Double Game - 27 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 27

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 27

वंशिका ने एक नई रणनीति अपनाई। उसने घर पर रुकना कम कर दिया और अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय फिर से जिम में देना शुरू कर दिया। उसे समझ आ गया था कि वह घर में रहकर जितना विरोध करेगी, क्लेश उतना ही बढ़ेगा और भूपेंद्र उतना ही काया की ओर झुकेगा। उसने खुद से कहा, "इन्हें जितना वक्त साथ बिताना है, बिताने दो। अति हर चीज़ की बुरी होती है।" वह जानती थी कि जब आकर्षण की चमक धुंधली पड़ेगी और रोज़मर्रा की हकीकत सामने आएगी, तब भूपेंद्र को काया के उसी भोलेपन और सादगी में खोट नज़र आने लगेगा जिससे वह आज प्रेम कर रहा है।

अब वंशिका सुबह जल्दी निकल जाती और देर शाम वापस आती। वह घर के तनाव से दूर अपने काम में खुद को झोंकने लगी। वह चाहती थी कि भूपेंद्र और काया एक-दूसरे के साथ इतने ज़्यादा समय तक रहें कि जल्द ही वे एक-दूसरे से ऊबने लगें। वह उन्हें वह एकांत दे रही थी जो अंततः उनके रिश्ते की कड़वाहट का कारण बनने वाला था।

वंशिका के जिम चले जाने और बच्चों के नाना के घर होने से घर अब किसी वीराने जैसा हो गया था। लेकिन भूपेंद्र के लिए यह वीराना ही स्वर्ग बन गया था। उसे अब न किसी की नज़रों की परवाह थी, न ही अपनी मर्यादा की। जैसे ही मनोरमा अपने कमरे में जाकर दोपहर की नींद लेने के लिए दरवाज़ा बंद करतीं, घर का माहौल पूरी तरह बदल जाता।

भूपेंद्र अब खुल कर खेलने लगा था। वह काया को महज़ एक नौकरानी नहीं, बल्कि अपनी जागीर समझने लगा था।
रसोई में काम करती काया के पीछे जाकर भूपेंद्र ने उसे कमर से भींच लिया। काया ने एक झूठी सिसकी भरी और कोहनियों से उसे पीछे ढकेलने का नाटक किया।
"साहब... छोड़िये न, कोई देख लेगा। माँ जी जाग रही हैं," काया ने अपनी गर्दन टेढ़ी करते हुए शरारत से कहा।

भूपेंद्र ने उसके कान के पास झुककर भारी आवाज़ में कहा, "माँ जी सो रही हैं और वंशिका बाहर अपनी दुकान चला रही है। आज इस घर में सिर्फ मैं और तुम हो। कल रात जो प्यास अधूरी रह गई थी, उसे आज दिन के उजाले में पूरा करना है।"

काया ने अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबाया और झटके से उसकी पकड़ से छूटकर बाहर हॉल की ओर भागी। "पकड़ सको तो पकड़ लो साहब! आप तो बस बातों के शेर हैं।"

भूपेंद्र एक शिकारी की तरह उसके पीछे दौड़ा। काया सोफे के इर्द-गिर्द भाग रही थी और भूपेंद्र उसे पकड़ने के लिए लपक रहा था। दोनों की हँसी और काया की दबी-दबी चीखें पूरे घर में गूँज रही थीं। बगल के कमरे में लेटी मनोरमा के कानों में जब ये आवाज़ें पहुँचतीं, तो उन्हें ऐसा लगता मानो कोई उनके कानों में पिघलता हुआ सीसा डाल रहा हो। उन्हें अपने ही बेटे की यह हरकतें अब शर्मिंदा करने लगी थीं, पर वे अपनी चुप्पी की बेड़ियों में जकड़ी हुई थीं। भागते-भागते भूपेंद्र ने झपट्टा मारा और काया की नीली साड़ी का पल्लू पकड़कर खींच लिया। काया ठिठक गई, उसका आधा बदन पल्लू के बिना और भी आकर्षक लगने लगा। वह रुकी नहीं, बल्कि वहीं खड़ी होकर भूपेंद्र को अपनी अदाओं से चिढ़ाने लगी।
"क्या हुआ साहब? साँस फूल गई?" उसने तंज कसा और अपनी उंगली अपनी गर्दन के पास रखी। उसने धीरे से अपनी उंगली को अपने गले से नीचे उतारते हुए सीने के उतार-चढ़ाव से होकर अपने पेट तक फेरा। उसकी आँखें भूपेंद्र को उकसा रही थीं।

