मनोरमा देवी ने अब बीच का रास्ता चुनने का मन बना लिया था। वे एक मँझी हुई खिलाड़ी की तरह खेल रही थीं। उन्होंने तय किया कि वे न तो पूरी तरह वंशिका की तरफ होंगी और न ही काया को अपना सरमाय बनायेंगी। उनका लक्ष्य साफ़ था—दोनों के बीच ऐसा युद्ध छिड़वा देना कि दोनों एक-दूसरे को काटती रहें और सत्ता की चाबी मनोरमा के पास सुरक्षित रहे।
वे वंशिका के सामने काया पर काम का बोझ बढ़ाकर उसका जीना हराम करतीं, ताकि वंशिका को लगे कि सासू माँ उसकी तरफ हैं। वहीं काया के सामने वे वंशिका के आलस और उसके मायके के घमंड को लेकर ऐसे ताने मारतीं कि काया को लगे कि उसे साहब के साथ-साथ माँ जी का भी समर्थन प्राप्त है।
वंशिका खिड़की के पास खड़ी यह सब देख रही थी। वह अपनी सासू माँ की फितरत से वाकिफ थी। उसने मन ही मन सोचा, सासु माँ अपनी साइड बचाकर चल रही हैं ताकि अंत में हाथ किसी के भी जले, पर आंच उन तक न आए। पर वो भूल रही हैं कि आग जब लगती है, तो घर का कोई कोना सुरक्षित नहीं रहता।'
दोपहर में मनोरमा ने बाज़ार जाने का मन बनाया। उन्होंने काया को साथ चलने का आदेश दिया। काया के लिए यह सुनहरा मौका था। पिछले डेढ़ साल में उसने शहर की एक-एक गली, एक-एक दुकान छान मारी थी। उसे पता था कि कहाँ सबसे अच्छी वैरायटी मिलती है और कहाँ सबसे कम दाम।
काया मनोरमा को उन तंग गलियों की पुरानी दुकानों पर ले गई जहाँ के बारे में रईस लोग नहीं जानते थे। उसने अपनी चपलता से मनोरमा को ऐसी साड़ियाँ और घर का सामान दिलवाया जो दिखने में राजसी थे पर कीमत में बेहद मामूली।
"माँ जी, यहाँ से लीजिये। मॉल में यही चीज़ आपको चार गुना दाम में मिलेगी," काया ने बड़े आत्मविश्वास से कहा।
मनोरमा अपनी पोटली में बचे हुए पैसे देखकर गदगद हो गईं। बहुत कम बजट में उन्होंने ढेर सारा सामान खरीद लिया था। "सच में काया, तू तो बड़ी पारखी निकली। वरना ये वंशिका तो जहाँ हाथ रखती है, वहाँ हज़ारों का बिल फाड़ देती है।"
काया अपनी तारीफ सुनकर फूली नहीं समा रही थी। उसे लग रहा था कि उसने मनोरमा के दिल का सबसे मज़बूत रास्ता—बचत—खोज लिया है।
शाम बीत गई, घर के काम निपट गए और सब अपने-अपने कमरों में चले गए। भूपेंद्र आज बहुत बेचैन था। माँ और बहन के आने के बाद से उसे काया से दो पल शांति से बात करने का मौका नहीं मिला था। रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे, जब पूरा घर गहरी नींद में था,
भूपेंद्र पानी पीने के बहाने रसोई की तरफ आया। काया वहां रात का दूध गर्म कर रही थी। दोनों की नज़रें मिलीं और एक पल के लिए वक्त जैसे ठहर गया।
भूपेंद्र ने दबी आवाज़ में कहा, "काया... काफी दिनों से तुमसे ठीक से बातचीत नहीं हो पाई है। सच कहूँ तो पूरा दिन बहुत खराब जा रहा है। घर में इतनी भीड़ होने के बाद भी बड़ा सूनापन लग रहा है।"
काया ने दूध का पतीला नीचे रखा और अपनी नज़रें झुका लीं। उसके चेहरे पर एक हया मिश्रित मुस्कान थी। "हवा तो मेरे भी दिन की ऐसी ही है साहब। पहले दिन की शुरुआत आपकी आवाज़ सुनकर होती थी, पर अब... अब तो आपकी ज़ुबान से अपना नाम सुनने के लिए तरस गई हूँ मैं। ऐसा लगता है जैसे मैं इस घर में अजनबी हो गई हूँ।"
भूपेंद्र की आँखों में एक चमक आ गई। वह एक कदम और करीब आया। "सच कहूँ तो मैं भी तुम्हें ताने मारने के लिए, तुम्हारे साथ तंजभरी तकरार करने के लिए तड़प रहा हूँ। पता ही नहीं चला कि कब मुझे तुम्हारी आदतों की ऐसी लत लग गई। तुम्हारे बिना ये घर सिर्फ दीवारों का ढांचा लगता है।"
काया ने धीरे से कहा, "साहब, मुझे भी आपकी उस डांट की और उन छोटे-छोटे कामों की आदत हो गई है। जब आप आवाज़ नहीं देते, तो लगता है जैसे मेरा वजूद ही खत्म हो गया है।"
भूपेंद्र ने दृढ़ता से कहा, "कल से मैं तुम्हें आवाज़ नहीं दूँगा काया। आवाज़ वो देते हैं जिन्हें काम करवाना होता है। तुम तो इस घर का हिस्सा हो। कल से तुम खुद पूरे हक के साथ मेरा हर काम करोगी—चाहे मेरी फाइलें हों, मेरी चाय हो या मेरा रुमाल। कोई कुछ भी कहे, तुम पीछे नहीं हटोगी। समझी?"
