समय की बात है, जब पहाड़ों के पीछे एक ऐसा राज्य था जिसका नाम लोग धीरे से लेते थे। उस राज्य का नाम था इंद्रगढ। कहते थे कि इंद्रगढ में रात कभी पूरी तरह अंधेरी नहीं होती थी, क्योंकि वहाँ के आकाश में एक चाँद नहीं, दो चाँद चमकते थे। एक चाँद आसमान में और दूसरा चाँद राजमहल के पीछे बहने वाली झील में। उस झील का पानी इतना साफ था कि उसमें सिर्फ चेहरा नहीं, मन भी दिख जाता था।
इंद्रगढ की राजकुमारी का नाम था मायरा। वह सुंदर थी, लेकिन उसकी सुंदरता से अधिक चर्चा उसकी उदासी की होती थी। उसके होंठों पर मुस्कान कम ही ठहरती थी। महल के ऊँचे-ऊँचे झरोखों से वह दूर के जंगलों को देखती और देर तक खोई रहती। कोई पूछता, “राजकुमारी, आपको क्या चाहिए?” तो वह बस इतना कहती, “एक ऐसी दुनिया जहाँ दिल की आवाज़ भी सुनी जाए।”
मायरा के जीवन में सोना था, रेशम था, रौनक थी, लेकिन अपनापन नहीं था। उसके पिता राजा वीरसेन कठोर थे। राज्य के लिए वे लोहे की तरह मजबूत थे, पर बेटी के लिए पत्थर की तरह सख्त। वे चाहते थे कि मायरा राजकुमारी की तरह रहे, हँसे भी तो मर्यादा में, बोले भी तो नियम में, और सपने देखे भी तो केवल राज्य के हित में।
मायरा के पास एक रहस्य भी था। हर पूर्णिमा की रात वह महल की सबसे ऊँची मीनार पर जाती और चुपचाप चाँद को देखती। वह चाँद से बातें करती। जैसे चाँद उसका पुराना मित्र हो। वह कहती, “तुम्हें क्या पता, मैं कितनी अकेली हूँ?” और हवा उसके बालों को छूकर जैसे उत्तर देती, “सबको पता है, राजकुमारी।”
इसी इंद्रगढ के बाहर था नीले पत्थरों का जंगल। वहाँ पेड़ों की जड़ें धरती के भीतर रोशनी पीती थीं और रात में उन जड़ों से हल्की-हल्की नीली चमक निकलती थी। लोग कहते थे कि उस जंगल में प्राचीन आत्माएँ रहती हैं। वहाँ कोई बिना कारण प्रवेश नहीं करता था। जो जाता, वह या तो डरकर लौट आता या फिर कभी लौटता ही नहीं।
लेकिन उसी जंगल में एक युवक रहता था। उसका नाम था आरव।
आरव कोई साधारण युवक नहीं था। वह एक पहरेदार का बेटा था, जिसने बचपन में ही अपनी माँ को खो दिया था। उसके पास न राजमहल की सुरक्षा थी, न धन, न उपाधि। पर उसके पास कुछ ऐसा था जो बहुत कम लोगों के पास होता है। वह जड़ी-बूटियों की भाषा समझता था, पवन की दिशा पहचानता था, और जीवों के मन के भाव भी पढ़ लेता था। वह जंगल में भटकती घायल चिड़ियों को सहारा देता, टूटी डालियों को बाँधता, और बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू में खुद को खो देता।
गाँव के लोग उसे अजीब समझते थे। कुछ कहते, “यह लड़का इंसानों से ज़्यादा पेड़ों से बात करता है।” कुछ हँसते, “कहीं इसमें कोई जादू तो नहीं?” लेकिन आरव बस मुस्कुराता। उसे लोगों की हँसी से फर्क नहीं पड़ता था। उसे फर्क पड़ता था इस बात से कि कोई रो रहा हो और वह उसे चुप करा सके।
एक शाम जब सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था, मायरा चुपके से महल की पश्चिमी दीवार से बाहर निकली। उसके साथ कोई सखी नहीं थी, कोई दासी नहीं थी। उसने पहली बार अकेले महल से बाहर जाने की हिम्मत की थी। उसके मन में एक ही इच्छा थी, बस थोड़ी देर के लिए खुली हवा में साँस लेना, बिना किसी के पहरे, बिना किसी के आदेश के।
लेकिन इंद्रगढ के बाहरी रास्ते उतने सुरक्षित नहीं थे। जैसे ही वह पत्थरों की पगडंडी से नीचे उतरी, उसका पैर फिसल गया। वह सँभलती, पर उसका घूंघट एक कांटे में अटक गया। वह घबरा गई। पहली बार उसे एहसास हुआ कि महल की सुरक्षा के बाहर दुनिया कितनी अनजान है।
तभी पास की झाड़ियों से एक आवाज़ आई।
“धीरे, वरना चोट लग जाएगी।”
मायरा ने मुड़कर देखा। सामने एक युवक खड़ा था, हाथ में लकड़ी की एक छड़ी थी, कंधे पर छोटी-सी पोटली थी, और आँखों में ऐसी शांति थी जैसे वह जंगल का हिस्सा हो। उसके चेहरे पर न तो डर था, न चापलूसी। बस एक साधारण-सी मानवीय चिंता थी।
मायरा ने धीरे से कहा, “तुम कौन हो?”
