Double Game - 35 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 35

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 35

अगली सुबह जब सूरज की रोशनी उस घर की खिड़कियों से टकराई, तो वंशिका के लिए वह घर अब घर नहीं, बल्कि एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। महिमा और शबनम के समझाने के बाद, वंशिका ने अपने आँसू पोंछ लिए थे। उसके चेहरे पर अब वह बेचारगी नहीं थी, बल्कि एक बर्फीली खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी। वह एक टैक्सी लेकर वापस उस घर पहुँची। जैसे ही उसने घर के भीतर कदम रखा, उसे अपनी ही मेहनत से सजाई हुई चीज़ें अब पराई लगने लगीं।

हॉल में भूपेंद्र और काया पहले से ही मौजूद थे। काया अब पूरी तरह मालकिन के अंदाज़ में सोफे पर पसरी हुई थी, उसके गले में वही मंगलसूत्र चमक रहा था जिसे पहनकर वह कल रात सोई थी। वंशिका को देखते ही काया के चेहरे पर एक तिरस्कार भरी मुस्कान आ गई।
"अरे! आप फिर वापस आ गईं? सामान लेने या फिर से साहब के पैरों में गिरने?" काया ने तंज कसा।

भूपेंद्र, जो अब भी बेरोजगारी के तनाव को छिपाए हुए था, ने वंशिका को देखते ही काया को अपनी बाहों में भर लिया। वह दिखाना चाहता था कि वंशिका के जाने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा है। वंशिका के ठीक सामने, उसने जानबूझकर काया के माथे और गालों को चूमना शुरू कर दिया। वह अपनी निर्लज्जता का प्रदर्शन कर रहा था ताकि वंशिका टूट जाए।

वंशिका ने उन दोनों की ओर एक नज़र डाली—नफरत से भरी नहीं, बल्कि दया से भरी। उसने बिना कुछ कहे अपनी अलमारी खोली और अपना सारा ज़रूरी सामान समेटना शुरू किया। उसने लॉकर की चाबियाँ उठाईं और अपने गहने, जो उसकी अपनी कमाई और उसके मायके से मिले थे, उन्हें एक बैग में सुरक्षित कर लिया।
अपना सामान समेटने के बाद, वंशिका हॉल में वापस आई। भूपेंद्र अभी भी काया के साथ छेड़खानी कर रहा था और काया ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी ताकि आवाज़ वंशिका के कानों तक पहुँचे।
वंशिका उनके पास गई और अपने बैग से एक लिफाफा निकाला। उसने उसे मेज पर पटका।

"ये क्या है?" भूपेंद्र ने अपनी पकड़ ढीली करते हुए पूछा।

"ये तुम्हारी बर्बादी का पहला दस्तावेज़ है," वंशिका ने सपाट लहजे में कहा। "तलाक का नोटिस। और साथ ही, भरण-पोषण और घरेलू हिंसा का केस। इसमें तुम्हारी दूसरी शादी के सबूत और उन फेक आईडीज़ की डिटेल भी है जिनसे तुम अपनी वासना शांत करते थे।"

तलाक का नाम सुनते ही भूपेंद्र के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे लगा था कि वंशिका हार मानकर चुपचाप चली जाएगी, लेकिन यहाँ तो बाज़ी पलट रही थी। वकील के नोटिस पर जब उसकी नज़र पड़ी, तो उसे लगा जैसे कोई अदृश्य हाथ उसका गला घोंट रहा हो।

"तुम... तुम ये नहीं कर सकती! ये घर मेरा है!" भूपेंद्र चिल्लाया, पर उसके स्वर में वह आत्मविश्वास नहीं था।

"घर तुम्हारा है, पर इसमें मेरा भी आधा हिस्सा है। और याद रखना भूपेंद्र, अब कोर्ट तय करेगा कि तुम सड़क पर कब आओगे। वैसे भी, बिना नौकरी के तुम वकील की फीस कैसे भरोगे, ये मैं देखना चाहूँगी," वंशिका ने उसकी सबसे दुखती रग पर हाथ रख दिया।

भूपेंद्र को एक पल के लिए लगा कि वह हार रहा है। उसकी नौकरी जा चुकी थी, समाज में बदनामी होने वाली थी और अब कानूनी लड़ाई का खर्च। लेकिन काया ने उसका हाथ दबाया, जैसे उसे उकसा रही हो।

भूपेंद्र का पुरुषोचित अहंकार फिर से जाग उठा। उसने नोटिस को एक तरफ फेंका और चिल्लाकर बोला, "जाओ! जो करना है कर लो। मुझे किसी का डर नहीं है। मैं और काया एक साथ हैं, यही मेरी ताकत है। तुम जैसी औरत को तो मैंने कब का अपने दिल से निकाल दिया है।"

काया ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, "हाँ दीदी! अब आप बाहर का रास्ता देखिये। अब यहाँ साहब की मर्जी चलेगी, आपकी नहीं।"

वंशिका ने एक गहरी सांस ली। उसने आखिरी बार उस घर को देखा, अपने बच्चों की याद को मन में समेटा और बिना पीछे मुड़े घर की दहलीज पार कर ली। उसे पता था कि घर के भीतर जो महारानी बनकर बैठी है, उसे जल्द ही पता चलने वाला है कि उसने एक खोखले आदमी से शादी की है।
जैसे ही वंशिका का कदम बाहर पड़ा, उसे एक अजीब सी आज़ादी महसूस हुई। अब युद्ध शुरू हो चुका था।



