Double Game - 19 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 19

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 19

अगले कुछ दिन घर के भीतर एक अजीब से भारीपन में बीते। ऊपर से सब कुछ शांत दिखता था—वही चाय, वही नाश्ता और वही औपचारिकताएं। लेकिन अंदर ही अंदर एक घुटन भरी कड़वाहट दीवारों में सिमटने लगी थी। वंशिका ने कई बार कोशिश की कि काया को उसकी औकात याद दिलाए, उसे सलीका सिखाए, लेकिन जैसे ही वह मुँह खोलती, मनोरमा देवी बीच में आ जातीं।
"काया, ज़रा इधर आना तो, मेरा सिर दबा दे," या "काया, रसोई देख ले, बहू को तो वैसे भी फुर्सत नहीं," कहकर मनोरमा हर बार काया की ढाल बन जातीं।

वंशिका को धीरे-धीरे यह समझ आने लगा कि जब तक उसकी सासू माँ और ननद इस घर में हैं, उसके और भूपेंद्र के बीच की यह दरार कभी नहीं भरेगी। वे दोनों रिश्ते को सुलझाने के बजाय काया को खाद-पानी दे रही थीं। पर वह चाहकर भी उनसे जाने को नहीं कह सकती थी—आखिर वे भूपेंद्र की माँ और बहन थीं।

दोपहर का समय था। काया घर का राशन और ताज़ा सब्जियां लेने के लिए बाज़ार निकली थी। सूरज की तपिश थी, लेकिन काया के मन में अपनी जीत की ठंडक थी। उधर भूपेंद्र आज ऑफिस के किसी काम से जल्दी फ्री हो गया था और वह भी उसी मार्केट में था। उसे अपनी माँ और शिखा के लिए कुछ साड़ियां लेनी थीं।
जैसे ही काया की नज़र भीड़ में भूपेंद्र पर पड़ी, उसका चेहरा खिल उठा। वह अपनी थैली संभालती हुई भागकर उसके पास पहुँची।
"अरे साहब! आप यहाँ? इतनी दोपहर में?" काया ने चहकते हुए पूछा।

भूपेंद्र उसे देखकर ठिठक गया। "हाँ काया, माँ और शिखा के लिए कुछ साड़ियां देखनी थीं। सोचा आज जल्दी निकल आया हूँ तो ये काम निपटा लूँ।"

"साहब, आप अकेले क्या देखेंगे? आपको तो रंगों की पहचान भी नहीं है," काया ने शरारत से कहा। "चलिये, मैं आपकी मदद कर देती हूँ।"

भूपेंद्र मुस्कुराया। उसे काया का साथ इस भीड़भाड़ वाले बाज़ार में एक सुकून भरे झोंके जैसा लगा। "ठीक है, चलो।"

दोनो एक बड़ी साड़ी की दुकान में दाखिल हुए। सेल्समैन ने उनके सामने साड़ियों का ढेर लगा दिया। मनोरमा के लिए चटक रंग और शिखा के लिए आधुनिक प्रिंट चुनते वक्त काया और भूपेंद्र के हाथ कई बार अनजाने में एक-दूसरे से टकराए। हर स्पर्श पर दोनों के शरीर में एक सनसनाहट दौड़ जाती। वह स्पर्श अनजाना नहीं था, बल्कि एक ऐसी लत बन रहा था जिसे वे दोनों अब चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहे थे।

भूपेंद्र ने अचानक एक बहुत ही सुंदर, आसमानी नीले रंग की सिल्क की साड़ी उठाई। उसकी नज़रें काया के सांवले मगर दमकते चेहरे पर ठहर गईं। "काया, ये साड़ी तुम पर बहुत जंचेगी। लो, एक अपने लिए भी ले लो।"

काया के चेहरे पर हया की लाली दौड़ गई। "नहीं साहब, मैं... मैं इतनी महंगी साड़ी का क्या करूँगी? और दीदी क्या सोचेंगी?"

"दीदी की फिक्र मत करो। मैंने कहा न, ये मेरी तरफ से है," भूपेंद्र की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।

काया शर्माते हुए साड़ी लेकर ट्रायल रूम की ओर बढ़ गई। भूपेंद्र बाहर बैठकर इंतज़ार करने लगा। उसकी धड़कनें तेज़ थीं। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह एक हाउसहेल्प के लिए इतना क्यों महसूस कर रहा है।
तभी ड्रेसिंग रूम का पर्दा हटा। काया उस आसमानी नीली साड़ी को लपेटकर बाहर आई। उसने अपनी पुरानी सादी साड़ी उतार दी थी और इस रेशमी कपड़े ने उसके व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल दिया था। खुले बाल, माथे पर छोटी सी बिंदी और उस नीले रंग में काया किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

भूपेंद्र उसे देखता ही रह गया। वह अपनी कुर्सी से आधा खड़ा हो गया। उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। काया ने नज़रें नीची कर लीं, पर उसकी आँखों में जीत की चमक थी।

"कैसी लग रही हूँ साहब?" उसने फुसफुसाते हुए पूछा।

भूपेंद्र ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा, "काया... तुम... तुम तो बिल्कुल पहचानी नहीं जा रही हो। सच कहूँ तो आज तक किसी को साड़ी में इतना सुंदर नहीं देखा।"

