वंशिका जानती थी कि लोग कहेंगे—"मर्द तो मासूम होता है, वह तो फिसल गया, औरत ने ही उसे संभाला नहीं होगा।" लोग कहेंगे कि वह एक असफल पत्नी है। कोई यह नहीं पूछेगा कि भूपेंद्र ने अपने बच्चों के भविष्य का क्या सोचा? कोई यह नहीं कहेगा कि भूपेंद्र ने अपनी सात फेरों की कसमें क्यों तोड़ीं?
अगली सुबह जब घर की खिड़कियों से धूप की पहली किरण अंदर आई, तो घर का माहौल कल जैसा नहीं था। वंशिका ने अपनी आँखों के काले घेरों को मेकअप से छिपाया और रेशमी साड़ी पहनकर पूरे रौब के साथ कमरे से बाहर निकली। आज उसके चेहरे पर न आँसू थे, न ही हार का दुख। वह सीधे रसोई में पहुँची, जहाँ काया पहले से ही चाय बना रही थी।
काया ने उसे देखते ही एक कुटिल मुस्कान दी, मानो वह उसे अपनी जीत का अहसास कराना चाहती हो। लेकिन वंशिका ने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया।
"काया! आज नाश्ते में कुछ हल्का नहीं, बल्कि पराठे और पूरी-सब्जी बनेगी। और सुनो, मसालों का डिब्बा ठीक से पोंछकर रखना, गंदगी मुझे पसंद नहीं। ये चाय का कप उठाओ और जाओ पहले डाइनिंग टेबल साफ करो," वंशिका ने अधिकारपूर्ण स्वर में आदेश दिया।
काया ठिठक गई। उसे उम्मीद थी कि वंशिका आज रोएगी या उससे झगड़ा करेगी, लेकिन यह महारानी वाला अवतार उसे समझ नहीं आया। उसने भूपेंद्र की ओर देखा, जो वहीं खड़ा अखबार पढ़ रहा था। भूपेंद्र भी वंशिका के इस अचानक बदले और शांत व्यवहार को देखकर असहज था। उसे लगा था कि वंशिका घर में तांडव करेगी, पर उसकी यह खामोशी और आदेश देने का लहजा उसे डरा रहा था।
भूपेंद्र ने काया को अकेले में ले जाकर फुसफुसाते हुए समझाया, "तुम अभी इससे मत उलझना काया, मैं देख लूँगा। इसे थोड़ा घमंड दिखाने दो, फिर मैं इसे ठिकाने लगाता हूँ।" काया तो शांत हो गई, लेकिन भूपेंद्र का अहंकार उसे चुप नहीं रहने दे रहा था।
नाश्ते की मेज पर जैसे ही वंशिका ने भूपेंद्र को किसी काम के लिए टोका, भूपेंद्र फट पड़ा। दोनों के बीच तीखी बहस होने लगी। भूपेंद्र चिल्ला रहा था और वंशिका शांति से लेकिन ज़हरीले शब्दों में उसे आईना दिखा रही थी। इस चीख-पुकार के बीच विहान और अवनी सहमे हुए एक कोने में खड़े थे। विहान की आँखों में आँसू थे और अवनी अपनी गुड़िया को ज़ोर से सीने से चिपकाए काँप रही थी।
बच्चों को इस कदर घबराया देख वंशिका का कलेजा मुँह को आ गया। उसने महसूस किया कि उसकी और भूपेंद्र की इस जंग में इन मासूमों की मानसिक स्थिति कुचली जा रही है। उसने उसी पल एक कठिन निर्णय लिया। वह जानती थी कि यह घर अब बच्चों के रहने लायक नहीं रहा।
वंशिका ने अपने पिता को फोन किया। इस बार उसने अधिकार से बात की। "पापा, आप मुझे और मेरी गृहस्थी को भूल जाइये, लेकिन अपने नाती-नातिन को इस नर्क से बचा लीजिये। यहाँ रोज़ के झगड़े उन्हें अंदर से खत्म कर देंगे।" बच्चों की दुर्दशा सुनकर वंशिका के पिता का दिल पसीज गया और वे अगले ही दिन वहाँ पहुँच गए।
नाना को देखते ही विहान और अवनी उनसे लिपट गए।
मनोरमा और भूपेंद्र ने विरोध करना चाहा। मनोरमा चिल्लाई, "ऐसे कैसे हमारे घर के चिरागों को ले जा रहे हैं आप? बहू, ये तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?"
