My groom has to die - 11 in Hindi Women Focused by Varun books and stories PDF | मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 11: सुहागरात (फिनाले)

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 11: सुहागरात (फिनाले)

बारात का आगमन ज़ोर-शोर से हुआ।

घोड़ों की टापें, आतिशबाज़ी, और नाचते हुए लोग।

करण घोड़ी पर आया—सिर पर सेहरा, चेहरे पर वही आत्मविश्वास भरी मुस्कान। फिर घोड़ी से उतरकर सीधे अपनी महँगी लाल लैंबॉर्गिनी में बैठा। इंजन की दहाड़ पर भीड़ ने तालियाँ बजाईं।

कुछ देर बाद दुल्हन की एंट्री हुई।

फूलों से सजा रथ, ऊपर से गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश।

सौम्या लाल जोड़े में थी। चेहरा शांत, मुस्कान सधी हुई—पर आँखें बार-बार भीड़ में कुछ ढूँढ रही थीं।

मंडप में दोनों को बैठाया गया।

पंडित मंत्र पढ़ने लगे।

करण झुककर कुछ कहता, उँगलियों से हल्की-सी छेड़ करता।

सौम्या मुस्कराती रही—सिर हिलाती, नज़रें झुकाती—जैसे सब कुछ सामान्य हो।

तभी दूर कहीं एक तेज़ धमाका हुआ।

एक पल को संगीत थम गया।

फिर गोलियों जैसी आवाज़ें।

भीड़ में हलचल मच गई। कुछ लोग उस दिशा में भागे। सुरक्षा वाले सतर्क हो गए। डीजे की आवाज़ बंद हो गई।

कुछ ही मिनटों में ठाकुर धुरंधर सिंह खुद आगे आए।

माइक हाथ में लिया।

“देखिए, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है,” उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा। “एक जनरेटर में छोटी-सी खराबी हो गई थी। अब सब ठीक है। आप सब एंजॉय कीजिए।”

धीरे-धीरे लोग शांत हो गए।

संगीत फिर शुरू हुआ।

मंत्र फिर बहने लगे।

रस्में पूरी होती रहीं।

फेरे, हवन, सिंदूर।

सौम्या के चेहरे पर मुस्कान जमी रही—पर भीतर कुछ कसता जा रहा था।

हर मंत्र के साथ साँस भारी होती जा रही थी।

शादी निपट चुकी थी, पर जख्खड़ का कोई नामोनिशान नहीं था।

आख़िरी रस्म के बाद नानी कमिनी देवी आगे आईं।

हाथ में एक छोटी-सी थाली थी—दो लड्डू रखे थे।

उन्होंने ऊँचे स्वर में कहा, “अरे इतनी रस्में हो गईं, पर लड्डू खिलाए ही नहीं गए।”

ठाकुर हँसे। “अरे माता जी, आप भी—”

कमिनी देवी ने हल्की-सी डाँट दी। “बड़ों की रस्म में टोका-टाकी नहीं होती दामाद जी।”

उन्होंने एक लड्डू उठाया और करण के मुँह में ज़बरन डाल दिया।

फिर दूसरा सौम्या के मुँह में।

सौम्या का संयम टूट गया।

आँसू बह निकले। वह नानी से लिपट गई।

नानी ने कुछ नहीं पूछा।

बस सिर पर हाथ फेरती रहीं।

सौम्या की कजिन्स जूता-चोरी और बाकी रस्मों की बात करने लगीं, पर बीच में आयी रुकावट की वजह से देर हो चुकी थी।

ठाकुर साहब और पशुपति बाबू ने फैसला किया—आज रात सब हवेली में ही रुकेंगे।

सुबह विदाई होगी।

करण को उसके दोस्त यार शराब के एक राउंड के लिए खींच ले गए।

हवेली की लाइटें देर रात तक जलती रहीं।

हँसी, शराब, थकान और संतोष के बीच—कहीं, बहुत भीतर, एक और घड़ी चल रही थी।

--

कुछ देर बाद

कमरा सजा हुआ था।

फूलों की खुशबू, हल्की रोशनी, और बाहर से आती हँसी—जैसे यह जगह किसी और कहानी की हो।

सौम्या पलंग के किनारे बैठी थी।

पीठ सीधी, हाथ आपस में भींचे हुए।

दरवाज़ा खुला।

करण अंदर आया। शराब की तीव्र बदबू का भपका पूरे कमरे को नहला सा गया।

सेहरा उतार चुका था। आँखों में वही परिचित चमक—शिकारी।

“कहाँ था न, बेबी,” उसने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा, “हर रात। हर रात।”

उसने हाथों से वही भद्दा इशारा किया।

सौम्या ने चेहरा दूसरी ओर फेर लिया।

करण पास आया। “इससे पहले कि तुम्हारी इज़्ज़त के परदे खुलें, तुम्हें कुछ सुनाना है।”

