Tere Mere Darmiyaan - 86 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियान - 86

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तेरे मेरे दरमियान - 86

आदित्य को परेशान दैखकर पूनम आदित्य के पास जाती है , आदित्य अपने मां , पापा और भाई को दैखकर बहोत खुश हो जाता है और चेहरे पर हल्की मुस्कान लिये अपनी मां के गले लग जाता है । आदित्य अपने दिल को दर्द को दबाने की कोशिश कर रहा था ताकी जो हलचल उसके अंदर चल रहा है , वो चेहरे पर ना आ जाए । 

पर मां और बाप से कौन भला अपना दर्द छुपा पाया है , वैसे ही आदित्य की आंखो मे साफ - साफ दिख रहा था ।

पूनम अपने बेटे की चेहरे पर झुटी मुस्कान को दैखकर उदास हो जाती है आदित्य मां से कहता है --

आदित्य :- मां कैसी हो आप ?

आदित्य फिर अपने पापा विद्युत के पैर छुता है , विद्युत अपने बेटे के लिए कुछ कह नही पाया और फिर आदित्य कहता है --

आदित्य :- कैसे हो पापा ?

विद्युत अपना सर हिलाकर हां मे जवाब दे देता है , अनय आदित्य के गले लग जाता है , आदित्य सब समझ जाता है के अगर वो दुखी हो गया तो सभी दुखी हो जाऐगें , इसिलिए आदित्य माहोल को बदलने के लिए सबसे कहता है --

अच्छा हूआ आप सब आ गये , बहोत दिन हो गए साथ मे डिनर नही किया । मां ... पापा ...आप लोगो की बहोत याद आ रही थी । 

ये सब पुनम और विद्युत चुप होकर दैख रहा था । वो दोनो सब समझ रहे थे के आदित्य ये सब उन लोगो की खुशी के लिए कर रहा है , बाकी आदित्य अंदर से बहोत दुखी है । 

आदित्य अपना फोन निकालता है और रमेश से कहता है --

आदित्य :- रमेश ... सुन ना , वो मां , पापा और भईया आए हूए है । तु कहां पर है अभी ?

रमेश :- मैं तो यही पर हूँ , घर पर , कु बोल ना हमे आना है क्या । बहोत दिन हो गए यार अंकल आंटी से मिले ।

आदित्य :- इसलिए तो कॉल किया तुझे , तु रश्मि को लेकर जल्दी आ जा । कृतिका को भी बोल दे , हम सब साथ मे डिनर करेगें ।

रमेश :- ओके , मैं अभी आया ।

इतना बोलकर रमेश फोन काट देता है । तभी रश्मी पुछती है --

रश्मी :- कौन आया है ?

रमेश :- आदित्य के मां और पापा , भारत के सबसे अमीर आदमी । 

ये सुनकर रश्मी भी बहोत एक्साईटेड हो जाती है और कहती है --

रश्मी :- उनसे मिलना तो बड़े - बड़े लोगो का तक सपना होता है , चलो , जल्दी चलो ।

रमेश :- हां हा , चलता हूँ । वैसे भी दुसरो के लिए सपना होगा । मेरा तो फेमिली है वो लोग । मैं कभी भी जा सकता हूँ ।

रमेश से इतना सुनकर रश्मी खुश हो जाती है और दोनो कृतिका को फोन करके सब बता देती है और वहां से निकल जाती है ।

इधर आदित्य सबसे हंसके बात करता है --

आदित्य :- अरे आप लोग बैठिए ना , कंश मामा ...

तभी पूनम आदित्य के पास आती है और कहती है ---

पूनम :- बस कर आदी , और कितना दिखावा करेगा । बस कर बेटा ।

पुनम की बात को सुनकर आदित्य मायुस हो जाता है आदित्य जितना दिखावा कर सकता था , किया । पर अपनी से इतना सुनने के बाद आदित्य एक जगह पर खड़ा हो जाता है ।

पुनम आदित्य के गाल पर हाथ रखकर कहती है --

पुनम :- मैं जानती हूँ बेटा , के तुम्हारे अंदर क्या बित रही है । तुम्हें ये सब करने की जरुरत नही है । मैं मां हूँ तेरा और एक मां को सब पता चल जाता है । तु इसिलिए ये सब कर रहा है ताकी हमे दुख ना हो । जब एक बेटा दुखी होता है ना , तो मां के दिल को पता चल जाता है बेटा । 

पुनम की बात को सुनकर आदित्य के आंखो मे आंशु बहने लगता है । और आदित्य अपने मां के गले लग जाता है और कहता है --

आदित्य :- Sorry मां , मैं आपलोगो को दुख देना नही चाहता था ।

विद्युत :- हिम्मत रख बेटा , वो उपर वाला एक दिन जरुर सुनेगा । मैं जानता हूँ के तु जानवी से बहोत प्यार करने लगा है और उसकी दुरी तुझसे सहा नही जा रहा है । पर बेटा समय बहोत पहलवान होता है , अभी अगर तु कुछ अच्छा भी करने जाएगा तो जानवी के नजरो मे वो बुरा ही होगा । इसिलिए समय का वेट करो , दैखना सब ठिक हो जाएगा । 

