स्थान: 'द गॉथिक फोर्ट' - राणा मेंशन
समय: सुबह १०:०० बजे
आरंभी को जब होश आया, तो उसे अपना अस्तित्व किसी 'क्रैश' हुए सर्वर की तरह बिखरा हुआ महसूस हुआ। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, सुबह ५:३० बजे का वह रूह कंपा देने वाला मंजर—वह खून से सना खंजर, वह दर्दनाक चीख और आर्यवर्धन का वह क्रूर चेहरा—उसके दिमाग में '4K रेजोल्यूशन' में फ्लैश होने लगा।
खिड़की से उस 'डेथ-लीप' (छलांग) की वजह से उसकी पीठ और बाहों पर नीले निशान उभर आए थे, लेकिन वह दर्द उस 'मेंटल ट्रॉमा' के सामने कुछ भी नहीं था जिसे उसने अभी अनुभव किया था। तभी, कमरे का भारी ओक का दरवाजा एक यांत्रिक 'बीप' की आवाज़ के साथ खुला। एक दासी, जिसकी नज़रें ज़मीन पर गड़ी थीं, हाथ में चांदी की एक भारी ट्रे और 'चारकोल-ग्रे' रंग का फॉर्मल सूट लेकर अंदर आई।
"मिस्टर आर्यवर्धन 'कंजरवेटरी' (शीशमहल) में आपका इंतज़ार कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि आपके पास केवल १५ मिनट का 'Buffer Time' है," दासी ने बिना पलक झपकाए मशीनी आवाज़ में कहा।
आरंभी की नसों में गुस्से का लावा बहने लगा। उसने उस ट्रे की तरफ देखा, जिसमें ताज़ा फल और सूप सजा था। अचानक, उसने ट्रे उठाई और पूरी ताकत से सामने वाली दीवार पर दे मारी।
'क्रैश!'
कांच के टुकड़े और खाना फर्श पर बिखर गया। "जाकर अपने उस 'साइको-एडमिन' से कह दो, आरंभी शास्त्री का ज़मीर बिकाऊ नहीं है! मैं उस कातिल के घर का खाना तो क्या, पानी भी नहीं पियूँगी!" दासी डर से थर-थर कांपने लगी और बिना एक शब्द कहे वहां से भाग गई।
आरंभी ने अपने बिखरे हुए कपड़े ठीक किए और गुस्से के आलम में कमरे से बाहर निकल गई। उन घुमावदार गलियारों से गुजरते हुए दीवार पर लगी पेंटिंग्स उसे डरा नहीं रही थीं, बल्कि मानो उसका मज़ाक उड़ा रही थीं। उसे लगातार महसूस हो रहा था कि हर कैमरा उसे ट्रैक कर रहा है, जैसे वह किसी 'लैब' की चूहा हो।
'कंजरवेटरी' (शीशमहल) घर के पिछले हिस्से में कांच की एक विशाल संरचना थी। वहां के पौधे सुंदर नहीं, बल्कि नुकीले और 'शिकारी' (Predatory) लग रहे थे। सूरज की रोशनी उन कांच की दीवारों से छनकर ऐसे अंदर आ रही थी, मानो 'Data Stream' का जाल बिछाया गया हो।
आर्यवर्धन एक कांच की मेज पर बैठा था, सामने उसका 'अल्ट्रा-थिन' लैपटॉप खुला था। उसकी सफेद शर्ट की आस्तीनें ऊपर मुड़ी हुई थीं और चेहरे पर सुबह के कत्ल का एक भी निशान नहीं था। वह इतना शांत था, मानो सुबह उसने किसी की जान नहीं, बल्कि बस एक साधारण 'Bug' फिक्स किया हो।
"तुम्हारी 'Processing' बहुत स्लो है आरंभी। १० मिनट लेट हो तुम," उसने बिना सिर उठाए ही कहा।
"भाड़ में जाए तुम्हारी प्रोसेसिंग!" आरंभी चिल्लाई। "तुम एक 'Cold-blooded' कातिल हो! तुम्हें क्या लगता है, तुम मुझे यहाँ कैद करके रखोगे और मैं तुम्हारी गुलाम बनकर काम करूँगी? मैं अभी के अभी बाहर जाऊँगी और दुनिया को बताऊँगी कि आर्यवर्धन राणा एक जानवर है!"
आर्यवर्धन ने बहुत धीरे से अपना लैपटॉप बंद किया। वह अपनी कुर्सी से उठा और किसी शिकारी जानवर की तरह उसकी ओर बढ़ने लगा। उसके जूतों की आवाज़ उस शांत हॉल में किसी 'Death Countdown' की तरह गूँज रही थी।
आरंभी पीछे नहीं हटी। जैसे ही वह करीब आया, आरंभी ने अपनी पूरी ताकत समेटकर हाथ हवा में लहराया और आर्यवर्धन के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।
'चटाख!'
सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि आरंभी को अपनी खुद की धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं। आर्यवर्धन का चेहरा एक तरफ झुक गया था। उसने अपनी जीभ से होंठ के उस कोने को छुआ, जहाँ से खून की एक बारीक लकीर निकली थी। उसने अपना चेहरा सीधा किया, उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक भयानक 'शून्य' था।
"Slap?" वह फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक थी।
"आरंभी, तुमने अभी एक ऐसी 'Disaster File' ओपन कर दी है, जिसे तुम कभी डिलीट नहीं कर पाओगी।"
"मैं तुमसे कतई नहीं डरती!" आरंभी ने उसे दोबारा धक्का देने की कोशिश की। "तुम इस समाज के लिए एक 'Bug' हो! मुझे अभी के अभी बाहर जाने दो, वरना..."
"वरना क्या?" उसने झटके से आरंभी की गर्दन के पीछे हाथ डाला और उसे अपनी ओर खींच लिया। "बाहर जाओगी? अपनी 'Family' को खतरे में डालकर?" उसने फोन निकाला और एक लाइव वीडियो फीड दिखाई—हॉस्पिटल के बेड पर पड़ा उसका भाई, ऋषभ।
आरंभी का शरीर सुन्न पड़ गया। "ऋषभ भाई... नहीं! तुम... तुम उन्हें इस सब में क्यों घसीट रहे हो? वे निर्दोष हैं! एक मासूम को सज़ा देकर तुम क्या साबित करना चाहते हो?" आरंभी की आँखों से आँसू बहने लगे।
आर्यवर्धन के होंठों पर एक क्रूर मुस्कान आई। उसने फोन आरंभी के चेहरे के करीब किया।
"Innocent?" आर्यवर्धन की आवाज़ बिजली की तरह कड़क उठी। "Seriously आरंभी? तुम्हें लगता है तुम्हारा भाई एक मासूम फरिश्ता है जो गलती से कोमा में चला गया?"
उसने स्क्रीन पर दूसरी फाइल स्वाइप की। उसमें कुछ पुरानी पुलिस रिपोर्ट्स और धुंधली वीडियो फुटेज थीं।
"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ, तुम्हारे इस सो-कॉल्ड 'Innocent' भाई ने न जाने कितनी नाबालिग लड़कियों पर अत्याचार किए हैं। उन लड़कियों की चीखें आज भी उन फाइलों में दफन हैं, जिन्हें तुम्हारे उस बुड्ढे बाप ने अपने रसूख से 'Delete' करवा दिया था। तुम्हारा भाई विक्टिम नहीं, बल्कि एक 'Corrupted Code' है जिसने कइयों की ज़िंदगी बर्बाद की है।"
आरंभी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह आर्यवर्धन को खुद से दूर धकेलते हुए कांपती आवाज़ में बोली, "न... नहीं... यह झूठ है! तुम सफेद झूठ बोल रहे हो! एक निर्दोष पर ऐसे आरोप लगाते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए!"
"शर्म तो तुम्हारे पूरे परिवार को आनी चाहिए आरंभी, क्योंकि Data never lies!" आर्यवर्धन ने एक कदम आगे बढ़ाकर फिर से उसे झटके से अपनी ओर खींचा और उसकी कलाई मजबूती से पकड़ ली। "जिस एक्सीडेंट की वजह से वह कोमा में गया, वह महज़ कोई इत्तेफाक नहीं था... वह तुम्हारे भाई के ही एक दुश्मन द्वारा लिया गया 'System Revenge' था। आज अगर उसका दिल धड़क रहा है, तो सिर्फ मेरी मेहरबानी और मेरी मशीनों की वजह से!"
आरंभी पूरी तरह टूट चुकी थी। उसकी आँखों के आगे सब कुछ घूमने लगा, मानो किसी ने उसके दिमाग का सारा 'डेटा' अस्त-व्यस्त कर दिया हो। सदमा, भूख और पुरानी कमज़ोरी ने एक साथ हमला किया। उसकी आँखों के सामने काला अंधेरा छा गया और उसका शरीर सुन्न पड़ गया।
आरंभी का शरीर निर्जीव होकर ज़मीन की ओर गिरने लगा। आर्यवर्धन की आँखों में पहली बार एक खौफ चमका—हारने का खौफ नहीं, बल्कि अपने सबसे कीमती 'Asset' को खो देने का डर। उसने बिजली की तेज़ी से झुककर आरंभी को ज़मीन से टकराने से पहले ही अपनी मज़बूत बाहों में जकड़ लिया।
उसकी पकड़ में अब वह क्रूरता नहीं, बल्कि एक अजीब सी हड़बड़ाहट और 'Surgical Protectiveness' थी। उसने आरंभी का पीला पड़ा चेहरा देखा और दहाड़ा— "कोई है? जल्दी पानी लेकर आओ! Dammit... आरंभी, अपनी आँखें खुली रखो! मैं तुम्हें 'Shut-down' होने की परमिशन नहीं देता। होश में आओ!"