हँसा और फोन निकाला। एक बटन दबाकर स्पीकर पर डाल दिया।

कमरे में सौम्या की अपनी आवाज़ गूँजी—

“शादी में बस दो दिन बचे हैं। मेरी ज़िंदगी को नर्क बनने से बचा लीजिए, भैया।”

सौम्या की साँस अटक गई। वही बात जो उसने जख्खड़ से कही थी, सुनंदा मौसी के पार्लर में, एक मदद की गुहार।

करण ने ज़ोर का ठहाका लगाया।

“तू साली उस डाकू से दोस्ती-यारी करने गई, उस ग़रीब ने तुझे ही बेच खाया, सौम्या। तेरी पोल खोली और डील हमसे की—पूरे दस करोड़ में खरीदा उसका ज़मीर। His so-called खुद्दारी।”

फ़ोन ऑफ कर एक ओर फेंका। “अब कहीं नेपाल में होगा साला, किसी रंडीखाने में ऐश करता।” हँसा।

वह हँसी अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि उसने गले पर हाथ फेरा।

“ये गले में क्या—”

करण की आवाज़ अटक गई।

उसने कॉलर ढीला किया।

साँसें भारी हो गईं। आँखें लाल होने लगीं—जैसे भीतर कुछ जल रहा हो। माथा पसीने से तर हो गया। “तूने… कुछ किया?”

उसने आगे बढ़ने की कोशिश की।

सौम्या खड़ी हो गई।

पहली बार—वह मुस्करा रही थी।

करण ने उसे पकड़ना चाहा, पर कदम लड़खड़ा गए।

वह पास रखी सोफ़े पर गिर पड़ा।

होंठों पर झाग-सा उभर आया।

आवाज़ निकलनी बंद हो गई।

उसकी आँखें फैल गईं—डर से नहीं, समझ से।

लड्डू में मिला ज़हर असर दिखा चुका था।

सौम्या उसके पास घुटने के बल बैठी, गुनगुनाई, “नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो बचा था काले चोर ले गए।”

फ़्लैशबैक।

नानी कामिनी देवी का चेहरा, सौम्या से बात करते हुए—“मैंने उस लड़के को पहली ही नज़र में पढ़ लिया था, बिटिया। तू ग़म मत कर। मैं तुझे इस शैतान के चंगुल में नहीं पड़ने दूँगी।”

वापस कमरे में।

करण तड़प रहा था।

शब्द नहीं निकल रहे थे।

सौम्या उठी, चेहरे का एक्सप्रेशन बदला, ख़ुशी नहीं—झूठा भय। तेज़ी से दरवाज़े की ओर भागी।

“पापा!” चीखी। “राजीव भैया, जल्दी आइए!”

उसकी आवाज़ काँप रही थी—बिल्कुल वैसी, जैसी सब उम्मीद करते।

“साँप!”

“साँप है कमरे में!”

“जल्दी आइए—देखो, साँप!”

हवेली में हलचल मच गई।

दरवाज़े खुलने लगे।

कदमों की आवाज़ें तेज़ हुईं।

और कमरे के भीतर—करण शांत हो गया था। उसका जिस्म ठंडा पड़ चुका था।

छह महीने बाद, ब्रुसेल्स सेंट्रल रेलवे स्टेशन, बेल्जियम।

सौम्या हाथ में एक किताब लिए उस सुंदर लाल ट्रेन से उतर रही थी। पिंक पैडेड डिज़ाइनर जैकेट, चुस्त गहरी नीली डेनिम जीन्स, सिर पर सफ़ेद मुलायम सर्दी की टोपी और नीचे बड़े जूते। पीठ पर एक छोटा-सा बैग। 

फोन पर अपनी माँ जानकी देवी से बात कर रही थी, “क्या रोज़ पूछती हो माँ, अभी छह महीने हुए हैं, छह और बचे हैं कोर्स पूरा होने में, तभी आऊँगी इंडिया। चलो बाद में करती हूँ।”

फ़ोन काट देती है और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती है।

तभी फ़ोन वाइब्रेट होता है।

अज्ञात नंबर से एक मैसेज फ़्लैश होता है।

“हर रात हर रात।”

सौम्या का चेहरा फीका पड़ जाता है।

करण की अंत्येष्टि की यादें मन में कौंध जाती हैं—वह अर्थी पर लिपटा शव, जल्दी में किया गया दाह संस्कार।

“कैसे…?”

वह चारों ओर देखती है। स्टेशन की भीड़ में हर चेहरा अजनबी लग रहा है। कोई उसे देख रहा है या सिर्फ़ उसका वहम है?

मैसेज खुद-ब-खुद मिट जाता है।

स्क्रीन पर कुछ भी नहीं बचता—जैसे कभी आया ही न हो।

लेकिन सौम्या की उँगलियाँ ठंडी हो चुकी हैं।

वह तेज़ी से चलने लगती है, जैसे कोई पीछे आ रहा हो।