अगली सुबह घर में सूरज की रोशनी के साथ एक नया तनाव भी उतरा। ऊपरी तौर पर सब सामान्य था, पर हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। भूपेंद्र जैसे ही सोकर उठा, उसने काया को आवाज़ लगाने के लिए अभी मुँह खोला ही था कि काया उसकी चाय और ताज़ा प्रेस की हुई शर्ट लेकर कमरे में दाखिल हो गई। भूपेंद्र कुछ कहता, उससे पहले ही काया ने उसकी घड़ी और रुमाल मेज पर सजा दिए। बिना कहे, बिना पुकारे, काया भूपेंद्र की परछाईं बन चुकी थी।
वंशिका जो अभी बिस्तर से उठी ही थी, काया का यह बेरोकटोक बेडरूम में आना-जाना देख जल-भुन गई। उसने कड़े स्वर में टोका, "काया! तुम्हें कितनी बार समझाया है कि बेडरूम में आने से पहले दरवाजा खटखटाया करो। बिना परमिशन अंदर आने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? कायदे-कानून भूल गई हो क्या?"
काया अपने इस अपमान पर भीतर तक तिलमिला उठी। उसने उम्मीद भरी नज़रों से भूपेंद्र की ओर देखा कि शायद वह उसके पक्ष में कुछ कहेगा, लेकिन भूपेंद्र ने चुप्पी साध ली और नज़रें नीचे झुका लीं। वह अपनी माँ और बहन की मौजूदगी में वंशिका से सीधा झगड़ा नहीं चाहता था। अपमान का कड़वा घूँट पीकर काया वापस किचन में चली गई। मनोरमा ने रसोई में काया के उखड़े हुए तेवर नोटिस किए, पर वे चुप रहीं; वे देखना चाहती थीं कि वंशिका अगला दांव क्या खेलती है।
नाश्ते की मेज पर जब पूरा परिवार इकट्ठा हुआ, तब वंशिका ने अपना ब्रह्मास्त्र चलाया। उसने चाय का प्याला रखते हुए ठंडे स्वर में घोषणा की, "भूपेंद्र, मैंने फैसला कर लिया है। आज के बाद काया सिर्फ सुबह और शाम खाना बनाने के लिए घर आएगी। बाकी समय वह यहाँ नहीं रहेगी। घर के बाकी छोटे-मोटे काम हम सबको खुद करने होंगे।"
भूपेंद्र झल्ला उठा। "यह क्या पागलपन है वंशिका? इतने बड़े घर का काम और मेहमानों की देखरेख कौन करेगा?"
"जिन्हें ज़रूरत होगी, वो करेंगे," वंशिका ने सपाट लहजे में जवाब दिया। उसे भूपेंद्र की झल्लाहट से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
काया, जो पास ही खड़ी थी, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर से दूर होने का मतलब था—भूपेंद्र से दूर होना।
मनोरमा को लगा कि अगर वंशिका का यह फैसला मान लिया गया, तो वंशिका की जीत हो जाएगी। उन्होंने तुरंत अपना पासा फेंका, "अरे बहू, ये क्या कह रही हो? काया चली गई तो घर की देखभाल कौन करेगा? मुझे तो बुढ़ापे में अब काम होता नहीं, और शिखा तो यहाँ मेहमान है, उससे काम करवाना शोभा नहीं देता।"
वंशिका कुछ बोलने ही वाली थी कि भूपेंद्र ने मेज पर हाथ पटकते हुए अंतिम फैसला सुना दिया, "जब तक मम्मी और शिखा यहाँ हैं, काया कहीं नहीं जाएगी। वह पूरे समय यहीं रहेगी। बस, बात खत्म!"
