Medusa in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Medusa

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Medusa

उस रात जब पहली बार उस पुराने स्कूल के दरवाजे अपने आप खुले, तो हवा में कुछ ऐसा था जो सांस को भारी कर दे। जैसे कोई अदृश्य नजरें अंधेरे में छिपकर हर आने वाले को देख रही हों।

गांव के लोग सालों से उस स्कूल के पास भी नहीं जाते थे, पर मैं वहां पहुंच गया था, क्योंकि मुझे यकीन नहीं था कि कोई इमारत सिर्फ डर की वजह से इतनी बदनाम हो सकती है।

वह स्कूल बहुत पुराना था। दीवारों पर जमी काई, टूटी खिड़कियां और धूल से भरी कक्षाएं। जैसे समय यहां आकर रुक गया हो। मैंने जैसे ही अंदर कदम रखा, फर्श पर जमी धूल में मेरे पैरों के निशान साफ दिखने लगे।

हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे पीछे भी चल रहा हो। मैंने पीछे मुड़कर देखा, पर वहां कोई नहीं था। सिर्फ सन्नाटा। पहली कक्षा में घुसते ही एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई। ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखा था, जो धुंधला होकर भी साफ दिख रहा था। “मत देखो उसकी आंखों में।” मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

मैंने सोचा यह किसी बच्चे की शरारत होगी, लेकिन इस सुनसान जगह में कौन लिखेगा यह सब। जैसे ही मैं आगे बढ़ा, दीवारों पर अजीब आकृतियां दिखने लगीं। पहले तो लगा ये पुरानी पेंटिंग्स हैं, पर ध्यान से देखने पर समझ आया कि ये इंसानों की आकृतियां थीं।

जैसे किसी ने उन्हें पत्थर में बदलकर दीवारों में जड़ दिया हो। उनके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था, आंखें खुली हुई, जैसे आखिरी पल में कुछ भयानक देख लिया हो। मेरे कदम अपने आप दूसरी मंजिल की तरफ बढ़ने लगे। वहां एक बड़ा हॉल था, जहां कभी सभा होती होगी। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, एक तेज बदबू ने मुझे घेर लिया।

सड़े हुए मांस और नमी की गंध। कमरे के बीचों बीच एक टूटी हुई मूर्ति खड़ी थी। उसका चेहरा अधूरा था, पर उसके सिर के आसपास सांप जैसे उकेरे गए थे। तभी मुझे पीछे से फुसफुसाहट सुनाई दी। बहुत धीमी, जैसे कोई नाम लेकर बुला रहा हो। “आओ…” मैं मुड़ा, पर वहां कोई नहीं था। आवाज फिर आई, इस बार और करीब। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

मैंने हिम्मत करके उस मूर्ति के पास कदम बढ़ाया। जैसे ही मैं पास पहुंचा, मुझे लगा कि उसके पत्थर के चेहरे की आंखें मेरी तरफ घूम गई हैं। मेरा गला सूख गया। तभी जमीन पर पड़ी धूल में कुछ खिंचने की आवाज आई। जैसे कोई रेंग रहा हो।

अचानक दीवारों से सरकते हुए काले साए बाहर आने लगे। और तभी मैंने देखा। वो मूर्ति नहीं थी। वो जिंदा थी।

उसका चेहरा धीरे धीरे साफ होने लगा। आंखें पूरी तरह सफेद, और सिर पर लिपटे सांप हिलने लगे। उनकी जीभ बाहर निकल रही थी, और वे फुफकार रहे थे। वो मेरे सामने खड़ी थी। उसकी नजर सीधे मेरी आंखों में घुस रही थी।

मुझे अचानक ब्लैकबोर्ड पर लिखा वाक्य याद आया। “मत देखो उसकी आंखों में।” मैंने नजरें झुका लीं, पर तब तक देर हो चुकी थी। मेरे पैरों में जकड़न शुरू हो गई। जैसे शरीर पत्थर बनता जा रहा हो। मैंने चीखने की कोशिश की, पर आवाज बाहर नहीं आई।

उसने मेरे करीब आकर धीमी आवाज में कहा, “ये स्कूल मेरा है। जो भी यहां आता है, हमेशा के लिए यहीं रह जाता है।” उसकी आवाज में एक अजीब सुकून था, जैसे वो इस श्राप को जीने की आदी हो चुकी हो।

मुझे अचानक एहसास हुआ कि ये कोई साधारण भूत नहीं था। ये वही थी जिसके बारे में कहानियां सुनी थीं। एक श्रापित आत्मा, जो इंसानों को पत्थर बना देती है। लेकिन सवाल यह था कि वो इस स्कूल में क्यों थी।

तभी मेरी नजर दीवारों पर जमे पत्थर के चेहरों पर गई। उनमें से एक चेहरा जाना पहचाना था। वो गांव का बुजुर्ग मास्टर था, जो सालों पहले गायब हो गया था। फिर एक और चेहरा दिखा। वो मेरे पिता का था।

मेरा दिल बैठ गया। इसका मतलब… वो भी यहां आए थे। और कभी लौटकर नहीं गए।

मेरे शरीर का आधा हिस्सा अब पत्थर बन चुका था। मैं हिल नहीं सकता था। बस देख सकता था। तभी वो औरत, या कहूं वो राक्षसी, धीरे से मुस्कुराई। “तुम्हारे पिता भी ऐसे ही आए थे। सच जानने। और अब तुम भी यहीं रहोगे।”

तभी एक और चौंकाने वाली बात हुई। उसके चेहरे की परतें जैसे हटने लगीं। अंदर से एक बूढ़ी औरत का चेहरा दिखाई दिया। वो स्कूल की पुरानी शिक्षिका थी, जिसकी मौत रहस्यमय तरीके से हुई थी।

मुझे समझ आ गया। वो खुद शिकार थी, लेकिन अब वही शिकारी बन चुकी थी।

आखिरी पल में मैंने अपनी आंखें बंद करने की कोशिश की, पर मेरी पलकों तक पत्थर बन चुकी थीं। मेरी नजरें उसी पर जमी रह गईं।

और फिर सब कुछ शांत हो गया।

अगली सुबह गांव के कुछ लोग हिम्मत करके स्कूल के पास गए। उन्होंने अंदर झांका, पर वापस भाग खड़े हुए। उन्होंने देखा कि दीवार पर एक नई आकृति जुड़ गई थी। एक युवक की, जिसकी आंखों में डर हमेशा के लिए जम गया था।

पर असली डर अभी बाकी था।

रात होते ही उस स्कूल की खिड़की में एक और चेहरा दिखाई दिया। वो मेरा था। लेकिन मेरी आंखें अब इंसानों जैसी नहीं थीं। उनमें वही सफेदी थी… और मेरे सिर के पास कुछ हलचल हो रही थी।

जैसे सांप जन्म ले रहे हों।

और उस दिन के बाद से, गांव में एक नई आवाज सुनाई देने लगी। “आओ…”