My groom has to die - 10 in Hindi Women Focused by Varun books and stories PDF | मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 10: शर्त

The Author
Featured Books
Categories
Share

मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 10: शर्त

कमरा छोटा था।

दीवारों पर शीशे नहीं—सिर्फ़ एक बड़ा आईना, जिस पर गुलाबी परदा आधा गिरा था। बाहर भजन की आवाज़ आती-जाती थी, जैसे कोई याद दिला रहा हो कि यह जगह सुरक्षित मानी जाती है।

जख्खड़ ने कुर्सी की पीठ से टेक लगाई।

सौम्या सामने बैठी थी—सीधी, बिना हिले।

उसने समय बर्बाद नहीं किया।

“मुझे करण प्रताप सिंह को ख़त्म करना है,” वह बोली। “शादी से ठीक पहले।”

कमरे की हवा नहीं बदली।

बस जख्खड़ की आँखें ज़रा-सी सिकुड़ीं।

“क्यों?” उसने पूछा।

“क्योंकि वो एक हैवान है,” सौम्या ने बिना रुके कहा। “और मुझे एक हैवान से शादी नहीं करनी।”

जख्खड़ कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला, “यहाँ हमारे विचार मिलते हैं।” उसकी आवाज़ सपाट थी। “पर इतनी सुरक्षा के बीच—ठाकुर की हवेली में—ये आसान नहीं।”

“अंदर घुसाने का काम मेरा होगा,” सौम्या ने कहा। “मैं उसी हवेली में पली-बढ़ी हूँ। हर गुप्त रास्ता जानती हूँ—सीढ़ियाँ, तहख़ाने, पुराने दरवाज़े। शादी के दिन वहाँ भीड़ होगी।”

जख्खड़ ने सिर थोड़ा झुकाया। “और अगर ये एक चाल हो?” उसकी आवाज़ में ठंडक आ गई। “मुझे फँसाने की।”

सौम्या खड़ी हो गई। उसने हाथ जोड़े।

आँखें पहली बार झुकीं।

“आप मुझसे बड़े हैं,” वह बोली। “बड़े भाई जैसे।”

उसकी आवाज़ काँपी नहीं, पर आँखें भर आई थीं।

“मेरे पिता और मेरे होने वाले पति ने जो आपके साथ किया है—उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ। पर यकीन मानिए, मैं इस पाप की दुनिया से निकलना चाहती हूँ।”

एक पल रुकी। “शादी में बस दो दिन बचे हैं। मेरी ज़िंदगी को नर्क बनने से बचा लीजिए, भैया।”

कमरे में भजन की एक पंक्ति आई—और चली गई।

जख्खड़ नरम पड़ा।

पर उसने कुछ कहा नहीं।

उसने जेब से एक छोटा-सा काला फ्लिप फोन निकाला।

टेबल पर रख दिया।

“ये रखो,” उसने कहा। “बर्नर फोन है।”

सौम्या ने फोन उठा लिया।

हाथ नहीं काँपे।

“जल्द ही बात होगी,” जख्खड़ बोला।

वह उठा और पीछे के दरवाज़े से तेज़ी से बाहर निकल गया।

सौम्या ने फोन पर्स में रखा।

आँसू पोंछे।

कंधे सीधे किए।

जब बाहर निकली, उसकी नज़र रश्मि से मिली।

सिर्फ़ एक हल्का-सा आँख का इशारा।

रश्मि समझ गई।

काउंटर पर बैठी सुनंदा मौसी मुस्कराईं।

“अरे ओ बिमला,” उन्होंने आवाज़ लगाई, “बिटिया का मेकअप शुरू करो। बड़ी कमचोर हो तुम लोग।”

पार्लर फिर से वही बन गया—आईने, ब्रश, हँसी, और झूठी सुरक्षा का कमरा।

पर सौम्या के भीतर, कई दिनों बाद, उम्मीद की एक किरण सी जगी थी।

शादी वाले दिन

हवेली रोशनी से नहा रही थी।

आँगन से लेकर पिछवाड़े तक रंगीन लाइटों की लड़ियाँ थीं। सौ प्रकार के व्यंजन—कहीं कढ़ाई में उबलती दाल, कहीं घी में डूबे कचौरी, कहीं मटन की खुशबू, कहीं मिठाइयों की कतारें। फिर चाइनीज़, पिज़्ज़ा और लाइव डोसा काउंटर। ढोल, शहनाई और डीजे की धुनें एक-दूसरे में उलझी हुई थीं।

कहीं कठपुतली का खेल चल रहा था, कहीं कलाबाज़ हवा में उलटियाँ खा रहे थे। बच्चों की चीखें, औरतों की हँसी, मर्दों की ऊँची आवाज़ें—सब कुछ वैसा ही था जैसा एक बड़ी शादी में होना चाहिए।

मेहमानों की सूची लंबी थी।

बड़े नेता, जाने-माने चेहरे, दो-चार अभिनेता भी। हर कोई मुस्करा रहा था। हर कोई सुरक्षित महसूस कर रहा था।