Double Game - 21 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 21

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 21

अगली सुबह जब घर के सदस्य डाइनिंग टेबल पर नाश्ते के लिए इकट्ठा हुए, तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गई। रसोई से काया बाहर आई, लेकिन वह रोज़ वाली साधारण सूती साड़ी में नहीं थी। उसने वही आसमानी नीली सिल्क की साड़ी पहन रखी थी जिसे भूपेंद्र ने बाज़ार में पसंद किया था। उस साड़ी में काया का रूप निखर कर आ रहा था; वह किसी घर की नौकरानी नहीं बल्कि किसी रईस खानदान की बहू जैसी लग रही थी।

वंशिका ने उसे सिर से पाँव तक देखा और उसका माथा ठनका। "काया! यह साड़ी? यह तो कल बाज़ार में जो साड़ियाँ भूपेंद्र लाया था, वैसी ही लग रही है। तुम्हारे पास यह कहाँ से आई?"

मनोरमा और शिखा ने भी अपनी चाय का प्याला मेज पर टिका दिया। शिखा ने चुटकी लेते हुए पूछा, "हाँ काया, इतनी महंगी साड़ी पहनने का शौक कैसे चर्राया? और यह आई कहाँ से?"

काया ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए बड़ी चतुराई से जवाब दिया, "दीदी, यह... यह साड़ी मेरी मौसी ने भेजी है। उनके बेटे की शादी तय हुई है न, तो उन्होंने शगुन के तौर पर भेजी थी। कल बाज़ार में साहब को साड़ियाँ लेते देखा तो मुझे याद आया कि मेरे पास भी ऐसी ही एक रखी है, सोचा आज पहन लूँ।"

भूपेंद्र चुपचाप अपना नाश्ता कर रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। जब उसने काया की ओर देखा, तो उसकी नज़रों में रात वाला वो गहरा राज़ तैर रहा था। काया ने जैसे ही भूपेंद्र की नज़रों से नज़रें मिलाईं, उसे अपनी कमर पर रात वाली वो चिकोटी फिर से महसूस हुई। उसके गाल गुलाबी हो गए।

वंशिका को शक तो हुआ, पर वह खामोश रही। उसे याद था कि रात को जब उसकी नींद खुली थी, तो बिस्तर का भूपेंद्र वाला हिस्सा खाली था। उसे लगा था कि शायद वह पानी पीने गया होगा, पर अब कड़ियाँ जुड़ने लगी थीं।

संयोग से उस दिन शनिवार था और भूपेंद्र की दफ्तर से छुट्टी थी। छुट्टी का मतलब था—पूरा दिन घर पर। लेकिन भूपेंद्र के लिए यह छुट्टी किसी परीक्षा से कम नहीं थी। रात के उस अधूरे स्पर्श और काया की नीली साड़ी के जादू ने उसे भीतर तक बेचैन कर दिया था। वह बस एक मौके की तलाश में था कि कैसे काया को एक बार फिर छुए, उसे महसूस करे।

भूपेंद्र बार-बार हॉल से किचन की ओर चक्कर काट रहा था। कभी पानी माँगने के बहाने, तो कभी अखबार ढूँढने के बहाने। मनोरमा और शिखा टीवी देखने में व्यस्त थीं और वंशिका अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी।
काया सीढ़ियों के पास सफाई कर रही थी। भूपेंद्र ने देखा कि वहां कोई नहीं है। वह धीरे से उसके पास से गुज़रा और बहुत ही मद्धम आवाज़ में फुसफुसाया, "नीली साड़ी में कत्ल करने का इरादा है क्या? रात की टीस अभी गई नहीं और तुम आग लगा रही हो।"

काया ने शरमाकर पल्लू से मुँह ढका। "साहब, कोई देख लेगा, जाइये यहाँ से।"

"देखने दो," भूपेंद्र की आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी। उसका हाथ अनजाने में फिर से काया की बांह को छूने के लिए बढ़ा, लेकिन तभी ऊपर से वंशिका की आवाज़ आई, "भूपेंद्र! ज़रा इधर आना, बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट के बारे में कुछ बात करनी है।"

भूपेंद्र झल्लाकर रह गया। उसे लगा जैसे किसी ने जलते हुए तवे पर ठंडा पानी डाल दिया हो। वह ऊपर तो चला गया, पर उसका मन नीचे सीढ़ियों पर काया के पास ही अटका रहा। वह किसी प्यासे की तरह मौके की तलाश में था, और काया भी जानती थी कि आज का दिन बहुत लंबा और रोमांचक होने वाला है।

भूपेंद्र के भीतर एक ऐसी आग सुलग रही थी जो मर्यादा की हर दीवार को राख करने के लिए बेताब थी। उसे अब बस उस पल का इंतज़ार था जब वह और काया एक बार फिर अकेले हों।

भूपेंद्र के लिए उस दिन का एक-एक मिनट पहाड़ जैसा भारी हो रहा था। उसके दिमाग में रात का वह रेशमी स्पर्श और काया का वह थरथराता हुआ वजूद किसी फिल्म की तरह चल रहा था। वह बस एक बार काया को अकेले में पकड़ना चाहता था, उसे फिर से यह अहसास दिलाना चाहता था कि अब वह उसकी पहुँच से दूर नहीं है।

