बाजार से लौटते वक्त काया के कदम हवा में थे, लेकिन दिमाग सचेत था। उसे पता था कि अगर वे साथ घर घुसे, तो वंशिका की पारखी नज़रें और मनोरमा की शक की सुई उन्हें चीर देगी। उसने बीच रास्ते में ही भूपेंद्र को रुकने का इशारा किया।
"साहब, आप पहले जाइये। मैं सब्ज़ियों के बहाने पीछे से आती हूँ। बवाल हो जाएगा वरना," काया ने अपनी साड़ी का पैकेट बड़ी चतुराई से प्लास्टिक के थैले में सब्ज़ियों के नीचे छिपाते हुए कहा।
भूपेंद्र मुस्कुराया, उसकी आँखों में एक नई शरारत थी। "तुम बहुत तेज़ हो काया।"
भूपेंद्र पहले घर पहुँचा। वह बेहद खुश दिख रहा था। उसने एक-एक करके सबके पैकेट खोले। मनोरमा के लिए चटक रंग की साड़ी, शिखा के लिए आधुनिक प्रिंट, और विहान-अवनी के लिए नए कपड़े। उसने वंशिका की ओर भी एक पैकेट बढ़ाया—"ये तुम्हारे लिए, सिम्पल और सोबर।"
वंशिका ने साड़ी देखी, वह सुंदर थी पर उसमें वो गर्माहट नहीं थी जो कभी भूपेंद्र के तोहफों में होती थी।
सबने गौर किया कि भूपेंद्र काया के लिए कुछ नहीं लाया। शिखा ने तो ताना भी मारा, "भैया, अपनी वफादार काया के लिए कुछ नहीं लाए? बेचारी दिन-रात खटती है।"
भूपेंद्र ने बस कंधे उचका दिए, "उसे क्या चाहिए होगा, छोड़ो।"
किसी को भनक तक नहीं लगी कि काया को उसका इनाम बाज़ार में ही मिल चुका है। काया कुछ देर बाद पीछे के दरवाज़े से आई और चुपचाप अपनी नीली साड़ी को अलमारी के सबसे पीछे वाले कोने में छिपा दिया।
रात के साढ़े दस बज चुके थे। घर में सन्नाटा था। भूपेंद्र बिस्तर पर लेटा था, बगल में वंशिका गहरी नींद में थी। लेकिन भूपेंद्र की बंद आँखों के सामने बार-बार बाज़ार का वह दृश्य आ रहा था। वह भीड़, वह धक्का और फिर उसका हाथ काया के रेशमी पेट पर जम जाना। वह स्पर्श उसके दिमाग़ में किसी नशे की तरह चढ़ गया था।
उसने करवट बदली और अनजाने में ही अपना हाथ सोई हुई वंशिका के पेट पर रखा। एक पल के लिए उसने महसूस करने की कोशिश की, लेकिन वह फील गायब था।
वंशिका जिम जाकर फिट तो थी, उसका शरीर सुगठित था, लेकिन भूपेंद्र को वह अब मशीनी सा लगने लगा था। जबकि शादी के बाद जब वंशिका भी काया की तरह छरहरी होने लगी थी तो भूपेंद्र को वो मोटी लगने लगी थी और वो चाहता था उसकी बीवी स्लिम रहे । लेकिन अब वो फिट वंशिका उसे मशीनी लग रही थी । उसकी तुलना में काया की वह छरहरी और कोमल काया भूपेंद्र को कहीं अधिक उत्तेजित कर रही थी। उसे वंशिका का अनुशासन अब बोझ लगने लगा था।
दीवार घड़ी ने ग्यारह बजाए। भूपेंद्र को पता था कि काया अभी जाग रही होगी, वह अक्सर देर रात तक रसोई के आखिरी काम निपटाती थी। उसके भीतर की अधीरता अब बेकाबू हो रही थी। वह दबे पाँव बिस्तर से उठा और चोरों की तरह कमरे से बाहर निकल आया।
रसोई में एक मद्धम सी रोशनी जल रही थी। काया पीठ फेरकर बर्तन स्टैंड पर लगा रही थी। जैसे ही उसने फर्श पर एक परछाईं देखी, वह बुरी तरह घबरा गई। वह पलटकर चीखने ही वाली थी कि भूपेंद्र ने फुर्ती से झपटकर उसके मुँह पर अपना हाथ रख दिया।
दोनों के बीच अब एक इंच की दूरी भी नहीं बची थी। काया की पीठ स्लैब से जा लगी थी और सामने भूपेंद्र का भारी वजूद था। काया की सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं। उसकी छाती भूपेंद्र के सीने से टकरा रही थी। मुँह पर भूपेंद्र के हाथ का दबाव था, लेकिन उसकी आँखों में दहशत के साथ-साथ एक अजीब सी कशमकश थी।
भूपेंद्र ने मुँह से हाथ नहीं हटाया, बल्कि काया के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "मार्केट से आने के बाद से बेचैन हूँ काया। अजीब सा लग रहा है, पता नहीं क्यों... नींद आँखों से कोसों दूर है।"
काया ने कुछ बोलने की कोशिश की, पर आवाज़ मुँह के अंदर ही दब गई। भूपेंद्र ने उसे और भी करीब खींच लिया। "बोलती क्यों नहीं?"
