Double Game - 29 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 29

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 29

करीब एक घंटे बाद, जब मनोरमा और वंशिका की बहस थककर शांत हुई, तो घर में एक भारी सन्नाटा पसर गया। वंशिका अपने कमरे में लौट गई, उसका शरीर टूट रहा था पर मन पत्थर हो चुका था। मनोरमा अपने बिस्तर पर गिर पड़ीं, उन्हें पहली बार लगा कि उन्होंने अपनी बहू को हराने के चक्कर में अपने बेटे को ही खो दिया है।

भूपेंद्र और काया रसोई से बाहर निकले। काया के चेहरे पर एक अजीब सी तृप्ति थी और भूपेंद्र की आँखों में वही लाल घेरे। उसने हॉल में खड़ी वंशिका को एक बार फिर हिकारत से देखा, जैसे वह कोई कचरा हो, और काया का हाथ पकड़कर सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

वंशिका ने उन्हें ऊपर जाते देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे। उसने दीवार घड़ी की ओर देखा। समय बदल रहा था। उसने एक लंबी सांस ली और अपना फोन निकाला। "अब तुम दोनों ने अपनी हदें पार की हैं... अब मैं अपनी सीमाएं तोड़ूँगी।"
उसने अपनी पुरानी सहेली शबनम को फोन लगाया। शबनम, जो खुद एक ऐसी ही आग से गुज़री थी, उसने फोन उठाते ही वंशिका की टूटी हुई आवाज़ पहचान ली।
"शबनम... मैं बहुत थक गई हूँ। सब कुछ खत्म हो गया है," वंशिका ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई।


शबनम ने गहरी सांस ली और बड़े दर्द से कहा, "बहन, मैं समझ सकती हूँ। तू जानती है दिव्या के साथ क्या हुआ था, और मेरे साथ क्या हुआ? जब मेरे पति सोहेल को अपनी सहकर्मी से प्यार हुआ, तो उसने एक पल नहीं सोचा कि मैं और मेरे बच्चे कहाँ जाएँगे। हमारे यहाँ तो चार शादियाँ जायज़ हैं, उसने तो मजहब की आड़ लेकर दूसरी शादी कर ली और मुझे बेसहारा छोड़ दिया। मैं कैसे तिल-तिल कर मरी हूँ, ये सिर्फ मैं जानती हूँ। खुदा भला करे मेरे अम्मी-अब्बू का, जिन्होंने मुझे संभाला और नौकरी करने की आज़ादी दी, वरना आज मैं अपने बच्चों को दो वक्त का सुकून का निवाला भी नहीं खिला पाती।"
शबनम की आवाज़ में एक दृढ़ता आई, "वंशिका, तू पढ़ी-लिखी है। तेरे पास तेरा हुनर है, तेरा जिम है। ऐसे मर्द के साथ रहकर अपने स्वाभिमान का गला घोंटने से बेहतर है कि तू अलग हो जा। सोहेल ने मुझे फूटी कौड़ी नहीं दी क्योंकि मेहर की रकम चुकाने के बाद उसका हक़ खत्म हो गया था, लेकिन तेरे पास कानून है। तू उस आदमी से अपना हक़ छीन सकती है। मैं तुझे अपनी वकील का नंबर दे रही हूँ, उससे बात कर।"

वंशिका ने कांपते हाथों से नंबर सेव किया। शबनम की बातों ने उसे अहसास कराया कि वह अकेली नहीं है, पर वह यह भी जान गई कि उसे अब दया की नहीं, न्याय की ज़रूरत है। वकील से थोड़ी देर बात करने के बाद उसने फोन रखा और खिड़की के बाहर देखा। सुबह होने वाली थी, एक ऐसी सुबह जो शायद उसके जीवन की सबसे बड़ी तबाही या सबसे बड़ी आज़ादी लेकर आने वाली थी।




अगले दिन सुबह सूरज निकला, लेकिन भूपेंद्र के इरादों में कोई बदलाव नहीं था। उसने फिर से ऑफिस न जाने का फैसला किया। उसे डर था कि उसकी अनुपस्थिति में वंशिका काया को डरा-धमकाकर भगा देगी। वंशिका जब तैयार होकर नीचे आई, तो उसने देखा कि भूपेंद्र आराम से सोफे पर बैठकर चाय पी रहा है। वंशिका के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान दौड़ गई।
'मत जाओ भूपेंद्र, मत जाओ ऑफिस। अपनी नौकरी से भी हाथ धो बैठो,' उसने मन ही मन सोचा। वंशिका ने पिछले कुछ दिनों में बड़ी खामोशी से अपनी सारी सेविंग्स अलग कर ली थी। वह जानती थी कि जिस ढलान पर भूपेंद्र है, वहाँ से आर्थिक तबाही निश्चित है। उसने अपनी फाइल उठाई और बिना कुछ कहे जिम की ओर निकल गई।

घर में अब सन्नाटा था। मनोरमा देवी अपने कमरे में बंद थीं। उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वे बाहर आकर अपने बेटे की बेशर्मी देखें। उन्हें अब अपनी ही परवरिश पर ग्लानि हो रही थी, पर वे बेबस थीं।
जैसे ही मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ, भूपेंद्र ने काया की ओर देखा। आज उसके भीतर की हवस और दीवानगी सारी हदें पार करने को बेताब थी। उसने काया को बीच हॉल में ही अपनी मज़बूत बाहों में उठा लिया।

काया ने उसके गले में अपनी बाहें डालीं और मुस्कुराते हुए तंज कसा, "साहब, ये क्या कर रहे हैं? ये तो वही जगह है न जहाँ दीदी का राज चलता है? यहाँ मुझे उठाकर आप उनका अपमान कर रहे हैं या मेरा मान बढ़ा रहे हैं?"

