Double Game - 18 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 18

Featured Books
Categories
Share

डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 18

जिम में सुबह की गहमागहमी अपने चरम पर थी। ट्रेडमिल के चलने की आवाज़ें और भारी संगीत के बीच कई महिलाएँ कसरत में व्यस्त थीं। शिखा ने अपनी तीखी नज़रों से पूरे जिम का मुआयना किया। उसने गौर किया कि पास में एक नया और आधुनिक जिम खुलने की वजह से यहाँ भीड़ कुछ कम तो हुई थी, लेकिन चूंकि उस नए जिम की फीस काफी ज़्यादा थी, इसलिए वंशिका के यहाँ मध्यम वर्ग की काफी महिलाएँ अब भी आ रही थीं।
वंशिका अपनी एक क्लाइंट को डंबल उठाने का सही तरीका समझा रही थी। शिखा पास ही खड़ी थी, उसने कुछ देर औरतों को वर्कआउट करते देखा और फिर 
अचानक वंशिका की ओर देखे बिना, बहुत ही ठंडे स्वर में कहा, "भाभी, जितना ध्यान आप यहाँ इन मशीनों और औरतों पर देती हैं, उतना ही अपने पति पर भी दे लें तो वह हाथ से निकलेगा नहीं।"

वंशिका के हाथ से पानी की बोतल छूटते-छूटते बची। उसके कानों में जैसे गरम शीशा पिघल कर गिर गया हो। उसने हैरानी और बेहद बेयकीनी से शिखा की ओर देखा। उसे लगा शायद शोर की वजह से उसने कुछ गलत सुन लिया है।
"क्या मतलब? क्या कहना चाह रही हो तुम?" वंशिका की आवाज़ में एक थरथराहट थी।

शिखा ने अब सीधे वंशिका की आँखों में आँखें डालकर कहा, "आप बहुत अच्छे से समझ रही हैं भाभी कि मैं क्या कहना चाहती हूँ। क्या आपको वाकई दिखाई नहीं देता? भूपेंद्र भैया आजकल उस काया के आगे-पीछे कैसे घूमते हैं? उन्हें और काया को साथ देखकर कोई भी अंधा बता सकता है कि उन दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है। वह आपसे कटे-कटे रहते हैं, आपकी हर बात काटते हैं, लेकिन काया के इर्द-गिर्द भँवरे की तरह मंडराते रहते हैं।"

वंशिका को यकीन नहीं हो रहा था कि ये शब्द शिखा के मुँह से निकल रहे थे। वही शिखा, जो दिन-रात उसे ताने मारती थी, जो अपनी माँ के साथ मिलकर उसका जीना हराम करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी, आज वह उसे सचेत कर रही थी?
लेकिन शिखा की मंशा कोई ममता या स्नेह से भरी नहीं थी। शिखा एक चतुर खिलाड़ी थी। वह देख पा रही थी कि अगर काया ने इस घर पर पूरी तरह हक़ जमा लिया, तो सबसे पहले पत्ता उसका और उसकी माँ का ही कटेगा। 

वंशिका पढ़ी-लिखी थी, आधुनिक थी, जवाब बराबरी से देती थी, लेकिन उसने कभी मर्यादा और संस्कारों की लक्ष्मण रेखा पार नहीं की थी। वह लड़ती थी, पर घर के रूतबे को जानती थी।
शिखा समझती थी कि काया जैसी औरतें जब हक़ जमाती हैं, तो वे किसी के सामने नहीं झुकतीं। कम पढ़े-लिखे होने का मतलब हमेशा संस्कारी होना नहीं होता, और काया के मामले में यह बात बिल्कुल फिट बैठ रही थी। काया की आँखों में जो महत्वाकांक्षा थी, उसे शिखा ने पहचान लिया था।