युवक ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोला, “कोई खास नहीं। नाम है आरव।”
मायरा का दिल अजीब तरह से धड़क गया। उसने पहली बार किसी ऐसे आदमी को देखा था जो उसे राजकुमारी की तरह नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह देख रहा था।
आरव ने झुककर उसका घूंघट कांटे से निकाला। “आप यहाँ अकेली क्यों आई हैं?” उसने पूछा।
मायरा कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “कभी-कभी आदमी को अपने ही जीवन से बाहर निकलना पड़ता है।”
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “यह अच्छा कारण है।”
मायरा को भी हँसी आ गई। बहुत दिनों बाद उसके होंठों पर सच्ची हँसी आई थी। उस हँसी में बचपन था, थकान थी, और एक अनजानी राहत थी।
उस दिन के बाद वह बार-बार उस रास्ते पर जाने लगी। कभी कोई बहाना बनाकर, कभी अपनी सखियों को धोखा देकर, कभी रात के अंधेरे में। और हर बार आरव वहीं होता। कभी पेड़ के नीचे बैठा किताब-जैसी किसी पुरानी पत्तियों की गड्डी पढ़ रहा होता, कभी घायल हिरण के पैर पर पट्टी बाँध रहा होता, कभी किसी छोटे बच्चे को जंगली फूलों की माला बनाना सिखा रहा होता।
दोनों के बीच बहुत बातें होतीं। धीरे-धीरे, जैसे दो नदियाँ एक ही समुद्र की ओर बढ़ रही हों।
मायरा ने कहा, “तुम इतने शांत कैसे रहते हो?”
आरव ने उत्तर दिया, “क्योंकि जंगल ने मुझे सिखाया है कि जो टूटा है, वह भी फिर से खिल सकता है।”
मायरा ने पूछा, “और जो दिल टूट जाए?”
आरव ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “उसमें भी रोशनी लौट सकती है। बस किसी को उसे सहलाना पड़ता है।”
मायरा ने अपनी नज़र झुका ली। उसके भीतर कुछ कांप उठा।
उन दिनों राज्य में एक पुरानी भविष्यवाणी फिर चर्चा में आने लगी थी। कहा जाता था कि हर सौ वर्ष में जब दो चाँद एक ही रात को लाल हो जाते हैं, तब किसी रानी के दिल से जन्मी एक शक्ति जागती है। यह शक्ति या तो राज्य को अमर समृद्धि दे सकती थी या उसे मिट्टी में मिला सकती थी। राजा वीरसेन इस भविष्यवाणी को लेकर बहुत चिंतित थे। उनके अनुसार मायरा ही उस शक्ति की वाहक थी।
उन्होंने एक दरबारी जादूगर, मंत्रपाल, को बुलाया। वह बूढ़ा था, उसकी दाढ़ी सफेद थी, पर आँखें साँप की तरह चमकती थीं। उसने कई रातों तक मायरा का अध्ययन किया। फिर बोला, “राजकुमारी के भीतर एक प्राचीन शक्ति है। पर यह शक्ति तब तक नहीं जागेगी जब तक उसके हृदय में सच्चा प्रेम प्रवेश नहीं करेगा।”
यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए। “प्रेम?” उन्होंने गरजकर कहा, “राज्य का भविष्य प्रेम पर निर्भर हो? यह नहीं हो सकता।”
मंत्रपाल ने धीरे से कहा, “महाराज, जादू तर्क नहीं मानता। वह भावनाओं का भोजन करता है।”
राजा ने आदेश दिया कि मायरा महल से बाहर न जाए। उसके चारों ओर पहरे और बढ़ा दिए गए। लेकिन अब तो देर हो चुकी थी। मायरा के दिल में कोई जगह आरव के लिए बन चुकी थी, और आरव के मन में मायरा के लिए। दोनों यह जानते थे कि यह रिश्ता संभव नहीं है। फिर भी वे उससे दूर नहीं जा सके।
एक रात मायरा ने साहस जुटाकर आरव से कहा, “अगर मैं राजकुमारी न होती, तो क्या तुम मुझे पसंद करते?”
