हॉल में बिखरी बेशर्मी की गूँज ने वंशिका के भीतर के धैर्य को राख कर दिया था। वह कमरे में छिपकर रोने वाली औरत नहीं थी। उसके भीतर अब वह स्वाभिमानी स्त्री जाग चुकी थी जिसे बरसों तक इस घर की तथाकथित मर्यादा के नाम पर कुचला गया था। वह तमतमाए चेहरे के साथ सीधे मनोरमा के कमरे में दाखिल हुई।
मनोरमा बिस्तर पर बैठी माला जप रही थीं, पर उनके कान बाहर रसोई से आती उन अमर्यादित आवाज़ों पर ही टिके थे। वंशिका को अचानक कमरे में देख वे सकपका गईं।
"मम्मी जी! चुप क्यों बैठी हैं आप?" वंशिका की आवाज़ में बिजली सी कड़क थी। "अपने राजा बेटे को समझाती क्यों नहीं? उसे रोकती क्यों नहीं? वह किचन में जो तमाशा कर रहा है, क्या वह आपको दिखाई नहीं दे रहा? आपका बेटा तो हर बात मानता है न आपकी? फिर आज आपकी ज़ुबान को लकवा क्यों मार गया है?"
मनोरमा ने नज़रें चुराईं, पर वंशिका का प्रहार जारी था। "अब आपको घर की इज़्ज़त और खानदान की मर्यादा का ख्याल नहीं आ रहा? जब मैं घर के बाहर इज़्ज़त की नौकरी करने जाती थी, तो आपके खानदान की इज़्ज़त नीलाम होने लगती थी। मुझे ताने दिए जाते थे कि कुलवंती बहुएं बाहर पैर नहीं रखतीं। अब आपका बेटा किचन में नौकरानी के साथ इज़्ज़त में चार चाँद लगा रहा है, तो आपको साँप सूँघ गया है?"
मनोरमा, जो अब तक अपराधी बोध में दबी थीं, वंशिका की तीखी बातों और उसके चीखने के अंदाज़ पर तिलमिला उठीं। उनके भीतर की कड़वी सासू माँ अचानक फूँफकार उठी। उन्होंने माला पटक दी और पलंग से उतरकर वंशिका के सामने आ खड़ी हुईं।
"बस कर बहू! बहुत ज़ुबान चलने लगी है तेरी," मनोरमा की आवाज़ में ज़हर घुला था। "मैं क्यों संभालूँ उसे? तेरा पति है, तू संभाल! मेरा बेटा तो मेरा ही रहेगा, उसकी रगों में मेरा खून है। वह कल को चार और औरतें लाएगा तो भी वह मेरा बेटा ही कहलाएगा। लेकिन तू? तेरा पति अब तेरा नहीं रहा, और सच तो यह है कि तू अब कहीं की नहीं रही!"
कमरे के भीतर अब मर्यादा की दीवारें पूरी तरह गिर चुकी थीं। सास और बहू एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर बरसों की दबी हुई कड़वाहट उगल रही थीं।
मनोरमा ने तीखा प्रहार किया, "तू अपनी गलती नहीं देखती वंशिका? जिस दिन तूने इस घर की दहलीज लाँघकर उस जिम के मर्दों के बीच जाना शुरू किया, उसी दिन तूने भूपेंद्र के मन में अपने लिए नफरत बो दी थी। तूने उसे वक्त नहीं दिया, तूने उसे वह सुख और सुकून नहीं दिया जो एक पत्नी को देना चाहिए। तूने पैसे कमाए तो तेरा दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया। तूने घर को होटल बना दिया और पति को एक ग्राहक। काया ने वही दिया जो तूने छीन लिया था—सेवा और समर्पण। तू अपनी मॉडर्न दुनिया में खोई रही, और देख आज तेरा घर उजड़ गया!"
वंशिका ने भी तीखा पलटवार किया,"सेवा? समर्पण? मम्मी जी, इसे आप सेवा कह रही हैं? यह हवस है और कुछ नहीं! और रही मेरी गलती, तो मेरी सबसे बड़ी गलती यह थी कि मैंने इस घर को अपना माना। मैंने अपनी कमाई इस घर की ईंटों में लगा दी ताकि आपका बेटा और आप शान से रह सकें। आपने मुझे तब सराहा जब मैं आपके इशारों पर नाचती थी, लेकिन जैसे ही मैंने अपने स्वाभिमान की बात की, मैं आपकी नज़रों में खटकने लगी। आपने जानबूझकर काया को शह दी ताकि आप मुझे नीचा दिखा सकें। आपने एक नौकरानी को मेरे बेडरूम तक पहुँचने का रास्ता दिखाया सिर्फ अपनी ईगो संतुष्ट करने के लिए। आज जो आग लगी है, उसकी तीली आपने ही सुलगाई थी, अब जब पूरा घर जल रहा है तो आप मुझे दोषी ठहरा रही हैं?"
दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि पुरानी बातें उखड़ने लगीं। मनोरमा ने वंशिका के मायके को कोसा, तो वंशिका ने मनोरमा की उस परवरिश पर सवाल उठाए जिसने भूपेंद्र को एक दगाबाज़ और चरित्रहीन मर्द बना दिया था।
उधर रसोई में, भूपेंद्र और काया को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि बाहर सास-बहू के बीच महाभारत छिड़ा है। बल्कि, बाहर होती चीख-पुकार उनके लिए किसी बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह काम कर रही थी।
भूपेंद्र ने काया को कमर से पकड़कर अपनी ओर इतना करीब खींच लिया था कि उनके बीच हवा का गुज़रना भी मुमकिन नहीं था। काया के बाल बिखरे हुए थे और उसकी नीली साड़ी का पल्लू अब ज़मीन पर था।
"साहब... सुनिए न," काया ने भूपेंद्र के सीने पर अपनी उंगलियाँ फेरते हुए फुसफुसाकर कहा। "दीदी और माँ जी के बीच बहुत ज़ोरदार बहस हो रही है। दीदी बहुत चिल्ला रही हैं, कहीं माँ जी को कुछ कह न दें।"
भूपेंद्र ने काया का गाल अपनी उंगलियों से सहलाया और उसकी आँखों में डूबते हुए बोला, "होने दो। उन्हें चिल्लाने दो। जब तक वे आपस में लड़ेंगी, हमें कोई परेशान नहीं करेगा। तुम उन पर नहीं, मुझ पर ध्यान दो काया। तुम्हारी ये धड़कनें मुझे कुछ और ही कह रही हैं।"
काया ने शरमाकर अपनी आँखें झुका लीं। "आप भी न... बिल्कुल नहीं सुधरेंगे।"
"सुधरना किसे है?" भूपेंद्र ने उसकी गर्दन के पास अपनी सांसें छोड़ते हुए कहा। "बरसों बाद मुझे अहसास हुआ है कि जीना किसे कहते हैं। वंशिका के साथ तो ज़िंदगी एक टाइम-टेबल बन गई थी—जिम, डाइट, ऑफिस, बच्चे। लेकिन तुम्हारे साथ... तुम्हारे साथ हर पल एक नशा है।"
भूपेंद्र ने झुककर काया के होंठों को चूम लिया। काया ने पहले तो हल्का सा प्रतिरोध किया, फिर वह भी उसके आगोश में पिघलने लगी। भूपेंद्र के हाथ अब काया की पीठ और कमर पर बेतहाशा घूमने लगे थे। वह उसे चूमते हुए बीच-बीच में रुककर उसकी देह की तारीफ करता, उसकी सादगी को वंशिका की बनावटी फिटनेस से बेहतर बताता।
"साहब... दीदी देख लेंगी तो फिर बवाल होगा," काया ने अपनी उखड़ी हुई सांसों के बीच कहा।
"देखने दो और क्या बाकी रहा देखने को," भूपेंद्र ने उसे और भी शिद्दत से चूमते हुए जवाब दिया। "वह देखेगी तभी तो उसे अहसास होगा कि उसने क्या खोया है। उसे उसकी औकात पता चलनी चाहिए। आज मैं तुम्हें वह सब दूँगा जो उसने कभी माँगा ही नहीं।"
काया ने भूपेंद्र को कसकर पकड़ लिया। उसे पता था कि वह इस घर की नींव हिला चुकी है। वह भूपेंद्र के कानों में उत्तेजक बातें कह रही थी, उसे उकसा रही थी ताकि वह वंशिका की आवाज़ को पूरी तरह अनसुना कर दे। भूपेंद्र अपनी मर्यादा, अपना चरित्र और अपना भविष्य—सब कुछ उस रसोई की स्लैब पर कुर्बान कर चुका था।
रसोई की दीवारों ने उस दोपहर वह सब देखा जो किसी सभ्य घर की कल्पना से बाहर था। बाहर नफरत और आरोपों का शोर था, और भीतर हवस और विश्वासघात का नंगा नाच।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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