शादी में छह दिन बाकी थे। आँगन में मेहँदी की रस्म चल रही थी।
सौम्या ज़मीन पर बिछे गद्दों पर बैठी थी। उसके चारों ओर औरतों का घेरा था—हँसी, गीत, चूड़ियों की खनक। उसकी हथेलियों पर मेहँदी चढ़ रही थी, गाढ़ी, ठंडी, धीरे-धीरे आकार लेती हुई।
उसकी नानी, कामिनी देवी, झुकी हुई करीने से डिज़ाइन बना रही थीं। उम्र ने उनकी उँगलियाँ काँपती ज़रूर कर दी थीं, पर पकड़ अब भी मज़बूत थी।
किसी ने कहा, “अरे, ये मेहँदी तो लड़के वालों की तरफ़ से आई है।”
सौम्या के भीतर कुछ चुभा। एक पल को आँगन की आवाज़ें पीछे हट गईं। बाथरूम का वह दरवाज़ा, वह आवाज़, वह मुस्कान—सब उसके मस्तिष्क में कौंध गया। उसने जबरन चेहरे पर मुस्कान टिकाई।
“क्या हुआ, बेटी?” कामिनी देवी ने बिना सिर उठाए पूछा।
“कुछ नहीं, नानी,” सौम्या ने कहा, और मुस्कुरा दी।
कामिनी देवी समझ गईं। उन्होंने हल्का-सा सिर उठाकर उसे देखा। “सबको डर लगता है, बेटा,” उन्होंने धीमे से कहा। “लोग कहते हैं लड़कियों को शादी का शौक़ होता है, पर ससुराल का डर भी साथ चलता है।”
जानकी देवी ने बात काट दी। “अरे माँ, इन बच्चियों को ये प्रवचन मत सुनाइए।”
सब हँस पड़े।
कामिनी देवी भी मुस्कुराईं। मेहँदी लगाते-लगाते बोलीं, “अच्छा, चलो… एक कहानी सुनाती हूँ।”
आस-पास बैठी युवतियाँ एक साथ बोल पड़ीं—“नहीं नानी, प्लीज़।”, “आपकी कहानियाँ बहुत बोरिंग होती हैं।”
कामिनी देवी ने हाथ रोक दिया। “अरे, आज बिल्कुल नई कहानी।”
सब चुप हो गईं।
“ये कहानी मेरी माँ की है,” उन्होंने कहना शुरू किया। “आज से अस्सी-पचासी साल पहले, जब अंग्रेज़ों का राज था।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
“मेरी माँ की भी इसी तरह शादी होने वाली थी,” कामिनी देवी बोलीं। “माँ नई-नई मेहँदी लगाकर सखियों के साथ गाँव में घूम रही थीं।”
उन्होंने साँस ली। “एक अंग्रेज़ सिपाही आया… और हवा में उनका पल्लू उड़ा दिया।”
आँगन में जैसे साँसें थम गईं।
एक कज़िन ने फुसफुसाकर पूछा, “फिर?”
“फिर क्या,” कामिनी देवी बोलीं। “मेरी माँ ने उसी सिपाही की कटारी छीनी और उसी के चेहरे पर चला दी।”
कई मुँह खुले रह गए।
“मुँह छुपाता भागा, चिल्लाता हुआ,” उन्होंने शांति से कहा। “मेरी माँ के हाथ की मेहँदी खराब हो गई… पर उन्होंने परवाह नहीं की।”
एक कज़िन हँस पड़ी। “वाओ… टाइगर बड़ी नानी!”
तालियाँ बज उठीं। हूटिंग होने लगी।
कामिनी देवी मुस्कुराईं और फिर से मेहँदी लगाने लगीं।
जानकी देवी तनिक झुँझला गईं। “रहने दो माँ… हमने तो ये कहानी कभी नहीं सुनी। एक अंग्रेज़ को ही घायल कर दिया होता तो पूरा गाँव जलाते वो लोग।”
कामिनी देवी का हाथ रुक गया। “गोरा नहीं था, था तो वो अपना ही हिंदुस्तानी,” उन्होंने शांत स्वर में कहा। “अंग्रेज़ों की लाल वर्दी पहनकर घूम रहा था। उन दिनों उसी वर्दी का रौब था।”
उन्होंने मेहँदी फिर से चलानी शुरू की। “पर मेरी माँ एक ही बात जानती थीं—औरत के लिए इज़्ज़त से बढ़कर कुछ नहीं।”
सौम्या ने अनायास ही अपनी माँ की ओर देखा। जानकी देवी की नज़र उससे मिली। एक पल।
फिर जानकी देवी उठ खड़ी हुईं। “मैं रसोई में ज़रा देख आती हूँ,” उन्होंने कहा। “जल्दी निपटाओ ये सब।” वह चली गईं।
कामिनी देवी ने धीरे से कहा, “ये क्यों जली-भुनी बैठी है?”
सब हँस पड़े।
सौम्या की हथेलियों पर मेहँदी गाढ़ी होती जा रही थी। रंग अभी कच्चा था। लेकिन कहानी अंदर उतर चुकी थी।