आरव ने लंबी साँस ली। उसकी आँखों में दर्द था। “मैं तुम्हें राजकुमारी होने की वजह से नहीं जान पाया, मायरा। मैं तुम्हें इसलिए जान पाया क्योंकि तुम चाँद देखते हुए भी अकेली थीं।”
मायरा की आँखों में आँसू आ गए। उसने पहली बार अपना नाम उसकी आवाज़ में सुना था। वह नाम नहीं, एक प्रार्थना लग रहा था।
“और अगर मैं तुम्हें खो दूँ?” उसने काँपते स्वर में पूछा।
आरव ने धीरे से कहा, “तब भी तुम्हें याद रखूँगा। लेकिन मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हें खोऊँ नहीं।”
कहा जाता है कि प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा खुशी नहीं, दूरी होती है। और उनकी परीक्षा शुरू हो गई।
कुछ ही दिनों बाद इंद्रगढ में एक भयानक घटना हुई। राज्य की रक्षा करने वाली चाँदी की दीवारें, जो सदियों से किसी शत्रु को भीतर नहीं आने देती थीं, अचानक रात के समय दरकने लगीं। काले बादल पहाड़ों से उतर आए। खेतों की जमीन सूखने लगी। कुओं का पानी कड़वा हो गया। पक्षी दक्षिण की दिशा में उड़कर लौटे ही नहीं। लोगों के चेहरों पर भय बैठ गया।
मंत्रपाल ने घोषणा की, “यह सब उसी भविष्यवाणी का संकेत है। लाल चाँद आने में केवल सात रातें बची हैं। यदि राजकुमारी का प्रेम सच्चा होगा, तो शक्ति जागेगी। यदि नहीं, तो इंद्रगढ शून्य में डूब जाएगा।”
राजा वीरसेन ने मायरा को महल के सबसे सुरक्षित कक्ष में बंद कर दिया। उन्होंने आरव को पकड़ने का आदेश भी दिया, क्योंकि उन्हें शक था कि वही मायरा के मन में है। पर आरव को पकड़ना उतना आसान नहीं था। जंगल उसके लिए शरण था। वह पेड़ों के बीच ऐसे गायब हो जाता जैसे हवा में घुल गया हो।
मायरा ने अपने कक्ष में बंद होकर पहली बार पिता के लिए भी आँसू बहाए। वह जानती थी कि वे क्रूर हैं, लेकिन अंदर से भयभीत भी हैं। राजा होने का बोझ कभी-कभी पिता होने की भावना को कुचल देता है।
सातवीं रात से एक रात पहले, मायरा ने अपने कक्ष में लगे पुराने आईने को देखा। वह आईना साधारण नहीं था। उसमें महल के सारे झूठ और सच्चाइयाँ दिखती थीं। अचानक आईने पर धुंध उभरी। उसमें आरव दिखाई दिया। वह जंगल में अकेला, घायल और थका हुआ था। शायद उसे पकड़ने वाले सिपाहियों ने हमला किया था। उसके कंधे से खून बह रहा था।
मायरा चीख पड़ी, “आरव।”
वह आईने की ओर बढ़ी। तभी आईने से एक नीली रोशनी निकली और उसके हाथों को छू गई। उसी पल उसके भीतर कुछ जागा। उसे समझ आया कि यह प्रेम केवल चाहना नहीं है। यह किसी की पीड़ा को अपनी पीड़ा मान लेना है। किसी के लिए अंधेरे में भी रोशनी बन जाना है।
उसने अपनी हथेलियाँ आईने पर रख दीं और फुसफुसाई, “मैं आ रही हूँ।”
और आश्चर्यजनक रूप से आईना खुल गया।
मायरा महल से बाहर निकली। आकाश में बादल फटे हुए थे। हवा में बिजली की सूखी गंध थी। वह भागती रही, अपने भारी वस्त्रों की परवाह किए बिना। उसने पहली बार अपने पैरों से नापी जा रही दूरी नहीं, अपने दिल से नापी जा रही चाह को महसूस किया।
वह जंगल में पहुँची तो देखा, आरव एक टूटे पेड़ के सहारे बैठा था। उसके चेहरे पर दर्द था। मायरा को देखते ही वह उठना चाहता था, पर नहीं उठा।
“तुम यहाँ क्यों आईं?” उसने कमजोर स्वर में कहा। “यह खतरनाक है।”
मायरा उसकी ओर दौड़ी, उसके घुटनों के पास बैठ गई। “मैं तुम्हें छोड़ने नहीं आई हूँ।”
आरव ने हँसने की कोशिश की। “तुम्हें छोड़ने की ताकत मेरे पास भी नहीं है।”