भूपेंद्र अपने होश पूरी तरह खो चुका था। उसकी आँखों में एक आदिम भूख थी। वह जैसे ही उसकी ओर अंतिम प्रहार के लिए बढ़ा, तभी अचानक घर का मुख्य दरवाज़ा खुला। वंशिका अंदर दाखिल हुई। हॉल का दृश्य देखकर वंशिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। काया का बिखरा हुआ पल्लू, उसकी उंगली का वो उत्तेजक सफर और भूपेंद्र की कामुक नज़रें—सब कुछ साफ़ था। वंशिका का दिल तिलमिला उठा, उसके भीतर एक ज्वालामुखी फटा, लेकिन वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही भूपेंद्र ने जो किया, उसने वंशिका की रूह को छलनी कर दिया।

भूपेंद्र ने वंशिका की मौजूदगी को महज़ एक पत्थर की तरह नज़रअंदाज़ किया। उसने वंशिका के सामने ही, बिल्कुल निर्लज्जता से अपना हाथ काया के पेट पर रखा और उसे सहलाते हुए बोला, "तुम्हारी इस काया का कोई जवाब नहीं है काया। ये रेशमी अहसास मुझे पागल कर देता है।"

भूपेंद्र ने काया को उसी तरह अपनी बाहों में जकड़े रखा और उसे लगभग घसीटते हुए, वंशिका को नीचा दिखाने के लिए, दोबारा किचन की ओर ले गया। जाते-जाते काया ने पलटकर वंशिका की ओर एक विजयी और ज़हरीली मुस्कान उछाली।

वंशिका वहीं खड़ी की खड़ी रह गई। उसे लगा जैसे उसके वजूद को सरेआम बाज़ार में नीलाम कर दिया गया हो। उसके अपने घर में, उसकी आँखों के सामने, उसका पति किसी और स्त्री की देह की नुमाइश कर रहा था।

वंशिका की आँखों में खून उतर आया। वह कांपते कदमों से रसोई की ओर बढ़ी, जहाँ भूपेंद्र ने काया को स्लैब से सटा रखा था। वंशिका को करीब आता देख भूपेंद्र रुका नहीं, बल्कि उसने जानबूझकर काया की कमर पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली।

"भूपेंद्र! अपनी मर्यादा मत भूलो। बच्चों की कसम, अगर तुमने अब एक कदम और आगे बढ़ाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा," वंशिका की आवाज़ में एक भयानक गर्जना थी।

भूपेंद्र ने मुड़कर उसे एक ठंडी और नफरत भरी नज़र से देखा। "मर्यादा? मर्यादा की बात तुम न ही करो तो बेहतर है वंशिका। तुम तो वैसे भी अब इस घर में एक मेहमान की तरह हो। तुम्हें तुम्हारा जिम मुबारक, मुझे मेरी काया।" यह कहकर उसने फिर से अपना हाथ काया के पेट के उसी हिस्से पर रखा जहाँ उसकी उंगली अभी-अभी फिरी थी और उसे सहलाते हुए वंशिका की ओर देखकर मुस्कुराया।

काया ने अपनी गर्दन भूपेंद्र के कंधे पर टिका दी और वंशिका की ओर देख कर अपनी आँखों को मटकाया। "साहब, दीदी को बुरा लग रहा है। देखिये न, कैसे गुस्से में लाल हो रही हैं।"

"लगने दो," भूपेंद्र ने लापरवाही से कहा। "जिसे जलन होती है, उसे जलने दो। आग तो यहाँ लगी है, जिसे सिर्फ तुम बुझा सकती हो।"

वंशिका को लगा जैसे उसका दम घुट जाएगा। वह वहां से पलटकर अपने कमरे की ओर भागी और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। रसोई से अब काया की खिलखिलाहट और भूपेंद्र की मदहोश बातें और तेज़ हो गई थीं।

मनोरमा, जो अब तक अपने कमरे में छिपी बैठी थी, बाहर आई। उसने रसोई का नज़ारा देखा और अपना सिर पीट लिया। उसे समझ आ गया था कि उसका बेटा अब उस ढलान पर है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। उसने वंशिका के बंद दरवाज़े की ओर देखा और पहली बार उसे अपनी बहू के लिए तरस आया। उसे अहसास हुआ कि जिस काया को वह वंशिका को नीचा दिखाने के लिए मोहरा बना रही थी, वह अब पूरे घर को निगलने वाला अजगर बन चुकी थी।

वंशिका कमरे के भीतर फर्श पर बैठ गई। उसने अपने कानों पर हाथ रख लिए ताकि वह उन अमर्यादित आवाजों को न सुन सके। लेकिन उसके मन में एक नई आग जल रही थी। उसे समझ आ गया था कि अब शांति और धैर्य का समय समाप्त हो चुका है। अब बारी थी उस प्रहार की, जिसकी कल्पना न भूपेंद्र ने की थी और न ही काया ने।






क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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