Double Game - 15 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 15

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 15

दूसरी ओर, मनोरमा ने वंशिका को परखना शुरू किया। वंशिका सुबह नौ बजे तैयार होकर जिम के लिए निकल जाती। वह घर के किसी काम में हाथ नहीं लगाती थी। यहाँ तक कि अगर उसकी अपनी कॉफी की प्याली भी मेज पर रखी हो, तो वह काया को आवाज़ लगाती।

शिखा ने एक दिन जानबूझकर वंशिका के सामने दूध का गिलास गिरा दिया। "ओह भाभी! गिर गया, अब क्या करें?"

वंशिका ने बिना पलक झपकाए कहा, "काया! ज़रा यहाँ पोछा मार देना।" और वह वापस अपने फोन में व्यस्त हो गई।

मनोरमा यह सब देख रही थी। उन्हें लगा कि वंशिका ने खुद को इस घर से मानसिक रूप से अलग कर लिया है। वह मालकिन तो बनना चाहती है, लेकिन ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहती।

शाम को जब भूपेंद्र घर लौटा, तो मनोरमा ने उसे अकेले में बुलाया।

"बेटा, मैंने पिछले तीन दिनों में बहुत कुछ देखा है," मनोरमा ने गंभीर होकर कहा।

भूपेंद्र उत्सुक हुआ। "क्या माँ? आपने देखा न काया कितनी मेहनत करती है? और वंशिका..."

मनोरमा ने उसे बीच में ही रोक दिया। "मैंने देखा कि काया सच में मेहनती है। वह इस घर को मंदिर की तरह पूजती है। लेकिन बेटा, एक बात याद रखना। जो घर को मंदिर की तरह पूजता है, वह एक दिन उसका पुजारी भी बनना चाहता है। और वंशिका? वह तो जैसे इस घर की मेहमान है। उसे तो बस हुक्म चलाना आता है।"

भूपेंद्र असमंजस में पड़ गया। "तो आप क्या कहना चाहती हैं माँ?"

मनोरमा की आँखों में एक अजीब सी चमक आई। "मैं ये कहना चाहती हूँ कि ये घर एक ज्वालामुखी पर खड़ा है। काया की मेहनत और वंशिका का आलस दोनों ही खतरनाक हैं। मुझे कुछ दिन और देखने दे, फिर मैं तय करूँगी कि इस घर की लगाम किसके हाथ में होनी चाहिए।"

काया को अब महसूस होने लगा था कि मनोरमा उसे परख रही हैं। उसे लगा कि अगर उसने अपनी मेहनत से सासू माँ का दिल जीत लिया, तो फिर उसे इस घर से कोई नहीं निकाल पाएगा—वंशिका भी नहीं। वह अब शिखा की बदतमीजियों को भी एक चुनौती की तरह लेने लगी थी।

एक रात, जब शिखा ने जानबूझकर काया की बनाई सब्जी में एक्स्ट्रा नमक डाल दिया और मेज पर हंगामा किया, तो काया ने बहुत ही शांति से कहा, "शिखा जी, माफ़ कीजियेगा। शायद मेरी ही गलती रही होगी। मैं अभी आपके लिए ताज़ा रायता बना देती हूँ, उससे नमक का असर कम हो जाएगा।"

काया के इस ठंडे और सधे हुए बर्ताव ने शिखा को निरुत्तर कर दिया। मनोरमा ने यह नज़ारा देखा और अपनी डायरी में काया के नाम के आगे एक चेक मार्क और लगा दिया।

वंशिका को अपनी योजना फेल होती दिख रही थी। उसने सोचा था कि सास-ननद काया को भगा देंगी, पर यहाँ तो वे उसे परख रही थीं। उसे डर लगने लगा कि कहीं मनोरमा काया को ही वंशिका के विकल्प के रूप में न देखने लगें।

घर में अब एक खामोश इंतज़ार था—उस फैसले का, जो मनोरमा देवी लेने वाली थीं।

वंशिका की तबीयत अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी, लेकिन उसके मस्तिष्क में चल रही रणनीतियां पहले से कहीं अधिक तीव्र हो गई थीं। उसे अहसास हो गया था कि मनोरमा देवी उसे और काया को एक तराजू पर तौल रही हैं। उसने तय किया कि वह अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक होकर खेलेगी।

सुबह के सात बज रहे थे। वंशिका पूरी तरह तैयार होकर अपने कमरे में टहल रही थी, मानो किसी बड़े फैसले का इंतज़ार कर रही हो। तभी मनोरमा देवी वहां से गुजरीं। कमरे का दरवाज़ा खुला देख वे अंदर झाँकने लगीं और बिखरे हुए सोफे को देखकर तंज कसा, "बहू, सूरज सिर पर आ गया है और तुम्हारे कमरे की चादरें अब भी अपनी जगह तलाश रही हैं। घर की ये अव्यवस्था देखकर मेरा तो जी घबराता है। क्या ऐसे ही घर चलाया जाता है?"


वंशिका ने इस तंज को लपक लिया। उसने पलटकर बड़ी सहजता से कहा, "माँ जी, मैं तो कब से भूपेंद्र से कह रही हूँ कि इस काया को काम से हटा दें, तो मैं फिर से घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल लूँ। लेकिन आपका बेटा ही तो उसे हटाने नहीं देता। और फिर माँ जी, वह इस घर से इतनी मोटी रकम (सैलरी) वसूलती है, तो मैं काम को हाथ क्यों लगाऊँ? उसे पैसे किस लिए मिल रहे हैं? अगर मैं ही सब करूँगी, तो उसे मुफ्त की तनख्वाह क्यों दें?"

