Double Game - 22 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 22

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 22

शाम का धुंधलका गहराने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग की लकीरें उभर आई थीं। घर में एक अजीब सी खामोशी छाई थी; मनोरमा और शिखा ड्राइंग रूम में टीवी के सामने थीं और वंशिका बच्चों को होमवर्क कराने में व्यस्त थी।

भूपेंद्र ने देखा कि बालकनी में सूखे हुए कपड़े अभी भी टंगे हैं। उसने रसोई की खिड़की से झाँकती काया को इशारा किया और खुद सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। काया समझ गई। वह हाथ पोंछती हुई दबे पाँव छत की ओर भागी।
छत पर सन्नाटा था। ठंडी हवाएं चल रही थीं। जैसे ही काया ने तार से कपड़े उतारने शुरू किए, पीछे से भूपेंद्र ने आकर उसे घेर लिया। उसने काया की कमर के गिर्द अपनी बाहें डाल दीं और अपना चेहरा उसकी गर्दन के पास झुका दिया।

"पूरा दिन तरसाया है तुमने काया... अब और सब्र नहीं होता," भूपेंद्र की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी। वह उसे अपनी ओर घुमाकर गले लगाने ही वाला था कि अचानक नीचे से विहान और अवनी की आवाज़ें और उनके पैरों की आहट सुनाई दी। "मम्मा ने कहा है कि ऊपर से कपड़े ले आओ!"

काया ने झटके से खुद को भूपेंद्र की बाहों से छुड़ाया और तेज़ी से कपड़े समेटने लगी। वह भूपेंद्र की ओर देखकर दबी आवाज़ में हंसी और चिढ़ाते हुए बोली, "साहब, कहा था न आज आपकी किस्मत खराब है। जाइये, वरना बच्चे देख लेंगे।"

भूपेंद्र मुट्ठियाँ भींचकर वहीं खड़ा रह गया। विहान और अवनी ऊपर आ गए और अपने पिता को वहां देखकर चहकने लगे। भूपेंद्र को अपनी ज़िंदगी में पहली बार अपनी ही औलादें अपनी दुश्मन लग रही थीं। वह तिलमिलाकर रह गया, उसका मन कर रहा था कि ज़ोर से चिल्लाए, पर उसे मुस्कुराकर बच्चों के साथ नीचे उतरना पड़ा।

रात का सन्नाटा अब घर को अपनी आगोश में ले चुका था। भूपेंद्र बिस्तर पर पड़ा करवटें बदल रहा था, पर उसकी तड़प अब बर्दाश्त के बाहर हो चुकी थी। उसके दिमाग में काया का वह नीली साड़ी वाला रूप और उसकी वो चिढ़ाती हुई हंसी बार-बार गूँज रही थी। वंशिका गहरी नींद में थी। भूपेंद्र दबे पाँव उठा। उसे अब किसी का डर नहीं था। वह सीधा रसोई में पहुँचा जहाँ काया आखिरी काम निपटा रही थी। काया ने जैसे ही मुड़कर उसे देखा, वह कुछ कहने ही वाली थी कि भूपेंद्र ने बिना एक शब्द कहे उसे दबोच लिया। इस बार भूपेंद्र के इरादे नेक नहीं थे। काया उसके हाथों की पकड़ देखकर कसमसाई, उसने बचने की हल्की कोशिश की, "साहब... छोड़िये... कोई आ जाएगा," लेकिन भूपेंद्र अपने होश पूरी तरह खो चुका था। उसकी आँखों में एक आदिम जुनून था।
भूपेंद्र ने अपना एक हाथ काया की लचीली कमर पर कस दिया और दूसरे हाथ से उसकी गर्दन को पीछे की ओर सहारा दिया। काया की सांसें थम गईं। अगले ही पल, भूपेंद्र ने अपनी सारी प्यास और दिन भर की तड़प को समेटते हुए काया के होंठों को जमकर चूम लिया।
वह चुंबन अधिकार का था, वर्जित प्रेम का था और उस हर मर्यादा को तोड़ने का था जो अब तक उनके बीच खड़ी थी। काया का शरीर एक पल के लिए काँपा, फिर वह भी उस बहाव में बहने लगी। रसोई की दीवारों ने उस रात एक ऐसे गुनाह को होते देखा, जिसकी गूँज इस घर की बुनियाद हिलाने वाली थी। भूपेंद्र ने उसे अपनी बाहों में ऐसा भींच रखा था जैसे वह उसे अपने भीतर ही समा लेना चाहता हो। काया की बंद आँखों से एक बूंद आँसू की टपकी, पर वह दुख का नहीं, उस समर्पण का था जिसे वह बहुत पहले स्वीकार कर चुकी थी। भूपेंद्र ने जब काया के होंठों को छोड़ा, तो दोनों की सांसें उखड़ी हुई थीं। रसोई की मद्धम रोशनी में भूपेंद्र की आँखें लाल हो रही थीं—उन आँखों में न केवल वासना थी, बल्कि दिन भर की उस तड़प का गुस्सा भी था जो उसे बार-बार मिल रहे अवरोधों से उपजा था। काया ने एक पल के लिए पीछे हटने की कोशिश की, उसकी धड़कनें उसके सीने को चीर देने पर आमादा थीं। लेकिन भूपेंद्र को जैसे आज कोई भय नहीं था। उसने काया को फिर से दबोचा और इस बार पहले से कहीं अधिक शिद्दत और दीवानगी के साथ उसके होंठों को अपने अधिकार में ले लिया। यह चुंबन नहीं था, यह एक प्यासे की वह तड़प थी जो बरसों के सूखे के बाद पानी की एक बूंद को भी निगल जाना चाहता हो।