भूपेंद्र की आँखों में नशा था। उसने उसे और कसकर भींचा और ऊपर सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा। "आज के बाद इस घर की हर ईंट पर तुम्हारा राज होगा काया। वंशिका का वक्त खत्म हो चुका है। उसे अपनी फिटनेस और अपनी आज़ादी मुबारक, मुझे तो बस तुम्हारी ये मखमली देह चाहिए।"

भूपेंद्र उसे सीधे उस मास्टर बेडरूम में ले गया, जहाँ की हर चीज़ वंशिका की पसंद से सजी थी। जिस बिस्तर पर वंशिका और भूपेंद्र ने अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के हज़ारों सपने बुने थे, आज भूपेंद्र ने उसी बिस्तर पर काया को बड़ी बेदर्दी और बेबाकी से पटक दिया।

काया ने बिस्तर की रेशमी चादर को महसूस किया और फिर से एक उकसावे वाला तंज मारा, "साहब, इस बिस्तर पर तो दीदी की खुशबू आ रही है। क्या आपको बुरा नहीं लग रहा कि उनकी जगह आज मैं यहाँ लेटी हूँ?"

भूपेंद्र ने अपनी कमीज़ उतारते हुए जवाब दिया, "उसकी खुशबू अब मुझे काटती है काया। मुझे तो तुम्हारी उस पसीने और मिट्टी वाली महक से प्यार है जिसमें असलियत है। वह तो एक मशीन बन चुकी है, तुम एक जीती-जागती औरत हो।" उसने बिस्तर पर झुककर काया की साड़ी का पल्लू एक झटके में हटा दिया। काया के बदन पर चढ़ी वह मखमली नीली साड़ी अब धीरे-धीरे उसके शरीर से अलग हो रही थी। काया ने एक गहरी सिसकी भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं।

भूपेंद्र का हाथ काया के पेट पर रेंगने लगा। उसने अपनी उंगलियों की पोरों से उसके मांस को टटोला और भारी आवाज़ में बोला, "वंशिका कहती थी कि तुम मोटी हो, तुम्हारी कोई शेप नहीं है। पर उसे क्या पता कि इस कोमलता में जो सुख है, वो उसके पत्थर जैसे जिम वाले शरीर में कहाँ?"

काया ने अपनी आँखें खोलीं, उनमें शरारत और जीत का भाव था। "तो साहब, क्या आप अपनी पत्नी को पूरी तरह भूल चुके हैं? क्या कल को अगर वह रोते हुए आपके पैर पकड़ेगी, तो आप मुझे छोड़ देंगे?"

भूपेंद्र ने उसके पेट पर एक ज़ोरदार चपत लगाई और उसे अपनी ओर खींचते हुए उसके होंठों के करीब फुसफुसाया, "वह अब मर चुकी है मेरे लिए। इस कमरे में, इस बिस्तर पर और इस दिल में अब सिर्फ तुम्हारी हुकूमत है। तुम मेरी वो लत बन चुकी हो जिसे मैं अब छोड़ना भी चाहूँ तो नहीं छोड़ सकता।"

काया ने उसे चिढ़ाते हुए कहा, "साहब, बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, पर डरते आप अब भी हैं। आज ऑफिस नहीं गए न? कहीं दीदी के डर से तो घर पर नहीं रुके?"

भूपेंद्र का पौरुष इस तंज से जैसे और भड़क उठा। उसने काया की गर्दन पर अपने दाँत गड़ा दिए, जिससे काया के मुँह से एक तीखी चीख निकली। "डरता मैं किसी से नहीं हूँ काया। मैं तो बस ये सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि जब मैं तुम्हें प्यार करूँ, तो कोई तीसरा बीच में न आए। आज मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि एक मर्द अपनी औरत को कैसे पूजता है।"

भूपेंद्र अब होश खो चुका था। वह काया के शरीर के हर हिस्से को अपनी मिल्कियत समझकर उसे खंगाल रहा था। काया भी जानती थी कि वह भूपेंद्र को अपनी उंगलियों पर नचा रही है। वह बार-बार वंशिका का नाम लेकर उसे और उत्तेजित करती, उसे उकसाती ताकि वह मर्यादा की हर उस लकीर को मिटा दे जो अभी भी कहीं न कहीं बाकी थी।

रसोई से शुरू हुआ यह खेल अब बेडरूम की पवित्रता को रौंद रहा था। काया ने भूपेंद्र को अपने आगोश में ऐसे जकड़ा जैसे वह उसे दुनिया से काट देना चाहती हो। कमरे की दीवारों ने उस दिन वह सब सुना और देखा जिसने एक घर की गरिमा को हमेशा के लिए दफन कर दिया।
भूपेंद्र का पागलपन अब एक ऐसे मोड़ पर था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। वह काया की देह के समंदर में डूबता जा रहा था, यह जानते हुए भी कि यह समंदर उसे एक दिन डुबो देगा। पर उस वक्त, उसे न बच्चों की याद थी, न माँ की मर्यादा की और न ही पत्नी के त्याग की। उसे तो बस काया की वो सिसकियाँ और उसके उकसावे वाले तंज सुनाई दे रहे थे, जो उसे और भी गहरा गिरने पर मजबूर कर रहे थे।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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