मनोरमा देवी सोच में पड़ गईं। वंशिका का तर्क काट पाना मुश्किल था। पैसा मनोरमा की सबसे कमज़ोर रग थी। उन्होंने सिकोड़ी हुई भवों के साथ उसे देखा।

वंशिका ने आग में घी डालते हुए आगे कहा, "सच मानिए माँ जी, अगर काया यहाँ नहीं रहती है, तो मैं खुद सारे काम कर लूँगी। मुझे कोई शौक नहीं है अपनी गृहस्थी को किसी बाहरी औरत के हाथों बर्बाद होते देखने का। लेकिन आपके बेटे को काया के सिवा कुछ सूझता ही नहीं है। पहले वह मुझे ताने मारते थे कि मेरी माँ की बराबरी कोई नहीं कर सकता—जो कि सच भी था। लेकिन अब... अब वह कहते हैं कि काया के बराबर कोई काम नहीं कर सकता। कल को तो वह उसे घर का सदस्य ही घोषित कर देंगे।"

मनोरमा की शक्ल देखने लायक हो गई। उनके भीतर वही आशंका घर कर गई जो उन्हें रात भर सोने नहीं दे रही थी। उनके राजा बेटे की नज़रों में उनकी जगह कोई दूसरी औरत (चाहे वह नौकरानी ही क्यों न हो) ले ले, यह उनके अहंकार के लिए असहनीय था।

वंशिका ने उनकी आँखों में उभरते हुए उस डर को पहचान लिया। उसे पता था कि उसने सही नस पर हाथ रखा है।

मनोरमा देवी कमरे से बाहर निकलीं, तो उनका दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। स्थिति उनके अनुमान से कहीं अधिक पेचीदा थी।
वे यहाँ एक ही उद्देश्य से आई थीं—वंशिका का जीना हराम करना, उसे यह अहसास दिलाना कि वह एक बुरी बहू है, और उसे वापस उनके चरणों में झुकने पर मजबूर करना। वे चाहती थीं कि हफ्ते भर में वंशिका हार मान ले और वापस उनके पुराने घर में लौट चले, जहाँ शिखा और मनोरमा की हुकूमत चलती थी।
लेकिन यहाँ तो माहौल ही बदला हुआ था। यहाँ दुश्मन वंशिका नहीं, बल्कि काया बन गई थी।

मनोरमा के सामने अब दो रास्ते थे: काया को बाहर निकालना: अगर वह काया को निकाल देती हैं, तो भूपेंद्र उनसे नाराज़ होगा। साथ ही, वंशिका फिर से घर की मालकिन बन जाएगी और भूपेंद्र पर अपना प्रभाव बढ़ा लेगी।
काया को मूक समर्थन देना: अगर वह काया को रखे रहती हैं, तो वह वंशिका को उसकी औकात दिखाती रहेगी और वंशिका को घर में नीचा महसूस कराएगी। लेकिन इसका खतरा यह था कि काया धीरे-धीरे भूपेंद्र के मन पर पूरी तरह काबिज़ हो सकती थी।

मनोरमा ने हॉल में देखा जहाँ काया बड़े ही सलीके से भूपेंद्र का नाश्ता मेज पर लगा रही थी। भूपेंद्र मुस्कुराते हुए उससे बात कर रहा था। मनोरमा को अपनी सत्ता खतरे में दिखी। उन्हें लगा कि वंशिका कम से कम उनके परिवार का हिस्सा तो है, लेकिन यह काया? यह तो उनकी बरसों की मेहनत से सींचे गए राजा बेटे को उनसे वैचारिक रूप से दूर कर रही थी।

तभी शिखा वहां आई और अपनी माँ के कान में फुसफुसाई, "मम्मी, आपने देखा? भैया कैसे काया-काया रट रहे हैं? मुझे तो डर है कि कहीं ये औरत इस घर के कागज़ातों पर हाथ न साफ़ कर दे। और भाभी? वो तो बस तमाशा देख रही हैं।"

मनोरमा ने शिखा को गौर से देखा और फिर रसोई में व्यस्त काया की ओर। उन्होंने मन ही मन तय किया कि फिलहाल वे काया को नहीं निकालेंगी। वे काया का इस्तेमाल वंशिका को तोड़ने के लिए करेंगी, और जब वंशिका पूरी तरह टूट जाएगी, तब वे एक झटके में काया को बाहर फेंक देंगी।

मनोरमा ने हॉल में आकर तेज़ आवाज़ में कहा, "काया! आज दोपहर के खाने में मेरी पसंद की कढ़ी बनाना। और सुनो, भूपेंद्र को ताज़ा मट्ठा देना। इस घर में अब मेरी चलेगी, समझी?"

काया ने मुस्कुराकर सिर झुकाया, "जी माँ जी, जैसा आप कहें।"

वंशिका कमरे के दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसे समझ आ गया कि सासू माँ ने अभी काया को ढाल बनाने का फैसला किया है। वह मुस्कुराई, क्योंकि उसे पता था कि जितना अधिक मनोरमा काया को बढ़ावा देंगी, उतनी ही जल्दी भूपेंद्र और मनोरमा के बीच भी टकराव शुरू होगा।

घर में अब त्रिकोणीय युद्ध शुरू हो चुका था, जहाँ हर औरत दूसरी को नीचा दिखाने के लिए अपनी बिसात बिछा रही थी।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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