एक निवाला भी बचना नहीं चाहिए, वरना कल से परांठे बंद।" उसने बनावटी गुस्से के साथ कहा।
भूपेंद्र, जो एक पैंतीस वर्षीय सौम्य व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति था, एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह मुस्कुराया और सिर हिलाया। "जो हुक्म मेरे आका!"
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। घर की यह हंसी उस थकान को सोख लेती थी जो दिन भर के काम के बाद आने वाली थी। तभी एक खनकती हुई, चिरपरिचित आवाज़ ने इस हंसी में दखल दिया।
"काया! लाओ भाई, मेरा स्प्राउट्स भी दे दो। रात को ठीक से गलाया था न तुमने? जिम के लिए देर हो रही है।"
यह वंशिका थी। तीस साल की, बेहद फिट और अपने लुक्स को लेकर जागरूक। वह ट्रैक सूट पहने, हाथ में सिपर लिए रसोई के पास खड़ी थी। काया ने फुर्ती से फ्रिज से स्प्राउट्स का बाउल निकाला, उसमें बारीक कटा खीरा, टमाटर और नींबू का रस मिलाया और एक सजा हुआ सलाद वंशिका को पकड़ा दिया।
भूपेंद्र ने जूता पहनते हुए वंशिका की तरफ देखा और मज़ाक में कहा, "काया, ये सब भी उतना ही चटपटा है क्या, जितना बाजार का चाट? मुझे तो देख कर ही भूख लग जाती है।"
काया ने उसे टोकते हुए कहा, "ऑफिस जा रहे हैं या चाट की दुकान पर? स्प्राउट्स खाने के फायदे पता हैं आपको? इससे न केवल आपका मेटाबॉलिज्म सुधरेगा, बल्कि वह जो पेट थोड़ा बाहर आ रहा है न, वह भी अंदर चला जाएगा।"
भूपेंद्र ने हार मानकर दोनों हाथ जोड़ लिए। "बाप रे! लेक्चर शुरू होने से पहले ही मैं निकल जाता हूँ।" वह हँसते हुए ऑफिस के लिए निकल गया।
अब घर में सिर्फ काया और वंशिका थे। वंशिका ने अपना सलाद खत्म किया और काया को खाली बाउल थमाते हुए बोली, "थैंक्स काया, तुम न होती तो मेरा तो डाइट प्लान ही चौपट हो जाता।" वंशिका जिम की ओर बढ़ गई
और काया एक बार फिर अकेले उस बड़े साम्राज्य की रानी बन गई—यानी उसकी रसोई।
भूपेंद्र का दफ्तर शहर के एक शांत इलाके में स्थित एक छोटा सा प्राइवेट ऑफिस था। यहाँ की नौकरी कोई बहुत बड़ी नहीं थी, तीस-चालीस हजार का वेतन था, लेकिन माहौल बहुत पारिवारिक था।
भूपेंद्र जब अपनी मेज पर बैठा, तो उसके चेहरे पर एक सुकून था। वह एक आदर्शवादी कर्मचारी था। उसकी मेज पर फाइलें करीने से सजी रहती थीं। उसके सहकर्मी उसे आदर्श बाबू कहकर चिढ़ाते थे क्योंकि वह कभी रिश्वत या काम में लापरवाही बर्दाश्त नहीं करता था।
दफ्तर की दीवारों पर कुछ प्रेरक विचार लिखे हुए थे। भूपेंद्र का काम डेटा एंट्री और क्लाइंट्स के रिकॉर्ड्स संभालना था। काम के बीच में जब भी उसे थकान महसूस होती, वह अपनी जेब से काया द्वारा रखे गए छोटे से बादाम और अखरोट के डिब्बे को निकालता। उसे याद आता कि काया ने सुबह कितनी मेहनत की थी।
उसके ऑफिस में मैनेजर खन्ना साहब अक्सर कहते थे, "भूपेंद्र, इस जमाने में तुम्हारी जैसी ईमानदारी ढूंढना मुश्किल है। तुम तीस हजार में भी ऐसे काम करते हो जैसे ये तुम्हारी अपनी कंपनी हो।"
भूपेंद्र बस मुस्कुरा देता। उसके लिए ईमानदारी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि काया के विश्वास का सम्मान था। वह जानता था कि काया घर को जिस अनुशासन से चलाती है, उसी अनुशासन की ज़रूरत उसे अपने ऑफिस में है।
दोपहर के एक बजे जब उसने टिफिन खोला, तो सब्जी की महक पूरे केबिन में फैल गई। सहकर्मी उसकी मेज के आसपास जमा होने लगे।
"यार भूपेंद्र, तुम्हारे घर के बने खाने में तो जादू है! सादा खाना भी पकवान जैसा लगता है।"
भूपेंद्र ने पहला निवाला लेते हुए सोचा—'क्या यह सिर्फ खाना है? या काया का वह प्यार जो वह सुबह पांच बजे से रसोई में झोंक देती है?'
इधर ऑफिस में फाइलें पलट रही थीं, और उधर घर में काया अब सिंक में जमा बर्तनों का ढेर साफ कर रही थी। घर में अब सन्नाटा था, लेकिन काया का दिमाग अब भी चल रहा था—रात के खाने में क्या बनेगा? बच्चों के प्रोजेक्ट का सामान कब लाना है? और वंशिका के जिम से आने के बाद उसका प्रोटीन शेक...
काया के हाथ थकते नहीं थे, या शायद उसे थकने की इजाजत ही नहीं थी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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