काया ने बड़ी-बड़ी आँखें दिखाकर उसके हाथ की ओर इशारा किया। भूपेंद्र ने धीरे से हाथ हटाया, लेकिन वह पीछे नहीं हटा। उसका चेहरा काया के इतना करीब था कि उनकी सांसें आपस में उलझ रही थीं।
"साहब... डरा दिया आपने। कोई देख लेता तो?" काया ने थरथराती आवाज़ में कहा।
"देखने दो," भूपेंद्र की आवाज़ में एक भारीपन था। "तुम्हारा वो स्पर्श मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा है। बाज़ार में जब तुम्हें छुआ, तो ऐसा लगा जैसे पहली बार किसी ज़िंदा चीज़ को छुआ हो। काया, तुम क्या जादू करती हो?"
काया ने भी अपनी लाज की दीवार को थोड़ा गिराते हुए जवाब दिया, "जादू मैंने नहीं, आपने किया है साहब। सारा दिन बीत गया, पर जहाँ आपने हाथ रखा था, वहां अब भी आग सी महसूस हो रही है। ऐसा तो मुझे कभी नहीं लगा।"
आधी रात की उस गहराई में, वे दोनों ऐसी बातें कर रहे थे जो उनके रिश्ते और समाज के हर नियम के खिलाफ थीं। भूपेंद्र ने काया की आँखों में डूबते हुए कहा, "तुम्हारी ये बातें मेरी धड़कनें और बढ़ा रही हैं। मन करता है तुम्हें बस देखता रहूँ।"
काया ने शरमाकर नज़रे झुका लीं, "जाइये साहब, दीदी जाग जाएँगी।"
भूपेंद्र जाने के लिए मुड़ा, पर फिर रुक गया। उसने काया की आँखों में एक शरारत के साथ देखा और कहा, "जाने से पहले... क्या एक बार फिर तुम्हें छू सकता हूँ?"
काया को लगा कि वह शायद उसके गालों को छुएगा या सर पर हाथ रखेगा। वह तैयार थी। लेकिन भूपेंद्र ने अचानक बिजली की फुर्ती से अपना हाथ उसकी कमर पर डाला, उसे कसकर अपनी ओर भींचा और उसकी कमर के नरम हिस्से पर एक ज़ोरदार चिकोटी (पेंच) काटकर दबे कदमों से रसोई से बाहर भाग गया।
काया हक्की-बक्की रह गई। उसके मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली। वह अपनी कमर पकड़कर वहीं बैठ गई, उसका पूरा शरीर झनझना उठा था। दर्द था, पर उस दर्द में एक ऐसा सुख था जिसने उसे पागल कर दिया। वह अँधेरे में भी मुस्कुरा रही थी, उसे पता चल गया था कि अब वह इस घर की सिर्फ नौकरानी नहीं, बल्कि इस घर के मालिक की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन चुकी है।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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