वंशिका ने एक लंबी सांस ली और अपनी नज़रों को जिम के फर्श पर टिका दिया। "मुझे सब दिखाई दे रहा है शिखा। मुझे अपनी गलती समझने में थोड़ी देर हो गई, मैंने उसे ज़रूरत से ज़्यादा छूट दे दी। लेकिन दुख इस बात का है कि तुम्हारे भैया सब कुछ जानते-बूझते हुए भी उसकी ओर कदम बढ़ा रहे हैं। उन्हें अपनी गृहस्थी की परवाह नहीं रही।"

शिखा ने अपने होंठ सिकोड़े और रूखे स्वर में जवाब दिया, "भाभी, आदमी तो होते ही ऐसे हैं। उन्हें जहाँ ज़्यादा पुचकार और ज़्यादा सेवा मिलती है, वे वहीं ढल जाते हैं। काया ने उनकी कमज़ोरी पकड़ ली है। वह उन्हें साहब-साहब कहकर चने के झाड़ पर चढ़ाती है और आप उन्हें हकीकत का आईना दिखाती हैं। अब आईना किसे पसंद होता है? आपको ध्यान रखना चाहिए था। अगर वो घर में टिक गई, तो हम सबको बाहर का रास्ता दिखाने में उसे देर नहीं लगेगी।"

वंशिका ने शिखा की ओर गौर से देखा। उसे पहली बार लगा कि इस घर में उसके और शिखा के हित एक जगह आकर मिल रहे हैं। "तुम कहना चाहती हो कि वह हमारे लिए खतरा है?"

"खतरा नहीं भाभी, वह दीमक है," शिखा ने कड़वाहट से कहा। "अंदर ही अंदर सब खोखला कर रही है। माँ को लगता है कि वह बहुत सीधी है, पर मैं देख रही हूँ कि कैसे उसने रसोई से लेकर भैया के बेडरूम तक अपनी पैठ बना ली है। आज उसने आपकी जगह ली है, कल वह माँ की जगह भी ले लेगी।"

जिम के उस कोने में, दो ऐसी औरतों के बीच एक मूक समझौता हो रहा था जो कभी एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती थीं। वंशिका को समझ आ गया था कि अब उसे केवल काया से नहीं, बल्कि भूपेंद्र के उस आकर्षण से भी लड़ना होगा जो दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था।
"तो अब क्या करना चाहिए?" वंशिका ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक दृढ़ता थी।

शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा, "वही, जो एक चतुर खिलाड़ी करता है। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। उसे उसी के जाल में फँसाना होगा।"

जिम से निकलते समय वंशिका के मन में एक अजीब सी हलचल थी। उसे लग रहा था कि शायद शिखा के रूप में उसे एक अनपेक्षित सहयोगी मिल गया है। घर वापस लौटते समय दोनों के बीच ज़्यादा बात नहीं हुई, लेकिन वंशिका के दिमाग में शिखा की बातें किसी अलार्म की तरह बज रही थीं—"वह दीमक है भाभी, अंदर ही अंदर सब खोखला कर रही है।"
जैसे ही वे घर पहुँचीं, उन्होंने देखा कि मनोरमा देवी और काया ड्राइंग रूम में बैठकर किसी पुरानी बात पर हंस रही थीं। काया मनोरमा के कंधे दबा रही थी और मनोरमा बेहद सुकून में दिख रही थीं। वंशिका का दिल यह देखकर जल उठा, लेकिन वह चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

शिखा ने अपनी माँ के चेहरे की वह संतुष्टि देखी तो उसे रहा नहीं गया। जैसे ही काया चाय बनाने रसोई में गई, शिखा दबे पाँव अपनी माँ के पास पहुँची।
"मम्मी, आपको समझ नहीं आ रहा? आप जिसे सर पर चढ़ा रही हैं, वह भैया को वंशिका भाभी से दूर कर रही है। मैंने आज भाभी को भी आगाह किया है। अगर काया का यही हाल रहा, तो इस घर का तमाशा सरेआम होगा," शिखा ने फुसफुसाते हुए अपनी माँ को समझाने की कोशिश की।

मनोरमा देवी ने अपनी माला रोकी और अपनी बेटी को तिरछी नज़रों से देखा। उन्होंने शिखा का हाथ पकड़ा और उसे खींचकर कोने वाले कमरे में ले गईं।
"तू पागल तो नहीं हो गई है शिखा?" मनोरमा की आवाज़ में एक ठंडी कड़वाहट थी। "उसकी गृहस्थी की चिंता तू क्यों कर रही है? वंशिका की फिक्र करने का ठेका क्या तूने ले रखा है?"