मायरा की आँखें भर आईं। उसने आरव के घाव को अपने आँचल से बाँधा। “मंत्रपाल कहता है कि सच्चा प्रेम शक्ति जागाएगा।”
आरव ने हल्के दर्द के बावजूद मुस्कुराकर कहा, “तो फिर यह शक्ति केवल राज्य को नहीं, हमें भी बचाएगी।”
तभी आकाश गड़गड़ाया। दो लाल चाँद बादलों के बीच से उभरने लगे। पूरा जंगल रक्तिम रोशनी में नहाने लगा। पेड़ों की छाल से सुनहरी रेखाएँ निकलने लगीं। जमीन काँपने लगी। पुरानी आत्माएँ जाग रही थीं।
मायरा और आरव एक-दूसरे को देखकर समझ गए कि अब समय आ गया है।
मायरा ने आरव का हाथ पकड़ा। उसकी हथेली में ठंडक थी, पर उस ठंडक में एक अजीब-सी गर्मी भी थी। उसने कहा, “मैं डरती हूँ।”
आरव ने कहा, “डरना ठीक है। पर अकेले डरना नहीं।”
उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। उनके बीच फैली सारी दूरी, सारी शंकाएँ, सारे नियम एक पल में टूटने लगे। मायरा को अपने भीतर अनजानी रोशनी महसूस हुई। आरव के हृदय से भी उसी तरह की रोशनी निकलने लगी। वे दो नहीं रहे। दो अलग धड़कनों के बीच एक ही स्पंदन जन्म लेने लगा।
जंगल के बीच एक वृक्ष फटा और उसमें से एक स्वर्णिम फूल निकला। उसकी पंखुड़ियाँ हवा में फैलकर चाँदी जैसी चमक देने लगीं। आकाश में बादल छँटने लगे। सूखी जमीन में नमी लौट आई। कुओं का पानी मीठा हो गया। राज्य की दीवारों में आई दरारें भरने लगीं।
लेकिन शक्ति की कीमत भी थी।
मंत्रपाल, जो छिपकर वहाँ तक आ पहुँचा था, चिल्लाया, “प्रेम की शक्ति तभी स्थिर होगी जब उसमें एक बलिदान होगा। कोई एक व्यक्ति अपनी पुरानी पहचान छोड़ दे, तभी यह जादू स्थायी होगा।”
मायरा और आरव दोनों चुप हो गए।
मायरा ने धीरे से पूछा, “इसका मतलब?”
मंत्रपाल ने उत्तर दिया, “राजकुमारी यदि इस शक्ति को बचाना चाहती है, तो उसे राजमहल और सिंहासन छोड़ना होगा। और युवक यदि इसे स्थायी बनाना चाहता है, तो उसे अपने जादू और जंगल की स्मृति छोड़नी होगी। तब वे एक साधारण जीवन जी पाएँगे, लेकिन उनकी शक्ति राज्य की रक्षा करेगी।”
मायरा की साँस रुक गई। उसका पूरा जीवन, उसका नाम, उसका दर्जा, उसका अधिकार। सब कुछ एक झटके में सामने आ खड़ा हुआ। आरव के लिए भी जंगल, उसके जानवर, उसकी पुरानी यादें, उसकी प्राचीन समझ। सब कुछ दाँव पर था।
आरव ने मायरा की ओर देखा। “तुम्हें महल से प्यार नहीं था,” उसने कहा, “तुम्हें सिर्फ उस आसमान से प्यार था जिसे तुम देखना चाहती थीं।”
मायरा की आँखों से आँसू बह निकले। “और तुम्हें जंगल से सिर्फ इसलिए प्रेम नहीं था कि वह तुम्हारा था। तुमने उसे इसलिए बचाया क्योंकि तुम उसे अपना घर मानते थे।”
आरव ने धीरे से उसकी हथेली दबाई। “घर वह होता है जहाँ मन टिक जाए।”
मायरा ने ऊपर देखा। लाल चाँद अब थोड़ा फीका पड़ रहा था। जैसे समय स्वयं उन्हें निर्णय लेने का अवसर दे रहा हो।
उसने एक लंबी साँस ली और कहा, “मैं सिंहासन छोड़ दूँगी।”
आरव की आँखें भर आईं। “और मैं जादू।”
मंत्रपाल ने मुस्कराकर आकाश की ओर देखा। “तो फिर इंद्रगढ बच गया।”
उस रात एक अद्भुत घटना हुई। राजमहल की सुबह जब हुई, तो राजा वीरसेन ने देखा कि उनकी बेटी गायब नहीं हुई थी, बल्कि लौट आई थी। लेकिन वह अब राजकुमारी की तरह नहीं, एक नई स्त्री की तरह खड़ी थी। उसने शाही आभूषण उतार दिए थे। उसके चेहरे पर भय कम और शांति अधिक थी। उसके साथ आरव था, जिसके हाथ में अब कोई जादुई छड़ी नहीं थी, पर आँखों में पहले से अधिक चमक थी।
राजा ने क्रोधित होकर पूछा, “यह सब क्या है?”