उसकी आवाज़ पूरे शीशमहल में किसी 'Shockwave' की तरह गूँजी। तभी वही दासी, कांपते हाथों से पानी का गिलास लिए भागती हुई आई। वह नज़ारा देखकर उसके हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।
"सर... वो..." दासी हकलाने लगी।
"वहाँ खड़ी क्या देख रही हो? पानी दो इसे! क्या तुम्हारे सिस्टम की 'Processing' भी रुक गई है? इसे होश में लाने के लिए कुछ करो!" आर्यवर्धन का स्वर चिंता और जानलेवा गुस्से की सरहद पर था।
दासी ने डरते हुए नज़रें नीची कीं और कांपती आवाज़ में कहा, "सर... मैडम ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। मैंने नाश्ता भेजा था, पर उन्होंने उसे दीवार पर दे मारा। कमरे में हर तरफ कांच के टुकड़े और खाना बिखरा पड़ा है... उन्होंने पानी की एक बूंद तक नहीं ली है।"
यह सुनते ही आर्यवर्धन के चेहरे की चिंता की लकीरें किसी डिलीट की गई फाइल की तरह गायब हो गईं। उसकी आँखों में एक भयानक अंधेरा छा गया। उसकी चिंता अब एक ठंडे और 'कैलकुलेटेड' गुस्से में बदल चुकी थी। उसने आरंभी को झटके से सीधा खड़ा किया, जबकि वह किसी टूटी हुई गुड़िया की तरह लड़खड़ा रही थी।
"तो... तुमने मेरी 'Authority' बायपास करने के लिए खुद को 'Hunger-strike' पर डाल दिया है बीवी?" आर्यवर्धन की आवाज़ अब और भी भारी और खौफनाक हो गई थी।
"तुम्हें लगा कि तुम खुद को 'Damage' पहुँचाओगी और मैं पिघल जाऊँगा? अगर तुम्हें अन्न की कद्र नहीं है, तो तुम्हें रोशनी का भी अधिकार नहीं है। मेरी सल्तनत में 'Resources' का अपमान करने वालों का अंजाम बहुत बुरा होता है!"
उसने बिना किसी रहम के आरंभी की नाज़ुक कलाई पकड़ी और उसे घसीटते हुए मेंशन के सबसे निचले और पुराने हिस्से की ओर ले जाने लगा। आरंभी कुछ नहीं बोल पा रही थी, उसका दिमाग अब भी ऋषभ के उस 'Corrupted' सच को डिकोड करने में 'हैंग' था।
वे सीढ़ियों से नीचे उतरते गए, जहाँ हवा भारी और ठंडी होती जा रही थी। अंत में, वे एक पुराने और भारी लकड़ी के दरवाज़े के सामने रुके— द डार्क बेसमेंट।
"जब तक तुम मेरी हर कमांड को अपनी 'Destiny' नहीं मान लेतीं, तुम इसी 'Black-box' में रहोगी। जब तक तुम अन्न का आदर करना नहीं सीखतीं, तुम्हें न खाना मिलेगा न पानी!" उसने दरवाज़ा खोला और आरंभी को उस घुप्प अंधेरे कमरे के अंदर धक्का दे दिया।
आरंभी लड़खड़ाकर धूल भरी ज़मीन पर गिर पड़ी। आर्यवर्धन ने दरवाज़े की चौखट पर खड़े होकर आखिरी बार उसकी तरफ देखा, उसके होंठों पर एक क्रूर मुस्कान थी।
"और याद रखना आरंभी... तुम्हारी फैमिली की हर धड़कन अब तुम्हारी 'Loyalty' पर टिकी है। इसे अपना 'Offline Mode' समझो। यहाँ कोई वाई-फाई नहीं, रोशनी नहीं... सिर्फ तुम और तुम्हारे गुनाह!"
'बँग!' दरवाज़ा बंद हुआ और बाहर से भारी ताला लगाने की आवाज़ आई। आरंभी उसी अंधेरे में ठंडी ज़मीन पर सिमट कर बैठ गई। उसके कानों में अब दो आवाज़ें गूँज रही थीं—एक तरफ भाई की वे धुंधली यादें और दूसरी तरफ आर्यवर्धन का वह खौफनाक 'Data'। वह अब एक ऐसे 'Black Hole' में थी जहाँ से 'Log-out' करना उसके वश में नहीं था।