आदित्य : - जी पापा ।

विद्युत :- ये जो तुने डिवोर्स का समय और सच्चा के जांच की मांग करते जानवी को सेफ किया है । ये अच्छा किया बेटा तुने ।

आदित्य :- पता नही पापा , पर ऐसा करके भी मैं .. उसकी नजरो से और गिर गया हूँ , उसे लगता है के मैं इसके दौलत के लिए ये सब कर रहा हूँ ।

पुनम :- सब्र रख बेटा , दैखना जानवी को एक दिन इन सबका एहसास होगा और फिर वो बहोत पछताएगी , मैं उससे उसकी सारी कॉट्रेक्ट वापस लेकर उसे रास्ते पर ला दूगीं ।

तभी वहां पर रश्मी , कृतिका और रमेश भा आ जाता है सभी पुनम और विद्युत के पैर छुता है और वहां पर खड़ा हो जाता है ।

तभी विद्युत कहता है ---

विद्युत :- नही पूनम , मैं समझ सकता हूँ के तुम्हारा गुस्सा जायज है , पर एक बार सोचो तो के अभी जानवी की हालत कैसी है , उसे कुछ याद भी नही है ।

विद्युत आदित्य के पास जाता है और कहता है --

विद्युत :- बेटा जब मुझे पता चला के तुने कोर्ट से समय मांगा है और जानवी को अभी डिवोर्स नही दिया है तो मैं तुरंत तुम्हारे पास आ गया । बेटा तुने जानवी को डिवोर्स ना देकर बहोत अच्छा किया है ।

विद्युत ये सब कह रहा था , तभी वहां पर अशोक भी आ जाता है और दरवाजे पर खड़े होकर यह सब सुन रहा था । विद्युत अपनी बात को जारी रखता है और कहता है --

विद्युत :- अगर तु जानवी को डिवोर्स दे देता तो इसमे जीत विकास की होती । जरा सोचो बेटा जानवी तुम्हारी पत्नी है , और तु उसका पति है , तो एक पति होने के नाते तेरा ये फर्ज बनता है के तु अपनी के इस मेडिकल सिचुएशन मे तु उसका साथ दे ना की उसे छोड़ दे । भले ही वो तुझे अपना दुश्मन मानती है पर ये सब उससे अनजाने मे हो रहा है , पर तु तो सब जानता है ना ।

तभी अशोक दरवाजे से अंदर आता है , अशोक को दैखकर सभी हैरान हो जाता है , विद्युत अशोक के पास जाता है और कहता है --

विद्युत :- अरे संबधी जी आप इस वक्त यहां पर ?

अशोक अपने दोनो हाथो को जोड़कर विद्युत सो कहता है --

अशोक :- सर ... मैं तो बस आदित्य बेटा से यही कहने के लिओ आया था , के इस समय जानवी जो कुछ भी कर रही है या कह रही है ये सब उसकी याददाश्त जाने के कारण कर रही है । मैं तो यही कहने के लिए यहां पर आया था के आदित्य जानवी का साथ ना छोड़े , अस समय जानवी को आदित्य ही बचा सकता है । पर मेरे कहने से पहले ही सर आपने ( विद्युत) सब कह दिया ।

अशोक इतना बोलकर विद्युत के पैर को छुने जाता है तो विद्युत अशोक ता हाथ पकड़ लेता है और कहता है --

विद्युत: - अरे ये आप क्या कर रहे हो संबधी जी । 

अशोक :- सर .. आपके सामने मेरी क्या ही औकात है , आपके घर मे मेरी बोटी बहू बनकर आई यही बहोत बड़ी बात है । 

विद्युत: - पहले तो आप मेरे संबधी हो तो मुझे सर नही संबधी जी बोलकर बुलाये , अरे एक ही तो संबधी है अभी मेरे अगर वो भी मुझे संबधी ना बोलके सर बोले तो कैसा लगेगा । अब से सर नही संबधी बोलिए । और और बात एक लड़की को पिता हो आप , आपने कन्या दान किया है , तो उस हिसाब से आपका दर्जा मेरे से बहोत उपर है तो आप मेरे पैर छुकर मुझे पाप का भागी ना बनाए ।

विद्युत से इतना सुनकर अशोक के आंखो से पानी बहने लगता है ।

अशोक :- ये आप क्या बोल रहे हो सर.. संबधी जी । आपको सामने मेरी वैसे भी क्या औकात ..