शिखा हकबका गई। "मम्मी, मैं भाभी की फिक्र नहीं कर रही, मैं भैया की और इस घर की मर्यादा की..."

"मर्यादा की बात मत कर मुझसे," मनोरमा ने उसे बीच में ही टोक दिया। "जब वंशिका को खुद अपने आदमी की फिक्र नहीं है, जब वह सारा दिन जिम में पसीना बहाती है और अपने पति को एक नौकरानी के भरोसे छोड़ देती है, तो भुगतेगी भी वही। तू क्यों अपने भाई से रिश्ता बिगाड़ने पर तुली है? अगर तूने भूपेंद्र के सामने काया की बुराई की, तो वह तुझसे भी कट जाएगा। तुझे पता है न वह आजकल कितना चिड़चिड़ा हो गया है?"

शिखा ने अपनी माँ का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था। मनोरमा आगे बोलीं, "वंशिका का गुरूर टूटना ज़रूरी है। उसे समझ आना चाहिए कि सिर्फ अंग्रेज़ी बोलने और पैसे कमाने से घर नहीं चलते। जब उसे ठोकर लगेगी, तब वह मेरे पास आएगी। और काया? वह सिर्फ एक मोहरा है। उसे जब चाहूँगी, दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकूँगी। तू बस तमाशा देख और अपनी जुबान पर लगाम रख।"

शिखा सन्न रह गई। उसने इस नज़रिये से कभी सोचा ही नहीं था। उसे लगा कि उसकी माँ का खेल उसकी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ा और खतरनाक है। मनोरमा के लिए यह सिर्फ एक नौकरानी का मामला नहीं था, यह वंशिका के अहंकार को पूरी तरह कुचलने की एक सोची-समझी साजिश थी।

शिखा को अचानक अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे लगा कि अगर वह वंशिका की मदद करने निकली, तो वह अपनी माँ की नज़रों में भी गिर जाएगी और भाई से भी दुश्मनी मोल ले लेगी। उसे लगा कि जब माँ ही सब कुछ संभाल रही है, तो उसे बीच में पड़ने की क्या ज़रूरत? वह बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकली। हॉल में वंशिका तैयार होकर नीचे आ रही थी, उसने उम्मीद भरी नज़रों से शिखा की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि क्या उसने माँ से बात की। लेकिन शिखा ने अपनी नज़रें चुरा लीं और चुपचाप टीवी चलाकर बैठ गई।

वंशिका को समझ आ गया कि शिखा पीछे हट चुकी है। वह फिर से अकेली खड़ी थी—एक तरफ सासू माँ की चालाकी, दूसरी तरफ काया की बढ़ती हिमाकत, और तीसरी तरफ भूपेंद्र की उदासीनता।
तभी रसोई से काया बाहर आई, उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। उसने वंशिका की ओर देखकर बहुत ही विनम्रता, मगर आँखों में चमक लिए कहा, "दीदी, साहब का फोन आया था। कह रहे थे आज दफ्तर से आते समय उनके लिए वही खास पकौड़े और चटनी तैयार रखूँ जो उन्हें पसंद है। उन्होंने आपसे नहीं, सीधे मुझसे ही कह दिया।"

वंशिका के पैर जैसे ठिठक गए। शिखा चुप रही, मनोरमा मुस्कुराती रहीं, और काया अपनी सत्ता का जश्न मनाती हुई वापस रसोई में चली गई।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

सर्वाधिकार सुरक्षित