काया को यही तो चाहिए था—साहब का पूर्ण अधिकार। उसकी आँखों में एक अजीब सा संतोष और जीत की चमक थी। उसने तुरंत हामी भरी, "जी साहब, जैसा आप कहें। अब तो हक़ से ही काम होगा।"
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं था कि अनजाने में ही वे एक ऐसी लत और एक ऐसे रिश्ते की ओर बढ़ चुके हैं, जिसकी कीमत इस घर की शांति को चुकानी पड़ेगी।
रसोई के उस मद्धम उजाले में भूपेंद्र और काया एक-दूसरे के इतने करीब थे कि उनकी सांसों की गरमाहट महसूस की जा सकती थी। घर के बाकी सदस्य गहरी नींद में थे, पर इन दोनों के भीतर भावनाओं का एक ऐसा ज्वार उठा था जिसने नींद के हर झोंके को कोसों दूर धकेल दिया था।
काया ने अपनी साड़ी का पल्लू उंगलियों में लपेटते हुए धीरे से कहा, "साहब, आप क्या जानें मेरी हालत। सुबह के चार बजे से ही मेरे कान रसोई में खड़े हो जाते हैं, बस इस इंतज़ार में कि कब आपके कमरे का दरवाज़ा खुले और कब आपकी आवाज़ गूँजे—'काया, ज़रा चाय लाना'। पर जब आप आवाज़ नहीं लगाते, तो ऐसा लगता है जैसे सारा दिन ही बासी हो गया हो। मन में एक ऐसी निराशा बैठ जाती है कि काम में हाथ ही नहीं चलता।"
भूपेंद्र ने उसकी आँखों में झाँका। उसे वहां वही छटपटाहट दिखी जो पिछले कई दिनों से उसे भी सोने नहीं दे रही थी। उसने बहुत ही धीरे से, लगभग कानाफूसी करते हुए कहा, "हाल तो मेरा भी बुरा है काया। मुझे तो अब अपनी ही चीज़ें अजनबी लगती हैं जब तक तुम उन्हें न छुओ। आज सुबह जब मोजे सामने रखे थे, तब भी मन कर रहा था कि ज़ोर से चिल्लाकर तुम्हें बुलाऊँ। पर माँ और शिखा के सामने चुप रहना पड़ता है। सच कहूँ तो उस खामोशी में मेरा दम घुटता है।"
एक-दूसरे की ये स्वीकारोक्तियाँ उनके भीतर एक अजीब सा भूचाल ला रही थीं। यह न तो प्रेम था, न केवल ज़रूरत; यह एक ऐसी लत थी जो दो अलग दुनिया के इंसानों को एक कर रही थी। वे अपनी उम्र, अपनी मर्यादा और अपने सामाजिक रिश्तों को दांव पर लगाकर इस अंधेरी रात में एक-दूसरे के वजूद को टटोल रहे थे। उन्हें इस समय न वंशिका की परवाह थी, न मनोरमा के तानों की।
काया ने माहौल के भारीपन को कम करने के लिए एक शरारती मुस्कान के साथ तंज कसा, "अच्छा साहब? तो अब आपको मोजे ढूँढने के लिए भी मेरी याद आती है? मुझे तो लगा था कि माँ जी और दीदी जी के आने के बाद आप अपने राजा बेटा वाले अवतार में लौट गए होंगे और मुझे भूल ही गए होंगे।"
भूपेंद्र की आँखों में वही पुरानी चमक लौट आई जो काया के गाँव जाने के बाद लुप्त हो गई थी। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया और पलटवार किया, "भूलना इतना आसान होता काया, तो शायद ये रात इतनी लंबी न लगती। और रही बात राजा बेटा की, तो याद रखना कि राजा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे अपनी सल्तनत चलाने के लिए वजीर की सलाह की ज़रूरत पड़ती ही है। और तुम... तुम इस घर की सिर्फ वजीर नहीं, उसकी जान बन गई हो।"
काया यह सुनकर पूरी तरह शर्मा गई। उसने चेहरा घुमा लिया ताकि भूपेंद्र उसकी लाल होती गालों को न देख सके। उसने धीमी आवाज़ में कहा, "साहब, ऐसी बातें मत कीजिये। मैं तो एक मामूली काम करने वाली हूँ।"
"नहीं काया," भूपेंद्र ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की पर खुद को रोक लिया, "तुम मामूली नहीं हो। तुम वो आदत हो जिसे मैं कभी छोड़ना नहीं चाहता। कल से देख लेना, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, मैं तुम्हें अपने हर काम के लिए आवाज़ दूँगा। तुम बस तैयार रहना।"
काया ने अपनी पलकें झपकाईं और सिर हिलाकर हामी भरी। उसे इस चोरी-छिपे बात करने में एक ऐसा रोमांच मिल रहा था जिसने उसके नीरस जीवन में रंग भर दिए थे। वे दोनों एक ऐसी आग से खेल रहे थे जिसका धुआँ जल्द ही पूरे घर में फैलने वाला था, लेकिन उस पल, उन्हें बस एक-दूसरे की मौजूदगी का सुकून चाहिए था।
काया ने दूध का गिलास भूपेंद्र की ओर बढ़ाया। उनकी उंगलियाँ एक पल के लिए छुईं और जैसे पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। भूपेंद्र ने गिलास लिया और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ गया, जबकि काया वहीं खड़ी अपनी धड़कनों को शांत करने की कोशिश करती रही।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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