विद्युत कड़क आवाज मे कहता है --

विद्युत :- खबरदार जो बार - बार औकात ती बात कियो तो , आप मेरे संबधी हो और हम दोनो का परिवार अब एक ही है तो इसमे छोटा या बड़ा कहां से आ गया । आगे से ऐसे बात मत बोलिए संबधी जी , वरना आपसे मेरा झगड़ा हो जाएगा हां .. बता रहा हूँ । ( विद्युत ने मजाकिया अंदाज मे अशोक से कहा )

तभी सब हंसने लगे , अशोक आदित्य के पास जाता है और कहता है ---

अशोक :- बेटा , जानवी को तुम्हारी जरुरत है , वो तुमसे बहोत प्यार करती है बेटा , बस उसे ये बात याद नही है ।

अशोक से ये सुनकर आदित्य मन ही मन खुश हो जाता है और उत्सुकतावश अशोक से पूछता है --

आदित्य :- क्या , जानवी मुझसे प्यार करती है , क्या जानवी ने आपसे खुद कहा था ये बात ।

आदित्य की उत्सुकता को दैखकर सभी हैरान थे और विद्युत और पुनम के चेहरे पर हल्की मुस्कान , तब अशोक जानवी की बात को बोलकर सुनाता है जब जानवी अशोक के पास आई थी और आदित्य के सामने जाने से उसके दिल मे जो होता है वो बोलतर सुनाती है ये बात अशोक आदित्य को बोलतर सुना देता है , जिसे सुनकर आदित्य बहोत खुश हो जाता है और कहता है --

आदित्य :- इसका मतलब ... इसका मतलब जानवी उस दिन मुझे ये बात बताने ही वाली थी ।

फिर आदित्य के चेहरे की खुशी अचानक से गायब हो जाती है और आदित्य कहता है --

आदित्य :- सब सही चल रहा था पर उस एक्सीडेंट ने मुझसे मेरे जानवी को छिन लिया ।

विद्युत आदित्य के पास आता है और कहता है --

विद्युत :- दिल छोटा मत करो बेटा , सब ठिक हो जाएगा ।

तिरु भी आदित्य के पास आता है और कहता है --

तिरु :- हां भाजें , जिजाजी सही कह रहे है , हिम्मत रखो , और उस विकास को जानवी से कैसे दुर रखा जाए वो सोचो ।

आदित्य :- कंश मामा , उस विकास को तो मैं दैख लूगां , उसे उसके ही बनाए जाल मे ऐसे फसाउगां के वो कभी बाहर ही नही निकल पाओगा । जानवी मेरी थी और मेरी ही रहेगी ।

आदित्य से इतना सुनकर अशोक को राहत मिलती है और वहां पर मौजूद बाकी सभी बहोत खुश हो जाता है ।


इधर रात बहुत शांत थी। इतनी शांत कि जानवी को
अपने दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी , वो खिड़की के पास खड़ी थी और बाहर हल्की हवा चल रही थी, पर उसके भीतर
कुछ अजीब-सा तूफ़ान था , उसे घबराहट हो रही थी…बिना किसी वजह के उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके दिल मे कोई बोझ आ गया है । 

दिन भर वो खुद को समझाती रही थी— के सब खत्म हो चुका है के आदित्य अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है पर फिर भी…
जैसे ही रात होती उसके मन मे आदित्य का नाम उसके सीने में चुभने लगता। जानवी बहोत परेशान हो जाती है और अपने आप ये सवाल करके पूछती है ---

जानवी :- “ये क्यों हो रहा है मेरे साथ । मैं क्यों उस आदित्य के बारे मे इतना सौच रही हूँ, मुझे ऐसा क्यें लग रहा है के जैसे मैं उसके साथ रहने पर खुश रहती हूँ । उससे दुर रहने का मन क्यों नही कर रहा है ।

जानवी ने खुद से पूछा क्येकी उसकी याददाश्त अधूरी थी। बहुत से ऐसे पल थे जो धुंध में लिपटे थे , लेकिन फिर भी कुछ एहसास… जो पूरी तरह ज़िंदा थे। जब भी वो आँखें बंद करती, उसे कोई
उसका हाथ थामे खड़ा महसूस होता। जो बहोत अपना सा लगता पर उसका चेहरा साफ़ नहीं दिखता, पर स्पर्श जाना-पहचाना लगता। इतना सोचते हूए जानवी कुर्सी पर बैठ गई। उसके मन मेंकोर्ट वाला दिन घूमने लगा।वो पल जब उसने आदित्य पर इल्ज़ाम लगाया था।
उस वक्त उसे यकीन था— क्योंकि मोनिका ने कहा था। पर अब…
उसे ये सोचने पर मजबुर रहा था , जानवी को आदित्य की आंखो मे सच दिख रहा था और सच के साथ उसका अपराधबोध भी।

जानवी कहती है --

जानवी :- आज कोर्ट मे जिस तरह से आदित्य ने कहा के मोनिका और विकास ने उस पर गलत इल्जाम लगाए है और जांच को बाद ही मुझे डिवोर्स देगा । ये बात सोचकर मुझे बहोत बुरा लग रहा है , कही मैने गुस्से मे आकर आदित्य पर उनहलगा दिया ।

उसकी आँखें भर आईं , उसका दिल बार-बार एक ही नाम दोहरा रहा था—आदित्य , लेकिन वो समझ नहीं पा रही थी—क्या ये पछतावा है , क्या ये अपराधबोध है , या फिर… कुछ और? उसने अपना सिर थाम लिया फिर कुछ दैर चुप रहती है और कहती है --

जानवी :- मैंने तो उसे छोड़ दिया था, पर फिर भी मुझे उसकी इतनी फिक्र क्यों हो रही है ?

To be continue.....781