मायरा ने पहली बार बिना काँपे उत्तर दिया, “यह मेरी पसंद है, पिता। मैंने प्रेम चुना है। और इस प्रेम ने राज्य को बचाया है।”
राजा ने आरव को देखा। फिर मायरा को। काफी देर तक वह कुछ नहीं बोले। अंत में बस इतना कहा, “क्या प्रेम वास्तव में इतना शक्तिशाली हो सकता है?”
मायरा ने उत्तर दिया, “हाँ, जब वह स्वार्थ नहीं, त्याग से जन्मे।”
राजा की आँखें पहली बार नरम हुईं। शायद वे समझ गए थे कि बेटी अब बच्ची नहीं रही। और शायद यह भी कि राजा होना एक बात है, खोते हुए दिल को थामना दूसरी।
मायरा और आरव ने महल नहीं छोड़ा, और न ही पूरी तरह उसे अपनाया। उन्होंने इंद्रगढ के पास एक छोटा सा घर बनाया, झील के किनारे, उसी जगह जहाँ चाँद का प्रतिबिंब सबसे साफ दिखता था। वहाँ मायरा अब राजकुमारी नहीं, एक साधारण स्त्री की तरह रहती। आरव अब जादूगर नहीं, एक साधारण पुरुष की तरह। पर उनके बीच जो प्रेम था, वह साधारण नहीं था। वह झील की तरह गहरा था, चाँद की तरह उजला था, और उन पेड़ों की तरह धैर्यवान था जो आँधी के बाद भी खड़े रहते हैं।
कुछ महीनों बाद इंद्रगढ में फिर से फूल खिलने लगे। खेत हरे हुए। बच्चे हँसने लगे। लोग कहते थे कि जब दो लोग सच में एक-दूसरे के हो जाते हैं, तब प्रकृति भी उनका उत्सव मनाती है।
मायरा अक्सर रात में झील किनारे बैठती। आरव उसके पास होता। दोनों चुप रहते और पानी में चाँद देखते।
एक रात मायरा ने कहा, “तुम्हें याद है, मैं कहती थी कि मुझे एक ऐसी दुनिया चाहिए जहाँ दिल की आवाज़ सुनी जाए?”
आरव ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “अब?”
मायरा ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। “अब मुझे दुनिया नहीं चाहिए। मुझे बस यह पल चाहिए।”
आरव ने उसकी उँगलियाँ अपने हाथ में लीं। “और मुझे बस तुम।”
चाँद ऊपर था। झील में उसका प्रतिबिंब काँप रहा था। हवा में जंगली फूलों की खुशबू थी। दूर कहीं कोई पक्षी रात के बादलों के बीच से उड़ता हुआ निकला।
और उस रात इंद्रगढ में प्रेम ने कोई ताज नहीं पहना। उसने कोई घोषणा नहीं की। उसने बस दो थके हुए, टूटी हुई उम्मीदों वाले दिलों को एक साथ सुला दिया।
क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ आग बनती हैं। कुछ पानी। और कुछ प्रेम कहानियाँ ऐसी होती हैं जो जख्मों पर रखी ठंडी हथेली की तरह धीरे-धीरे जीवन बचाती हैं।
मायरा और आरव की कहानी ऐसी ही थी।
चाँदनी के उस पार, जहाँ सपने और सच्चाई एक-दूसरे से मिलते हैं, वहीं उनका घर था। वहीं उनका प्रेम था। वहीं उनका संसार था।