Nishi Dak in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Nishi Dak

Featured Books
Categories
Share

Nishi Dak

उस रात गाँव के ऊपर एक अजीब सन्नाटा छाया हुआ था। हवा भी जैसे थम सी गई थी, और दूर मंदिर की टूटी घंटियों की धीमी आवाज अंधेरे में गूंज रही थी। 

लोगअपने दरवाजे जल्दी बंद कर चुके थे, क्योंकि अमावस्या की रात थी और इस रात के बारे में पुरखों ने हमेशा एक ही चेतावनी दी थी, “अगर कोई तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।” लेकिन चेतावनियाँ अक्सर उतनी ही डरावनी होती हैं जितनी उन्हें अनदेखा करने की जिज्ञासा।


बंगाल के उस छोटे से गाँव में हर कोई निश्चि डाक के बारे में जानता था। कहते थे, वह रात के सन्नाटे में किसी अपने की आवाज में नाम पुकारता है। आवाज इतनी सच्ची, इतनी जानी पहचानी होती है कि दिल खुद ही जवाब देना चाहता है। और जो जवाब दे देता है, वह वापस कभी नहीं आता।

रघुनाथ उस गाँव का सीधा साधा किसान था। उसे इन बातों पर ज्यादा भरोसा नहीं था। उसकी माँ अक्सर उसे समझाती, “बेटा, रात को कोई भी नाम पुकारे, चाहे मेरी आवाज ही क्यों न हो, बाहर मत निकलना।” रघुनाथ बस हँस देता।

उस अमावस्या की रात, जब आसमान में चाँद का नामोनिशान नहीं था, रघुनाथ अपने कच्चे घर में लेटा हुआ था। बाहर कहीं दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। अचानक, दरवाजे के पास से एक धीमी आवाज आई, “रघु…”

रघुनाथ की आँखें खुल गईं। वह चुपचाप लेटा रहा। फिर वही आवाज, इस बार थोड़ी साफ, “रघुनाथ… दरवाजा खोलो… मैं हूँ।”

वह आवाज उसकी माँ की थी।

उसका दिल तेज धड़कने लगा। उसने सोचा, माँ तो दूसरे कमरे में सो रही है। फिर यह आवाज… वह उठकर बैठ गया, लेकिन उसे माँ की बात याद आई। उसने खुद को रोक लिया।

कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।

फिर तीसरी बार आवाज आई, इस बार और भी पास से, “रघु… बाहर आओ… मुझे मदद चाहिए…”

इस बार आवाज में दर्द था, जैसे कोई सच में मुसीबत में हो। रघुनाथ का दिल पसीज गया। उसने धीरे से दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने कुंडी खोल दी।

दरवाजा खुलते ही बाहर घना अंधेरा था। कोई दिखाई नहीं दे रहा था, बस दूर मंदिर के खंडहर के पास एक हल्की सी परछाईं खड़ी थी।

“माँ?” उसने धीमी आवाज में पुकारा।

वह परछाईं धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी। जैसे ही वह पास आई, रघुनाथ का खून जम गया।

वह उसकी माँ नहीं थी।

वह एक लंबी, काली आकृति थी, जिसके बाल जमीन तक लटक रहे थे। उसकी आँखें चमक रही थीं, और उसके मुँह से धुएँ जैसी ठंडी साँस निकल रही थी। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वह अब भी उसकी माँ की आवाज में ही बोल रही थी।

“तुमने जवाब दे दिया, रघु…”

रघुनाथ पीछे हटने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए थे। वह आकृति उसके बिल्कुल पास आ गई। उसकी लंबी उँगलियाँ रघुनाथ के कंधे को छू गईं, और उसी पल उसे लगा जैसे उसकी आत्मा शरीर से खींची जा रही हो।

गाँव वालों ने अगली सुबह रघुनाथ को उसके घर के बाहर पाया। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई जान नहीं थी। उसका शरीर ठंडा था, जैसे उसमें से सारी गर्मी किसी ने चूस ली हो।

उस दिन के बाद गाँव में डर और गहरा हो गया।

लेकिन असली डर तब शुरू हुआ।

कुछ दिनों बाद, रात के समय गाँव में फिर वही आवाज गूंजने लगी।

“माँ… दरवाजा खोलो… मैं रघु हूँ…”

अब वह आवाज रघुनाथ की थी।

लोगों ने अपने कान बंद कर लिए, दरवाजे कसकर बंद कर लिए। लेकिन एक घर में, एक बूढ़ी औरत, जिसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं, उस आवाज को सुनकर खुद को रोक नहीं पाई।

उसने दरवाजा खोल दिया।

अंधेरे में कोई खड़ा था, और उसकी आवाज बिल्कुल उसके बेटे जैसी थी।

और उसी रात, गाँव में एक और नाम हमेशा के लिए खामोश हो गया।

कहते हैं, निश्चि डाक कभी अकेला नहीं रहता। हर शिकार के बाद उसकी आवाज बदल जाती है। अब वह कई आवाजों में पुकार सकता है।

और अगर तुम ध्यान से सुनो, तो आज भी किसी सुनसान रास्ते पर, रात के सन्नाटे में, कोई तुम्हारा नाम पुकार रहा होता है।

पहली बार अगर तुमने अनसुना कर दिया, तो बच जाओगे।

लेकिन अगर दूसरी बार जवाब दे दिया, तो शायद तुम पहले ही चल पड़े हो।