दोपहर का वक्त था। मनोरमा देवी सोफे पर झपकी ले रही थीं। शिखा अपने कमरे में फोन पर व्यस्त थी। भूपेंद्र ने देखा कि काया डाइनिंग टेबल साफ कर रही है। उसने गहरी सांस ली और दबे पाँव उसकी ओर बढ़ा। जैसे ही वह काया के पीछे पहुँचा और अपना हाथ उसकी साड़ी के पल्लू को छूने के लिए बढ़ाया, तभी ऊपर से वंशिका की तीखी आवाज़ गूँजी। "भूपेंद्र! क्या तुम नीचे ही रहोगे? विहान का लैपटॉप चार्जर नहीं मिल रहा है, इसके प्रोजेक्ट में जो मैटीरियल चाहिए वो नहीं मिल रहे... ज़रा ऊपर आकर ढूँढने में मदद करो।"

भूपेंद्र का हाथ हवा में ही ठिठक गया। उसने दांत पीसते हुए छत की ओर देखा। "आ रहा हूँ वंशिका!" वह झुंझलाकर ऊपर चला गया।

काया ने अपनी हँसी दबाई। वह जानती थी कि साहब की क्या हालत हो रही है। नीली साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए उसने एक तिरछी नज़र सीढ़ियों की ओर डाली।

दस मिनट बाद भूपेंद्र फिर नीचे आया। इस बार उसने बहाना बनाया कि उसे प्यास लगी है। वह सीधा रसोई में गया। काया वहां आटा गूँध रही थी। भूपेंद्र ने फ्रिज खोला और ठंडा पानी पीने लगा, उसकी नज़रें काया की झुकी हुई गर्दन और नीली साड़ी से छलकती उसकी कमर पर थीं।
वह धीरे से उसके करीब गया और बहुत मद्धम स्वर में बोला, "सब दुश्मन बने बैठे हैं आज। एक पल चैन से बैठने नहीं दे रहे।"

काया ने बिना सिर उठाए कहा, "साहब, ये घर है, बाज़ार नहीं। यहाँ हर दीवार के कान हैं।"

भूपेंद्र ने पानी का गिलास रखा और जैसे ही काया के कंधे पर हाथ रखने के लिए हाथ बढ़ाया, मनोरमा देवी की आवाज़ हॉल से आई, "काया! ओ काया! ज़रा यहाँ आकर मेरे पैर दबा दे, बड़ी थकान हो रही है।"

काया ने फुर्ती से अपने हाथ पोंछे और भूपेंद्र को एक चिढ़ाने वाली मुस्कान देकर बाहर निकल गई। भूपेंद्र खाली गिलास पकड़े वहीं खड़ा रह गया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बहुत बढ़िया निवाला उसके मुँह तक आकर छिन गया हो।

करीब एक घंटे बाद, भूपेंद्र ने फिर से मोर्चा संभाला। उसने देखा कि शिखा और वंशिका अपनी बातों में मग्न हैं और माँ सो रही हैं। उसने काया को स्टोर रूम की तरफ जाते देखा। वह पीछे-पीछे गया और जैसे ही उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा अंदर से बंद करने की कोशिश की, शिखा बाहर से चिल्लाई। "भैया! आपकी कंपनी से किसी का फोन है, वो कह रहे हैं बहुत ज़रूरी काम है।"

भूपेंद्र ने ज़ोर से अपना हाथ दीवार पर मारा। "अभी बात करता हूँ!"

स्टोर रूम के अंधेरे में काया ने दबी आवाज़ में कहा, "साहब, मान जाइये। आज किस्मत आपके साथ नहीं है। जाइये, वरना शक हो जाएगा सबको।"

भूपेंद्र का चेहरा गुस्से और तड़प से लाल था। "किस्मत 
को छोड़ो काया, आज मैं हार नहीं मानूँगा। ये लोग कब तक पहरा देंगे? शाम होने दो, फिर देखता हूँ।"

पूरे दोपहर यही सिलसिला चलता रहा। कभी वंशिका बुला लेती, कभी बच्चे शोर मचा देते, तो कभी मनोरमा देवी की फरमाइशें खत्म नहीं होतीं। हर बार जब भूपेंद्र और काया के बीच की दूरी कम होने वाली होती, कोई न कोई कबाब में हड्डी बन जाता।

भूपेंद्र की बेचैनी अब उसके चेहरे पर साफ दिखने लगी थी। वह किसी पिंजरे में बंद शेर की तरह इधर-उधर टहल रहा था। वहीं काया, नीली साड़ी में लिपटी, अपनी हर अदा से उसे और भी ज़्यादा बेचैन कर रही थी। उसे मज़ा आ रहा था साहब को इस तरह तड़पते देख। वह जानती थी कि यह इंतज़ार रात को और भी ज़्यादा रोमांचक बना देगा।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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