inteqam, chapter-40 in Hindi Women Focused by Mamta Meena books and stories PDF | इंतेक़ाम - भाग 40

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इंतेक़ाम - भाग 40

तब संगीता बोली यह नहीं हो सकता निशा तुम समझो लोग क्या कहेंगे समाज क्या कहेगा,,,,,

तब निशा बोली क्यों नहीं हो सकता क्या तुम्हें अपनी जिंदगी खुलकर जीने का कोई अधिकार नहीं है क्या एक तलाक के बाद एक औरत की जिंदगी खत्म हो जाती है जो गलती तुमने की ही नहीं उसकी सजा तुम भुगत रही हो,,,,,

हमारा यह समाज दोगला है यह हर हाल में एक औरत को ही दोषी ठहरा था है, इस समाज के डर से ना जाने कितनी औरतें घुट घुट कर अपना जीवन बिता देती है,,,,,,

यह वह समाज है जो मुसीबत में हमारा साथ नहीं देता लेकिन अगर हम अब खुलकर अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं ना तो यह हमारे ऊपर उंगली उठाना जरूर शुरू कर देता है,,,,

और समझो यह समय समाज के बारे में नहीं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अपनी खुशी के बारे में उनकी खुशी के बारे में सोचने का है, अरे क्या तुम अपनी जिंदगी खुलकर नहीं जीना चाहती तुम्हें भी किसी ऐसे इंसान की कमी महसूस होती होगी जिसके कंधे पर तुम्हें मुसीबत में सिर रखकर रो सको, जिसे अपना हर सुख दुख बांट सको,,,,,

यह जिंदगी छोटी नहीं है सन्नो बहुत बड़ी है और ऐसे अकेले घुट घुट कर जीना आसान नहीं है,,,,

यह सुनकर सन्नो के पिता जी बोले हां बेटी निशा बिटिया बिल्कुल सही कह रही है मैं भी इसकी बात से सहमत हूं, अरे भला देवता जैसे इंसान तुम्हारे लिए आगे से चलकर शादी का प्रस्ताव लेकर आया है तो बेटा इस प्रस्ताव को मत ठुकराओ,,,,,

यह सुनकर सन्नो बोली लेकिन पिताजी आप समझो ना,,,,,

तब उसके पिताजी बोले हां बेटा मेरी भी है इच्छा है कि मैं मरने से पहले अपनी आंख बंद होने से पहले एक बार तुम्हारा घर फिर से बसा हुआ देखो, बेटा मैं पहले ही तुम्हारा घर उजाड़ता देख कर जीते जी ही मर चुका हूं अब बेटा अगर अपने बाप की आखिरी इच्छा को पूरा करना तुम्हारे हाथ में है जिससे मैं भी तुम्हें खुश देखकर अपनी आखिरी सांस चैन से ले सकूं,,,,,,

सब की बात सुनकर सन्नो कुछ देर चुप रही और फिर बोली जैसी आपकी मर्जी मुझे भी इस रिश्ते से कोई एतराज नहीं है,,,,,

यह कहकर वह उठकर वहां से चली गई, तब सुनील दत्त ने उठकर सन्नो के पिता जी के पैर छू लिए,,,,

तब सनों के पिताजी बोले बेटा तुम्हारा यह एहसान में जीते जी कभी नहीं भुला पाऊंगा कि पहले तुमने मेरी सन्नो और मेरी निशा बिटिया को उनके जीने की चाह बताई और अब मेरी बिटिया का जीवन भर के लिए हाथ थामना चाहते हो,,,,

तब उसके हाथ को अपने हाथों में लेकर सुनील दत्त बोले एहसान तो आप मुझ पर कर रहे हो अपनी देवी जैसी बेटी देकर,,,,

यह कहकर उसने सन्नो के पिताजी को गले लगा लिया, इस तरह दोनों का रिश्ता तय हो गया और फिर एक सादा ढंग से मंदिर में दोनों की शादी हो गई,,,,,

इस शादी में जहां एक तरफ निशा ने संगीता की बहन बनकर जूते छुपाकर उसका नेग प्राप्त किया तो वहीं दूल्हे की बहन बन कर दरवाजा रुक आई आदि के नेक प्राप्त किए,,,,

संगीता दुल्हन बनकर अब सुनील दत्त के परिवार में आ गई, सुनील दत्त के दोनों बच्चे भी संगीता से अपनी सगी मां की तरह प्यार करने लगे और संगीता का बेटा भी सुनील दत्त को अपने सगे पापा से बढ़कर चाहने लगा, तीनों बच्चे ही आपस में बहुत खुश थे ,साथ स्कूल जाते, साथ साथ खेलते और साथ साथ खाना खाते थे, उनमें किसी भी तरह की द्वेष भावना नहीं थी,,,,, 

सुनील दत्त और संगीता कभी भी अपने बच्चों में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करते थे,,,,

निशा उन दोनों को खुश देखकर बहुत खुश होती लेकिन सुनील दत्त और संगीता को अब निशा की चिंता थी क्योंकि वे लोग जानते थे कि जिस मुस्कुराती और हंसते हुए निशा को बे लोग देख रहे है वह अंदर से बिल्कुल टूट चुकी है,,,,

उन लोगों ने निशा को काफी समझाया कि वह विजय को माफ कर दे वही विजय ने भी कई बार निशा से माफी मांगी लेकिन निशा शायद अपने अतीत को भुला नहीं पा रही थी,,,,,