Double Game - 25 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 25

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 25

वंशिका अपने अंधेरे कमरे में अकेले बैठी थी। पंखे की आवाज़ उसे किसी पुराने जख्म को कुरेदने जैसी लग रही थी। वह शून्य में ताकते हुए सोच रही थी—'गलती कहाँ हुई? कब और कैसे मेरी सत्ता मेरे ही हाथों से रेत की तरह फिसल गई?'
उसने अपनी शादी के शुरुआती दिनों को याद किया। वह दौर, जब वह एक आदर्श बहू बनने की दौड़ में अपनी पहचान खो चुकी थी। ससुराल वालों की उंगली के इशारों पर नाचना उसकी दिनचर्या थी। मनोरमा ने उसे किसी कठपुतली की तरह घुमाया था। घर के अंतहीन काम, लोगों के सामने नीची गर्दन, और यहाँ तक कि उसकी इच्छाओं की बलि। उन लोगों ने उसकी अच्छी-खासी नौकरी छुड़वा दी थी और उसका मायके जाना भी लगभग बंद करवा दिया था। उसे एक-एक पैसे, एक-एक चीज़ के लिए मोहताज बना दिया गया था।
तब इन्हीं मायके वालों ने, जिन्हें आज वह अपनी व्यथा सुना रही थी, उसे सहारा दिया था। उन्होंने उसे टूटने से बचाया, उसे मज़बूत बनाया और उसे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी। बच्चों के जन्म के बाद दोबारा करियर शुरू करना पहाड़ जैसा काम था। विहान और अवनी के जन्म के बाद उसका शरीर भारी हो गया था। वह बिल्कुल वैसी ही 'मोटी' दिखने लगी थी जैसी आज काया है।
भूपेंद्र को तब उसका वह मोटापा ज़हर लगता था। वह अक्सर ताना मारता था, "वंशिका, जिम में ट्रेनिंग दे रही हो, कम से कम खुद तो थोड़ा फिट हो जाओ। तुम्हें देखकर कौन जिम आएगा?" वंशिका ने उस ताने को चुनौती की तरह लिया। उसने खुद को तराशा, अपना वजन कम किया और फिर से वही छरहरी वंशिका बन गई जो भूपेंद्र को पसंद थी।
उस दौर में भूपेंद्र की तनख्वाह मात्र ₹20,000 थी। वह आज भी याद करती है कि कैसे उन 20 हज़ार में से भूपेंद्र चुपचाप 10 हज़ार अपनी माँ को भेज देता था। मनोरमा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनके बेटे का घर 10 हज़ार में कैसे चलेगा। बच्चों की स्कूल फीस, गाड़ी की किश्त, दूध-सब्जी का खर्च... वह एक भयानक दौर था। लेकिन वंशिका ने कभी शिकायत नहीं की। आम महिलाओं के विपरीत, उसने कभी यह नहीं सोचा कि 'मेरी कमाई सिर्फ मेरी है'। उसने अपनी तनख्वाह घर के खर्चों में झोंक दी। उसी के संघर्ष की बदौलत भूपेंद्र को कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ा।

तरक्की के साथ-साथ महत्वाकांक्षाओं ने भी जन्म लिया। मायके वालों की मदद से जब वंशिका ने अपना खुद का जिम खोला, तो उसकी दुनिया बदल गई। शहर के रईस घरानों की बहुएं-बेटियां उसके जिम में आने लगीं। उनके साथ उठने-बैठने से वंशिका का ब्रेनवाश होने लगा। उसे लगने लगा कि उसे भी अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीनी चाहिए, उसे भी लग्जरी और खुद पर खर्च करने का हक़ है।
जब तक काया इस घर में नहीं थी, वंशिका अकेले ही घर और जिम के बीच संतुलन बना रही थी। लेकिन अचानक महिलाओं में जिम जाने का क्रेज बढ़ा और वंशिका का काम दुगना हो गया। वह थकने लगी थी। तब यही भूपेंद्र था जिसने प्यार से सलाह दी थी, "वंशिका, तुम बहुत थक जाती हो। एक फुल-टाइम कामवाली रख लो, तुम्हें मदद मिल जाएगी।"
और तब काया आई। शुरू के 8-10 महीनों तक काया ऐसी रही जैसे दुनिया की सबसे लाचार और बेसहारा औरत हो। वह फटे हाल, रोती हुई आँखों और दीन-हीन स्वर में अपनी दुखभरी कहानियाँ सुनाती थी। वंशिका को उस पर तरस आ गया। उसने काया को सिर्फ एक नौकरानी नहीं, बल्कि घर का सदस्य मान लिया। उसने उसे अपने पुराने कपड़े दिए, उसे मान-सम्मान दिया।
वंशिका ने एक लंबी और भारी साँस ली। उसे अब समझ आया कि सबसे बड़ी गलती उसने वहीं की थी। रईस घरानों की बहुएं, जो उसके जिम में आती थीं, वे सही कहती थीं—"कामवाली कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसे पाँव की जूती बनाकर रखना चाहिए, गले का हार नहीं।" वंशिका ने काया को गले का हार बनाया और आज वही हार उसके गले का फंदा बन गया था।

उसे याद आया कि कैसे धीरे-धीरे भूपेंद्र के सुर बदले थे। जो भूपेंद्र शुरू में कहता था कि "फुल-टाइम मेड की क्या ज़रूरत है?", वही अब दिन-रात "काया... काया" जपने लगा था। वही भूपेंद्र जो उसे कभी बैलेंस बनाने का ज्ञान देता था, आज उसी ने संतुलन बिगाड़ दिया था।

