राजन का मन जैसे कर रहा था वो वैसे त्रिशा को इधर उधर धक्का दे रहा था। उसे मार रहा था। उसे कोस रहा था। उसके और उसके परिवार के लिए अपशब्द कह रहा था और त्रिशा बस अपनी आंखों से आंसू बहाएं जा रही थी। त्रिशा के साथ इतना सब करने के बाद भी जब उसका मन ना भरा तो वो बोला, " अब तुझे समझ में आया न कि क्या क्या गलतियां थी तेरी तो आगे से अब इनमें से कुछ भी दोबारा मत करना और अब जमीन पर क्या पड़ी है उठ चल अब पत्नी होने का कर्तव्य निभा आ इधर आ और बन जा मेरी पत्नी।।।।।म इतना कह उसने त्रिशा को जमीन से उठा बेड पर पटका उसके ऊपर अपने पति होने का अधिकार जबर्दस्ती जमाना शुरु करने लगा।
किसी भूखे भेड़िये की तरह राजन त्रिशा पर, उसकी देह पर, टूट पड़ा। बहुत ही बेसब्री के साथ और बेरुखी के साथ उसने त्रिशा के लहंगे के कपड़ों को बहुत ही बेदर्दी और बदसलूकी से हटा कर जमीन पर बिखेर दिया। वो लहंगा जिसे त्रिशा ने बड़े ही अरमानों से लिया और पहना था आज उसी की तरह बुरी दशा में पड़ा हुआ था। बस फर्क इतना था कि त्रिशा अपनी दशा पर लगातार आंसू बहा रही थी और उसका लहंगा यह कर नहीं सकता था।
बिस्तर पर पड़े उस बेजान सी गुड़िया के शरीर पर वो राक्षस सा बन ऐसा टूटा कि उसके अपने शरीर को दबोच कर रख दिया। बेचारी की चीख, चीत्कार, सिसकियां कुछ दिखाई या सुनाई नहीं दी। उस बेजान शरीर को नोचते हुए और उसके एक एक हिस्से पर वो आदमी जो उसका पति होने का अधिकार दिखने में लगा था उसने उसके शरीर के अंगों को अपनी हवस मिटाने की जंग में ऐसे रौंदा जैसे वो कोई इंसान नहीं। जैसे उसकी कोई भावना नहीं। जैसे उसमें कोई जान नहीं। उस आदमी के लिए वो अपनी नई नवेली दुल्हन की बयाज जंग में जीती किसी जागीर की तरह थी जिस पर अपना पूर्ण आधिपत्य स्थापित करने में वह बस लगा हुआ था।
और त्रिशा बेचारी किसी बेजान गुड़िया की तरह बस बिस्तर पर पड़ी थी। उसके साथ जो कुछ भी हो रहा था उसका एक भी हिस्सा उसे अच्छा नहीं लग रहा था पर वह ना तो कोई बचाव कर रही थी और ना ही कोई प्रतिक्रिया दे रही थी। वह आदमी जो उसका पति है उसके ऊपर बल का प्रयोग कर रहा है, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के नाम पर उसका शोषण कर रहा है, उसे शारीरिक कष्ट हो रहा है पर फिर भी उसके मुंह से ना तो कोई आह निकली और ना ही कोई ऊफ्फ की आवाज। निकल रही थी। निकल रहे थे तो बस उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे। जिसके कारण उसकी आंखों का काजल बह कर उसके चेहरे पर कालिख छोड़ रहा था। उसका चेहरा लगातार थप्पड़ों की मार से सूज गया था। और वह बस ऐसे ही पड़ी थी वह बिस्तर पर। ऐसा लग रहा था कि मानो अब उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था कि राजन उसके कपड़ों के साथ या उसके शरीर के साथ या फिर उसकी आत्मा के साथ या उसके आत्म सम्मान के साथ क्या कर रहा है।
वो बस पड़ी थी। लेकिन यह सच नहीं था उसे फर्क पड़ रहा था। इस समय केवल उसका शरीर ही नहीं उसकी आत्मा भी कष्ट में थी। तकलीफ में थी। मुंह से भले ही कुछ ना निकला हो पर मन से वह चीख चीख कर रो रही थी। उसे मां ने समझाया था कि पति पत्नी का रिश्ता सिर्फ रुहानी नहीं होता बल्कि जिस्मानी भी होता है और इसके लिए एक पत्नी को अपने पति के प्रति पूरी तरह से समर्पित होना पड़ता है। उसे अपना मन, तन सब कुछ पति को सौंपना पड़ता है। और उस पत्नी के शरीर पर केवल उसके पति का ही अधिकार होता है तो जब वह समय आए तो कोई नखरे ना दिखाना, उसे मना ना करना क्योंकि वो एक पति का हक तो होता ही है। एक पत्नी का मान सम्मान तभी तक होता है जबतक वो अपने पति के दिल पर रहती है। एक बार पत्नी पति के दिल से उतरी उसके बाद ससुराल में भी उसकी इज्जत धीरे धीरे कम होती जाती है। इसलिए अपने पति को रीझा कर रखना।
मां ने कहा था कि अगर पत्नी अपने आप को पति को सौंप दे तो पति उसे पलकों पर बिठा लेता है। उसके सारे नखरें उठाता है पर कहीं भी मां ने यह जिक्र नहीं किया था कि यह सब करने के लिए पत्नी को अपने ही आत्म सम्मान से समझौता करना पड़ता है। वही पति जो उसका सबकुछ होता है उसमें ऐसा एक जानवर भी छिपा होता है। वही पति जो पत्नी का समाज के सामने सम्मान करता है बाद में बंद कमरों के पीछे उस सम्मान का बदला ब्याज समेत उसे ऐसे अपमानित करके वापिस ले लेता है।
क्या सच में पति ऐसा ही होता है????? जो अपनी पत्नी को मात्र एक भोग की वस्तु और उस पर आश्रित एक दासी मानता है????? सवाल बहुत थे मन में, ख्याल बहुत थे जहन में त्रिशा के पर उन्हें कह पाने की ना तो ताकत थी और ना ही हिम्मत थी। वो इस समय तन और मन से पूरी तरह टूट चुकी थी। इस समय तो वह बस एक गुलाम की तरह बिस्तर पर पड़ी थी जिसके साथ जो भी हो रहा था उस पर कोई प्रतिक्रिया देना तो दूर त्रिशा को हिलने की भी इजाजत ना थी।
वो उसे नोचने, खसोटने, मरोड़ने, मसलने में लगा था और उसका एक एक प्रहार त्रिशा के शरीर पर नहीं बल्कि उसकी आत्मा पर हो रहा था। खैर अपने पति का जोर उसके चरम सुख पाने की यह जंग जब त्रिशा के सहन के बाहर हो गई तो खुद त्रिशा को भी पता ना चला कि वो कब बेहोश हो गई। और उसके बेहोश होने के बाद उसके पति ने उसके बाद और कितनी देर तक उसके साथ कब तक और अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन किया।