वंशिका ने आगे बढ़कर अपने पिता के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गई। उसने भूपेंद्र और मनोरमा की आँखों में आँखें डालकर कहा, "चुप रहिये! अगर आप दोनों को फिर से कोर्ट-कचहरी और बदनामी के चक्कर नहीं काटने हैं, तो खामोश रहिये। अगर पुलिस को पता चला कि आप दोनों मिलकर इस घर में क्या अनैतिक काम कर रहे हैं और उसका इन बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है, तो अंजाम बहुत बुरा होगा। बच्चों का जाना ही आप सबके हित में है।"
पुलिस और कोर्ट का नाम सुनते ही भूपेंद्र, काया और मनोरमा के चेहरे पीले पड़ गए। वे जानते थे कि वंशिका अगर ठान ले, तो उन्हें सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है। बच्चों को रोते हुए नाना के साथ गाड़ी में बैठते देख वंशिका का दिल अंदर से रो रहा था, पर उसने खुद को पत्थर बना लिया था।
अब उस बड़े से घर में सिर्फ चार लोग बचे थे—काया, भूपेंद्र, वंशिका और मनोरमा। बच्चों के जाते ही भूपेंद्र को जैसे एक अजीब सी खुली छूट मिल गई। उसे अब बच्चों के सामने शर्मिंदा होने का डर नहीं था।
उसने वंशिका की उपस्थिति को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। अब वह काया के साथ और भी ज़्यादा निर्लज्जता से पेश आने लगा। घर में एक अजीब सा त्रिकोण बन गया था—जहाँ एक तरफ भूपेंद्र और काया की बेशर्मी थी, दूसरी तरफ मनोरमा की लाचार खामोशी, और तीसरी तरफ वंशिका की वह ठंडी साज़िश, जो अब फटने के लिए तैयार थी।
भूपेंद्र को लगा कि वह जीत गया है, लेकिन वह नहीं जानता था कि बच्चों को सुरक्षित भेजकर वंशिका ने दरअसल अपने हाथ खोल लिए थे। अब वह बिना किसी कमज़ोरी के इस शतरंज के खेल में अपना आखिरी मोहरा चलने वाली थी।
घर का माहौलपूरी तरह ज़हरीला हो चुका था। भूपेंद्र की आँखों में अब वंशिका के लिए सम्मान तो दूर, सामान्य शिष्टाचार भी बाकी नहीं रहा था। वह उसे देखते ही चिढ़ने लगता था, जैसे वंशिका उसकी सुख-सुविधाओं के बीच एक अनावश्यक बाधा हो। काया के मोहपाश में भूपेंद्र इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे अपनी ज़िम्मेदारियों का भी होश नहीं रहा।
भूपेंद्र ने दफ्तर से बेवजह छुट्टियाँ लेनी शुरू कर दी थीं। उसे हर पल यह डर सताता रहता था कि कहीं उसके दफ्तर जाते ही वंशिका अपनी चतुराई से काया को अपमानित करके घर से बाहर न निकाल दे। वह काया का एक स्वघोषित अंगरक्षक बनकर चौबीसों घंटे घर पर ही डेरा डाले रहता। काया भी अब रसोई से ज़्यादा भूपेंद्र के इर्द-गिर्द मंडराने लगी थी।
घर के इस क्लेश का सीधा असर वंशिका के काम पर पड़ने लगा। तनाव और रातों की नींद उड़ने की वजह से उसने जिम जाना कम कर दिया था, जिसका नतीजा यह हुआ कि क्लाइंट्स कम होने लगे और उसकी सालों की मेहनत से सींचा गया जिम बर्बादी की कगार पर पहुँचने लगा।
एक सुबह, आईने के सामने खड़ी वंशिका ने खुद को देखा। उसने ठान लिया कि वह इन दो लोगों की वजह से अपना अस्तित्व नहीं मिटाएगी। उसे एक गहरी सच्चाई का अहसास हुआ—भूपेंद्र अभी आकर्षण के उस अंधे वेग में बह रहा है जहाँ उसे गलत और सही का अंतर नहीं दिख रहा। लेकिन वंशिका जानती थी कि समाज में जो
अधिकार, जो रुतबा और जो मर्यादा एक पत्नी की होती है, वह काया कभी नहीं पा सकती। घर की चारदीवारी में भूपेंद्र चाहे काया को रानी बना दे, लेकिन बाहर की दुनिया में वह हमेशा दूसरी औरत ही कहलाएगी।
वंशिका ने मन ही मन सोचा, "पत्नी की जगह कोई नहीं ले सकता। आज वह अंधा है, लेकिन जिस दिन हकीकत की ठोकर लगेगी, उसे लौटकर मेरे पास ही आना होगा।"
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
सर्वाधिकार सुरक्षित