वंशिका की आँखों से एक गरम आंसू ढलक गया। उसे महसूस हुआ कि उसने जिस औरत को आसरा दिया, उसी ने उसके घर की नींव में दीमक लगा दी। और उसका अपना पति, जिसके लिए उसने अपनी जवानी और अपनी कमाई कुर्बान कर दी, वह आज उसी मोटापे और साधारणपन की ओर खिंचा चला गया जिससे वह कभी नफरत करता था। काया का वह भोलापन दरअसल एक बिछाया हुआ जाल था, जिसमें भूपेंद्र पूरी तरह फंस चुका था।

कमरे के बाहर से काया की खिलखिलाहट सुनाई दी। वह विहान और अवनी से कुछ बात कर रही थी। वंशिका को लगा जैसे उसके अपने ही बच्चे उससे छीने जा रहे हों। उसे समझ आ गया था कि यह युद्ध अब सिर्फ हक़ का नहीं, बल्कि अस्तित्व का है। उसके मायके वालों ने हाथ खींच लिए थे, पति पराया हो चुका था, और सासू माँ तटस्थ थीं।

वंशिका ने अपने आंसू पोंछे और अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। "मैंने तुम्हें उंगली पकड़ाई थी काया, और तुमने मेरा सर पकड़ लिया। लेकिन याद रखना, जिस जिम की ट्रेनिंग देकर मैंने अपना शरीर बदला है, उसी ट्रेनिंग ने मेरे इरादों को भी लोहे जैसा बनाया है।"

वह जानती थी कि अब तक वह घर की बहू बनकर खेल रही थी, लेकिन अब उसे योद्धा बनकर लड़ना होगा। उसे वह सब वापस पाना था जो उसका था, चाहे उसके लिए उसे अपनी मर्यादा की सीमाओं को और भी ज़्यादा खींचना पड़े। वंशिका अंधेरे कमरे में बैठी इन कड़वी यादों को मथ रही थी। बाहर हॉल में भूपेंद्र और काया की दबी-दबी फुसफुसाहट और कभी-कभी गूँजने वाली हँसी उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी। वंशिका ने अपनी मुट्ठियाँ इतनी ज़ोर से भींचीं कि उसके नाखून हथेलियों में गड़ गए।

उसने खुद से एक सवाल किया—"क्या सारा दोष मेरा है? क्या सिर्फ इसलिए कि मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, मैंने अपने पति को खो दिया?"

नहीं। वंशिका की अंतरात्मा ने चीखकर जवाब दिया। उसने फैसला किया कि वह काया को उसकी जगह याद दिलाकर रहेगी, लेकिन सिर्फ काया ही क्यों? भूपेंद्र कौन सा दूध का धुला था? एक शादीशुदा मर्द, दो मासूम बच्चों का बाप, जिसका समाज में एक सम्मानजनक ओहदा है—क्या उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी? क्या उसकी मर्यादा सिर्फ कागज़ों तक सीमित थी? अपनी हवस और क्षणिक सुख के लिए उसने अपनी पत्नी के त्याग, उसके संघर्ष और उसके वजूद को एक झटके में मिट्टी में मिला दिया।

गलती सिर्फ वंशिका की नहीं थी। काया और भूपेंद्र भी बराबर के गुनहगार थे। एक ने नमकहरामी की थी और दूसरे ने विश्वासघात। लेकिन वंशिका एक कड़वी हकीकत जानती थी। वह जानती थी कि कल जब यह बात घर की चारदीवारी से बाहर निकलेगी, तो यह जालिम समाज भूपेंद्र को 'भटका हुआ राही' कहकर माफ कर देगा और काया को 'मजबूर' बता देगा, लेकिन सारा ठीकरा सिर्फ वंशिका के माथे ही फोड़ा जाएगा।

वंशिका अपनी आँखें बंद किए कल्पना कर रही थी कि अगर उसने आज स्टैंड लिया, तो लोग उस पर कैसे तीखे बाण छोड़ेंगे। उसे वे चेहरे और वे आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं.....:::: पड़ोस की महिलाएं कह रही थी: "अरे, बहुत शौक था न इसे जिम जाने का? सारा दिन पराए मर्दों को कसरत कराती थी, अब अपना घर ढह गया तो कैसा लग रहा है? अपने मर्द को वश में रखना नहीं आया, चली थी दुनिया बदलने। जो औरत चूल्हा-चौका छोड़कर बाहर पैर निकालती है, उसका यही हश्र होता है।"
फिर रिश्तेदार की आवाज़ें आने लगी......: "नौकरी और पैसे का घमंड सर चढ़कर बोलता था। ससुराल वालों से अलग रहने की ज़िद की थी न? अब भुगतो। अगर सासू माँ की सेवा की होती और घर में टिकी रहती, तो पति की नज़र कभी बाहर नहीं जाती। मर्द तो वही ढल जाता है जहाँ उसे सेवा और शांति मिलती है।"
और जिम के लोग...: "देखा? घर तो संभला नहीं, हमें ट्रेनिंग देती थी। खुद फिट हो गई पर अपनी गृहस्थी को अनफिट कर दिया। पति को तो प्यार चाहिए था, इसने उसे सिर्फ प्रोटीन शेक और डाइट चार्ट पकड़ा दिया। घर में प्यार नहीं मिलेगा तो आदमी बाहर जाकर तो भूख मिटाएगा ही । आदमी की क्या गलती..?"