काया की मुस्कुराहट और गहरी हो गई। उसे पता था कि उसने भूपेंद्र के दिल के उस आखिरी किले को भी फतह कर लिया है। भूपेंद्र की आँखों में वह आकर्षण था जो केवल एक पत्नी के लिए होना चाहिए था, पर आज वह काया के लिए था।

बाज़ार की उस भीड़भाड़ और दुकान के शोर के बीच, वे दोनों एक ऐसी दुनिया में थे जहाँ केवल वे थे। भूपेंद्र ने साड़ी का बिल चुकाया। उसने न केवल मनोरमा और शिखा के लिए, बल्कि काया के लिए भी वह हक खरीदा था जिसे वह अब खुलेआम देने वाला था। घर लौटते समय काया के हाथ में वह पैकेट किसी मेडल की तरह था। उसे पता था कि जब वह ये साड़ी पहनकर घर में घूमेगी, तो वंशिका के कलेजे पर साँप लोटेंगे, पर अब उसे डर नहीं था। उसके पास साहब का साथ था। दुकान से बाहर निकलने के बाद बाज़ार की भीड़ और बढ़ गई थी। धूप ढलने लगी थी, लेकिन हवा में एक गर्माहट अभी भी बाकी थी। घर जाने की जल्दी होने के बावजूद भूपेंद्र का मन नहीं कर रहा था कि यह साथ यहीं खत्म हो जाए। रास्ते के कोने पर एक पानी-पूरी का ठेला था। 

"पानी-पूरी खाओगी?" भूपेंद्र ने अचानक पूछा।

काया की आँखों में बच्चों जैसी चमक आ गई। "साहब, बहुत मन है, पर घर पर माँ जी और दीदी इंतज़ार कर रही होंगी।"

"पाँच मिनट में कुछ नहीं होगा, चलो," भूपेंद्र ने अधिकार से कहा।

दोनों ठेले के पास खड़े हो गए। तीखी और चटपटी पानी-पूरी खाते हुए काया की आँखों में पानी आ गया। उसने अपनी उंगलियों से मिर्च का तीखापन शांत करने की कोशिश की, तो भूपेंद्र हंस पड़ा। "इतनी तीखी लग रही है तो मना कर देती।"

"नहीं साहब, स्वाद तो तीखे में ही है," काया ने सिसकारी भरते हुए कहा और फिर शर्माकर अपनी नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर फैली वह लाली मिर्च की वजह से थी या भूपेंद्र के सामने होने के अहसास से, यह कहना मुश्किल था। भूपेंद्र उसे खाते हुए देख रहा था और उसे लगा कि वंशिका के साथ बिताए गए महंगे डिनर से कहीं ज़्यादा सुकून उसे इस सड़क किनारे खड़े होकर काया के साथ पानी-पूरी खाने में मिल रहा है।
तभी पीछे से लोगों का एक बड़ा रेला आया। तंग गली थी और भीड़ का दबाव अचानक बढ़ गया। काया अनियंत्रित होकर आगे की ओर गिरने ही वाली थी कि भूपेंद्र ने फुर्ती से अपना हाथ उसकी कमर और पेट के हिस्से पर रखा और उसे खींचकर अपनी ओर पीछे कर लिया।
भूपेंद्र का हाथ काया के पेट पर जम गया था। वह स्पर्श अनजाना नहीं था, बल्कि बहुत ही सचेत और अधिकारपूर्ण था। भूपेंद्र ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि कुछ पलों के लिए उसे वहीं रहने दिया। काया की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि उसे लगा जैसे उसका दिल गले तक आ गया हो। उसने अपनी सांसें रोक लीं। भूपेंद्र के हाथ की गर्माहट उसके शरीर में बिजली की तरह दौड़ रही थी।

भूपेंद्र ने ऐसे अभिनय किया जैसे वह सिर्फ उसे भीड़ से बचा रहा हो। "सावधान! यहाँ भीड़ बहुत ज़्यादा है, मेरे करीब रहो," उसने बहुत ही शांत आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी अपनी धड़कनें भी काबू से बाहर हो रही थीं।

काया ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से अपना सिर झुका लिया। उसके शर्माने का अंदाज़ इतना गहरा था कि भूपेंद्र का सीना गर्व और आकर्षण से भर उठा। काया को महसूस हो रहा था कि यह हाथ सिर्फ बचाने के लिए नहीं था, बल्कि एक दावेदारी थी। एक ऐसा रिश्ता जो बिना नाम के भी मज़बूत होता जा रहा था।

भीड़ छंटने के बाद भी उन दोनों के बीच एक अनकही निकटता बनी रही। वे चुपचाप रिक्शा की ओर बढ़े। पूरे रास्ते काया उस जगह को महसूस करती रही जहाँ भूपेंद्र का हाथ स्पर्श हुआ था। उसे लग रहा था कि वह अब सिर्फ एक नौकरानी नहीं रही, वह भूपेंद्र की वह चोरी बन गई है जिसे वह दुनिया से छिपाकर रखना चाहता है पर छोड़ना नहीं चाहता।



क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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