काया, जो अब तक केवल मर्यादा के डर से काँप रही थी, भूपेंद्र की इस बेतहाशा शिद्दत को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी। उसने भी अपने हाथ भूपेंद्र के गले में डाल दिए और उसे अपने आगोश में भर लिया। जैसे ही भूपेंद्र को काया की ओर से यह मौन स्वीकृति मिली, उसका हाथ बिजली की गति से काया की साड़ी के पल्लू को पार करता हुआ उसकी नग्न पीठ और पेट के हिस्से को सहलाने लगा।

भूपेंद्र की हथेलियों ने काया के मांस को अपनी मुट्ठी में भरा, जैसे वह यह यकीन करना चाहता हो कि यह सपना नहीं, बल्कि हकीकत है।

"आह... साहब..." काया के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। उसका शरीर तन गया था। "छोड़िये... कोई... कोई आ जाएगा... माँ जी या दीदी जाग गई तो सब खत्म हो जाएगा..."

लेकिन भूपेंद्र पर जैसे कोई भूत सवार था। वह किसी शिकारी की तरह काया की गर्दन पर झुक गया। वह उसकी गर्दन के नाजुक हिस्से को अपनी गरम सांसों और होंठों से जलाने लगा। उसने एक हाथ से काया को और भी ज़ोर से अपनी ओर भींचा, जैसे वह उसे अपने वजूद में ही समा लेना चाहता हो।
"आने दो किसी को... आज मुझे किसी की परवाह नहीं," भूपेंद्र ने काया के कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा और फिर से उसके होंठों को चूमने लगा। वह बार-बार उसे चूम रहा था, जैसे दिन भर जो उसे बच्चों ने और वंशिका ने परेशान किया था, वह उन सबका बदला काया से वसूल रहा हो।

काया के लिए यह सब कुछ डरावना भी था और जादुई भी। वह भूपेंद्र के हाथों के नीचे मोम की तरह पिघल रही थी। उसे पता था कि वह आग से खेल रही है, लेकिन भूपेंद्र की दीवानगी उसे इस आग में जलने के लिए मजबूर कर रही थी। रसोई का वह कोना उस रात एक ऐसे गुप्त और गहरे मिलन का गवाह बन गया, जिसने भूपेंद्र और काया के बीच की सामाजिक दीवारों को हमेशा के लिए ढहा दिया था।

भूपेंद्र ने उसे अपनी बाहों में जकड़े रखा, उसकी उंगलियाँ काया के शरीर के हर हिस्से को अपनी मिल्कियत समझकर टटोल रही थीं। रात की उस गहराई में, सन्नाटे को केवल उनकी भारी सांसें और काया की बीच-बीच में निकलने वाली दबी हुई सिसकियाँ ही तोड़ रही थीं। 
काया जो कल तक सिर्फ एक बेसहारा औरत थी... जिसने वंशिका के यहां पनाह पाई थी अब उसी पनाहगार को अपना आशियाना समझने लगी थी। और वंशिका... अपनी खुद को बुरा बनाने से बचने के चक्कर में, दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश में अपने ही रिश्ते को खत्म कर रही थी। 




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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