वंशिका तिलमिलाकर रह गई। उसे अपनी हार और काया की मूक जीत बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
ऑफिस जाने के लिए जब भूपेंद्र तैयार होकर बाहर आया, तो गलियारे के मोड़ पर उसकी और काया की चोरी-छिपे मुलाकात हुई। काया की आँखों में डर और आंसू थे। "साहब, दीदी मुझे निकाल कर ही दम लेंगी," वह सिसकी।
भूपेंद्र ने चारों ओर देखा और फिर काया के करीब आकर धीमे स्वर में कहा, "तुम कहीं नहीं जाओगी काया। मैं तुम्हें यहाँ से कहीं नहीं जाने दूँगा। तुम मुझ पर भरोसा रखो।"
काया ने कांपती आवाज़ में कहा, "मुझे आप पर पूरा भरोसा है साहब। बस डर लगता है कि अगर आपने साथ छोड़ दिया, तो मैं बेसहारा हो जाऊँगी।"
भूपेंद्र ने भावुक होकर काया के हाथ पर अपना हाथ रखा। उस स्पर्श में एक अजीब सा करंट था, एक ऐसी झनझनाहट जो दोनों के शरीरों में बिजली की तरह दौड़ गई। भूपेंद्र ने हाथ दबाकर उसे विश्वास दिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गया। काया वहीं खड़ी अपनी धड़कनों को सुनने लगी। उसे अब अपनी ताकत का अहसास हो रहा था।
तभी वंशिका ने शिखा से कहा, "चलो शिखा, तैयार हो जाओ। आज तुम भी मेरे साथ जिम चलो। घर के इस दमघोंटू माहौल से थोड़ा बाहर निकलते हैं।"
शिखा उत्साह से तैयार हो गई और दोनों बाहर निकल गईं। घर में अब सिर्फ मनोरमा और काया रह गई थीं—दो ऐसी औरतें जो एक-दूसरे को परख रही थीं।
घर से वंशिका और शिखा के निकलते ही सन्नाटा पसर गया। मनोरमा देवी सोफे पर बैठ गईं और गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर अभी भी सुबह के उस ड्रामे की लकीरें खिंची हुई थीं। काया ने ताड़ लिया कि यही वह मौका है जब वह अपनी जड़ें इस घर में इतनी गहरी कर सकती है कि वंशिका चाहकर भी उसे उखाड़ न सके।
काया बहुत सलीके से रसोई में गई और केसर-इलायची वाली मलाईदार लस्सी का गिलास सजाकर लाई। उसने मनोरमा के पास जाकर बहुत ही विनम्रता से गिलास मेज पर रखा।
"माँ जी, आप सुबह से बहुत परेशान हो गई हैं। ये थोड़ी लस्सी पी लीजिये, मन शांत हो जाएगा," काया ने उनके पैरों के पास बैठते हुए कहा।
मनोरमा ने गिलास हाथ में लिया और एक घूँट भरकर तृप्ति महसूस की। "सच कहूँ काया, तो इस घर में बस तू ही है जो मेरी पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है। वरना वंशिका तो जैसे भूल ही गई है कि बड़ों की सेवा क्या होती है।"
काया ने मौक़ा देखकर पासा फेंका। "माँ जी, मैं तो एक मामूली काम करने वाली हूँ, पर सच कहूँ तो आपको देखकर मुझे अपनी माँ की याद आ जाती है। आप कितनी सुलझी हुई हैं, कितनी समझदार हैं। मुझे तो समझ नहीं आता कि दीदी आपकी बातों का बुरा क्यों मान जाती हैं? अगर मैं आपकी बहू होती, तो आपके चरणों को धोकर पीती।"
मनोरमा का अहंकार इस चापलूसी से जैसे फूलकर कुप्पा हो गया। उन्हें काया की बातें शहद की तरह मीठी लग रही थीं। उन्होंने काया के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "तू बहुत गुणी है काया। काश! भूपेंद्र के लिए तेरे जैसी ही कोई सुशील और सेवाभावी लड़की ढूँढी होती। पर क्या करें, उसकी किस्मत में तो ये मॉडर्न जिम वाली लिखी थी।"
काया ने अपनी आँखों में नकली आंसू भरकर कहा, "माँ जी, दीदी तो मुझे निकाल देना चाहती हैं। उन्हें डर लगता है कि मैं आपकी और साहब की इतनी सेवा क्यों करती हूँ। पर मैं कहाँ जाऊँगी? मेरा तो अब इस दुनिया में आप लोगों के सिवा कोई नहीं है। साहब ने तो कह दिया कि वो मुझे नहीं जाने देंगे, पर आप साथ नहीं देंगी तो दीदी मुझे चैन से रहने नहीं देंगी।"
मनोरमा ने गिलास मेज पर रखा और दृढ़ स्वर में कहा, "तू फिक्र मत कर। जब तक मैं यहाँ हूँ, तुझे इस चौखट से कोई बाहर नहीं निकाल सकता। वंशिका चाहे जितनी उछल-कूद कर ले, पर इस घर की असली चाबी आज भी मेरे ही हाथ में है। तू बस भूपेंद्र का और मेरा ख्याल रखती रह, बाकी मैं संभाल लूँगी।"
काया ने धीरे से मनोरमा के पैर दबाना शुरू कर दिए। "माँ जी, साहब भी अक्सर कहते हैं कि उनकी माँ जैसा दिल किसी का नहीं है। वो तो बस दीदी के सामने चुप रहते हैं ताकि घर में झगड़ा न हो। पर अंदर ही अंदर वो भी घुटते हैं।"
मनोरमा को लगा जैसे काया उनकी ही भाषा बोल रही है। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि काया उनकी सबसे वफादार सिपाही बनेगी। उन्हें लगा कि वंशिका को सबक सिखाने के लिए काया से बेहतर हथियार और कोई नहीं हो सकता।
काया मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसने एक ही तीर से दो शिकार कर लिए थे—साहब का भरोसा पहले ही उसके पास था, और अब माँ जी की ढाल भी उसे मिल गई थी। अब वह सिर्फ एक नौकरानी नहीं थी, वह इस घर के सत्ता संघर्ष की एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुकी थी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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