वंशिका के जाते ही कमरे में पसरा सन्नाटा अचानक बोझिल हो गया। काया, जो अब तक जीत की खुमारी में झूम रही थी, उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। वंशिका के जाते-जाते कहे गए शब्द उसके कानों में किसी अलार्म की तरह बजने लगे—"बिना नौकरी के तुम वकील की फीस कैसे भरोगे, ये मैं देखना चाहूँगी।"
काया ने अपनी पैनी निगाहें भूपेंद्र पर टिका दीं। उसने गौर किया कि भूपेंद्र का चेहरा पीला पड़ चुका था और उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें उभर आई थीं। भूपेंद्र ने नोटिस के कागजों को मुट्ठी में इतनी ज़ोर से भींच रखा था कि उसके पोरों का रंग सफेद पड़ गया था।

"साहब..." काया ने धीरे से पूछा, उसकी आवाज़ में अब वह मिठास नहीं, बल्कि एक संदेह था। "ये दीदी क्या कह कर गई हैं? नौकरी? आपकी नौकरी को क्या हुआ?"

भूपेंद्र सकपका गया। उसने ज़बरदस्ती एक खोखली हँसी हँसने की कोशिश की और पसीना पोंछते हुए बोला, "अरे... तुम उसकी बातों को गंभीरता से क्यों ले रही हो काया? वह तो पागल हो गई है। हार बर्दाश्त नहीं हो रही उसे, तो कुछ भी बक कर चली गई। मेरी नौकरी को भला क्या होगा?"

काया चुप रही, लेकिन उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। उसने पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को याद करना शुरू किया। भूपेंद्र का दिन भर घर पर टिके रहना, ऑफिस के नाम पर बस थोड़ी देर के लिए बाहर जाना और फिर वापस आ जाना, और वह प्रमोशन वाली बात जिस पर अब उसे शक होने लगा था। ऑफिस का समय तो देर शाम तक का होता था, फिर साहब दोपहर में ही घर क्यों आ जाते थे? उसने भूपेंद्र के पास जाकर उसकी आँखों में झाँका । "साहब, आप मुझसे झूठ तो नहीं बोल रहे? अगर नौकरी सलामत है, तो आप सुबह-सुबह ही दफ्तर क्यों नहीं चले जाते? कल भी आप पूरे दिन घर पर थे।"

भूपेंद्र अब घिर चुका था। उसने तुरंत काया को अपनी बाहों में खींच लिया और उसके गले में अपना चेहरा छिपा लिया ताकि वह उसकी आँखों का झूठ न पढ़ सके। "अरे मेरी जान, मैंने बताया तो था कि नया प्रोजेक्ट है, जिसे मैं घर से संभाल रहा हूँ। अब तुम मुझ पर शक करोगी? क्या तुम्हें अपनी इस शादी पर भरोसा नहीं?" उसने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों का जाल फैलाना शुरू किया। "मैं बस कुछ दिन तुम्हारे साथ ज़्यादा वक्त बिताना चाहता हूँ, इसीलिए छुट्टियाँ ली हैं। तुम बस अपनी इस खूबसूरती का ख्याल रखो, बाकी सब मैं संभाल लूँगी।"

काया उसकी बातों में थोड़ी शांत तो हुई, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट नहीं। भूपेंद्र उसे बाहों में भरे हुए था, उसे सहला रहा था, लेकिन उसका पूरा ध्यान मेज पर रखे उन तलाक के कागजों पर था।

भूपेंद्र के भीतर एक अजीब सा अहंकार उबल रहा था। उसे इस बात का दुख नहीं था कि उसकी गृहस्थी उजड़ गई है, बल्कि उसे इस बात की जलन थी कि वंशिका ने उसे तलाक का नोटिस देने की हिम्मत कैसे की?
'तलाक तो मुझे देना था उसे! उसे घर से निकालने का हक मेरा था। वह एक मामूली औरत होकर मुझे कानूनी धमकी दे रही है?' उसका पुरुषोचित अहंकार उसे अंदर ही अंदर काट रहा था। वह सोच रहा था कि वंशिका ने उसे नीचा दिखाया है। उसे लगा कि वंशिका ने उसकी मर्दानगी और उसके वजूद को चुनौती दी है।
भूपेंद्र ने मन ही मन तय किया कि उसे जल्द से जल्द दूसरी नौकरी तलाशनी होगी। उसे पैसे चाहिए थे—काया की फरमाइशें पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि वंशिका को कोर्ट में धूल चटाने के लिए। वह अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं था। उसे लग रहा था कि वह एक साथ दो मोर्चों पर लड़ रहा है—एक तरफ काया का बढ़ता संदेह और दूसरी तरफ वंशिका का कानूनी प्रहार।
उसने काया को और कसकर भींच लिया, जैसे वह अपनी सारी नाकामियों को उस देह के सुख में दबा देना चाहता हो। लेकिन बेडरूम की उस खिड़की से आती ठंडी हवा उसे बार-बार याद दिला रही थी कि अब उसकी महारानी जा चुकी है और उसके सामने खड़ी हकीकत बहुत कड़वी है।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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